आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291
श्लोक 292 से 301 युद्ध में मृत योद्धाओं की स्त्रियों का विलाप
कई स्त्रियाँ अपने पतियों को शत्रु के बाणों से मृत देखकर स्वयं मर गईं। कुछ ने वीरलक्ष्मी की ईर्ष्या में प्राण त्यागे, तो कुछ ने पति को अप्सराओं के साथ स्वर्ग में जाने की कल्पना कर विलाप किया। योद्धा अपनी स्त्रियों की प्रतीक्षा में मृत्यु के कगार पर थे, और कुछ ने पत्नी के प्रेम में प्राण छोड़े। युद्धक्षेत्र में प्रेम और शोक का मिश्रण देखने को मिला।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 44- Shlok 292 to 301
श्लोक ( Shlok ) 292
इत्याविर्भावितानङ्गरसास्ताः प्रियसङ्गमात् । प्रीति वाग्गोचरातीतां स्वीचक्रुर्वकवीक्षणाः ॥२९२॥
इस प्रकार जिनके कामका रस प्रकट हुआ है और जिनकी दृष्टि कुछ-कुछ तिरछी हो रही है ऐसी स्त्रियाँ पतिके समागम होनेसे वचनातीत आनन्दका अनुभव कर रही थीं ॥ २९२॥
Thus, those women in whom the nectar of passion had awakened, and whose glances had begun to turn ever so slightly askew with longing, experienced a bliss beyond all words in the union with their beloved husbands.292
श्लोक ( Shlok ) 293
तत्र काचिद् प्रियं वीक्ष्य’ कथाशेषं द्विषच्छरैः । स्वयं कामशरैरक्षताङ्गी चित्रमभूद् व्यसुः ॥२९३॥
उन स्त्रियोंमेंसे कोई स्त्री अपने पतिको शत्रुओंके बाणोंसे मरा हुआ देखकर आश्चर्य है कि कामके बाणोंसे शरीर क्षत न होनेपर भी स्वयं मर गई थीं ।॥ २९३॥
Among those women, there were some who, upon seeing their husbands slain by the arrows of the enemy, perished themselves—not from wounds of the body, but from the unseen arrows of Love. Strange indeed, that though untouched by weapons, they were struck down by longing alone. 293
श्लोक ( Shlok ) 294
‘क्षतैरनु पलक्ष्याङ्गं वीक्ष्य कान्तमजानती। परा परासुतां ‘प्रापज्ज्ञात्वाऽऽत्मविहितव्रणैः ॥२९४।।
अन्य कोई अजान स्त्री घावोंसे जिसके अंग उपांग ठीक-ठीक नहीं दिखाई देते ऐसे अपने प्रिय पतिको देखकर और उन्हें अपने द्वारा ही किये हुए घाव समझकर प्राणरहित हो गई थीं ।॥ २९४।॥
Another, an innocent and unknowing woman, beheld her beloved husband—his limbs disfigured and scarcely recognizable from grievous wounds—and, mistaking those very wounds as caused by her own harsh words or deeds, surrendered her life in silent anguish and remorse.294
श्लोक ( Shlok ) 295
मया निवारितोऽप्याया’ वीरलक्ष्मीप्रियः प्रिय । तत्कठोरव्रणैरेवं जातोऽसीति मृता परा ॥२९५॥
हे प्रिय, तुम्हें वीर लक्ष्मी बहुत ही प्यारी थी इसीलिये मेरे रोकनेपर भी तुम उसके पास आये थे अब उसी वीरलक्ष्मीके कठोर घावोंसे तुम्हारी यह दशा हो रही है यह कहती हुई कोई अन्य स्त्री मर गई थी ।।२९५॥
“O beloved, it was the glory of valor that you held dear—so dear, that even my pleading could not hold you back from her embrace. And now, it is by her cruel wounds that you lie in this state.” Thus lamenting, another woman, overcome with grief and love, breathed her last beside him.295
श्लोक ( Shlok ) 296 – 297
मां निवार्य सहायान्तीं कीर्ति स्वीकर्तुमागमः। निर्मलेति विपर्यस्तो जानन्नपि बहिश्चरीम् ॥२९६॥स्थिता तत्रैव सा कीर्तिः किं वदन्ति “नरोऽन्तरम् । इति सासू यमुक्त्वाऽन्या “प्रायासीत् “प्रियपद्धतिम् ll२९७।।
हे प्रिय, में उसी समय आपके साथ आ रही थी परन्तु आप मुझे रोककर कीतिको स्वीकार करने के लिये यहाँ आये थे, यद्यपि आप यह जानते थे कि कीति सदा बाहर घूमनेवाली (स्वैरिणी-व्यभिचारिणी) है तथापि यह शुद्ध है ऐसा आपको भ्रम हो गया, अब देखिये, वह कीति वहीं रह गई, हाय, क्या मनुष्य हृदय अथवा विरहको जानते हैं ? इस प्रकार ईर्ष्याके साथ कहकर अन्य कोई स्त्री अपने पतिके मार्गपर जा पहुँची थी अर्थात् पतिको मरा हुआ देखकर स्वयं भी मर गई थी ॥२९६-२९७।।
“O beloved, I was following you even then—but you held me back and came here to embrace Kīrti, choosing her instead. Though you knew she was ever roaming—fickle and unfaithful—you were still deluded into believing her pure. And now, see! That Kīrti has forsaken you in the end. Alas! Do men truly understand the heart… or the torment of separation?”
Thus speaking, her voice heavy with jealousy and sorrow, another woman followed the path her husband had taken—departing from life upon seeing him fallen.296 – 297
श्लोक ( Shlok ) 298 – 299
न कि निवारिताऽप्यायां त्वया सार्द्धं विचेतना । सन्निधौ मे किमेवं त्वां नयन्ति गणिकाधमाः ॥२९८llअस्तु कि यातमद्यापि तत्र त्वां न हराणि किम् । विलप्यैवं कलालापा काचित् कान्तानुगाऽभवत् ll२९९ll
हे प्रिय, रोकी जाकर भी में मूर्खा आपके साथ क्यों नहीं आई ? क्या मेरे समीप रहते ये नीच वेश्याएँ (स्वर्गकी अप्सराएँ) इस प्रकार तुम्हें ले जाती ? खैर, अब भी क्या गया ? क्या मैं वहाँ उनसे तुम्हें न छीन लूंगी ! इस प्रकार विलाप कर मधुर स्वरवाली कोई स्त्री अपने पतिकी अनुगामिनी हुई थी अर्थात् वह भी मर गई थी ॥२९८-२९९।।
“O beloved, though you bade me stay, why did I—foolish as I was—not come with you? Had I been at your side, would those lowly courtesans—those heavenly nymphs—have dared to carry you away thus?But no matter—nothing is lost yet. Even now, shall I not wrest you from their grasp?”Thus lamenting in a voice as sweet as song, one devoted wife followed her husband even unto death—becoming his faithful companion on the path beyond.298 – 299
श्लोक ( Shlok ) 300
शरनिभिन्नसर्वाङ्गः कीलितासुरिवापरः । कान्तागमं प्रतीक्ष्यास्त लोचनस्थितजीवितः ॥३००॥
जिसका सब शरीर बाणोंसे छिन्न भिन्न हो गया है, और इसलिये ही जिसके प्राण कीलितसे हो गये हैं तथा नेत्रोंमें ही जिसका जीवन अटका हुआ है ऐसा कोई योद्धा अपनी स्त्री के आनेकी प्रतीक्षा कर रहा था ॥ ३००॥
His entire body torn and shattered by arrows, his life held fast as if nailed in place, his soul lingering only in his fading eyes—such was the state of a warrior who, even in the throes of death, waited with yearning for the arrival of his beloved wife.300
श्लोक ( Shlok ) 301
कोपदष्टविमुक्तौष्ठं कान्तमालोक्य कामिनी । वीरलक्ष्म्या कृतासूया क्षणकोपाऽसुमत्यजत् ॥३०१॥
जिसने क्रोधसे अपने ओठ डसकर छोड़ दिये हैं ऐसे अपने पतिको देखकर क्षणभर क्रोध करती और वीरलक्ष्मी के साथ ईर्ष्या करती हुई किसी अन्य स्त्रीने अपने प्राण छोड़ दिये थे ॥ ३०१।।
Upon seeing her husband, who in anger had bitten his own lips and now lay still, another woman—burning with momentary wrath and seething with jealousy toward Vīra-Lakṣmī—surrendered her life, unable to bear the torment of love, pride, and loss.301
श्लोक 302 से 311
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 264 | श्लोक 265 से 275 | श्लोक 276 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 332 से 339
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