धर्मनाथ तीर्थकर, सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 61 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 71
English translation of Uttar Puran parv 61- shlok 72 to 81
श्लोक ( Shlok ) 72
परस्परानुकूल्येन मतिरूपबलान्वितौ । परानाक्रम्य सर्वान् स्वान् रञ्जयामासतुर्गुणैः ॥ ७२ ॥
एक दूसरेके अनुकूल बुद्धि, रूप और बलसे सहित उन दोनों भाइयोंने समस्त शत्रुओं पर आक्रमण कर आत्मीय लोगोंको अपने गुणोंसे अनुरक्त बनाया था ॥ ७२ ॥
“Endowed with intellect, physical beauty, and strength that perfectly complemented one another, the two brothers launched campaigns against all their enemies and deeply endeared their own people to themselves through their exceptional virtues.” || 72 ||
श्लोक ( Shlok ) 73
अविभक्तापि दोषाय भुज्यमाना तयोरभूत् । न लक्ष्मीः शुद्धचित्तानां शुद्धयै निखिलमप्यलम् ॥ ७३ ॥
यद्यपि उन दोनोंकी लक्ष्मी अविभक्त थी- परस्पर बाँटी नहीं गई थी तो भी उनके लिए कोई दोष उत्पन्न नहीं करती थी सो ठीक ही है क्योंकि जिनका चित्त शुद्ध है उनके लिए सभी वस्तुएँ शुद्धताके लिए ही होती हैं ।॥ ७३ ॥
“Although their wealth and royal prosperity (Lakshmi) were undivided—never partitioned between them—it never gave rise to any conflict or fault. This is indeed appropriate, for to those whose minds are pure, all things serve only to increase their purity.” || 73 ||
श्लोक ( Shlok ) 74 – 76
अथाभुङ्गारते क्षेत्रे ‘विषये कुरुजाङ्गले । हास्तिनाख्यपुराधीशो मधुक्रीडो महीपतिः ॥ ७४ ॥राजसिंहचरो लङ्घिताखिलारातिसंहतिः । असहँस्तौ समुद्यन्तौ तेजसा बलकेशवौ ॥ ७५ ॥ करं परार्थ्यरत्नानि याचित्वा प्राहिणोद्बली । दण्डगर्भाभिधानाभिशालिनं सचिवाग्रिमम् ॥ ७६ ॥
अथानन्तर इसी भरतक्षेत्र के कुरुजांगल देशमें एक हस्तिनापुर नामका नगर है उसमें मधुक्रीड़ नामका राजा राज्य करता था। वह सुमित्रको जीतनेवाले राजसिंहका जीव था। उसने समस्त शत्रुओं के समूहको जीत लिया था, वह तेजसे बढ़ते हुए बलभद्र और नारायणको नहीं सह सका इसलिए उस बलवान्ने कर-स्वरूप अनेकों श्रेष्ठ रत्न माँगनेके लिए दण्डगर्भ नामका प्रधानमंत्री भेजा ॥ ७४-७६ ।।
“Thereafter, within the Kurujangala province of this very Bharata-kshetra, there lies a city named Hastinapur. A king named Madhukrida ruled there; he was the soul of King Rajasimha (who had previously defeated King Sumitra). Having conquered the entire host of his enemies, he could not tolerate the rising power and splendor of Balabhadra and Narayana. Therefore, that powerful king dispatched his Prime Minister, Dandagarbha, to demand numerous finest jewels as tribute.” || 74-76 ||
श्लोक ( Shlok ) 77
तद्वचःश्रवणात्तौ च गजकण्ठरवश्रुतेः । कण्ठीरवौ वा संक्रुद्धौ रुद्ध्वाऽहर्पतितेजसौ ॥ ७७ ॥
जिस प्रकार हाथीके कण्ठका शब्द सुनकर सिंह क्रुद्ध हो जाते हैं उसी प्रकार सूर्यके समान तेजके धारक दोनों भाई प्रधानमंत्रीके शब्द सुनकर क्रुद्ध हो उठे ॥ ७७ ॥
“Just as lions are instantly enraged upon hearing the deep roar of an elephant, those two brothers, who possessed splendor as radiant as the sun, flared up in fierce anger upon hearing the words of the Prime Minister.” || 77 ||
श्लोक ( Shlok ) 78
क्रीडितुं याचते मूढो गर्भव्यालं जडः करम् । समीपवर्ती चेत्तस्य समवर्ते तु दीयते ॥ ७८ ॥
और कहने लगे कि वह मूर्ख खेलनेके लिए साँपों भरा हुआ कर माँगता है सो यदि वह पास आया तो उसके लिए वह कर अवश्य दिया जावेगा ॥ ७८ ॥
“And they said, ‘That fool is demanding a tribute (Kar) filled with venomous serpents just for his amusement! If he dares to come near us, that tribute shall most certainly be delivered to him!'” || 78 ||
श्लोक ( Shlok ) 79
इत्युक्तवन्तौ तत्कोपकठोरोक्त्या स सत्वरम् । गत्वा तत्कार्यपर्यायमधुक्रीडमजिज्ञपत् ॥ ७९ ॥
इस प्रकार क्रोधसे वे दोनों भाई कठोर शब्द कहने लगे और उस मंत्रीने शीघ्र ही जाकर राजा मधुक्रीड़को इसकी खबर दी ॥ ७९ ॥
“In this manner, overflowing with rage, the two brothers began uttering these harsh and defiant words. Hearing this, the minister immediately hurried back and reported the entire matter to King Madhukrida.” || 79 ||
श्लोक ( Shlok ) 80
सोऽपि तदुर्वचः श्रुत्वा कोपारुणितविग्रहः । विग्रहाय सहैताभ्यां प्रतस्थे बहुसाधनः ॥ ८० ॥
राजा मधुक्रीड़ भी उनके दुर्वचन सुनकर क्रोधसे लाल शरीर हो गया और उनके साथ युद्ध करनेके लिए बहुत बड़ी सेना लेकर चला ।। ८० ।।
“Upon hearing their insolent words, King Madhukrida’s entire body flushed crimson with fury, and he marched forth with a massive army to wage war against them.” || 80 ||
श्लोक ( Shlok ) 81
अभिगम्य तमाक्रम्य युद्ध्वा युद्धविशारदः । अच्छिनत्तस्य चक्रेण शिरः सद्यः स केशवः ॥ ८१ ॥
युद्ध करनेमें चतुर नारायण भी उसके सामने आया, उसपर आक्रमण किया, चिर-काल तक उसके साथ युद्ध किया और अन्तमें उसीके चलाये हुए चक्र ले शीघ्र ही उसका शिर काट डाला ॥ ८१ ॥
“Narayana, who was highly skilled in warfare, also advanced to confront him. He launched a fierce assault and fought against him for a very long time, until finally, using the enemy’s very own Chakra (discus weapon), he swiftly severed his head.” || 81 ||
श्लोक 82 से 90
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तीर्थंकर तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ तीर्थकर पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ तीर्थंकर पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ भगवान् पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पुराण का वर्णन पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पुराण का वर्णन पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पुराण का वर्णन पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ तीर्थकर त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य जिनेन्द्र, द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण का वर्णन पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 – श्लोक 1 से 319
अनन्तनाथ तीर्थंकर, सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायणके पुराणका वर्णन पर्व 60 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 85
धर्मनाथ तीर्थकर, सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 61 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 71
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |