श्लोक 1 से 11 दीक्षान्वय क्रियाओं का प्रारंभ
महाराज भरत द्विजों को मोक्ष प्रदान करने वाली 43 दीक्षान्वय क्रियाओं का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि व्रतों का धारण करना दीक्षा है, जो महाव्रत (सूक्ष्म-स्थूल हिंसा आदि पापों का पूर्ण त्याग) और अणुव्रत (स्थूल हिंसा आदि का त्याग) के रूप में दो प्रकार के होते हैं। दीक्षा वह प्रवृत्ति है, जब सन्मुख पुरुष व्रत ग्रहण करता है। पहली क्रिया ‘अवतार’ है, जिसमें मिथ्यात्व से दूषित भव्य पुरुष योग्य मुनि या गृहस्थाचार्य से समीचीन धर्म का उपदेश मांगता है, क्योंकि अन्य मत और वेदों के वाक्य उसे दोषपूर्ण प्रतीत होते हैं।
श्लोक 12 से 21 आप्त और समीचीन धर्म का वर्णन
मुनि या आचार्य भव्य को आप्त के सत्य वचनों को ग्रहण करने का उपदेश देते हैं। आप्त वह है, जो वीतराग, सर्वज्ञ, कल्याणकारी, और मोक्षमार्ग का उपदेशक है। आप्त के गुणों में रूप, तेज, ज्ञान, और सुखामृत आदि शामिल हैं। जैन मत आप्त का कथन है, जो युक्ति, आगम, और गंभीर शासन से युक्त है। इसमें शास्त्र, मंत्र, और क्रिया का यथार्थ निरूपण है। अन्य मतों के वचन दुष्ट हैं, जबकि जैन धर्म ही समीचीन मार्ग है।
श्लोक 22 से 31 धर्म और शुद्धि के लक्षण
वेद, पुराण, और धर्मशास्त्र वही हैं, जो हिंसा का निषेध करते हैं। हिंसा का उपदेश देने वाले ग्रंथ धूर्तों के रचित हैं। चारित्र पापकर्मों से विरक्ति है, जो देवपूजा आदि छह कर्मों में प्रकट होता है। गर्भाधान से निर्वाण तक की क्रियाएं ही शुद्ध हैं। मंत्र, देवता, लिंग, और आहार की शुद्धि अहिंसा और दया पर आधारित है। हिंसा करने वाले मंत्र, देवता, और मांसाहारी आहार दुष्ट हैं। कामशुद्धि जितेंद्रिय मुनियों या संतोषी गृहस्थों में होती है।
श्लोक 32 से 41 अवतार और स्थानलाभ क्रिया
आप्त के उपदेश से भव्य मिथ्यामार्ग त्यागकर समीचीन मार्ग अपनाता है। यह ‘गर्भाधान’ के समान अवतार क्रिया है। इसके बाद ‘वृत्तलाभ’ क्रिया में भव्य गुरु को नमस्कार कर व्रत ग्रहण करता है। तीसरी ‘स्थानलाभ’ क्रिया में वह उपवास के बाद जिनालय में अष्टदल कमल या समवसरण मंडल की रचना करता है। आचार्य उसे जिनप्रतिमा के समक्ष बैठाकर पंचमुष्टि से मस्तक स्पर्श कर श्रावक दीक्षा देते हैं और पंच नमस्कार मंत्र का उपदेश करते हैं।
श्लोक 42 से 51 गणग्रह और पूजाराध्य क्रिया
चौथी ‘गणग्रह’ क्रिया में भव्य मिथ्यादेवताओं का विसर्जन कर अपने मत के शांत देवताओं की पूजा करता है। पांचवीं ‘पूजाराध्य’ क्रिया में वह जिनपूजन, उपवास, और द्वादशांग के अर्थ सुनता है। छठी ‘पुण्ययज्ञा’ क्रिया में वह साधर्मी पुरुषों के साथ चौदह पूर्वविद्याओं के अर्थ सुनता है। सातवीं ‘दृढ़चर्या’ क्रिया में वह अपने मत के शास्त्रों को समझकर अन्य मतों के ग्रंथों का अध्ययन करता है।
श्लोक 52 से 61 उपयोगिता और उपनीति क्रिया
आठवीं ‘उपयोगिता’ क्रिया में दृढ़व्रती भव्य पर्व के दिन रात्रि में प्रतिमायोग धारण करता है। नौवीं ‘उपनीति’ क्रिया में वह शुद्धि और उत्कृष्ट चिह्न (सफेद वस्त्र, यज्ञोपवीत, देवपूजा आदि) धारण करता है। दसवीं ‘व्रतचर्या’ क्रिया में वह यज्ञोपवीत धारण कर उपासकाध्ययन का अभ्यास करता है। ग्यारहवीं ‘व्रतावतरण’ क्रिया में वह गुरु के समक्ष आभूषण ग्रहण करता है। बारहवीं ‘विवाह’ क्रिया में वह अपनी पत्नी को श्रावक दीक्षा देकर पुनर्विवाह संस्कार करता है।
श्लोक 62 से 71 वर्णलाभ क्रिया
तेरहवीं ‘वर्णलाभ’ क्रिया में भव्य अन्य साधर्मी श्रावकों से संबंध स्थापित करता है। वह चार श्रावकों को बुलाकर कहता है कि उसने समस्त गृहस्थ धर्म का पालन किया, दान दिए, गुरुपूजन किया, और मिथ्याधर्म त्यागकर सम्यक् चारित्र अपनाया। वह यज्ञोपवीत, श्रावकाचार, और पत्नी के संस्कार पूर्ण कर चुका है। श्रावक उसे प्रशंसा कर वर्णलाभ प्रदान करते हैं, जिससे वह उनके समान हो जाता है।
श्लोक 72 से 81 कुलचर्या से कर्त्रन्वय क्रियाओं का प्रारंभ
चौदहवीं ‘कुलचर्या’ क्रिया में भव्य पुरुष आर्योचित छह कर्मों (देवपूजा आदि) में पूर्ण प्रवृत्ति रखता है। पंद्रहवीं ‘गृहीशिता’ क्रिया में सम्यक् चारित्र और अध्ययन से युक्त श्रावक, प्रायश्चित्त, श्रुति, स्मृति, और पुराण जानकर गृहस्थाचार्य पद प्राप्त करता है। सोलहवीं ‘प्रशान्तता’ क्रिया में वह उपवास आदि भावनाओं से शांति प्राप्त करता है। सत्रहवीं ‘गृहत्याग’ क्रिया में वह पुत्र को शिक्षा देकर घर छोड़ता है। अठारहवीं ‘दीक्षाद्य’ क्रिया में वह तपोवन में एक वस्त्र धारण करता है। उन्नीसवीं ‘जिनरूपता’ क्रिया में वह मुनि से दिगंबर रूप ग्रहण करता है। शेष क्रियाएं गर्भान्वय जैसी हैं। इनका पालन करने वाला भव्य शीघ्र निर्वाण प्राप्त करता है। इसके बाद कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन शुरू होता है।
श्लोक 82 से 91 सज्जाति क्रिया
कर्त्रन्वय की पहली ‘सज्जाति’ क्रिया में भव्य को मनुष्य जन्म और विशुद्ध कुल-जाति में जन्म मिलता है। विशुद्ध कुल (पिता का वंश) और जाति (माता का वंश) सज्जाति कहलाती है, जो रत्नत्रय की प्राप्ति को सुलभ करती है। आर्यखंड में योग्य शरीर और सामग्री से सज्जाति अनेक कल्याण देती है। संस्काररूपी जन्म से भव्य द्विजन्म प्राप्त करता है, जैसे रत्न या सुवर्ण संस्कार से शुद्ध होकर उत्कर्ष पाता है।
श्लोक 92 से 101 सज्जाति और सद्गृहित्व क्रिया
सज्जाति में भव्य सर्वज्ञ के मुख से सम्यग्ज्ञान प्राप्त कर व्रत-शील से द्विज कहलाता है। वह यज्ञोपवीत (द्रव्यसूत्र) और सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र (भावसूत्र) धारण करता है। आचार्य उसे पुष्प-अक्षतों से जिनपूजा के आशीर्वाद देते हैं, जो धर्म में उत्साह बढ़ाता है। दूसरी ‘सद्गृहित्व’ क्रिया में वह गृहस्थ अवस्था में अरहंत के उपदेशानुसार छह कर्मों का आलस्यरहित पालन करता है। जिनेंद्र और गणधरों की शिक्षा से वह ब्रह्मतेज धारण करता है।
श्लोक 102 से 111 सद्गृहित्व और देवब्राह्मण की महिमा
सद्गृहित्व में भव्य की प्रशंसा धर्मस्वरूप और ब्रह्मतेज युक्त के रूप में होती है। वह पूजा करता, करवाता, और वेद-वेदांग पढ़ता-पढ़ाता है। उसके गुणों में अणिमा-महिमा आदि देवगुण हैं, जिससे वह पृथ्वी पर पूजित होता है। यदि कोई उसकी जाति या कुल पर प्रश्न उठाए, तो वह कहता है कि वह जिनेंद्र के उपदेश से उत्पन्न हुआ है, न कि सांसारिक कुल-जाति से।
श्लोक 112 से 121 देवब्राह्मण की शुद्धता
कोई मिथ्यादृष्टि यदि भव्य को उलाहना दे कि वह मनुष्य ही है, तो वह उत्तर देता है कि जिनेंद्र उसका पिता और ज्ञान उसका गर्भ है। सम्यग्दर्शन, ज्ञान, और चारित्र उसकी शक्तियां हैं। वह बिना योनि के उत्पन्न होकर देवब्राह्मण है। उसका यज्ञोपवीत और व्रत शास्त्रोक्त चिह्न हैं। मिथ्यादृष्टि केवल मलिन सूत्र धारण करते हैं। जीव का जन्म और मरण दो प्रकार का होता है: शरीरजन्म-मरण और संस्कारजन्म-मरण। भव्य को संस्कारजन्म से द्विजपना प्राप्त होता है।
श्लोक 122 से 131 संस्कारजन्म और ब्राह्मण की परिभाषा
संस्कारमरण से भव्य मिथ्यादर्शन छोड़ता है और संस्कारजन्म से देवद्विज कहलाता है। वह युक्तिपूर्ण वचनों से अपने गुणों का उत्कर्ष प्रकट करता है। जिनेंद्र ही आदि ब्रह्मा हैं, जिनके उपदेश से शिष्य ब्राह्मण कहलाते हैं। मृगचर्म, जटा, या कामवश भ्रष्ट व्यक्ति ब्रह्मा नहीं हो सकता। जिनेंद्र के ज्ञान से उत्पन्न द्विज वर्णातीत और उत्कृष्ट हैं।
श्लोक 132 से 141 द्विज की शुद्धि और अशुद्धि
क्षमा, शौच, संतोष, और निर्दोष आचरण से युक्त द्विज सर्वोत्तम हैं। मलिन आचार, हिंसा, और पापकर्म करने वाले ब्राह्मण नहीं, बल्कि कर्मचांडाल हैं। हिंसक धर्म को मानने वाले निर्दय, लुटेरे, और दंडनीय हैं। जैन लोग निर्मल आचार से शुक्लवर्ग में, जबकि मिथ्यादृष्टि पापियों के कृष्णवर्ग में गिने जाते हैं। द्विज की शुद्धि श्रुति, स्मृति, पुराण, सदाचार, मंत्र, और कामनाश से होती है। दया न्याय और हिंसा अन्याय है, जिससे शुद्धि-अशुद्धि का निर्णय होता है।
श्लोक 142 से 151 जैन द्विजों की शुद्धता और हिंसा का निराकरण
जैन लोग विशुद्ध वृत्ति के कारण वर्णोत्तम और जगत्पूज्य द्विज हैं। जैन गृहस्थों की आजीविका के लिए छह कर्मों (असि, मषि आदि) में थोड़ी हिंसा हो सकती है, पर शास्त्रों में इसके शुद्धिकरण का उपाय है। शुद्धि के तीन अंग हैं: पक्ष (मैत्री, प्रमोद, कारुण्य, माध्यस्थ्य भाव से हिंसा त्याग), चर्या (देवता, मंत्र, औषधि, या भोजन के लिए हिंसा न करने की प्रतिज्ञा), और साधन (आयु के अंत में शरीर, आहार, और चेष्टाओं का त्याग कर ध्यान से आत्मशुद्धि)। इनसे हिंसा का दोष नहीं लगता। जैन मत में चार आश्रम (ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, भिक्षुक) ही विशुद्ध हैं, अन्य मतों के आश्रम विचार में दोषपूर्ण हैं।
श्लोक 152 से 161 सद्गृहित्व और पारिव्रज्य क्रिया
चार आश्रमों के भेदों से अनेक प्रकार की शुद्धि प्राप्त होती है, जिनका विस्तार ग्रंथ वृद्धि के भय से नहीं किया गया। दूसरी ‘सद्गृहित्व’ क्रिया में गृहस्थ धर्म का पालन कर भव्य दीक्षा ग्रहण करता है, जिसे ‘पारिव्रज्य’ कहते हैं। यह तीसरी क्रिया है, जिसमें ममत्व त्यागकर दिगंबर रूप धारण किया जाता है। मोक्ष की इच्छा वाला भव्य शुभ तिथि, नक्षत्र, और योग में विशुद्ध कुल-चरित्र वाले आचार्य से दीक्षा लेता है। अशुभ समय (ग्रहण, मेघ, नष्ट मास आदि) में दीक्षा नहीं दी जाती। असमय दीक्षा देने वाला आचार्य संघ से बहिष्कृत होता है।
श्लोक 162 से 171 पारिव्रज्य के सूत्रपद और गुण
पारिव्रज्य में 27 सूत्रपद (जाति, मूर्ति, लक्षण, सौंदर्य, प्रभा, मंडल, चक्र, अभिषेक आदि) परमेष्ठियों के गुण हैं। दीक्षा लेने वाला भव्य अपने गुणों का आदर न कर अरहंत के गुणों का सम्मान करता है, जिससे अहंकार से बचकर उत्थान होता है। वह उत्तम जाति का होते हुए भी अरहंत की सेवा करता है, जिससे अगले जन्म में दिव्या, विजयाश्रिता, परमा, या स्वा जाति प्राप्त होती है। मुनि शरीर को कृश कर, अन्य जीवों की रक्षा करते हुए, और अरहंत के लक्षणों का चिंतन कर तप करता है।
श्लोक 172 से 181 तप से प्राप्तियां
मुनि अपने सौंदर्य, प्रभा, तेज, और परिग्रह (अस्त्र, वस्त्र, आसन, छत्र आदि) का त्याग कर अरहंत की आराधना करता है, जिससे वह देदीप्यमान प्रभा, धर्मचक्र, अभिषेक, और सिंहासन प्राप्त करता है। तकिया, छत्र, और चामर का त्याग करने से वह स्वर्गीय विभूतियां, तीन छत्र, और चौंसठ चामर प्राप्त करता है। तप से वह परम स्वामी और तीर्थकर बनता है।
श्लोक 182 से 191 तप की महिमा
मुनि नगाड़े, उद्यान, धन, घर, और क्षेत्र का त्याग कर तप करता है, जिससे स्वर्गीय दुंदुभि, अशोक वृक्ष, निधियां, मंडप शोभा, और अवगाहन शक्ति प्राप्त होती है। वह आज्ञा, सभा, और इच्छाओं का त्याग कर मौन धारण करता है, जिससे उसकी आज्ञा सुर-असुर मानते हैं और वह समवसरण में विराजमान होता है। तप से वह प्रशंसनीय और वंदनीय बनता है।
श्लोक 192 से 201 पारिव्रज्य की पूर्णता
मुनि सवारी, भाषा, और आहार का नियमन कर तप करता है, जिससे कमल पर चरण, दिव्य ध्वनि, और चार तृप्तियां (दिव्य, विजय, परम, अमृत) प्राप्त होती हैं। काम-सुख त्यागकर वह परमानंद पाता है। तप से त्यागी वस्तु ही उसे प्राप्त होती है। पारिव्रज्य में जिनेंद्र की आज्ञा मानकर तप करने से ही सच्ची दीक्षा होती है। अन्य मतों की पारिव्रज्य युक्तिहीन है। चौथी ‘सुरेन्द्रता’ क्रिया में सुरेंद्र पद प्राप्त होता है।
श्लोक 202 से 211 साम्राज्य, आर्हन्त्य, और परिनिर्वृति
पांचवीं ‘साम्राज्य’ क्रिया में चक्रवर्ती को चक्ररत्न, निधियां, और भोग प्राप्त होते हैं। छठवीं ‘आर्हन्त्य’ क्रिया में अरहंत को स्वर्गावतार और पंचकल्याण की प्राप्ति होती है, जो तीनों लोकों में क्षोभ उत्पन्न करती है। सातवीं ‘परिनिर्वृति’ क्रिया में कर्ममल नष्ट होकर सिद्धि प्राप्त होती है, जो आत्मतत्त्व की शुद्धि है। ये सात कर्त्रन्वय क्रियाएं मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती हैं। भव्य इनका पालन कर संसार के बंधनों को तोड़ता है, सज्जाति, सद्गृहित्व, पारिव्रज्य, सुरेंद्रता, चक्रवर्ती, अरहंत, और अंत में निर्वाण प्राप्त करता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 39- Shlok 1 to 11
श्लोक ( Shlok ) 1
अथाब्रवीद् द्विजन्मभ्यो ‘मनुर्दीक्षान्वयक्रियाः । यास्ता निःश्रेयसोदर्काश्चत्वारिंशदथाष्ट च ॥१॥
अथानन्तर-सोलहवें मनु महाराज भरत उन द्विजोंके लिये मोक्ष फल देनेवाली अड़-तालीस दीक्षान्वय क्रियाएं कहने लगे ॥ १॥
Thereafter, the sixteenth Manu, the illustrious King Bharata, began to expound the forty-eight consecratory rites—bestowers of liberation upon the twice-born. 1
श्लोक ( Shlok ) 2
श्रूयतां भो द्विजन्मानो वक्ष्य नैःश्रेयसीः क्रियाः । अवतारादिनिर्वाणपर्यन्ता दीक्षितोचिताः ॥२॥
वे बोले कि हे द्विजो, मैं अवतारसे लेकर निर्वाण पर्यन्तकी मोक्ष देनेवाली दीक्षान्वय क्रियाओंको कहता हूं सो तुम लोग सुनो ॥२॥
He said, “O twice-born, hearken! I shall now declare unto you the consecratory rites—from incarnation to final liberation—that bestow deliverance. Attend with reverence.”2
श्लोक ( Shlok ) 3
व्रताविष्करणं दोक्षा द्विधाम्नातं च तद् व्रतम् । महच्चाणु च दोषाणां “कृत्स्नदेशनिवृत्तितः ॥३॥
व्रतोंका धारण करना दीक्षा है और वे व्रत हिंसादि दोषोंके पूर्ण तथा एकदेश त्याग करनेकी अपेक्षा महाव्रत और अणुव्रतके भेदसे दो प्रकारके माने गये हैं ।।३।।
The adoption of vows is known as dīkṣā—consecration; and these vows, distinguished as Mahāvrata (great vows) and Aṇuvrata (lesser vows), are of two kinds, determined by the complete or partial renunciation of transgressions such as violence and the like.3
श्लोक ( Shlok ) 4
महाव्रतं भवेत् कृत्स्नहिंसाद्यागोविवर्जितम् । विरतिः स्थूर्लाहंसादिदोषेभ्योऽणुव्रतं मतम् ॥४॥
सूक्ष्म अथवा स्थूल-सभी प्रकारके हिंसादि पापोंका त्याग करना महाव्रत कहलाता है और स्थूल हिंसादि दोषोंसे निवृत्त होनेको अणुव्रत कहते हैं ।॥४।।
The complete renunciation of all forms of sin—whether subtle or gross—such as violence, is termed Mahāvrata; whereas abstention solely from gross transgressions like overt acts of violence is known as Aṇuvrata.4
श्लोक ( Shlok ) 5
तदुन्मुखस्य या वृत्तिः पुंसो दीक्षेत्यसौ मता । तामन्विता क्रिया या तु सा स्याद् दीक्षान्वया क्रिया ॥५।
उन व्रतोंके ग्रहण करने के लिये सन्मुख पुरुषकी जो प्रवृत्ति है उसे दीक्षा कहते हैं और उस दीक्षासे सम्बन्ध रखनेवाली जो क्रियाएं हैं वे दीक्षान्वय क्रियाएं कहलाती हैं ।।५।।
The earnest inclination of a worthy individual toward the adoption of these vows is called Dīkṣā—initiation; and the practices associated with that initiation are known as Dīkṣānvaya Kriyās—the rites proceeding from and pertaining to the consecration.5
श्लोक ( Shlok ) 6
तस्यास्तु भेदसङ्ख्यानं प्राग्निर्णीतं षडष्टकम् । क्रियते तद्विकल्पानाम धुना लक्ष्मवर्णनम् ॥६॥
उस दीक्षान्वय क्रियाके भेद अड़तालीस हैं जिनका कि निर्णय पहले किया जा चुका है। अब इस समय उन भेदोंके लक्षणोंका वर्णन किया जाता है ।।६।।
The classifications of the Dīkṣānvaya Kriyās are forty-eight in number, as previously delineated. Now, at this juncture, their distinguishing characteristics shall be set forth in detail.The classifications of the Dīkṣānvaya Kriyās are forty-eight in number, as previously delineated. Now, at this juncture, their distinguishing characteristics shall be set forth in detail.6
श्लोक ( Shlok ) 7
तत्रावतारसंज्ञा स्यादाद्या दीक्षान्वयक्रिया । मिथ्यात्वदूषिते भव्ये सन्मार्गग्रहणोन्मुखे ॥७॥
उन दीक्षान्वय क्रियाओंमें पहली अवतार नामकी क्रिया है जब मिथ्यात्वसे दूषित हुआ कोई भव्य पुरुष समीचीन मार्गको ग्रहण करनेके सन्मुख होता है तब यह क्रिया की जाती है ।।७।।
Among these Dīkṣānvaya Kriyās, the first is the rite called Avatāra—Descent. It is performed when a noble soul, long tainted by delusion, turns toward the righteous path with the intent to embrace it.7
श्लोक ( Shlok ) 8
स तु संसृत्य योगीन्द्रं युक्ताचारं महाधियम् । गृहस्थाचार्यमथवा पृच्छतीति विचक्षणः ॥८॥
प्रथम ही वह चतुर भव्य पुरुष योग्य आचरणवाले महाबुद्धिमान् मुनिराजके समीप जाकर अथवा किसी गृहस्थाचार्यके समीप पहुंचकर उनसे इस प्रकार पूछता है कि ॥८॥
At the very outset, that discerning and noble soul—endowed with wisdom—approaches a venerable sage of pure conduct, or a householder preceptor of right discipline, and humbly inquires of him thus:8
श्लोक ( Shlok ) 9
ब्रूत यूयं महाप्रज्ञा मह्यं धर्ममनाविलम् । प्रायो मतानि तीर्थ्यानां हेयानि प्रतिभान्ति मे ॥९॥
महाबुद्धिमन्, आप मेरे लिये निर्दोष धर्म कहिये क्योंकि मुझे अन्य लोगोंके मत प्रायः दुष्ट मालूम होते हैं ।॥९॥
“O great sage of sublime wisdom, do reveal unto me the flawless path of Dharma, for the doctrines of others appear to me, by and large, to be impure and misguided.”9
श्लोक ( Shlok ) 10
श्रौतान्यपि हि वाक्यानि सम्मतानि क्रियाविधौ । न विचारसहिष्णूनि दुः प्रणीतानि तान्यपि ॥१०॥
धार्मिक क्रियाओंके करने में जो वेदोंके वाक्य माने गये हैं वे भी विचारको सहन नहीं कर सकते अर्थात् विचार करनेपर वे निःसार जान पड़ते हैं, वास्तवमें वे वाक्य दुष्ट पुरुषोंके बनाये हुए हैं ।।१०।।
Even the declarations of the Vedas, accepted as authoritative in the performance of religious rites, cannot withstand the scrutiny of reason—for upon reflection, they appear devoid of true substance. In truth, such utterances are the fabrications of misguided men.10
श्लोक ( Shlok ) 11
इति पृष्टवते तस्मै व्याचष्टे स’ विदांवरः । तथ्यं मुक्तिपथं धर्म विचारपरिनिष्ठितम् ॥११॥
इस प्रकार पूछनेवाले उस भव्य पुरुषके लिये, महाज्ञानी मुनिराज अथवा गृहस्थाचार्य सत्य, विचारसे परिपूर्ण तथा मोक्षके मार्गस्वरूप धर्मका व्याख्यान करते हैं ।।११।।
hus, to the noble seeker who inquires so, the great sage of profound wisdom—or the householder preceptor—expounds the true Dharma, replete with reason and veracity, revealed as the very path to liberation 11
श्लोक 12 से 21
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201 | श्लोक 202 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 303 | श्लोक 304 से 313
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