आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
श्लोक 172 से 181 व्रतचर्या और दश अधिकार
यज्ञोपवीत धारण करने वाले द्विज मांसाहार त्यागें, विवाहिता स्त्री का सेवन करें, अनारंभी हिंसा और अभक्ष्य-अपेय का परित्याग करें। उपासकाध्ययन सूत्र में दश अधिकार हैं: अतिबाल विद्या, कुलावधि, वर्णोत्तमत्व, पात्रत्व, सृष्टयधिकारिता, व्यवहारेशिता, अवध्यत्व, अदण्डधता, मानार्हता, और प्रजासम्बन्धान्तर। अतिबाल विद्या बाल्यकाल से विद्या सिखलाती है, जो द्विजों के लिए आवश्यक है। इसके अभाव में द्विज मूर्ख रहता है और मिथ्या शास्त्रों में भटकता है। श्रावकाचार शास्त्रों का अभ्यास निज और पर का उद्धार करता है। कुलावधि कुलाचार की रक्षा करती है, अन्यथा व्यक्ति अन्य कुल में विलीन हो जाता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 40- Shlok 172 to 181
श्लोक ( Shlok ) 172
स्यान्निरामिषभोजित्वं कुलस्त्रीसेवनव्रतम् । अनारम्भवधोत्सर्गो ह्यभक्ष्यापेयवर्जनम् ॥१७२॥
यज्ञोपवीत धारण करनेवाले पुरुषोंको माँस-रहित भोजन करना चाहिये, अपनी विवाहिता कुलस्त्रीका सेवन करना चाहिये, अनारम्भी हिंसाका त्याग करना चाहिये और अभक्ष्य तथा अपेय पदार्थका परित्याग करना चाहिये ।।१७२॥
He who wears the sacred thread must partake only of food untouched by flesh,remain loyal to his wedded wife of noble lineage,eschew all forms of unprovoked violence,and renounce that which is unfit to eat or unworthy to drink.Thus shall he honour the sanctity of his initiation and walk the path of restraint and righteousness. 172
श्लोक ( Shlok ) 173
इति शुद्धतरां वृत्ति व्रतवूतामुपेयिवान्। यो द्विजस्तस्य सम्पूर्णो व्रतचर्याविधिः स्मृतः ॥१७३॥
इस प्रकार जो द्विज व्रतोंसे पवित्र हुई अत्यन्त शुद्ध वृत्तिको धारण करता है उसके व्रतचर्याकी पूर्ण विधि समझनी चाहिये ॥१७३॥
Thus, one who, as a twice-born, upholds vows with sanctity and embraces a life of utmost purity and discipline—his way of observance, shaped by sacred restraint,must be understood as the complete and consummate conduct of a votary.173
श्लोक ( Shlok ) 174
दशाधिकारास्तस्योक्ताः सूत्रेणौपासिकेन हि । तान्यथाक्रममुद्देशमात्रेणानुप्रचक्ष्महे ।। १७४।।
अब उन द्विजोंके लिये उपासकाध्ययन सूत्रमें जो दश अधिकार कहे हैं उन्हें यथाक्रमसे नामके अनुसार कहता हूँ ॥ १७४।॥
Now, in due sequence and by their proper names,I shall declare the ten disciplines that are enjoined for the twice-born within the sacred treatise of the Upāsaka-adhyayanasūtra. 174
श्लोक ( Shlok ) 175 – 177
तत्रातिबालविद्याऽद्या कुलावधिरनन्तरम् । वर्णोत्तमत्वपात्रत्वे तथा सुष्टयधिकारिणा ॥१७५॥व्यवहारेशिताऽन्या स्यादवध्यत्वमदण्ड्यता । मानार्हता प्रजासम्बन्धान्तरं चेत्यनुक्रमात् ॥१७६॥दशाधिकारि वास्तूनि स्वरुपासकसङ्ग्रहे । तानीमानि यथोद्देश सङ्क्षेपेण विवृन्महे ॥ १७७।।
उन दश अधिका रोंमें पहला अतिबाल विद्या, दूसरा कुलावधि, तीसरा वर्णोत्तमत्व, चौथा पात्रत्व, पाँचवाँ सृष्टयधि-कारिता, छठवाँ व्यवहारेशिता, सातवाँ अवध्यत्व, आठवाँ अदण्डधता, नौवाँ मानार्हता और दशवाँ प्रजा सम्बन्धान्तर है। उपासकसंग्रहमें अनुक्रमसे ये दश अधिकारवस्तुएँ बतलाई गई हैं। उन्हीं अधिकार वस्तुओंका उनके नामके अनुसार यहाँ संक्षेपसे कुछ विवरण करता हूँ । ।।१७५-१७७।।
Among the ten prescribed qualifications for the twice-born,
the first is Excellence in Childhood Education (Atibāla Vidyā),
the second is Nobility of Lineage (Kulāvadhi),
the third, Excellence of Caste (Varṇottamatva),
the fourth, Deservedness (Pātratva),
the fifth, Entitlement to Creation (Sṛṣṭyadhikāritā),
the sixth, Authority in Conduct (Vyavahāreśitā),
the seventh, Invulnerability (Avadhyatva),
the eighth, Immunity from Punishment (Adaṇḍadhata),
the ninth, Worthiness of Honour (Mānārhatā),
and the tenth is Social Influence or Civic Relevance (Prajā-Sambandhāntara).
These ten domains of merit have been enumerated in sequence
within the Upāsaka-saṅgraha,and now, here, I shall briefly describe each according to its name. 175 – 177
श्लोक ( Shlok ) 178
बाल्यात्प्रभृति ‘या विद्याशिक्षोद्योगाद् द्विजन्मनः। प्रीक्तातिबालविद्येति सा क्रिया द्विजसम्मता ॥१७८॥
द्विजोंको जो बाल्य अवस्थासे ही लेकर विद्या सिखलानेका उद्योग किया जाता है उसे अतिबालविद्या कहते हैं, यह विद्या द्विजोंको अत्यन्त इष्ट है ।। १७८।।
The effort undertaken to instruct the twice-born from early childhood itself—this is known as Atibāla Vidyā, the noble pursuit of early learning.Such knowledge is held in the highest esteem by the twice-born and is deemed most desirable among their attainments.178
श्लोक ( Shlok ) 179
तस्यामसत्यां मूढात्मा हेयादेयानभिज्ञकः । मिथ्याश्रुतिं प्रपद्येत ‘द्विजन्मान्यैः प्रतारितः ॥१७९ ॥
इस अति-बाल विद्याके अभावमें द्विज मूर्ख रह जाता है उसे हेय उपादेयका ज्ञान नहीं हो पाता और वह अपनेको झॣठमूठ द्विज माननेवाले पुरुषोंके द्वारा ठगाया जाकर मिथ्या शास्त्रके अध्ययन में लग जाता है ।।१७९।।
In the absence of this noble early learning,the twice-born remains steeped in ignorance.He fails to discern the worthy from the unworthy,and, misled by those who merely pretend to be twice-born,he is deceived—ensnared in the study of false scriptures.179
श्लोक ( Shlok ) 180
बाल्य एव ततोऽभ्यस्येद् द्विजन्मौपासिकों श्रुतिम्। स तया प्राप्तसंस्कारः स्वपरोत्तारको भवेत् ॥१८०॥
इसलिये द्विजोंको उचित है कि वे बाल्य अवस्थामें ही श्रावकाचारके शास्त्रोंका अभ्यास करें क्योंकि उपासकाचारके शास्त्रोंके द्वारा जिसे अच्छे संस्कार प्राप्त हो जाते हैं वह निज और परको तारनेवाला हो जाता है ॥१८०॥
Therefore, it befits the twice-born to engage,even in childhood, in the study of the scriptures of the householder’s path.For one who is well-imbued with noble impressions through the sacred teachings of the lay-discipline—such a soul becomes a redeemer of both self and others.180
श्लोक ( Shlok ) 181
कुलावधिः कुलाचाररक्षणं स्यात् द्विजन्मनः । तस्मिन्नसत्यसौ नष्ट क्रियोऽन्यंकुलतां भजेत् ॥१८१॥
अपने कुलके आचारकी रक्षा करना द्विजोंकी कुलावधि क्रिया कहलाती है। कुलके आचारकी रक्षा न होनेपर पुरुष-की समस्त क्रियाएँ नष्ट हो जाती हैं और वह अन्य कुलको प्राप्त हो जाता है ।। १८१।।
Safeguarding the noble customs of one’s lineage—this, among the twice-born, is known as the discipline of Kulāvadhi.If such ancestral conduct is not preserved,then all the deeds of a man lose their merit,and he is cast adrift into another lineage,severed from the honour of his own.181
श्लोक 182 से 191
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313
आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211
आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
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