आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101
श्लोक 102 से 111 सद्गृहित्व और देवब्राह्मण की महिमा
सद्गृहित्व में भव्य की प्रशंसा धर्मस्वरूप और ब्रह्मतेज युक्त के रूप में होती है। वह पूजा करता, करवाता, और वेद-वेदांग पढ़ता-पढ़ाता है। उसके गुणों में अणिमा-महिमा आदि देवगुण हैं, जिससे वह पृथ्वी पर पूजित होता है। यदि कोई उसकी जाति या कुल पर प्रश्न उठाए, तो वह कहता है कि वह जिनेंद्र के उपदेश से उत्पन्न हुआ है, न कि सांसारिक कुल-जाति से।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 39- Shlok 102 to 111
श्लोक ( Shlok ) 102
तमेनं धर्मसाद्भूतं श्लाघन्ते धार्मिकाः जनाः। परं तेज इव ब्राह्ममवतीर्णं महीतलम् ॥१०२॥
उस समय धर्मस्वरूप हुए उस भव्यकी अन्य धर्मात्मा लोग यह कहते हुए प्रशंसा करते हैं कि तू पृथिवीतलपर अवतीर्ण हुआ उत्कृष्ट ब्रह्मतेजके समान है ।।१०२।।
At that moment, other pious and virtuous souls extol that noble one, who has become the very embodiment of Dharma, saying:“Thou hast descended upon the face of the earth like a radiant embodiment of supreme Brahmic splendor.”102
श्लोक ( Shlok ) 103 –106
स यजत् याजयन् धीमान् यजमाने रुपासितः। अध्यापयन्नधीयानो वेदवेदाङ्ग विस्तरम् ॥ १०३॥स्पृशनपि महीं नैव स्पृष्टो दोषैर्महीगतैः । देवत्वमात्मसात्कुर्यादि हैवाभ्यर्चितैर्गुणैः ॥१०४।॥ नाणिमा महिमेवास्य गरिमेव न लाघवन् । ‘प्राप्तिः प्राकाम्यमीशित्वं वशित्वं चेति तद्गुणाः ॥१०५।।गुणैरेभिरुपारूढमहिमा देवसाद्भवम् । बिभ्रल्लोकातिगं धाम मह्यामेष महीयते ॥१०६॥
पूजा करनेवाले यजमान जिसकी पूजा करते हैं, जो स्वयं पूजन करता है, और दूसरोंसे भी कराता है, जो वेद और वेदाङग के विस्तारको स्वयं पढ़ता है तथा दूसरोंको भी पढ़ाता है, जो यद्यपि पृथिवीका स्पर्श करता है तथापि पृथिवीसम्बन्धी दोष जिसका स्पर्श नहीं कर सकते हैं, जो अपने प्रशंसनीय गुणोंसे इसी पर्याय में देवपर्यायको प्राप्त होता है, जिसके अणिमा ऋद्धि अर्थात् छोटापन नहीं है किन्तु महिमा अर्थात् बड़प्पन है, जिसके गरिमाऋद्धि है परन्तु लघिमा नहीं हैं, जिसमें प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व आदि देवताओंके गुण विद्यमान हैं, उपर्युक्त गुणोंसे जिसकी महिमा बढ़ रही है, जो देवरूप हो रहा है और लोकको उल्लंघन करनेवाला उत्कृष्ट तेज धारण करता है ऐसा यह भव्य पृथिवीपर पूजित होता है ॥ १०३-१०६।।
He whom the officiating priests worship through sacred rites, who himself engages in worship and inspires others to do the same;He who studies in depth the Vedas and their limbs, and also imparts that knowledge to others;He who, though treading upon the earth, remains untouched by its defilements;He who, by his noble virtues alone, attains a divine state even in this very existence, He who possesses no aṇimā (littleness) but abounds in mahimā (greatness),Who is endowed with garimā (gravity, weight of character), and untouched by laghimā (lightness or frivolity);In whom shine forth the divine qualities of prāpti (attainment), prākāmya (irresistible will), īśitva (lordship), and vaśitva (mastery);Whose glory is ever increasing through these exalted attributes—Such a one, who in truth has become divine, bearing a brilliance that transcends the world,—this noble soul is worshipped upon the very earth as one worthy of highest reverence.103 –106
श्लोक ( Shlok ) 107
धम्यैंराचरितैः सत्यशौचक्षान्तिदमादिभिः । देवब्राह्मणतां श्लाध्यां स्वस्मिन् सम्भावयत्यसौ ।॥१०७।।
सत्य, शौच, क्षमा और दम आदि धर्मसम्बन्धी आचरणोंसे वह अपने में प्रशंसनीय देवब्राह्मणपनेकी संभावना करता है अर्थात् उत्तम आचरणोंसे अपने आपको देवब्राह्मणके समान उत्तम बना देता है ।॥१०७।।
Through the noble observances of Dharma—such as truthfulness, purity, forgiveness, and self-restraint—he nurtures within himself the potential of the praiseworthy Deva-Brāhmaṇa, and by his exalted conduct, he indeed renders himself akin to a divine Brāhmaṇa. 107
श्लोक ( Shlok ) 108
अथ जातिमदावेशात् कश्चिदेनं द्विजब्रुवः । ब्रूयादेवं किमद्यैव देवभूयं गतो भवान् ॥१०८॥
यदि अपनेको झूठमूठ ही द्विज माननेवाला कोई पुरुष अपनी जातिके अहंकारके आवेश से इस देवब्राह्मणसे कहे कि आप क्या आज ही देवपनेको प्राप्त हो गये हैं? ॥१०८।।
Should a man, who falsely considers himself a dvija, speak to this Deva-Brāhmaṇa—driven by the pride of his lineage—and mockingly say, “Have you only today attained this so-called divinity?” 108
श्लोक ( Shlok ) 109
त्वमामुप्यायणः किन्न किन्ते ऽम्बाऽमुष्य पुत्रिका” । ‘येनैवमुन्नसो भूत्वा यास्यसत्कृत्य मद्विधान् ॥१०९।।
क्या तू अमुक पुरुषका पुत्र नहीं है ? और क्या तेरी माता अमुक पुरुषकी पुत्री नहीं है ? जिससे कि तू इस तरह नाक ऊंची कर मेरे ऐसे पुरुषोंका सत्कार किये बिना ही जाता है ? ।।१०९।।
“Are you not the son of so-and-so? And is your mother not the daughter of so-and-so?How then do you raise your nose so high, passing by men like me without showing them due respect?”109
श्लोक ( Shlok ) 110
जातिः सैव कुलं तच्च सोऽसि योऽसि प्रगेतनः । तथापि देवतात्मानम् आत्मानं मन्यते भवान् ॥११०।।
यद्यपि तेरी जाति वही है, कुल वही है और तू भी वही है जो कि सबेरेके समय था तथापि तू अपने आपको देवतारूप मानता है ।।११०।।
Though thy caste remains the same, thy lineage unchanged, and thou art the very same as at dawn,Yet thou deemest thyself to be divine, as if transformed into a celestial being.110
श्लोक ( Shlok ) 111
देवतातिथिपित्रग्निकार्येष्वप्रयतो भवान् । गुरुद्विजातिदेवानां प्रणामाच्च पराङ्मुखः ॥१११॥
यद्यपि तू देवता, अतिथि, पितृगण और अग्निके कार्योंमें निपुण है तथापि गुरु, द्विज और देवोंको प्रणाम करनेसे विमुख है ।।१११।।
Though well-versed in the rites of the gods, the guests, the ancestors, and the sacred fire,Yet thou turnest away from bowing to the Guru, the twice-born, and the Divine—showing them no reverence.111
श्लोक 112 से 121
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 303 | श्लोक 304 से 313
आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101
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