आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 45- Shlok 22 to 31
श्लोक ( Shlok ) 22
आहारस्या यथा तेऽद्य विकारोऽयं विना त्वया । जीविकास्ति किमस्माकं प्रसीदतु विभो भवान् ॥२२॥
आज यह आपका विकार आहारके विकारके समान है, क्या आपके बिना हम लोगोंकी जीविका रह सकती है ? इसलिये हे प्रभो, हम लोगोंपर प्रसन्न हूजिये । भावार्थ-जिस प्रकार भोजनके बिना कोई जीवित नहीं रह सकता उसी प्रकार आपकी प्रसन्नताके बिना हम लोग जीवित नहीं रह सकते इसलिये हम लोगोंपर अवश्य ही प्रसन्न हूजिये ॥२२॥
This displeasure of yours today is like a disturbance in nourishment itself—for can we sustain our lives without you? Just as no being can live without food, even so, without your grace, we cannot endure.Therefore, O Lord, be pleased with us—let your favour once again shine upon us.22
श्लोक ( Shlok ) 23
यद्वयं भिन्नमर्यादे त्वय्यवार्येऽम्बुधाविव । तत्तेऽवशिष्टाः पुष्येन भवत्प्रेषणकारिणः ॥२३॥
हम लोग तो इधर उधर भेजने योग्य सेवक हैं और आप जिसका निवारण न हो सके ऐसे समुद्रके समान हैं। हे नाथ, आपके मर्यादा छोड़नेपर भी जो हम लोग जीवित बच सके हैं सो आपके पुण्यसे ही बच सके हैं ।॥ २३॥
We are but humble servants, to be sent here and there at your command, while you are as vast and unfathomable as the ocean, beyond all restraint.
O Lord, that we still live even after you withdrew your favour—this, too, is solely by the power of your own merit.23
श्लोक ( Shlok ) 24
त्वं वह्निनेव केनापि पापिना विश्वजीवितः । उष्णीकृतोऽसि प्रत्यस्मान् शीतीभव हि वारि वा ॥२४॥
आप पानी के समान सबको जीवित करनेवाले हैं जिस प्रकार अग्नि पानीको गर्म कर देती है उसी प्रकार किसीने हम लोगोंके प्रति आपको भी गर्म अर्थात् क्रोधित कर दिया है इसलिये अब आप पानीके समान ही शीतल हो जाइये ।।२४।।
ou are like water—sustaining the life of all. Yet just as fire can heat water,so too has someone kindled your wrath against us.
Therefore, we beseech you—be once more as cool and gentle as water itself.24
श्लोक ( Shlok ) 25
न’ चेदिमान् सुतान् दारान् ‘प्रतिग्राह्य पालय । मम तावाश्रयौ यामि पुरूणां पादपादपौ ॥२५॥
यदि आप शान्त नहीं होना चाहते हैं तो इन पुत्रों और स्त्रियोंको स्वीकार कीजिये, इनकी रक्षा कीजिये, में हम आप दोनों के आश्रय श्रीवृषभदेवके चरणरूपी वृक्षोंके समीप जाता हूँ ।।२५।।
And if you choose not to be pacified, then at the very least, accept these sons and daughters—protect them, O Lord.
As for me, I now seek refuge at the feet of Śrī Vṛṣabhadeva, that tree of shelter for both you and me.25
श्लोक ( Shlok ) 26 – 30
इति प्रसाद्य संतोष्य समारोप्य गजाधिपम् । अर्ककीति पुरोधाय वृतं भूचरखेचरैः ॥२६॥ शान्तिपूजां विधायाष्टौ दिनानि विविर्धाद्धकाम् । महाभिषेकपर्यन्तां सर्वपापोपशान्तये ॥२७।।जयमानीय सन्धाय सन्धानविधिवित्तदा । नितरां प्रीतिमुत्पाद्य कृत्वकोभाबमक्षरम् ॥२८॥अक्षिमालां महाभूत्या दत्वा सर्वार्थसम्पदा । सम्पूज्य गमयित्वैनम्” अनुगम्य मथोचितम् ॥२९॥तथेतरांश्च सम्मान्य नरविद्याधराधिपान् । सद्यो विसर्जयामास सव्रत्नगजवाजिभिः ॥३०॥
इस प्रकार भूमिगोचरी और विद्याधरोंसे घिरे हुए अर्ककीतिको प्रसन्न कर, संतुष्ट कर और उत्तम हाथीपर सवार कराकर सबसे आगे किया तथा सब पापोंकी शान्तिके लिये आठ दिन तक बड़ी विभूतिके साथ महाभिषेक होने पर्यन्त शान्तिपूजा की । मेलमिलापकी विधिको जाननेवाले अकंपनने जयकुमारको भी वहां बुलाया और उसी समय संधि कराकर दोनोंमें अत्यन्त प्रेम उत्पन्न करा दिया तथा कभी न नष्ट होनेवाली एकता करा दी । तदनन्तर अर्ककीतिको बड़े वैभव और सब प्रकारकी धनरूप सम्पदाओंके साथ साथ अक्षमाला नामकी कन्या दी, अच्छा आदर-सत्कार किया और उनकी योग्यताके अनुसार थोड़ी दूर तक साथ जाकर उन्हें बिदा किया । इसी प्रकार अच्छे अच्छे रत्न, हाथी और घोड़े देकर अन्य भूमिगोचरी और विद्याधर राजाओंका सन्मान कर उन्हें भी शीघ्र ही बिदा किया ॥ २६-३०।।
Thus, having appeased and gladdened Arkakīrti—who was surrounded by both Bhūmigocarī and Vidyādhara lords—King Akampana seated him upon a noble elephant and placed him at the head of the royal procession. Then, for the pacification of all accumulated sins, a grand śānti-pūjā was performed for eight days, culminating in a magnificent mahābhiṣeka.
Knowing well the rites of reconciliation, Akampana also summoned Jayakumāra. At that very moment, he established a lasting peace between the two and fostered deep affection in their hearts—uniting them in a bond that would never again be broken.
Thereafter, with splendid honour and abundant treasures, he bestowed upon Arkakīrti his daughter named Akṣamālā in marriage. He paid him homage befitting his dignity and accompanied him a short distance on his way in respectful farewell.
In like manner, Akampana honoured the other Bhūmigocarī and Vidyādhara kings with precious gems, elephants, and horses—and, with great courtesy, swiftly bid them farewell as well.26 – 30
श्लोक ( Shlok ) 31
ते स्वदुर्नयलज्जास्त वैराः स्वं स्वमगुः पुरम् । सा धीर्देवा “पराधस्य “प्रतिकर्थी हि याऽचिरात् ॥३१॥
अपने अन्यायके कारण उत्पन्न हुई लज्जासे जिनका वैर दूर हो गया है ऐसे वे सब लोग अपने अपने नगरको चले गये, सो ठीक ही है क्योंकि बुद्धि वही है जो भाग्यवश हुए अपराधका शीघ्र ही प्रतिकार कर लेती है ॥३१॥
Those whose enmity had been dispelled by the shame arising from their own injustice now returned to their respective cities. And rightly so—
for true wisdom lies in swiftly atoning for offences brought about by the hand of fate.
श्लोक 32 से 41
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 203 | श्लोक 204 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 352 | श्लोक 353 से 361 | श्लोक 362 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21