आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71
श्लोक 72 से 81 परमेष्ठी मंत्रों का संग्रह और समापन
इस खंड में परमेष्ठी मंत्रों का पूर्ण संग्रह है, जिसमें ‘परमवीर्याय नमः’, ‘सर्वज्ञाय नमः’, ‘परमेष्ठिने नमो नमः’, और ‘परमनेत्रे नमो नमः’ शामिल हैं। सम्यग्दृष्टि, त्रिलोकविजय, धर्ममूर्ति, और धर्मनेमि की सम्बोधन में ‘स्वाहा’ के साथ मंत्र पढ़े जाते हैं। ये सात पीठिका मंत्र ब्राह्मणों द्वारा गर्भाधानादि क्रियाओं में सिद्धपूजन के लिए हैं। ये मंत्र संध्याओं में आहुति मंत्र और साधन मंत्र के रूप में भी प्रयुक्त होते हैं। सिद्ध प्रतिमा के समक्ष 108 बार जप, गंध-पुष्प अर्पण, और शुद्ध वस्त्र धारण कर इन मंत्रों से क्रिया करनी चाहिए।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 40- Shlok 72 to 81
श्लोक ( Shlok ) 72
ततः परमवीर्याय पवं चास्मान्नमः परम् । परमादिसुखायेति पदमस्मादनन्तरम् ॥७२॥
इसके पश्चात् ‘परमवीर्याय नमः’ (अनन्त बल शालीके लिये नमस्कार हो) और फिर ‘परमसुखाय नमः’ (परम सुखके धारकको नमस्कार हो) ये मन्त्र कहना चाहिये ।। ७२ ।।
Thereafter, one should recite the following mantras:“Paramavīryāya Namaḥ” — Obeisance unto Him of infinite strength,and then“Paramasukhāya Namaḥ” — Obeisance unto Him who embodies supreme bliss.॥72॥
श्लोक ( Shlok ) 73
सर्वज्ञाय नमोवाक्यमर्हते नम इत्यपि। नमो नमः पदं चास्मात्स्यात्परं परमेष्ठिने ॥७३॥
इसके अनन्तर सर्वज्ञाय नमः (संसारके समस्त पदार्थोंको जाननेवालेके लिये नमस्कार हो) ‘अर्हते नमः’ (अरहन्तदेवके लिये नमस्कार हो), और फिर ‘परमेष्ठिने नमो नमः’ (परमेष्ठी के लिये बार बार नमस्कार हो) ये मन्त्र बोलना चाहिये ।।७३।।
Thereafter, one should utter the following mantras:“Sarvajñāya Namaḥ” — Obeisance unto the Omniscient, knower of all substances in the cosmos,“Arhate Namaḥ” — Obeisance unto the Arhat, the Worthy One,and then,“Parameṣṭhine Namo Namaḥ” — Repeated obeisance unto the Supreme Being (Parameṣṭhī).॥73॥
श्लोक ( Shlok ) 74
परमादिपदान्नेत्र इत्यस्माच्च नमो नमः । सम्यग्दृष्टिपदं चान्ते बोध्यन्तं द्विः प्रयुज्यताम् ॥७४।।
तदनन्तर’परमनेत्रे नमो नमः’ (उत्कृष्ट नेताके लिये नमस्कार हो) यह मन्त्र कहना चाहिये और उसके बाद सम्बोधनान्त सम्यग्दृष्टि पदका दो बार प्रयोग करना चाहिये ॥७४।।
Thereafter, one should recite the mantra:“Paramanetre Namo Namaḥ” — Repeated obeisance unto the Supreme Leader.Following this, the word “Samyagdṛṣṭe”—in the vocative form—should be uttered twice, addressing the Right-Visioned One.॥74॥
श्लोक ( Shlok ) 75
द्विः स्तां त्रिलोकविजयधर्ममूर्त्तिपदे ततः । धर्मनेमिपदं वाच्यं द्विः स्वाहेति ततः परम् ॥७५॥
तथा इसी प्रकार त्रिलोकविजय, धर्म मूर्तिऔर धर्मनेमि शब्दको भी दो दो बार उच्चारण कर अन्तमें स्वाहा पद बोलना चाहिये अर्थात् सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे, त्रिलोकविजय त्रिलोकविजय, धर्ममूर्ते धर्ममूर्ते, धर्मनेमे धर्मनेमे स्वाहा (हे सम्यग्दृष्टि, हे तीनों लोकोंको विजय करनेवाले, हे धर्ममूर्ति और हे धर्मके प्रवर्तक, मैं तेरे लिये हवि समर्पण करता हूँ) यह मन्त्र बोलना चाहिये ॥ ७५॥
Likewise, the words “Trilokavijaya” (Conqueror of the Three Worlds), “Dharmamūrti” (Embodiment of Dharma), and “Dharmanemi” (Originator of the Wheel of Righteousness) should each be pronounced twice in the vocative form.Then, conclude with the word “Svāhā”, thus chanting the mantra:“Samyagdṛṣṭe Samyagdṛṣṭe, Trilokavijaya Trilokavijaya, Dharmamūrte Dharmamūrte, Dharmaneme Dharmaneme Svāhā”(O Right-Visioned One! O Conqueror of the Three Worlds! O Embodiment of Dharma! O Initiator of the Wheel of Dharma! I offer this sacred oblation unto Thee.)॥75॥
श्लोक ( Shlok ) 76
काम्यमन्त्रमतो ब्रुयात्पूर्ववद्विधिवद् द्विजः । काम्यसिद्धिप्रधाना हि सर्वे मन्त्राः स्मृता बुधैः ॥७६॥
तत्पश्चात् द्विजोंको पहले के समान विधिपूर्वक काम्यमन्त्र पढ़ना चाहिये क्योंकि विद्वान् लोग सब मन्त्रोंसे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होना ही मुख्य फल मानते हैं ।।७६।।
Thereafter, the twice-born (brāhmaṇas) should recite the kāmya-mantra in the prescribed manner, just as before. For the wise hold this to be the principal fruit of all mantras—that the desired objective is thereby attained.॥76॥
श्लोक ( Shlok ) 77
चूर्णिः- सत्यजाताय नमः, अर्हज्जाताय नमः, परमजाताय नमः, परमार्हताय नमः, परमरूपाय नमः, परमतेजसे नमः, परमगुणाय नमः, परमस्थानाय नमः, परमयोगिने नमः, परमभाग्याय नमः, परमर्द्धये नमः, परमप्रसादाय नमः, परमकाङ्क्षिताय नमः, परमविजयाय नमः, परमविज्ञानाय नमः, परमदर्शनाय नमः, परमवीर्याय नमः, परमसुखाय नमः, सर्वज्ञाय नमः, अर्हते नमः, परमेष्ठिने नमो नमः, परमनेत्रे नमो नमः, सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे त्रिलोकविजय त्रिलोकविजय धर्ममूर्ते धर्ममूर्ते धर्मनेमे धर्मनेमे स्वाहा, सेवाफलं षट्परमस्थानं भवतु, अपमृत्युविनाशनं भवतु, समाधिमरणं भवतु ।
एते तु पीठिकामन्त्राः सप्त ज्ञेया द्विजोत्तमैः । एतैः सिद्धार्चनं कुर्यादाधा नादिक्रियाविधौ ॥७७॥
परमेष्ठी मन्त्रोंका संग्रह इस प्रकार है-
चूणिः- सत्यजाताय नमः, अहंज्जाताय नमः, परमजाताय नमः, परमाहंताय ननः, परमरूपाय नमः, परमतेजसे नमः, परमगुणाय नमः, परमस्थानाय नमः, परमयोगिने नमः, परमभाग्याय नमः, परमर्द्धये नमः, परमप्रसादाय नमः, परमकाङक्षिताय नमः, परमविजयाय नमः, परमविज्ञानाय नमः, परमदर्शनाय नमः, परमवीर्याय नमः, परमसुखाय नमः, सर्वज्ञाय नमः, अर्हते नमः, परमेष्ठिने नमो नमः, परमनेत्रे नमो नमः, सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे त्रिलोकविजय त्रिलोकविजय धर्ममूर्ते धर्ममूर्ते धर्मनेमे धर्मनेमे स्वाहा, सेवाफलं षट्परमस्थानं भवतु, अपमृत्युविनाशनं भवतु, समाधिमरणं भवतु । एते तु पीठिकामन्त्राः सप्त ज्ञेया द्विजोत्तमः । एतैः सिद्धार्चनं कुर्यादाषा’नादिक्रियाविधौ ॥७७॥ब्राह्मणोंको ये ऊपर लिखे हुए सात पीठिका मन्त्र जानना चाहिये और गर्भाधानादि क्रियाओंको विधि करनेमें इनसे सिद्धपूजन करना चाहिये ।।७७।।
The collection of Parameṣṭhī mantras is as follows:Summary (Chūṇiḥ):“Salutations to the One of True Birth, salutations to the Worthy-Born, salutations to the Exalted-Born, salutations to the Supremely Worthy, salutations to the One of Supreme Form, salutations to the One of Supreme Radiance, salutations to the One of Supreme Virtues, salutations to the One abiding in the Supreme Abode, salutations to the Supreme Yogi, salutations to the One of Supreme Fortune, salutations to the Possessor of Supreme Powers, salutations to the One of Supreme Grace, salutations to the One desiring Supreme Bliss, salutations to the One of Supreme Victory, salutations to the One of Supreme Knowledge, salutations to the One of Supreme Insight, salutations to the One of Supreme Strength, salutations to the One of Supreme Joy, salutations to the Omniscient, salutations to the Arhat, repeated salutations to the Parameṣṭhī, repeated salutations to the Supreme Guide.”“O One of Right Vision, O One of Right Vision; O Conqueror of the Three Worlds, O Conqueror of the Three Worlds; O Embodiment of Dharma, O Embodiment of Dharma; O Dharma-Nemi, O Dharma-Nemi—Swāhā!”“May this offering bear the fruit of attaining the six supreme abodes. May it destroy untimely death. May it culminate in the blessed end of meditative death.”These are known as the seven Pīṭhikā mantras, O best of the twice-born. With these, one should perform the siddhārcana ritual in the prescribed manner, beginning with the invocation of the Lord.॥77॥
श्लोक ( Shlok ) 78
क्रियामन्त्रास्त एते स्युराधानादिक्रियाविधौ । सूत्रे गणधरोद्धार्ये यान्ति साधनमन्त्रताम् ॥७८॥
गर्भाधानादि क्रियाओंकी विधि करनेमें ये मन्त्र क्रियामन्त्र कहलाते हैं और गणधरोंके द्वारा कहे हुए सूत्रमें ये ही साधन मन्त्रपनेको प्राप्त हो जाते हैं ।॥७८॥
In the performance of rites such as Garbha-ādāna (conception and related sacraments), these mantras are known as Kriyā-mantras, for they are applied in sacred actions. Indeed, in the sacred scriptures proclaimed by the Gaṇadharas, these very mantras are regarded as Sādhana-mantras—means to spiritual accomplishment.॥78॥
श्लोक ( Shlok ) 79
सन्ध्यास्वग्नित्रये देवपूजने नित्यकर्मणि । भवन्त्याहुतिमन्त्राश्च त एते विधिसाधिताः ॥७९॥
विधिपूर्वक सिद्ध किये हुए ये ही मन्त्र संध्याओंके समय तीनों अग्नियोंमें देवपूजनरूप नित्य कर्म करते समय आहुति मन्त्र कहलाते हैं ।॥७९॥
These very mantras, when duly consecrated according to prescribed rites, are known as Āhuti-mantras—oblational formulas—when employed in daily worship of the divine, performed at the three junctures of the day (Sandhyās) in the three sacred fires as part of one’s eternal duties.॥79॥
श्लोक ( Shlok ) 80
सिद्धार्च्चा सन्निधौ मन्त्रान् जपेदष्टोत्तरं शतम् । गन्धपुष्पाक्षतार्घादि ‘निवेदनपुरःसरम् ॥८०॥
सिद्ध भगवान्की प्रतिमाके सामने पहले गन्ध, पुष्प, अक्षत और अर्ध आदि समर्पण कर एक सौ आठ बार उक्त मन्त्रोंका जप करना चाहिये ।॥८०॥
In the presence of the consecrated image of the Blessed Lord, one should first offer fragrant substances, flowers, rice-grains, water-libation, and other appropriate offerings, and thereafter, recite the aforementioned mantras one hundred and eight times with devotion.॥80॥
श्लोक ( Shlok ) 81
सिद्धविद्यस्ततो मन्त्रैरेभिः कर्म समाचरेत् । शुक्लवासाः शुचिर्यज्ञोपवीत्यव्यग्रमानसः ॥८१॥
तदनन्तर जिसे विद्याएँ सिद्ध हो गई हैं, जो सफेद वस्त्र पहने हुए हैं, पवित्र हैं, यज्ञोपवीत धारण किये हुए हैं और जिसका चित्त आकुलतासे रहित है ऐसा द्विज इन मन्त्रोंके द्वारा समस्त क्रियाएँ करें ॥८१॥
Thereafter, a twice-born who is endowed with mastered sacred sciences, clad in white garments, pure in conduct, bearing the sacred thread, and whose mind is free from all agitation—such a one alone should perform all the sacred rites through the agency of these mantras.॥81॥
श्लोक 82 से 91
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आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71
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