आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
श्लोक 52 से 61 ब्राह्मण सृष्टि का भविष्य और स्वप्नों का प्रकार
पंचम काल में ब्राह्मण मिथ्यादृष्टि होकर धर्मद्रोही बनेंगे, पाखंडी मतों का प्रचार करेंगे। यह सृष्टि वर्तमान में दोषरहित है, पर भविष्य में दोष का बीज बनेगी। फिर भी, धर्म सृष्टि के उल्लंघन से बचने के लिए इसे अभी त्यागना उचित नहीं। स्वप्न दो प्रकार के होते हैं: स्वस्थ (सत्य) और अस्वस्थ (असत्य), तथा दोषजन्य (मिथ्या) और दैवजन्य (सत्य)। भरत के स्वप्न दैवजन्य और सत्य हैं, जिनका फल पंचम काल में होगा।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 41- Shlok 52 to 61
श्लोक ( Shlok ) 52
अहिंसालक्षणं धर्म दूषयित्वा दुराशयाः । चोदनालक्षणं धर्म पोषयिष्यन्त्यमी बत ॥५२॥
खेद है कि दुष्ट आशयवाले ये ब्राह्मण अहिंसारूप धर्मको दूषित कर वेदमें कहे हुए हिंसारूप धर्मको पुष्ट करेंगे ।। ५२ ।।
“Alas! These Brāhmaṇas of wicked intent shall defile the true Dharma of non-violence, and instead uphold the Vedic path that extols violence, giving it false strength and sanctity.”52
श्लोक ( Shlok ) 53
पापसूत्रधरा धूर्त्ताः प्राणिमारणतत्पराः। वर्त्स्यद्युगे प्रवर्त्स्यन्ति सन्मार्गपरिपन्थिनः ॥५३॥
पापका समर्थन करनेवाले, शास्त्रको जानने वाले अथवा पापके चिह्नस्वरूप यज्ञोपवीतको धारण करनेवाले और प्राणियोंके मारनेमें सदा तत्पर रहनेवाले ये धूर्त ब्राह्मण आगामी युग अर्थात् पंचम कालमें समीचीन मार्गके विरोधी हो जायेंगे ।।५३।।
“Supporting sin, claiming knowledge of scripture, donning the sacred thread as a mere symbol of vice, and ever eager to slay living beings—these deceitful Brāhmaṇas, in the coming age—the fifth era—shall become staunch adversaries of the true and righteous path.”53
श्लोक ( Shlok ) 54
द्विजातिसर्जनं” तस्मान्नाद्य यद्यपि दोषकृत् । स्याद्दोषबीजमायत्यां कुपाखण्डप्रवर्तनात् ॥५४॥
इसलिये यह ब्राह्मणोंकी रचना यद्यपि आज दोष उत्पन्न करनेवाली नहीं है तथापि आगामी कालमें खोटे पाखण्ड मतोंकी प्रवृत्ति करनेसे दोषका बीजरूप है ।।५४।।
“Therefore, though the order of Brāhmaṇas you have established brings no fault at present, yet in the ages to come, it shall become the seed of error—giving rise to false and heretical doctrines.”54
श्लोक ( Shlok ) 55
इति कालान्तरे दोषबीजमप्येतदञ्जसा । नाधुना परिहर्तव्यं धर्मसृष्टयनतिक्रमात् ॥५५।।
इस प्रकार यद्यपि यह ब्राह्मगोंकी सृष्टि कालान्तर में दोषका बीजरूप है तथापि धर्म सृष्टिका उल्लंघन न हो इसलिये इस समय इसका परिहार करना भी अच्छा नहीं है ।।५५।।
“Thus, though this creation of the Brāhmaṇas may in time become the very seed of corruption, yet for now, it is not to be discarded—for to do so would disrupt the divine order of Dharma.”55
श्लोक ( Shlok ) 56 – 57
यथान्नमपयुक्त सत क्वचित्कस्यापि दोषकृत् । तथाऽप्यपरिहार्य तद् बुधैर्बहुगुणास्थया ।।५६।। तथेदमपि मन्तव्यम् द्यत्वे गुणवत्तया । पुंसामाशयवैषम्यात् पश्चाद् यद्यपि दोषकृत् ॥५७।।
जिस प्रकार खाया हुआ अन्न यद्यपि कहीं किसीको दोष उत्पन्न कर देता है तथापि अनेक गुणोंकी आस्थासे विद्वान् लोग उसे छोड़ नहीं सकते उसी प्रकार यद्यपि ये पुरुषोंके अभिप्रायोंकी विषमतासे आगामी कालमें दोष उत्पन्न करनेवाले हो जावेंगे तथापि इस समय इन्हें गुणवान् ही मानना चाहिये ।।५६-५७।।
“Just as food once consumed may at times bring harm to some, yet the wise do not reject it, owing to its many virtues—so too, though these men may, through the divergence of intentions in times to come, become the source of fault, they must, for now, be regarded as virtuous.”56 – 57
श्लोक ( Shlok ) 58
इदमेवं गतं हन्त यच्च ते स्वप्नदर्शनम् । तदप्येष्यद् युगे धर्मस्थितिहासस्य सूचनम् ॥५८ ॥
इस प्रकार यह तेरी ब्राह्मण रचनाका उत्तर तो हो चुका, अब तूने जो स्वप्न देखे हैं, खेद है, कि वे भी आगामी युग (पंचम काल) में धर्मकी स्थितिके हासको सूचित करनेवाले हैं ॥५८॥
“Thus have I answered regarding the Brāhmaṇa order you established. Now, as for the dreams you beheld—alas!—they too foretell the decline of Dharma’s firm standing in the coming age, the fifth era.”58
श्लोक ( Shlok ) 59
ते च स्वप्ना द्विधाऽऽम्नाताः स्वस्थास्वस्थात्मगोचराः । समैस्तु धातुभिः स्वस्था विषमैरितरे मताः ॥५९॥
वे स्वप्न दो प्रकारके माने गये हैं एक अपनी स्वस्थ अवस्थामें दिखनेवाले और दूसरे अस्वस्थ अवस्थामें दिखनेवाले । जो धातुओंकी समानता रहते हुए दिखते हैं वे स्वस्थ अवस्थाके कहलाते हैं और जो धातुओंकी विषमता-न्यूनाधिकता रहते हुए दिखते हैं वे अस्वस्थ अवस्थाके कहलाते हैं ।॥ ५९।।
“Dreams are regarded as of two kinds: those seen in a state of bodily balance, and those seen in imbalance. Dreams that arise when the bodily humors are in equilibrium are deemed to occur in a healthy state; but those that appear amidst an excess or deficiency of the humors are said to arise from an unhealthy condition.”59
श्लोक ( Shlok ) 60
तथ्याः स्युः स्वस्य सन्दृष्टाः मिथ्यास्वप्ना विपयर्यात् । जगत्प्रतीतमेतद्धि विद्धि स्वप्नविमर्शनम् ॥ ६०।।
स्वस्थ अवस्थामें दिखनेवाले स्वप्न सत्य होते हैं और अस्वस्थ अवस्थामें दिखनेवाले स्वप्न असत्य हुआ करते हैं इस प्रकार स्वप्नों-के फलका विचार करनेमें यह जगत्प्रसिद्ध बात है ऐसा तू समझ ॥६०॥
“Dreams seen in a state of bodily balance are true, while those arising from imbalance are false—this, know well, is the widely accepted rule in discerning the fruits of dreams.” 60
श्लोक ( Shlok ) 61
स्वप्नानां द्वैतमस्त्यन्यद्दोषदैवसमुद्भवम् । दोषप्रकोपजा मिथ्या तथ्याः स्युर्दै वसम्भवाः ॥६१॥
स्वप्नोंके और भी दो भेद हैं एक दोषसे उत्पन्न होनेवाले और दूसरे दैवसे उत्पन्न होनेवाले । उनमें दोषोंके प्रकोप-से उत्पन्न होनेवाले झूठ होते हैं और दैवसे उत्पन्न होनेवाले सच्चे होते हैं ।। ६१।।
“Dreams are further divided into two kinds: those arising from internal disorder, and those born of divine influence. Of these, the former—born of disturbed humors—are false, while those arising from the divine are indeed true.”61
श्लोक 62 से 71
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आदिपुराण भाग – 2 :
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