अजितनाथ तीर्थंकर तथा सगर चक्रवर्तीका वर्णन पर्व 48 – श्लोक 62 से 73 | श्लोक 74 से 84 | श्लोक 85 से 101
English translation of Uttar Puran parv 48- shlok 102 to 112
श्लोक ( Shlok ) 102 – 103
तदाकर्ण्य मुदा पुत्राः सर्व चक्रेण साधितम् । भो किं यन्न मे सिद्धं मध्ये हिमसमुद्रयोः ॥ १०२ ॥
एष एव मम प्रैषो राज्यलक्ष्मीमिमां मम । सम्भूय भूयसीं यूयमनुभूवं यथोचितम् ॥ १०३ ॥
यह सुन चक्रवर्तीने हर्षित होकर कहा कि ‘हे पुत्रो ! चक्रसे सब कुछ सिद्ध हो चुका है, हिमवान् पर्वत और समुद्रके बीच ऐसी कौनसी वस्तु है जो मुझे सिद्ध नहीं हुई है ? तुम्हारे लिए मेरा यही काम है कि तुम लोग मिलकर मेरी इस विशाल राज्यलक्ष्मीका यथायोग्य रीतिसे उपभोग करो’ ।।१०२-१०३।।
Hearing this, the Emperor, filled with delight, replied: “O sons! By the power of the discus, all has already been accomplished. Between Mount Himavān and the ocean, what remains that I have not subdued? This alone is my command for you—that, united together, you duly and fittingly enjoy this vast fortune of my empire.” ॥ 102–103 ॥
श्लोक ( Shlok ) 104
इति भूयो नरेन्द्रेण तेन ते सुनिवारिताः । जोषमास्थुर्विधेया हि पितॄणां शुद्धवंशजाः ॥ १०४ ॥
इस प्रकार राजाने जब उन्हें बहुत निवारण किया तब वे चुप हो रहे सो ठीक ही है क्योंकि शुद्ध वंशमें उत्पन्न हुए पुत्र पिताके आज्ञाकारी ही होते हैं ।॥ १०४ ॥
Thus, when the king repeatedly restrained them, they fell silent—and rightly so; for sons born in a noble lineage are ever obedient to their father’s command. ॥ 104 ॥
श्लोक ( Shlok ) 105
तेऽन्येद्युः पुनरासाद्य नृपं व्यज्ञापयन्निदम् । न भुज्महे न चेत्यैष इत्यभ्यर्णात्मशुद्धयः ॥ १०५ ॥
आत्मशुद्धिसे भरे वे राजपुत्र किसी एक दिन फिर राजाके पास जाकर कहने लगे कि यदि आप हम लोगोंको कोई कार्य नहीं देते हैं तो हम भोजन भी नहीं करते हैं ।॥ १०५ ॥
Filled with a sense of inner purity, those princes, on another occasion, again approached the king and said: “If you do not assign us any task, then we shall not even partake of food.” ॥ 105 ॥
श्लोक ( Shlok ) 106 –108
तच्छ्रुत्वैष स कः प्रैष इति चिन्तयता मनाक् । नन्वस्ति कार्यशेषोऽयं धर्म इत्यात्तहृष्टिना ॥ १०६ ॥
राज्ञाप्याज्ञापिता यूयं कैलासे भरतेशिना । गृहाः कृता महारनैश्चतुविंशतिरर्हताम् ॥ १०७ ॥
तेषां गङ्गां प्रकुर्वीध्वं परिखां परितो गिरिम् । इति तेऽपि तथा कुर्वन् दण्डरलेन सत्वरम् ॥ १०८ ॥
पुत्रोंका निवेदन सुनकर राजा कुछ चिन्तामें पड़ गये । वे सोचने लगे कि इन्हें कौनसा कार्य दिया जावे । अकस्मात् उन्हें याद आ गई कि अभी धर्मका एक कार्य बाकी है। उन्होंने हर्षित होकर आज्ञा दी कि भरत चक्रवर्तीने कैलास पर्वत पर महारत्नोंसे अरहन्तदेवके चौबीस मन्दिर बनवाये हैं, तुम लोग उस पर्वतके चारों ओर गङ्गा नदीको उन मन्दिरोंकी परिखा बना दो।’ उन राजपुत्रोंने भी पिताकी आज्ञानुसार दण्डरत्नसे वह काम शीघ्र ही कर दिया ।। १०६-१०८ ।।
Hearing the entreaty of his sons, the king fell into some reflection, pondering what task might be assigned to them. Suddenly, it occurred to him that a certain religious undertaking yet remained to be accomplished. Filled with joy, he commanded:
“Bharata Cakravartin caused twenty-four temples of the Arhats to be constructed on Mount Kailāsa, fashioned of the most precious jewels. You shall, therefore, channel the river Gaṅgā around that पर्वत, making it a moat encircling those temples.”
In accordance with their father’s command, the princes swiftly accomplished that task by means of the Daṇḍa-ratna. ॥ 106–108 ॥
श्लोक ( Shlok ) 109
मणिकेतुः पुनश्चास्य स्नेहसौजन्यचोदितः । सचिवैर्बोधनोपायं स सहैवं व्यचिन्तयत् ॥ १०९ ॥
प्रेम और सज्जनतासे प्रेरित हुआ मणिकेतु देव फिर भी अपने मन्त्रियोंके साथ राजा सगरको समझानेके लिए योग्य उपायका इस प्रकार विचार करने लगा ॥ १०९॥
Moved by affection and noble intent, the celestial Maṇiketu once again began to deliberate, along with his ministers, upon a fitting means to instruct and guide King Sagara. ॥ 109 ॥
श्लोक ( Shlok ) 110 – 112
किञ्चिद्धितं प्रियं चोक्त’ किञ्चिच्च हितमप्रियम् । किञ्चित्प्रियं सदहितं परं चाहितमप्रियम् ॥ ११० ॥
अन्त्यद्वयं परित्यज्य शेषाभ्यां भाषता हितम् । इति निश्चित्य कैलासं तदैवागम्य दर्पिणः ॥ १११ ॥
कुमारान् भस्मराशिं वा व्यधात् क्रूरोरगाकृतिः । कुर्वन्ति सुहृदोऽगत्या हितं चेदप्रियं च तत् ॥ ११२ ॥
कि वचन चार प्रकारके होते हैं-कुछ वचन तो हित और प्रिय दोनों ही होते हैं, कुछ हित और अप्रिय होते हैं, कुछ प्रिय होकर अहित होते हैं और कुछ अहित तथा अप्रिय होते हैं। इन चार प्रकारके वचनोंमें अन्तके दो वचनोंको छोड़कर शेष दो प्रकारके वचनोंसे हितका उपदेश दिया जा सकता है। ऐसा निश्चय कर वह मणिकेतु एक दुष्ट नागका रूप धरकर कैलास पर्वत पर आया और उन अहङ्कारी राजकुमारोंको भस्मकी राशिके समान कर चला गया सो ठीक ही है क्योंकि मंत्रीगण जब कुछ उपाय नहीं देखते हैं तब हित होनेपर भी अप्रिय वचनोंका प्रयोग करते ही हैं ।। ११०-११२ ।।
He reflected thus: “Speech is of four kinds—some words are both beneficial and pleasing; some are beneficial yet unpleasing; some, though pleasing, are harmful; and some are both harmful and unpleasing. Of these four, setting aside the latter two, instruction for welfare may be imparted through the former two kinds of speech.”
Having thus resolved, that Maṇiketu assumed the form of a wicked serpent, came to Mount Kailāsa, and reduced those arrogant princes to heaps of ashes before departing—and rightly so; for when ministers perceive no other expedient, they indeed resort, even for the sake of welfare, to words that are unpleasing. ॥ 110–112 ॥
श्लोक 113 से 121
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