राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 123
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 124 to 132
श्लोक ( Shlok ) 124
तदैव कातरः सूर्पणखामाहूय केनचित् । प्रकारेण त्वया सीता मयि रक्ता विधीयताम् ॥ १२४ ॥
उसी समय उस कायरने शूर्पणखाको बुलाकर कहा कि तू किसी उपायसे सीताको मुझमें अनुरक्त कर ॥ १२४ ॥
“At that very time, that coward summoned Shurpanakha and told her, ‘By some means or another, make Sita devotedly attached to me.'” (124)
श्लोक ( Shlok ) 125
इत्याह सादरं सापि तत्सङ्गीर्य विहायसि । तदैव रंहसा गत्वा प्रापद्वाराणसीं पुरीम् ॥ १२५ ॥
इस प्रकार उसने बड़े आदरसे कहा। शूर्पणखा भी इस कार्यकी प्रतिज्ञा कर उसी समय वेगसे आकाशमें चल पड़ी और बनारस जा पहुँची ।॥ १२५ ॥
“In this manner, he spoke with great respect. Having pledged to carry out this task, Shurpanakha also immediately set out through the sky with great speed and arrived in Benares.” (125)
श्लोक ( Shlok ) 126
चित्रकूटाभिधोद्याने नन्दनाच्चातिसुन्दरे । रामो रन्तु तदा गत्वा वसन्ते सीतया सह ॥ १२६ ॥
उस समय वसन्त ऋतु थी अतः रामचन्द्रजी नन्दन वनसे भी अधिक सुन्दर चित्रकूट नामक वनमें रमण करनेके लिए सीताकेसाथ गये हुए थे ।। १२६ ।।
“It was the spring season at that time; therefore, Ramachandraji, accompanied by Sita, had gone to sport in the forest named Chitrakoot, which was even more beautiful than the Nandan Van (the celestial grove of Indra).” (126)
श्लोक ( Shlok ) 127 – 130
मध्येवनं परिक्रम्य वीक्ष्य नानावनस्पतिम् । सप्रसूनां सहासां वा सरागां वा सपल्लवाम् ॥ १२७ ॥लतां समुत्सुकस्तन्वीं तन्वीमन्यामिव प्रियाम् । आलोकमानो जानक्यालोकितः स सकोपया ॥ १२८ ॥कुपितेयं विना हेतोः प्रसाद्येत्येवमब्रवीत् । पश्य चन्द्रानने भृङ्गं लतायाः कुसुमे भृशम् ॥ १२९ ॥तवास्ये मामिवासक्त’ तत्र तर्पयितु स्वयम् । रागं पिण्डीद्रुमाः पुष्पैरुद्भिरन्तीव नूतनैः ॥ १३० ॥
वहाँ वे वनके बीचमें घूम-घूमकर नाना वनस्पतियोंको देख रहे थे। वहाँ एक लता थी जो फूलोंसे सहित होनेके कारण ऐसी जान पड़ती थी मानों हँस ही रही हो तथा पल्लवोंसे सहित होनेके कारण ऐसी मालूम होती थी मानो अनुरागसे सहित ही हो। वह पतली थी और ऐसी जान पड़ती थी मानो कृश शरीरवाली कोई दूसरी स्त्री ही हो। वे उसे बड़ी उत्सुकता से देख रहे थे। उस लताको देखते हुए रामचन्द्रजीके प्रति सीताने कुछ क्रोध युक्त होकर देखा। उसे देखते ही रामचन्द्रने कहा कि यह विना कारण ही कुपित हो रही है अतः इसे प्रसन्न करना चाहिए। वे कहने लगे कि हे चन्द्रमुखि ! देख, जिस प्रकार मैं तुम्हारे मुख पर आसक्त रहता हूं उसी प्रकार इधर यह भ्रमर इस लताके फूल पर कैसा आसक्त हो रहा है? उधर ये अशोक वृक्ष स्वयं सन्तुष्ट करनेके लिए नये-नये फूलोंके द्वारा मानो अपना अनुराग ही प्रकट कर रहे हैं ।॥१२७-१३०।।
“There, while wandering in the midst of the forest, they were observing various types of flora. In that place, there was a creeper (vine) which, being laden with flowers, appeared as though it were smiling; and being adorned with tender new leaves, it seemed as if it were filled with love and passion. It was slender, looking just like another woman with a delicate frame. They were gazing at it with great curiosity.
While looking at that creeper, Sita cast a somewhat angry glance at Ramachandraji. Seeing this, Ramachandra thought, ‘She is getting angry without any cause, so she must be appeased.’ He then began to say, ‘O moon-faced one! Look, just as I am deeply attached to your face, how passionately attached this black bee is to the flower of this creeper! And over there, these Ashok trees, in order to please you, seem to be expressing their own love through fresh new blossoms.'” (127-130)
श्लोक ( Shlok ) 131 – 132
मम नेत्रालिनोः प्रीत्यै वध्वैभिश्चित्रशेखरम् । स्वहस्तेन प्रिये मेऽमूनलङ्गुरु शिरोरुहान् ॥ १३१ ॥ एतत्पुष्पैः प्रवालैश्च भूषणानि प्रकल्पये । तवापि त्वं विभास्येतैर्जङ्गमेव लताऽपरा ॥ १३२ ॥
हे प्रिये ! मेरे नेत्ररूपी भ्रमरोंको सन्तुष्ट करनेके लिए तू इन फूलोंके द्वारा चित्र-विचित्र सेहरा बाँधकर अपने हाथसे मेरे इन केशोंको अलंकृत कर। मैं तेरे लिए भी इन पुष्पों और प्रवालोंसे भूषण बनाता हूं। इन फूलों और प्रवालोंसे तू सचमुच ही एक चलती-फिरती लताके समान सुशोभित होगी ।। १३१-१३२ ॥
“O beloved! To satisfy the black bees that are my eyes, tie an exquisite, multicolored chaplet (garland/sehra) with these flowers and adorn these locks of my hair with your own hands. I, too, shall fashion ornaments for you using these blossoms and tender sprouts. Adorned with these flowers and coral-red shoots, you will truly shine like a living, walking creeper vine.” (131-132)
श्लोक 133 से 141
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राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 123
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