आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 100 | श्लोक 101 से 111
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 46- Shlok 112 to 122
श्लोक ( Shlok )112 –113
तत्रैवागत्य सार्थैशो” निविष्टो बहुभिः सह । विभुर्मेरुकदत्ताख्यः श्रेष्ठी भार्यास्य धारिणी ॥११२॥ मन्त्रिणस्तस्य भूतार्थः शकुनिः सबृहस्पतिः । धन्वन्तरिश्च चत्वारः सर्वे शास्त्रविशारदाः ॥११३।।
उसी सरोवरके समीप धनी और सब संघके स्वामी मेरुकदत्त नामका सेठ बहुत लोगों के साथ आकर ठहरा हुआ था । उसकी स्त्रीका नाम धारिणी था । उस सेठके चार मंत्री थे-१ भूतार्थ, २ शकुनि, ३ बृहस्पति और ४ धन्वन्तरि । ये चारों ही मंत्री अपने अपने शास्त्रोंमें पण्डित थे ।।११२-११३॥
Near that very lake had also arrived and taken residence the wealthy merchant Merukadatta, lord of a great retinue and master of his entire guild. His wife was named Dhāriṇī. This merchant had four ministers: 1) Bhūtārtha, 2) Shakuni, 3) Brihaspati, and 4) Dhanvantari—each one a learned scholar in his respective field of knowledge.॥112–113॥
श्लोक ( Shlok )114
एभिः परिवृतः श्रेष्ठी होनाङ्गं” कञ्चिदागतम् । समीक्ष्यैनं कुतो हेतोर्जातोऽयमिति तान् जगौ ॥११४।।
एक दिन सेठ इन सबसे घिरा हुआ बैठा था कि इतनेम वहां एक हीन अंगवाला पुरुष आया। उसे देखकर सेठने सब मंत्रियोस कहा कि यह ऐसा किस कारणसे हुआ है ? ।। ११४।।
One day, as the merchant sat surrounded by all his ministers, there came before him a man with deformed limbs. Upon seeing him, the merchant turned to his ministers and asked, “By what cause has he come to be in such a state?”॥114॥
श्लोक ( Shlok )115 – 116
शकुनिः शकुनाद् दुष्टाद् ग्रहात्पापाद् बृहस्पतिः । धन्वन्तरिस्त्रिदोषेभ्यो जन्मनीति समादिशत् ॥११५।।भूतार्थस्त्वस्तु तत्सर्वं कर्म हिंसाद्युपार्जितम् । प्रधानकारणं तेन’ हीनाङ्ग इति सूक्तवान् ॥११६॥
इसके उत्तरमें शकुनि मंत्रीने कहा कि जन्मके समय बुरे शकुन होनेसे यह ऐसा हुआ है ? बृहस्पतिने कहा कि जन्मके समय दुष्ट ग्रहोंके पड़नेसे यह हीनांग हुआ है और धन्वन्तरिने कहा कि जन्मके समय वात पित्त कफ इन तीन दोषोंके कारण यह विकलांग हो गया है। यह सुनकर भूतार्थ नामक मन्त्री ने कहा कि आप यह सब रहने दीजिये, इस जीवने पूर्वभवमें हिंसा आदिके द्वारा जो कर्म उपाजन किये थे. वे ही इसके हीतांग होने में प्रधान कारण हैं ।॥ ११५-११६।।
In reply, the minister Shakuni said, “It is because of inauspicious omens at the time of his birth that he has become so.” Brihaspati declared, “It is due to the influence of malevolent planets at his birth that he was born deformed.” Dhanvantari explained, “This lameness arose from the imbalance of the three humors—vāta, pitta, and kapha—at the time of his birth.”
Hearing these words, the minister named Bhūtārtha spoke: “Let all this be set aside; it is the karmic fruit of his own past misdeeds—violence and the like committed in previous lives—that is the true and primary cause of his deformity.”॥115–116॥
श्लोक ( Shlok )117 – 122
शक्तिषेण” महोपालप्रतिपन्नतुजः पिता । सत्यदेवस्य दृष्ट्वाऽऽस्मस्त मन्विष्यन्य दृच्छया ॥११७॥ तदा कृत्वा महद् दुःखं ‘सभ्यै राकर्ण्यतामिदम् । च्युतं पयोऽतिपाकेन भाजनात्तण्डुलानपि ॥११८॥भक्ष्यमाणान् कपोताद्यैः पश्यँस्तूष्णीमयं स्थितः । क्रोधान्मातुः कनीयस्या भर्त्सनादागतोऽसहः ॥११९॥ अधस्ताद् वक्त्रविवरं घ्राणस्येति तदप्ययम् । क्षमते नेति सर्वेषां तदकर्मण्यतां ब्रुवन् ॥१२०॥गन्तुं सहात्मना “तस्यानभिलाषाद् विषण्णवान् । परस्मिन्नपि भूयासं भवे ते स्नेहगोचरः ॥१२१॥ इति कृत्वा निदानं स द्रव्यसंयममाश्रितः । प्रपेदे लोकपालत्वं तद्गतस्नेहमोहितः ॥१२२॥
इतने में ही शक्तिषेण सेनापतिने जिसे अपना पुत्र स्वीकार किया है ऐसे उस सत्यदेवका पिता अपनी इच्छानुसार उसे खोजता हुआ आ पहुंचा । उस हीनांग पुत्रको देखकर उसे बहुत ही दुःख हुआ और वह कहने लगा कि हे सभासदो, सुनो, एक दिन घर में चावल पक रहे थे सो पानी के उफानके कारण कुछ चावल बर्तनसे नीचे गिर गये और उन नीचे गिरे हुए चावलोंको कबूतर आदि पक्षी चुगने लगे परन्तु यह सब देखता हुआ चुपचाप खड़ा रहा-इसने उन्हें भगाया नहीं । तब इसकी मांकी छोटी बहिनने क्रोधसे इसे डांटा, उस डांटको न सह सकने के कारण ही यह यहां चला आया है। यह इतना असहन-शील है कि ‘तेरी नाकके नीचे मुँहका छेद है’ इस बातको भी नहीं सह सकता है। इस तरह सब सभासदोंसे उसके पिताने उसकी अकर्मण्यताका वर्णन किया। चूँकि सत्यदेव अपने पिताके साथ वापिस नहीं जाना चाहता था इसलिये उसने दुखी होकर निदान किया कि ‘अगले भवमें भी मैं तेरे स्नेहका पात्र होऊं’ इस प्रकार निदान कर वह द्रव्यलिङ्गी मुनि हो गया और सत्यदेवके प्रेमसे मोहित होकर मरा जिससे लोकपाल हुआ ।।११७-१२२॥
Just then, the father of Satyadeva—whom the commander Shaktisheṇa had accepted as his own son—arrived there, searching for him according to his wish. Seeing his son so deformed, he was stricken with deep sorrow, and began to speak:
“O noble assembly, listen well: One day, rice was being cooked at home, and as the water boiled over, some grains fell from the pot. Doves and other birds began pecking at the fallen rice, yet this child merely stood by, silently watching, without driving them away. His mother’s younger sister, enraged by his indifference, scolded him harshly. Unable to bear that rebuke, he left home in anger. He is so intolerant that he cannot even endure someone saying, ‘There is an opening below your nose’—a simple statement of fact about the mouth beneath the nose. In this way, his father described his son’s utter lack of forbearance to the entire assembly.
Since Satyadeva did not wish to return home with his father, he sorrowfully resolved: ‘May I remain an object of your affection in my next life as well.’ Having thus determined, he became a mendicant monk of dravyaliṅga, and dying while still ensnared by his attachment to Satyadeva, he was reborn as a Lokapāla (guardian deity).॥117–122॥
श्लोक 123 से 132
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 160 | श्लोक 161 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 219
आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 100 | श्लोक 101 से 111