आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191
श्लोक 192 से 201 पारिव्रज्य की पूर्णता
मुनि सवारी, भाषा, और आहार का नियमन कर तप करता है, जिससे कमल पर चरण, दिव्य ध्वनि, और चार तृप्तियां (दिव्य, विजय, परम, अमृत) प्राप्त होती हैं। काम-सुख त्यागकर वह परमानंद पाता है। तप से त्यागी वस्तु ही उसे प्राप्त होती है। पारिव्रज्य में जिनेंद्र की आज्ञा मानकर तप करने से ही सच्ची दीक्षा होती है। अन्य मतों की पारिव्रज्य युक्तिहीन है। चौथी ‘सुरेन्द्रता’ क्रिया में सुरेंद्र पद प्राप्त होता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 39- Shlok 192 to 201
श्लोक ( Shlok ) 192
वन्दित्वा वन्द्यमर्हन्तं यतोऽनुष्ठितवांस्तपः । ततोऽयं वन्द्यते वन्द्यैर निन्द्यगुणसन्निधिः ॥१९२॥
इस मुनिने वन्दना करने योग्य अर्हन्तदेवकी वन्दना कर तपश्चरण किया था इसीलिये यह वन्दना करने योग्य-पूज्य पुरुषोंके द्वारा वन्दना किया जाता है तथा प्रशंसनीय उत्तम गुणोंका भण्डार हुआ है ॥१९२।।
This sage, having worshipped the venerable Arhat—worthy of the highest veneration—and undertaken austere penance,is now himself venerated by the most noble and worthy beings,and stands as a treasury of praiseworthy and exalted virtues.192
श्लोक ( Shlok ) 193
तपोऽयमनुपानत्कः पादचारी विवाहनः । कृतवान् पद्मगर्भेषु चरणन्यासमर्हति ॥१९३॥
जो जूता और सवारीका परित्याग कर पैदल चलता हुआ तपश्चरण करता है वह कमलोंके मध्यमें चरण रखनेके योग्य होता है अर्थात् अर्हन्त अवस्थामें देवलोग उसके चरणोंके नीचे कमलोंकी रचना करते हैं ।॥ १९३॥
He who renounces footwear and conveyance,and undertakes his penance walking barefoot—becomes one whose feet are worthy of resting upon lotus-blooms;for in the Arhat state, the gods fashion lotuses beneath his every step.193
श्लोक ( Shlok ) 194
वाग्गुप्तो हितवाग्वृत्त्या यतोऽयं तपसि स्थितः । ततोऽस्य दिव्यभाषा स्यात् प्रीणयन्त्यखिलां सभाम् ॥१९४॥
चूंकि यह मुनि वचनगुप्तिको धारण कर अथवा हित मित वचनरूप भाषासमितिका पालन कर तपश्चरणमें स्थित हुआ था इसलिये ही इसे समस्त सभाको संतुष्ट करनेवाली दिव्य ध्वनि प्राप्त हुई है ॥१९४।।
Because this sage observed restraint in speech—practicing right verbal conduct through measured and wholesome words—and remained steadfast in penance,he is now endowed with the divine voice,a speech that brings contentment to all assemblies. 194
श्लोक ( Shlok ) 195
अनाश्वान्नियताहारपारणोऽतप्त यत्तपः । तदस्य दिव्यविजय परमामृततृप्तयः ॥१९५॥
इस मुनिने पहले उपवास धारण कर अथवा नियमित आहार और पारणाएं कर तप तपा था इसलिये ही इसे दिव्यतृप्ति, विजय-तृप्ति, परमतृप्ति और अमृततृप्ति ये चारों ही तृप्तियाँ प्राप्त हुई हैं ।॥ १९५॥
This sage, having once observed fasts, regulated his intake, and practiced austere vows,thus performed rigorous penance—therefore, he is now endowed with fourfold divine contentment:celestial satisfaction, victorious fulfillment, supreme contentment, and the bliss of immortality.195
श्लोक ( Shlok ) 196
त्यक्तकामसुखो भूत्वा तपस्यस्थाच्चिरं यतः । ततोऽयं सुखसाद्भूत्वा परमानन्दथुं भजेत् ॥१९६।॥
यह मुनि काम जनित सुखको छोड़कर चिरकाल तक तपश्चरणमें स्थिर रहा था इसलिये ही यह सुखस्वरूप होकर परमानन्दको प्राप्त हुआ है ।। १९६।।
This sage, having renounced pleasures born of desire and remained steadfast in penance for a long time,has now become the very embodiment of bliss—attaining supreme and eternal beatitude. 196
श्लोक ( Shlok ) 197
किमत्र बहुनोक्तेन यद्यदिष्टं यथाविधम् । त्यजेन्मुनिरसंकल्पः तत्तत्सूतेऽस्य तत्तपः ॥१९७॥
इस विषयमें बहुत कहनेसे क्या लाभ है ? संक्षेप में इतना ही कह देना ठीक है कि मुनि संकल्परहित होकर जिस प्रकारकी जिस जिस वस्तुका परित्याग करता है उसका तपश्चरण उसके लिये वही वही वस्तु उत्पन्न कर देता है ।॥१९७॥
Of what use is lengthy elaboration in this matter?Suffice it to say, in brief:whatsoever the sage renounces—free of desire and resolve—that very thing, in its highest form, is brought forth to him through the power of his penance.197
श्लोक ( Shlok ) 198
प्राप्तोत्कर्षं तदस्य स्यात्तपश्चिन्तामणेः फलम् । यतोऽर्हज्जातिमूर्त्यादिप्राप्तिः सैषाऽनुर्वाणता ॥ १९८॥
जिस तपश्चरणरूपी चिन्तामणिका फल उत्कृष्ट पदकी प्राप्ति आदि मिलता है और जिससे अर्हन्तदेवकी जाति तथा मूर्ति आदिकी प्राप्ति होती है ऐसी इस पारिव्रज्य नामकी क्रियाका वर्णन किया ॥१९८॥
Thus has been described this sacred act known as Pārivrajya—by which, through the wish-fulfilling gem of penance,one attains exalted states, and comes into the birth and divine form of the venerable Arhat.198
श्लोक ( Shlok ) 199
जैनेश्वरी परामाज्ञां सूत्रोद्दिष्टां प्रमाणयन् । तपस्यां यदुपाधत्ते पारिव्राज्यं तदाञ्जसम् ॥१९९॥
जो आगममें कही हुई जिनेन्द्रदेवकी आज्ञाको प्रमाण मानता हुआ तपस्या धारण करता है अर्थात् दीक्षा ग्रहण करता है उसीके वास्तविक पारिव्रज्य होता है ।।१९९॥
He alone truly undertakes Pārivrajya—who, accepting the command of the Lord Jina as revealed in the scriptures as his supreme authority,embraces austerity and enters into the life of renunciation through sacred initiation. 199
श्लोक ( Shlok ) 200
अन्यच्च बहुवाग्जाल निबद्धं युक्तिबाधितम् । पारिव्राज्य परित्यज्य ग्राह्यं चेदमनुत्तरम् ॥ २००॥इति पारिव्राज्यम् ।
अनेक प्रकारके वचनोंके जालमें निबद्ध तथा युक्तिसे बाधित अन्य लोगोंके पारिव्रज्य को छोड़कर इसी सर्वोत्कृष्ट पारिव्रज्यको ग्रहण करना चाहिये ॥ २००॥ यह तीसरी पारि-व्रज्य क्रिया है ।
Casting aside the lesser paths of renunciation—bound in webs of words and refuted by true reasoning—one should embrace this supreme Pārivrajya alone.This is the third act of Pārivrajya.200
श्लोक ( Shlok ) 201
या सुरेन्द्रपदप्राप्तिः पारिव्राज्य फलोदयात् । सैषा सुरेन्द्रता नाम क्रिया प्रागनुवर्णिता ॥२०१॥इति सुरेन्द्रता ।
पारिव्रज्यके फलका उदय होनेसे जो सुरेन्द्र पदकी प्राप्ति होती है वही यह सुरेन्द्रता नामकी क्रिया है इसका वर्णन पहले किया जा चुका है ।॥२०१।। यह चौथी सुरेन्द्रता क्रिया है।
The attainment of the state of Lord of the Gods—Surendra—which arises as the fruit of Pārivrajya,is what is known as the act of Surendratā;this has already been described above.This is the fourth act—Surendratā-kriyā.201
श्लोक 202 से 211
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205
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