मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 254 | श्लोक 255 से 273
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 274 to 281
श्लोक ( Shlok ) 274
विचिन्त्येति यतीन् भक्त्या तत्स्थ एवाभिवन्द्य तान् । वैमनस्येन तैश्च्छात्रैर्नगरं प्राविशत् समम्॥२७४॥
ऐसा विचारकर उसने उन मुनियोंको वहीं वृक्षके नीचे बैठे बैठे भक्तिपूर्वक नमस्कार किया और फिर बड़ी उदासीनतासे उन तीनों छात्रोंके साथ वह अपने नगर में आ गया ।। २७४ ॥
Reflecting thus, he reverentially bowed to those monks from where he sat beneath the tree. Thereafter, with a heart weighed down by deep despondency, he returned to his city accompanied by the three students. ( 274)
श्लोक ( Shlok ) 275
शास्त्रबालत्वयोरेकवत्सरे परिपूरणे । वसोः पिता स्वयं पहुं बध्वा प्रायात्तपोवनम् ॥ २७५॥
एक वर्षके बाद शास्त्रा-ध्ययन तथा बाल्यावस्था पूर्ण होनेपर वसुके पिता विश्वावसु, वसुको राज्यपट्ट ‘बाँधकर स्वयं तपो-वनके लिए चले गये ।। २७५ ।।
After the lapse of a year, when Vasu had completed both his scriptural studies and the years of his youth, his father, Viśvāvasu, invested him with the royal sovereignty by ceremonially conferring the crown of kingship and then himself departed for the forest to undertake a life of austerities. ( 275)
श्लोक ( Shlok ) 276 – 277
वसुः निष्कण्टकं पृथ्वी पालयन् हेलयान्यदा । वनं विहर्तुमभ्येत्य पयोधरपथाद् द्विजान् ॥ २७६॥ प्रस्खल्य पतितान् वीक्ष्य विस्मयादिति खाद् द्रुतम् । पततां हेतुनावश्यं भवितव्यमिति स्फुटम् ॥२७७॥
इधर बसु पृथिवीका अनायास ही निष्कण्टक पालन करने लगा। किसी एक दिन वह विहार करनेके लिए वनमें गया था। वहीं क्या देखता है कि बहुतसे पक्षी आकाशमें जाते-जाते टकराकर नीचे गिर रहे हैं। यह देख उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। वह विचार करने लगा कि आकाशसे जो ये पक्षी नीचे गिर रहे हैं इसमें कुछ कारण अवश्य होना चाहिये ।। २७६-२७७ ।।
Meanwhile, Vasu governed the earth with ease, ruling over an untroubled and unopposed kingdom. One day, while wandering through the forest for recreation, he witnessed a remarkable sight: numerous birds, as they flew through the sky, suddenly collided with something unseen and fell to the ground.The spectacle filled him with profound astonishment, and he reflected within himself:“There must surely be some hidden cause behind these birds falling from the sky in this manner.”( 276–277)
श्लोक ( Shlok ) 278 – 279
मत्वाकृष्यधनुर्बाणममुञ्चत्तत्प्रदेशवित् । स्खलित्वा ३ पतितं तस्मात्तं समीक्ष्य महीपतिः ॥ २७८॥ तत्प्रदेशं स्वयं गत्वा रथिकेन सहास्पृशत् । आकाशस्फटिकस्तम्भं विज्ञायाविदितं परैः ॥२७९॥
यह विचार, उसने उस स्थानका ज्ञान प्राप्त करनेके लिए धनुष खींचकर एक वाण छोड़ा वह वाण भी वहाँ टकराकर नीचे गिर पड़ा। यह देख, राजा वसु वहाँ स्वयं गया और सारथिके साथ उसने उस स्थानका स्पर्श किया। स्पर्श करते ही उसे मालूम हुआ कि यह आकाश स्फटिकका स्तम्भ है, वह स्तम्भ आकाशके रङ्गसे इतना मिलता जुलता था कि किसी दूसरेको आजतक उसका बोध नहीं हुआ था ।। २७८-२७९ ॥
With this thought in mind, he drew his bow and discharged an arrow to discover the nature of that place. The arrow too struck something unseen and fell to the ground.Witnessing this, King Vasu personally approached the spot and, together with his charioteer, examined it by touch. The moment he made contact, he realized that it was a pillar of crystal rising into the sky. So perfectly did the crystal pillar blend with the color of the heavens that, until that day, no one had ever perceived its existence.(278–279)
श्लोक ( Shlok ) 280 – 281
आनाय्य तेन निर्माप्य पृथुपादचतुष्टयम् । तत्सिंहासनमारुह्य सेव्यमानो नृपादिभिः ॥२८०॥ वसुः सत्यस्य माहात्म्यात्स्थितः खे सिंहविष्टरे । इति विस्मयमानेन जनेनाघोषितोन्नतिः ॥२८१॥
राजा वसुने उस स्तम्भको घर लाकर उसके चार बड़े बड़े पाये बनवाये और उनका सिंहासन बनवाकर वह उसपर आरूढ़ हुआ। उस समय अनेक राजा आदि उसकी सेवा करते थे। लोग बड़े आश्चर्यसे उसकी उन्नतिकी घोषणा करते हुए कहते थे कि देखो, राजा वसु सत्यके माहात्म्यसे सिंहासनपर अधर आकाशमें बैठता है ॥२८०-२८१॥
King Vasu had that crystal pillar brought to his palace and fashioned from it four massive supports, upon which he caused a magnificent throne to be constructed. Ascending this extraordinary seat, he held court while attended by numerous kings and other dignitaries.Filled with amazement at his unparalleled elevation, the people proclaimed:“Behold! By the majesty of his truthfulness and righteousness, King Vasu sits enthroned, suspended in the very sky.”( 280–281)
श्लोक 282 से 292
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मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33 | श्लोक 34 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 135 | श्लोक 136 से 152 | श्लोक 153 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 254| श्लोक 255 से 273
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