मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 293 से 304 | श्लोक 305 से 321 | श्लोक 322 से 332 | श्लोक 333 से 343 | श्लोक 344 से 353
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 354 to 370
श्लोक ( Shlok ) 354 – 356
इत्युक्स्वा वैरिनाशार्थमात्मीयान् दितिपुत्रकान् । तीब्रान् सगरराष्ट्रस्य बाधां तीव्रज्वरादिभिः ॥३५४॥ कुरुध्वमिति सम्प्रेष्य सद्विजस्तत्पुरं गतः । सगरं मन्त्रगर्भाशीर्वादेनालोक्य पर्वतः ॥ ३५५॥ स्वप्रभावं प्रकाश्यास्य त्वद्देशविषमाशिवम् । ‘शममिष्यामि यज्ञेन समन्त्रेणाविलम्बितम् ॥३५६॥
ऐसा कहकर महाकालने वैरियोंका नाश करनेके लिए अपने क्रूर असुरोंको बुलाया और आदेश दिया कि तुम लोग राजा सगरके देशमें तीव्र ज्वर आदिके द्वारा पीड़ा उत्पन्न करो। यह कहकर असुरोंको भेजा और स्वयं पर्वतको साथ लेकर राजा सगरके नगरमें गया। वहाँ मन्त्र मिश्रित आशीर्वादके द्वारा सगरके दर्शन कर पर्वतने अपना प्रभाव दिखलाते हुए कहा कि तुम्हारे राज्यमें जो घोर अमंगल हो रहा है मैं उसे मन्त्रसहित यज्ञके द्वारा शीघ्र ही शान्त कर दूँगा ॥ ३५४-३५६ ।।
Saying this, and with the intent to destroy his enemies, Mahakala summoned his cruel demons (Asuras) and commanded, “Go and inflict severe suffering upon the kingdom of King Sagara by unleashing raging fevers and other ailments.”
Having dispatched the demons with this order, he personally took Parvata along and went to King Sagara’s city. There, after gaining an audience with Sagara and offering him blessings laden with occult mantras, Parvata demonstrated his influence and asserted, “I shall very swiftly pacify the terrible, inauspicious calamities currently ravaging your kingdom by performing a sacrifice (Yajna) accompanied by powerful mantras.” || 354-356 ||
श्लोक ( Shlok ) 357
यज्ञाय वेधसा सृष्टा पशवस्तद्विहिंसनात् । न पापं पुण्यमेव अस्यात्स्वर्गोरुसुखसाधनम् ॥३५७॥
विधाताने पशुओंकी सृष्टि यज्ञके लिए ही की है अतः उनकी हिंसासे पाप नहीं होता किन्तु स्वर्गके विशाल सुख प्रदान करनेवाला पुण्य ही होता है ।॥ ३५७ ॥
“The Creator has fashioned animals solely for the purpose of sacrifice; therefore, no sin is incurred by slaughtering them. On the contrary, it yields profound merit (Punya) that bestows the vast, boundless joys of heaven.” || 357 ||
श्लोक ( Shlok ) 358 – 359
इति प्रत्याय्य तं पापः पुनरप्येवमब्रवीत् । त्वं पशूनां सहस्त्राणि षष्टि यागस्य सिद्धये ॥३५८॥ कुरु संग्रहमम्यच्च द्रव्यं तद्योग्यमित्यसौ । राजापि सर्ववस्तूनि तथैवास्मै समर्पयत् ॥ ३५९॥
इस प्रकार विश्वास दिलाकर वह पापी फिर कहने लगा कि तुम यज्ञकी सिद्धिके लिए साठ हजार पशुओंका तथा यज्ञके योग्य अन्य पदार्थोंका संग्रह करो । राजा सगरने भी उसके कहे अनुसार सब वस्तुएँ उसके लिए सौंप दीं ॥ ३५८-३५९ ।।
Instilling confidence in this manner, that sinner further said, “To ensure the successful completion of the sacrifice, gather sixty thousand animals along with all the other materials required for the ritual.” King Sagara, adhering strictly to his words, handed over all the requested items to him. || 358-359 ||
श्लोक ( Shlok ) 360 – 361
प्रारभ्य पर्वतो यागं प्राणिनोऽमन्त्रयत्तदा । महाकालः शरीरेण सह स्वर्गमुपागतः ॥३६०॥ इत्याकाशे विमानैस्तान्नीयमानानदर्शयत् । देशाशिवोपसर्ग च तदैवासौ निरस्तवान् ॥३६१॥
इधर पर्वतने यज्ञ आरम्भ कर प्राणियों को मन्त्रित करना शुरू किया- मन्त्रोच्चारण पूर्वक उन्हें यज्ञ-कुण्डमें डालना शुरू किया। उधर महाकालने उन प्राणियोंको विमानोंमें बैठाकर शरीर सहित आकाशमें जाते हुए दिखलाया और लोगोंको विश्वास दिला दिया कि ये सब पशु स्वर्ग गये हैं। उसी समय उसने देशके सब अमङ्गल और उपसर्ग दूर कर दिये ।। ३६०-३६१ ।।
Meanwhile, Parvata commenced the sacrifice and began consecrating the living beings with incantations—casting them into the sacrificial pit (Yajna-kunda) while chanting mantras. On the other side, Mahakala generated an illusion, showing those creatures ascending into the sky in their physical bodies, seated inside celestial chariots (Vimanas), thereby convincing the people that all these animals had departed for heaven. At that very moment, he also banished all the plagues, inauspicious calamities, and afflictions from the kingdom. || 360-361 ||
श्लोक ( Shlok ) 362
मुग्धास्तत्प्रलम्भेन मोहिताः । तां गतिं प्रेप्सवो यागमृतिमाकांक्षयन्नलम् ॥३६२॥
यह देख बहुतसे भोले प्राणी उसकी प्रतारणा – मायासे मोहित हो गये और स्वर्ग प्राप्त करनेकी इच्छासे यज्ञमें मरनेकी इच्छा करने लगे ॥ ३६२ ।।
Witnessing this, numerous innocent and naive living beings were completely beguiled by his malicious deception and illusion, and out of a desperate desire to attain heaven, they began to wish for their own death in the sacrifice. || 362 ||
श्लोक ( Shlok ) 363
तद्यज्ञावसितौ जात्यं हयमेकं विधानतः । इयाज सुलसां देवीमपि राजाज्ञया खलः ॥३६३॥
यज्ञके समाप्त होने पर उस दुष्ट पर्वतने विधि-पूर्वक एक उत्तम जातिका घोड़ा तथा राजाकी आज्ञासे उसकी सुलसा नामकी रानीको भी होम दिया ॥ ३६३ ॥
Upon the conclusion of the sacrifice, that wicked Parvata, adhering to his distorted rituals, offered a fine-bred horse of noble pedigree, and, by the command of the King, also sacrificed King Sagara’s queen, named Sulasa, into the sacrificial fire pit. || 363 ||
श्लोक ( Shlok ) 364
प्रियकान्तावियोगोत्थशोकदाबानलचिषा । परिप्लुष्टतनू राजा राजधानीं प्रविष्टवान् ॥३६४॥
प्रिय स्त्रीके वियोगसे उत्पन्न हुए शोक रूपी दावानलकी ज्वालासे जिसका शरीर जल गया है ऐसा राजा सगर राजधानी में प्रविष्ट हुआ ॥ ३६४ ॥
His body consumed by the blazing flames of a forest fire called grief, born from the tragic separation from his beloved wife, King Sagara re-entered his capital city. || 364 ||
श्लोक ( Shlok ) 365
शय्यातले विनिक्षिप्य शरीरं प्राणिहिंसनम् । वृत्तं महदिदं धर्मः किमधर्मोऽयमित्यसौ ॥३६५॥
वहाँ शय्यातल पर अपना शरीर डाल कर वह संशय करने लगा कि यह जो बहुत भारी प्राणियोंकी हिंसा हुई है सो यह धर्म है या अधर्म ? ।। ३६५ ।।
Casting his body down upon his bed there, he began to harbor deep doubts, questioning himself, “This massive slaughter of living beings that has been carried out—is it truly righteousness (Dharma), or is it unrighteousness (Adharma)?” || 365 ||
श्लोक ( Shlok ) 366 – 369
संशयामस्तथान्येयुर्मुनिं यतिवराभिधम् । अभिवन्द्य मयारब्धं भट्टारक यथास्थितम् ॥३६६॥ ब्रूहि किं कर्म पुण्यं मे पापं चेदं विचार्य तत् । इत्यवोचदसौ चाह धर्मशास्त्रबहिः कृतम् ॥ ३६७॥ एतदेव विधातारं सप्तमीं प्रापयेत्क्षितिम् । तस्याभिज्ञानमप्यस्ति दिनेऽस्मिन् सप्तमे शनिः ॥३६८॥ पतिष्यति ततो यिद्धि सप्तमी धरणीति ते । तदुक्तं भूपतिर्मत्वा ब्राह्मणं तं न्यवेदयत् ॥३६९॥
ऐसा संशय करता हुआ वह यतिवर नामक मुनिके पास गया और नमस्कार कर पूछने लगा कि हे स्वामिन् ! मैंने जो कार्य प्रारम्भ किया है वह आपको ठीक-ठीक विदित है। विचार कर आप यह कहिये कि मेरा यह कार्य पुण्य रूप है अथवा पाप रूप ? उत्तरमें मुनिराजने कहा कि यह कार्य धर्मशास्त्र से बहिष्कृत है, यह कार्य ही अपने करनेवालेको सप्तम नरक भेजेगा। उसकी पहिचान यह है कि आजसे सातवें दिन वज्र गिरेगा उससे जान लेना कि तुझे सातवीं पृथिवी प्राप्त हुई है। मुनिराजका कहा ठीक मान कर राजाने उस ब्राह्मण-पर्वतसे यह सब बात कही ।। ३६६-३६९ ॥
Harboring such doubts, the King approached a prominent ascetic named Sage Yativara. Bowing before him respectfully, he began to inquire, “O Lord! The ritual enterprise that I initiated is fully known to you. Reflecting upon it, please tell me whether this deed of mine is of the nature of merit (Punya) or of sin (Papa)?”
In response, the King of Sages (Muniraja) declared, “This act is completely exiled from the true scriptures of righteousness (Dharma-shastras); it is this very deed that will dispatch its perpetrator to the seventh hell. As proof of this, a thunderbolt (Vajra) shall strike on the seventh day from today—by that sign, know for certain that the seventh hellish realm has been attained.”
Accepting the words of the sage as absolute truth, the King related this entire matter to that Brahmin, Parvata. || 366-369 ||
श्लोक ( Shlok ) 370
तन्मृषा किमसौ वेत्ति नग्नः क्षपणकस्ततः । ‘शङ्कास्ति चेत्तवैतस्या शान्तिरत्र विधीयते ॥३७०॥
राजाकी यह बात सुनकर पर्वत कहने लगा कि वह झूठ है, वह नंगा साधु क्या जानता है ? फिर भी तुझे यदि शंका है तो इसकी भी शांति कर डालते हैं ।॥ ३७० ॥
Hearing these words of the King, Parvata said, “That is an utter lie! What could that naked ascetic possibly know? Nevertheless, if you still harbor any lingering doubts, we shall pacify and resolve this matter as well.” || 370 ||
श्लोक 371 से 390
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