उत्तरपुराण के त्रेपन्नवें पर्व में सप्तम तीर्थंकर भगवान सुपार्श्वनाथ के पूर्वभव, जन्म, वैराग्य, दीक्षा, केवलज्ञान और निर्वाण का अत्यंत प्रेरक वर्णन किया गया है।
संक्षिप्त सारांश:
श्लोक 1 से 11 राजा नन्दिषेण का धर्ममय राज्य और वैराग्य का उदय
धातकीखण्ड के पूर्व विदेह क्षेत्र के सुकच्छ देश की क्षेमपुर नगरी में राजा नन्दिषेण बुद्धिमान, पराक्रमी, धर्मपरायण और लोकहितकारी शासक थे। उनके राज्य में सुख, समृद्धि और नीति का वास था। धर्म, अर्थ और काम तीनों पुरुषार्थ उनके जीवन में संतुलित थे, परंतु उन्होंने संसार के बन्धन, मोह और कर्मचक्र की गहनता को समझा। आत्मकल्याण की भावना से उन्होंने संसार की आसक्ति को धिक्कारा और मोक्षमार्ग की ओर उन्मुख हुए।
श्लोक 12 से 22 : दीक्षा, तीर्थंकर प्रकृति बन्ध और सुपार्श्वनाथ का गर्भावतरण
राजा नन्दिषेण ने पुत्र धनपति को राज्य देकर स्वयं अर्हन्नन्दन मुनि से दीक्षा ग्रहण की। ग्यारह अंगों का अध्ययन कर उन्होंने दर्शनविशुद्धि आदि सोलह कारण भावनाओं से तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध किया। संन्यासमरण के पश्चात वे मध्यम ग्रैवेयक के सुभद्र विमान में अहमिन्द्र देव बने। वहाँ से च्युत होकर वे काशी देश की बनारस नगरी के राजा सुप्रतिष्ठ और रानी पृथिवीषेणा के यहाँ गर्भस्थ हुए। रानी ने शुभ स्वप्न देखे और ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी को दिव्य पुत्र का जन्म हुआ।
श्लोक 23 से 34 : जन्मकल्याणक, अलौकिक सौन्दर्य और राज्यवैभव
इन्द्रों ने सुमेरु पर्वत पर जन्माभिषेक कर उनका नाम ‘सुपार्श्व’ रखा। वे प्रियंगु पुष्प के समान कान्तिमान, दिव्य लक्षणों से युक्त और अतिशयों से सम्पन्न थे। युवावस्था में उन्होंने राज्य स्वीकार किया, परन्तु भोगों के मध्य भी आत्मसंयम बनाए रखा। उनका जीवन ज्ञान, पुण्य, करुणा और अलौकिक प्रभाव से परिपूर्ण था।
श्लोक 35 से 42 : नश्वरता का बोध, वैराग्य और दीक्षा
ऋतु परिवर्तन देखकर भगवान सुपार्श्वनाथ को संसार और राज्यलक्ष्मी की नश्वरता का गहन बोध हुआ। उन्होंने समझा कि भोग और वैभव मायामय हैं तथा आत्मज्ञान ही शाश्वत है। लौकान्तिक देवों की प्रेरणा से वे मनोगति पालकी में सवार होकर सहेतुक वन पहुँचे और ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी को एक हजार राजाओं सहित दीक्षा धारण की। उसी समय उन्हें मनःपर्ययज्ञान प्राप्त हुआ।
श्लोक 43 से 51 : तप, केवलज्ञान और धर्मसंघ की स्थापना
दीक्षा के पश्चात भगवान सुपार्श्वनाथ ने नौ वर्ष तक मौनपूर्वक तप और संयम का पालन किया। शिरीष वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ होकर फाल्गुन कृष्ण षष्ठी को उन्होंने केवलज्ञान प्राप्त किया। उनके समवसरण में विशाल मुनिसंघ, आर्यिकाएँ, श्रावक-श्राविकाएँ तथा असंख्य देव उपस्थित रहे। उन्होंने धर्मामृतमयी वाणी से जीवों को मोक्षमार्ग की प्रेरणा दी।
श्लोक 52 से 56 : सम्मेदशिखर पर निर्वाण और मंगलमयी महिमा
अंतकाल समीप जानकर भगवान सुपार्श्वनाथ सम्मेदशिखर पहुँचे और प्रतिमायोग धारण किया। फाल्गुन कृष्ण सप्तमी को उन्होंने समस्त कर्मों का क्षय कर मोक्ष प्राप्त किया। देवों ने निर्वाणकल्याणक मनाया और सम्मेदशिखर को पवित्र निर्वाणभूमि घोषित किया। पूर्वभव के राजा नन्दिषेण, फिर अहमिन्द्र और अंततः सप्तम तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ के रूप में उनकी आत्मयात्रा वैराग्य, तप, सर्वज्ञता और मोक्ष का दिव्य आदर्श प्रस्तुत करती है।
श्लोक 1 से 11 राजा नन्दिषेण का धर्ममय राज्य और वैराग्य का उदय
English translation of Uttar Puran parv 53- shlok 1 to 11
श्लोक ( Shlok ) 1
तत्त्वं सत्त्वादिना येन नैकेनाप्यवधारितम् । तद्वित्तथाप्यसावेव स सुपाश्र्थोऽस्तु मे गुरुः ॥ १ ॥
जिन्होंने जीवाजीवादि तत्त्वोंको सत्त्व असत्त्व आदि किसी एक रूपसे निश्चित नहीं किया है फिर भी उनके जानकार वही हैं ऐसे सुपार्श्वनाथ भगवान् मेरे गुरु हों ॥ १ ॥
“May Lord Suparshvanath be my Guru—He who has not defined the principles of Jiva (soul) and Ajiva (non-soul) through a single lens such as ‘existence’ or ‘non-existence’ alone, yet remains the ultimate Knower of them all.”1
श्लोक ( Shlok ) 2
विदेहे धातकीखण्डे प्राच्यां सीतोत्तरे तटे । सुकच्छविषये नन्दिषेणः क्षेमपुराधिपः ॥ २ ॥
धातकीखण्ड के पूर्व विदेह क्षेत्रमें सीता नदीके उत्तर तट पर सुकच्छ नामका देश है। उसके क्षेमपुर नगरमें नन्दिषेण नामका राजा राज्य करता था ।। २ ।।
“In the eastern region of Dhatakikhanda, on the northern bank of the Sita River, lies a country named Sukaccha. In its city of Kshemapur, there reigned a king named Nandishen.” “In the eastern region of Dhatakikhanda, on the northern bank of the Sita River, lies a country named Sukaccha. In its city of Kshemapur, there reigned a king named Nandishen.”2
श्लोक ( Shlok ) 3
प्रज्ञाविक्रमयुक्तस्य स्वानुरक्तानुजीविनः । तस्यानुगुणदैवस्य राज्यश्रीः सुखदायिनी ॥ ३ ॥
वह राजा बुद्धि और पराक्रमसे युक्त था, उसके अनुचर सदा उसमें अनुराग रखते थे, यही नहीं दैव भी सदा उसके अनुकूल रहता था। इसलिए उसकी राज्य-लक्ष्मी सबको सुख देनेवाली थी ।॥ ३ ॥
“That King was endowed with both great wisdom and valor; his followers were deeply devoted to him, and even Fortune (destiny) was always in his favor. Consequently, the prosperity of his kingdom brought happiness to all.”3
श्लोक ( Shlok ) 4
शरीरं न भिषग्रक्ष्यं न राज्यमपि मन्त्रिभिः । तथापि तद्वयं तस्य क्षेमवत्सुकृतोदयात् ॥ ४ ॥
उसके शरीरकी न तो वैद्य लोग रक्षा करते थे और न राज्यकी मंत्री ही रक्षा करते थे फिर भी पुण्योदयसे उसके शरीर और राज्य दोनों ही कुशलयुक्त थे ॥ ४ ॥
“Neither did physicians (Vaidyas) need to protect his body, nor did ministers have to strive to protect his kingdom; yet, due to the rise of his past merits (Punya), both his health and his realm remained perfectly secure and prosperous.”4
श्लोक ( Shlok ) 5
पुरुषार्थत्रयं तस्मिन्नेकस्मिन्नेव सुस्थितम् । परस्परोपकारेण तस्मात्तस्योपकारिता ॥ ५ ॥
धर्म, अर्थ और काम ये तीनों पुरुषार्थ परस्परका उपकार करते हुए उसी एक राजामें स्थित थे इसलिए यह उस राजाका उपकारीपना ही था ।। ५ ।।
“Dharma (Righteousness), Artha (Prosperity), and Kama (Pleasure)—these three goals of life resided in that King, each mutually enhancing the others. This was, indeed, a testament to the King’s own benevolent and helpful nature.”5
श्लोक ( Shlok ) 6
जितारिभूभुजस्यास्य विजिगीषैहलौकिकी । मा भूनन्वस्ति सन्मार्ग रक्षतः पारलौकिकी ॥ ६ ॥
शत्रुओंको जीतनेवाले इस राजा नन्दिषेणको जीतनेकी इच्छा सिर्फ इस लोक सम्बन्धी ही नहीं थी किन्तु समीचीन मार्गकी रक्षा करते हुए इसके परलोकके जीतनेकी भी इच्छा थी ।। ६ ।।
“King Nandishen, the conquerer of his enemies, did not merely desire victory over this world; rather, while protecting the righteous path, he also desired to conquer the world beyond.”6
श्लोक ( Shlok ) 7
एवं राज्यसुखं श्रीमान् बन्धुमित्रानुजीविभिः । ‘सहसानुभवाज्जातवैराग्यातिशयः सुधीः ॥ ७ ॥
इस प्रकार वह श्रीमान् तथा बुद्धिमान् राजा बन्धुओं, मित्रों तथा सेवकोंके साथ राज्य-सुखका अनुभव करता हुआ शीघ्र ही विरक्त हो गया ।। ७ ।।
“In this manner, that glorious and wise King, while experiencing the pleasures of sovereignty alongside his kin, friends, and servants, soon became detached from worldly life.”7
श्लोक ( Shlok ) 8
मोहोदयोभयाविद्धकायवाचितवृत्तिभिः । बद्ध्वा कर्माणि तैर्नीतो जातो गतिचतुष्टये ॥ ८ ॥
वह विचार करने लगा कि यह जीव दर्शनमोह तथा चारित्रमोह इन दोनों मोहकर्मके उदयसे मिली हुई मन, वचन, कायकी प्रवृत्तिते कर्मोंको बाँधकर उन्होंके द्वारा प्रेरित हुआ चारों गतियोंमें उत्पन्न होता है ।। ८ ।।
“He began to reflect: ‘This soul, driven by the rise of both Darshanamohaniya (Perception-deluding) and Charitramohaniya (Conduct-deluding) karmas, engages the activities of mind, speech, and body. Bound by the karmas created through these actions, the soul is then propelled into the cycles of birth across the four realms of existence.'”8
श्लोक ( Shlok ) 9 – 10
संसारे चक्रकभ्रान्त्या दुस्तरे दुःखदूषितः । वीतादौ सुचिरं भ्राम्यनद्य भव्यो यदृच्छया ॥ ९ ॥लब्धकालादिराप्तोऽपि मुक्तिमार्ग सुदुर्गमम् । रेमे रामादिभिर्मुग्धो धिग्धिग्मां कामुकाग्रिमम् ॥ १० ll
अत्यन्त दुःखसे तरने योग्य इस अनादि संसारमें चक्रकी तरह चिरकालसे भ्रमण करता हुआ भव्य प्राणी दुःखसे दूषित हुआ कदाचित् कालादि लब्धियाँ पाकर अतिशय कठिन मोक्षमार्गको पाता है फिर भी मोहित हुआ स्त्रियों आदिके साथ क्रीडा करता है। मैं भी ऐसा ही हूँ अतः कामियोंमें मुख्य मुझको बार-बार धिक्कार है ।। ९-१० ॥
“In this beginningless world—a vast ocean of misery crossed only with extreme difficulty—the worthy soul (Bhavya) has been wandering for ages like a revolving wheel. After suffering for so long, if by some rare chance and the right timing (Labdhi), one finally finds the incredibly difficult path to liberation, they still remain deluded and waste their time in sensual play with women and worldly pleasures. I, too, am exactly like this; therefore, shame on me, who stands foremost among the lustful!” (9-10)
श्लोक ( Shlok ) 11
निर्मूल्याखिलकर्माणि निर्मलो लोकमूर्ध्वगः । किल नामोमि निर्वाणं सार्व सर्वज्ञभाषितम् ॥ ११ ॥
मैं समस्त कर्मोंको नष्ट कर निर्मल हो ऊर्ध्व-गामी बनकर सबका हित करनेवाले सर्वज्ञ-निरूपित निर्वाणलोकको नहीं प्राप्त हो रहा हूँ यह दुःख की बात है ।। ११ ।।
“It is a matter of profound grief that I am not attaining the realm of Nirvana—that state described by the Omniscient ones, which is the ultimate benefactor of all. I have yet to become pure by destroying all karmas and ascending to that highest peak of liberation.”11
श्लोक 12 से 22
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