Summary of Ādi purāṇa Parv 46 by Acharya Jinasena
संक्षिप्त सारांश: आदिपुराण पर्व 46 (श्लोक 1 से 369)
जयकुमार और सुलोचना के महल में पूर्वजन्म स्मरण होता है। विद्याधर दम्पति और कबूतर युगल देखकर दोनों मूर्छित हो जाते हैं। सुलोचना पूर्वभव कथा सुनाती है।
पुष्कलावती देश की पुण्डरीकिणी नगरी में राजा प्रजापाल थे। राजशेठ कुबेरमित्र के महल में रतिवर नामक बुद्धिमान कबूतर रहता था। कुबेरमित्र के पुत्र कुबेरकान्त का विवाह प्रियदत्ता से हुआ। मंत्री फल्गुमति की दुष्टता से सेठ दूर हुए, लेकिन मणि भ्रम की घटना से राजा ने सेठ का सम्मान बढ़ाया। सेठ ने वैराग्य धारण कर तप लिया।
प्रियदत्ता ने चारण मुनि से पूर्वजन्म पूछा। अमितमति गणिनी ने सबके पूर्वभव बताए—रतिवर-रतिषेणा जयकुमार-सुलोचना थे। भवदत्त (दुर्मुख) ने उन्हें तीन बार मारा—वैश्य, कबूतर और विद्याधर रूप में।
सुलोचना ने प्रभावती-हिरण्यवर्मा भव सुनाया। प्रभावती ने गतियुद्ध में हिरण्यवर्मा को चुना। दोनों ने वैराग्य धारण कर दीक्षा ली। हिरण्यवर्मा ने उपसर्ग सहन कर स्वर्ग प्राप्त किया।
भीम मुनि ने अपना पूर्वजन्म बताया—पापियों के दण्ड देखकर दीक्षा ली। चाण्डाल ने शीलव्रत से विद्युच्चोर को नहीं मारा। उत्पलमाला वेश्या ने शील व्रत लिया। सेठ कुबेरप्रिय पर तलवार मणियों का हार बनी।
सुलोचना ने कई भवों में पति-पत्नी संबंध बताए। सभा में पूर्वभव परम्परा सुनकर जयकुमार संतुष्ट हुए। अन्य स्त्रियों की ईर्ष्या नष्ट हुई। पर्व जयकुमार-सुलोचना के भवान्तर वर्णन के साथ समाप्त हुआ।
यह पर्व पूर्वजन्म चक्र, कर्म फल, अहिंसा, शील व्रत, वैराग्य और मोक्ष मार्ग की शिक्षा देता है।
46 पर्व हिन्दी-भाषानुवाद
श्लोक 1 से 13 पूर्वजन्म स्मरण और मूर्च्छा
जयकुमार महल की छत पर बैठा था। विद्याधर दम्पति को देखकर वह ‘हा मेरी प्रभावती’ कहकर मूर्छित हो गया। सुलोचना ने कबूतर युगल देखकर ‘हा मेरे रतिवर’ कहकर मूर्छा प्राप्त की। दासियों के शीतलोपचार से दोनों प्रबोध को प्राप्त हुए। जयकुमार ने सुलोचना को अनुनय-विनय से समझाया। दोनों को अवधिज्ञान प्राप्त हुआ। सौतें ईर्ष्या से सुलोचना की माया पर टिप्पणी करने लगीं। जयकुमार ने सुलोचना से पूर्वभव कथा कहने को कहा।
श्लोक 14 से 21 पूर्वभव कथा का प्रारम्भ
सुलोचना ने पूर्वभव कथा शुरू की। पूर्व विदेह क्षेत्र में पुण्डरीकिणी नगरी में राजा प्रजापाल थे। राजशेठ कुबेरमित्र थे। उनके महल में रतिवर नामक बुद्धिमान कबूतर रहता था। वह सेठ के हाथ पर बैठता, धान खाता, अहिंसा चिन्तन करता, मुनियों की सेवा करता। रतिवर और रतिषेणा कबूतरी साथ क्रीड़ा करते थे। सुलोचना ने कहा कि रतिवर ही जयकुमार और रतिषेणा ही वह (सुलोचना) थे।
श्लोक 22 से 31 कुबेरकान्त का जन्म और सुख
कुबेरमित्र की स्त्री धनवती से कुबेरकान्त पुत्र हुआ। उसका मित्र प्रियसेन था। कामधेनु ने उसके लिए धान्य, ईख, वीणा, गंगा जल, कल्पवृक्ष आदि प्रदान किए। कुबेरकान्त ने सभी भोगों का उपभोग किया।
श्लोक 32 से 40 कुबेरकान्त का विवाह
कुबेरकान्त का विवाह समुद्रदत्त सेठ की पुत्री प्रियदत्ता से हुआ। राजकुमारियों यशस्वती और गुणवती ने वैराग्य धारण किया। राजा प्रजापाल ने भी संयम लिया। लोकपाल ने राज्य संभाला।
श्लोक 41 से 51 फल्गुमति मंत्री की दुष्टता
मंत्री फल्गुमति ने सेठ कुबेरमित्र को राजा से दूर करने की चेष्टा की। उसने पहरेदार को रिश्वत देकर राजा से कहलवाया कि सेठ बिना बुलाए न आएँ। राजा ने सेठ को दूर रखा।
श्लोक 52 से 61 मणि भ्रम और सेठ की बुद्धिमत्ता
राजा ने बावड़ी में मणि देखी, पर वह वृक्ष पर थी। सेठ ने भ्रम दूर किया। राजा ने अपनी मूर्खता और मंत्री की दुष्टता समझी। सेठ को सदा पास रखा और राज्य भार सौंपा।
श्लोक 62 से 71 सेठ का वैराग्य और तप
सेठ की स्त्री ने सेठ के बाल देखे। सेठ ने राजा छोड़कर देवगिरि पर तप लिया। दोनों ब्रह्मलोक गए।
श्लोक 72 से 81 प्रियदत्ता का पुण्य और पूर्वजन्म ज्ञान
प्रियदत्ता ने चारण मुनि को दान दिया। मुनि ने बताया कि पाँच पुत्र और एक पुत्री होगी। अमितमति, अनन्तमति आदि आयिकाएँ आईं। राजा लोकपाल और सेठ ने धर्म सुना।
श्लोक 82 से 92 रतिवर-रतिषेणा का पूर्वजन्म प्रकट
जंघाचारण मुनि आए। रतिवर-रतिषेणा ने प्रणाम किया। दोनों ने पूर्वजन्म नाम लिखे। प्रियदत्ता ने रतिवर को अपना पूर्व पति पहचाना। सभा प्रसन्न हुई। सुलोचना ने कथा जारी रखने की इच्छा व्यक्त की।
श्लोक 93 से 100 मुनियों का प्रस्थान और व्रत नियम
मुनि आहार त्याग कर सेठ के घर से चले गए। राजा ने अमितमति गणिनी से कारण पूछा। अमितमति ने धान्यकमाल वन के पास शोभानगर का वर्णन किया। वहाँ राजा प्रजापाल और रानी देवश्री थे। सामंत शक्तिषेण और पत्नी अटवीश्री के पुत्र सत्यदेव थे। सभी ने धर्मोपदेश सुना, मद्य-मांस त्यागा, उपवास व्रत लिया। शक्तिषेण ने मुनियों के बाद भोजन करने का नियम लिया। अटवीश्री ने पाँच वर्ष तक विशेष उपवास किया। सत्यदेव ने साधु स्तवन का व्रत लिया।
श्लोक 101 से 111 भवदत्त (दुर्मुख) की दुष्टता और विवाह विवाद
मृणालवती में राजा धरणीपति थे। सेठ सुकेतु के पुत्र भवदत्त (दुर्मुख) दुराचारी था। श्रीदत्त सेठ की पुत्री रतिवेगा थी। अशोकदेव की पुत्री सुकान्त से रतिवेगा का विवाह हुआ। भवदत्त ने विवाह रोका, पर असफल रहा। वधू-वर शक्तिषेण की शरण में गए। भवदत्त ने हठ किया, पर शक्तिषेण के भय से लौट गया। शक्तिषेण ने मुनियों को आहार दान दिया।
श्लोक 112 से 122 : मेरुकदत्त सेठ और हीनांग व्यक्ति
सर्पसरोवर के पास सेठ मेरुकदत्त ठहरे थे। उनकी पत्नी धारिणी थी। चार मंत्री—भूतार्थ, शकुनि, बृहस्पति, धन्वन्तरि थे। एक हीनांग व्यक्ति आया। मंत्री अलग-अलग कारण बताए। भूतार्थ ने पूर्वजन्म की हिंसा बताया। सत्यदेव के पिता ने उसकी अकर्मण्यता बताई। सत्यदेव ने निदान किया और द्रव्यलिंगी मुनि बनकर लोकपाल हुआ।
श्लोक 123 से 132 पुण्य और पूर्वजन्म स्मरण
शक्तिषेण-अटवीश्री ने आहार दान कर पंचाश्चर्य प्राप्त किए। मेरुकदत्त-धारिणी ने निदान किया कि वे उनकी संतान होंगे। मंत्री तप कर लोकपाल पर्याय प्राप्त किए। सुकान्त-रतिवेगा ने अनुमोदना से पुण्य प्राप्त किया। वसुमती को पूर्वजन्म स्मरण हुआ, वह मूर्छित हुई। अमितमति ने बताया कि वसुमती देवश्री थी, लोकपाल प्रजापाल था। प्रियदत्ता को भी स्मरण हुआ, वह अटवीश्री थी, कुबेरकान्त शक्तिषेण था। मंत्री कामधेनु-कल्पवृक्ष बने।
श्लोक 133 से 141 भवदत्त का प्रभाव और नए जन्म
सत्यक देव बनकर रक्षा करता है। भवदत्त ने रतिवेगा-सुकान्त को जलाया, वे कबूतर-कबूतरी बने। मेरुकदत्त-धारिणी कुबेरकान्त के माता-पिता बने। मुनि विजयार्ध पर्वत पर थे। उन्होंने पाँच पुत्र-एक पुत्री का संकेत दिया। रत्नवृष्टि आदि से वे इस जन्म में आए, पर कबूतर देखकर लौट गए। वे पिता और गुरु थे।
श्लोक 142 से 151 कबूतरों का मृत्यु और नए जन्म
धनवती और कुबेरसेना ने दीक्षा ली। बिलाव (भवदत्त) ने कबूतरों को मार डाला। रतिवर हिरण्यवर्मा और रतिषेणा प्रभावती बने। उनके माता-पिता पूर्वजन्म के माता-पिता ही बने।
श्लोक 152 से 162 प्रभावती का स्वयंवर
वायुरथ ने प्रभावती का स्वयंवर तय किया। प्रभावती ने गतियुद्ध जीतने वाले को वर चुना। कोई सफल नहीं हुआ। हिरण्यवर्मा ने माला ली। दोनों का प्रेम बढ़ा। प्रभावती को पूर्वजन्म स्मरण हुआ।
श्लोक 163 से 170 पूर्वजन्म स्मरण और प्रेम
हिरण्यवर्मा ने पूर्वजन्म लिखा। प्रभावती ने भी लिखा। दोनों का प्रेम दुगुना हुआ। मंगलाभिषेक हुआ। चारण मुनि से पूर्वभव सुना—तीसरे जन्म में रतिवेगा-सुकान्त थे।
श्लोक 171 से 181 वायुरथ का वैराग्य
मुनि ने बताया कि शक्तिषेण ने दान दिया, अनुमोदना से पुण्य मिला। वायुरथ ने संसार की नश्वरता देख वैराग्य धारण किया। राज्य मनोरथ को सौंपा। भाई-बन्धुओं ने रतिप्रभा का विवाह चित्ररथ से तय किया।
श्लोक 182 से 194 हिरण्यवर्मा का वैराग्य और दीक्षा
महाराज आदित्यगति ने हिरण्यवर्मा का अभिषेक कर राज्य सौंपा और वायुरथ के साथ मुनि के समीप संयम धारण किया। सुलोचना ने कहा कि रतिवेगा, रतिषेणा और प्रभावती तीनों वह स्वयं थी। जयकुमार ने भी तीनों भवों में वह उनका पति था। हिरण्यवर्मा धान्यकमाल वन में सर्पसरोवर देखकर पूर्वभव स्मरण कर वैराग्य प्राप्त हुआ। उसने संसार की क्षणभंगुरता, शरीर की असारता, भोगों की अनित्यता पर विचार कर राज्य पुत्र सुवर्णवर्मा को सौंपा और श्रीपाल गुरु के समीप दीक्षा ली।
श्लोक 195 से 211 हिरण्यवर्मा का वैराग्य-विचार
हिरण्यवर्मा ने शरीर को अपवित्र, संसार को दुःखमय, भोगों को सर्प-फण समान बताया। तृष्णा की अग्नि बढ़ने, इष्ट-अनिष्ट की अनिश्चितता पर विचार किया। जीव के रूप-रहित स्वरूप और मोक्ष की आवश्यकता समझी। बंधन के कारणों का नाश करने का संकल्प लिया। प्रभावती ने भी माता शशिप्रभा के साथ गुणवती आयिका के समीप तप धारण किया।
श्लोक 212 से 221 हिरण्यवर्मा का तप और पुण्डरीकिणी आगमन
हिरण्यवर्मा सूर्य की तरह तप से देदीप्यमान हुआ। प्रभावती भी आयिका के साथ रहने लगी। प्रियदत्ता ने पूछा कि अमितमति कहाँ हैं? प्रभावती ने बताया कि वह स्वर्ग गई। प्रभावती ने कहा कि वह रतिषेणा थी। प्रियदत्ता ने आश्चर्य व्यक्त किया। प्रभावती ने कुबेरकान्त को रतिवर बताया।
श्लोक 222 से 232 गांधारी की माया और सेठ का संयम
प्रभावती ने गांधारी की माया का वर्णन किया। गांधारी ने कुबेरकान्त को नपुंसक समझा। सेठ ने गांधारी को विरक्त किया। गांधारी ने संयम लिया। प्रभावती ने पाँच पुत्रों का वर्णन किया। गांधारी ने पुनः आकर सेठ से पूछा। सेठ और राजा ने मुनि से धर्म जाना।
श्लोक 233 से 241 लोकपाल और सेठ की दीक्षा
लोकपाल ने राज्य गुणपाल को सौंपा और रतिषेण मुनि के समीप संयम लिया। सेठ ने कुबेरप्रिय को पद सौंपा और पुत्रों के साथ दीक्षा ली। प्रियदत्ता विरक्त हो पुत्री कुबेरश्री को गुणपाल को दी और गुणवती आयिका के समीप दीक्षा ली।
श्लोक 242 से 255 मुनिराज का उपसर्ग और स्वर्ग प्राप्ति
हिरण्यवर्मा ने श्मशान में प्रतिमायोग लिया। विद्युच्चोर ने प्रियदत्ता की दासी से वृत्तांत सुना और क्रोध से विभंगावधि प्राप्त की। उसने हिरण्यवर्मा-प्रभावती को जलाया। दोनों उपसर्ग सहन कर स्वर्ग गए। सुवर्णवर्मा ने प्रतिज्ञा की। देव-देवी ने संयमी रूप धारण कर पुत्र को क्रोध से मुक्त किया और दिव्यरूप प्रकट कर आभूषण दिए।
श्लोक 256 से 271 केवलज्ञान और पूर्वभव कथा
शिवघोष मुनि को केवलज्ञान हुआ। इन्द्र ने पूछा। भगवान ने बताया कि पुष्पपालिता और पुष्पवती मालिन की लड़कियाँ थीं। उन्होंने श्रावक व्रत लिया। सर्प से मरकर देवियाँ बनीं। हिरण्यवर्मा-प्रभावती ने भी पूर्वभव सुना। भीम मुनि ने धर्मोपदेश दिया।
श्लोक 272 से 286 भीम मुनि का पूर्वजन्म और दीक्षा
भीम मुनि ने बताया कि पिता ने व्रत गुरु का स्थान पूछा। रास्ते में विभिन्न पापियों को दण्ड मिलते देखे—वज्रकेतु ने मुर्गा मारा, धनदेव ने धरोहर छिपाई, रतिपिंगल ने हार चुराया, कोतवाल ने परस्त्रीगमन किया, किसान लोल ने पुत्र मारा, सागरदत्त ने जुए में धन जीता, आनन्द महाराज के पुत्र ने मेढ़ा मारा, मद्यपानिनी ने बालक मारा। इन दण्डों से पाप का फल इस लोक और परलोक में बुरा होने का निश्चय हुआ। भीम ने पिता छोड़कर मोक्ष के लिए दीक्षा ली।
श्लोक 287 से 296 : भीम मुनि का ज्ञान और विद्यद्वेग चोर की कथा
गुरु प्रसाद से भीम शास्त्रों में पारंगत हुए। सर्वज्ञ देव से पूर्वजन्म सुने। पुण्डरीकिणी में राजा वसुपाल थे। कोतवाल ने विद्यद्वेग चोर पकड़ा। चोर ने धन विमति को दिया। विमति ने इंकार किया। धन उसके घर मिला। दण्ड में तीन विकल्प—विष्ठा खाना, मुक्के सहना, धन देना। चोर ने तीनों सहे और नरक गया। राजा ने चाण्डाल से मारने को कहा। चाण्डाल ने अहिंसा व्रत के कारण इंकार किया। राजा ने दोनों को बाँध दिया।
श्लोक 297 से 313 चाण्डाल की कथा और उत्पलमाला का शील व्रत
चाण्डाल ने कहा कि गुणपाल के समय कुबेरप्रिय सेठ थे। नाट्यमालिका की पुत्री ने नृत्य किया। उत्पलमाला वेश्या ने कहा कि कुबेरप्रिय को विचलित नहीं कर सकी। राजा ने शील व्रत वर दिया। सर्वरक्षित कोतवाल रात में गया। उत्पलमाला ने रजस्वला होने का बहाना बनाया। मंत्री पुत्र और पृथुधी आए। उत्पलमाला ने कोतवाल को संदूक में छिपाया। पृथुधी ने धन माँगा। सत्यवती ने धन लाकर रख दिया। राजा ने पृथुधी को मारने का आदेश दिया।
श्लोक 314 से 322 सेठ का प्रतिमायोग और उपद्रव
राजा के मुख्य हाथी को पूर्वभव स्मरण हुआ। उसने मांस त्यागा। सेठ ने शुद्ध भोजन दिया। राजा ने वर माँगने को कहा। सेठ ने बाद के लिए रखा। मंत्री पुत्र को मारने ले जाया गया। सेठ ने वर माँगकर छुड़वाया। मंत्री पुत्र ने सेठ पर क्रोध किया। राजा के साले ने अंगूठी से वसु को सेठ रूप बनाया। पृथुधी ने राजा से सेठ को मारने की आज्ञा ली। सेठ प्रतिमायोग में था। पृथुधी ने बाँधकर श्मशान ले गया।
श्लोक 323 से 331 सेठ पर तलवार और चमत्कार
चाण्डाल ने तलवार मारी। तलवार मणियों का हार बनी। नगर में उपद्रव हुआ। राजा और लोग सेठ की शरण गए। उपद्रव दूर हुआ। देवों ने शील व्रत की महिमा बताई। राजा ने क्षमा माँगी। सेठ ने पूर्वकर्म बताया और क्षमा की। सेठ विभूति से नगर में प्रवेश किया। राजा ने वारिषेणा (सेठ की पुत्री) वसुपाल को दी।
श्लोक 332 से 341 धर्म और पुरुषार्थ पर चर्चा
राजा ने सेठ से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के परस्पर संबंध पूछा। सेठ ने कहा कि सम्यग्दृष्टि वालों के लिए अनुकूल, मिथ्यादृष्टि वालों के लिए नहीं। राजा ने वर माँगने को कहा। सेठ ने जन्म-मरण क्षय माँगा। राजा ने असमर्थता बताई। सेठ ने स्वयं सिद्ध करने की बात कही। राजा छिपकली के बच्चों को देखकर विचार किया कि जीव स्वयं आजीविका जानते हैं। राज्य वसुपाल को सौंपा। सेठ और राजा ने तप लिया।
श्लोक 342 से 361 भीम मुनि का पूर्वजन्म और देवियों का प्रश्न
चाण्डाल ने अहिंसा व्रत बताया। भीम मुनि ने सर्वज्ञ से सुना कि भवदेव (विद्युच्चोर) ने तीन बार रतिवेगा-सुकान्त को मारा। वे देव-देवी बने। दोनों ने वन्दना की। सुलोचना ने कहा कि पुण्डरीकिणी में भीम मुनि को केवलज्ञान हुआ। चार देवियाँ आईं। उन्होंने पति के बारे में पूछा। मुनि ने बताया कि सुरदेव पिंगल कोतवाल हुआ। उसकी रानियाँ और दासियाँ देवियाँ बनीं। पिंगल संन्यास लेकर अच्युत स्वर्ग जाएगा। व्यन्तर कन्याएँ अतिपिंगल को पूजने लगीं।
श्लोक 362 से 369 कथा समापन और पर्व समाप्ति
देवियों ने रतिकूल, मणिनागदत्त, सुकेतु के चरित्र सुने। सब सत्य होने पर वन्दना कर गईं। जयकुमार-सुलोचना भी वन्दना कर स्वर्ग गए। सुलोचना ने क्रमबद्ध पूर्वभव कथा सुनाई। जयकुमार संतुष्ट हुए। सभा विकसित हुई। अन्य स्त्रियों की कान्ति नष्ट हुई। सुलोचना ने तीन भवों में पति-पत्नी संबंध बताया। जयकुमार अन्य वृत्तांत सुनने को उत्सुक हुआ। पर्व जयकुमार-सुलोचना के भवान्तर वर्णन के साथ समाप्त हुआ।
हिन्दी-भाषानुवाद
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द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण भाग – 2
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