मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 135 | श्लोक 136 से 152 | श्लोक 153 से 162 | श्लोक 163 से 173
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 174 to 181
श्लोक ( Shlok ) 174
चाद्य महाकालेनासुरेण नवो विधिः । याज्ञो विनिर्मितस्तस्य विघातः शङ्कयतेऽरिभिः ॥ १७४ ॥
चूंकि यज्ञ की यह नई रीति महाकाल नामक असुरने चलाई है अतः प्रतिपक्षियोंके द्वारा इसमें विघ्न किये जानेकी आशंका है ।। १७४ ।।
Here is the English translation, maintaining the cautious and explanatory tone of the commander’s warning:
“Since this new ritual of sacrifice (Yajna) has been initiated by the Asura named Mahakala, there is a strong apprehension of obstacles being created in it by his adversaries.”174
श्लोक ( Shlok ) 175
नागराडुपकर्त्ताऽभून्नमेश्च विनमेरपि । ततो यागस्य हन्तारः खगास्तत्पक्षपातिनः ॥ १७५ ॥
इसके सिवाय एक बात यह भी है कि नागकुमारोंके राजा धरणेन्द्रने नमि तथा विनमिका उपकार किया था इसलिए उसका पक्षपात करने वाले विद्याधर अवश्य ही यज्ञका विघात करेंगे ।। १७५ ॥
“Furthermore, there is also this fact: Dharanendra, the king of the Nagakumaras, had previously done a great favor for Nami and Vinami; therefore, the Vidyadharas, who favor his side, will most certainly destroy the sacrifice.”175
श्लोक ( Shlok ) 176 – 177
यागः सिद्धयति शक्तानां तद्विकारव्यपोहने । यद्यप्येतन्न बुध्येरन् रूप्यशैलनिवासिनः ॥ १७६ ॥निश्चितो रावणः शौर्यशाली मानग्रहाहितः । तस्मात्प्रागपि शङ्कास्ति स कदाचित् विघातकृत् ॥१७७॥
यज्ञ उन्हींका सिद्ध हो पाता है जो कि उसके विघ्न दूर करनेमें समर्थ होते हैं। यद्यपि विजयार्ध पर्वतपर रहने वाले विद्याधरोंको इसका पता नहीं चलेगा यह ठीक है तथापि यह निश्चित है कि उनमें रावण बड़ा पराक्रमी और मानरूपी ग्रहसे अधिष्ठित है उससे इस बातका भय पहलेसे ही है कि कदाचित् वह यज्ञमें विघ्न्न उपस्थित करे ॥ १७६-१७७ ॥
“A sacrifice (Yajna) is successfully accomplished only by those who are capable of dispelling its obstacles. Although it is true that the Vidyadharas residing on Mount Vijayardha will not get to know of this, yet it is certain that among them, Ravana is immensely powerful and is possessed by the planetary spirit of intense pride; therefore, there is an inherent fear from the very beginning that he might somehow cause disruptions in the sacrifice.”176 – 177
श्लोक ( Shlok ) 178
स्यात्तद्रामाय शक्ताय दास्यामः कन्यकामिमाम् । इति तद्वचनं सर्वे तुष्टुवुस्तत्सभासिनः ॥ १७८ ॥
हाँ, एक उपाय हो सकता है कि इस समय रामचन्द्रजी सब प्रकारसे समर्थ हैं उनके लिए यदि हम यह कन्या प्रदान कर देंगे तो वे सब विघ्न दूर कर देंगे। इसप्रकार सेनापतिके वचनोंकी सभामें बैठे हुए सब लोगोंने प्रशंसा की ॥ १७८ ॥
“‘Yes, there could be one solution—at this moment, Ramachandra-ji is capable in every possible way. If we bestow this maiden upon him, he will dispel all the obstacles.’ In this manner, everyone seated in the assembly hall praised the words of the commander-in-chief.”178
श्लोक ( Shlok ) 179 –181
निरचिन्वंश्च भूपेन सःकं तत्कार्यमेव ते । तदैव जनको दूतं प्राहिणोद्रामलक्ष्मणौ ॥ १७९ ॥मदीययागरक्षार्थ प्रहेतव्यौ कृतत्वरम् । रामाय दास्यते सीता चेति शासनहारिणम् ॥ १८० ॥सलेखोपायनं सन्तं नृपं दशरथं प्रति । तथान्यांश्च महीट्सूनूत्र दूतानानेतुमादिशत् ॥ १८१॥
राजा जनकके साथ ही साथ सब लोगोंने इस कार्यका निश्चय कर लिया और राजा जनकने उसी समय सत्पुरुष राजा दशरथके पास पत्र तथा भेंटके साथ एक दूत भेजा तथा उससे निम्न सन्देश कहलाया। आप मेरी यज्ञकी रक्षाके लिए शीघ्र ही राम तथा लक्ष्मणको भेजिये । यहाँ रामके लिए सीता नामक कन्या दी जावेगी। राम-लक्ष्मण के सिवाय अन्य राज्यपुत्रोंको बुलानेके लिए भी अन्य अन्य दूत भेजे ॥ १७९-१८१ ॥
“Along with King Janaka, everyone [in the assembly] resolved upon this course of action. Right at that moment, King Janaka dispatched a messenger to the virtuous King Dasharatha, along with a letter and ceremonial gifts, and sent the following message through him: ‘Please send Rama and Lakshmana swiftly to ensure the protection of my sacrifice (Yajna). Here, the maiden named Sita shall be given in marriage to Rama.’ Aside from Rama and Lakshmana, he also dispatched various other messengers to invite the princes of other kingdoms.”179 –181
श्लोक 182 से 192
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मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33 | श्लोक 34 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 135 | श्लोक 136 से 152 | श्लोक 153 से 162 | श्लोक 163 से 173
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