आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 203
श्लोक 204 से 212 जयकुमार का पराक्रम
अर्ककीर्ति के हाथी मंद, भयभीत, और अशुभ संकेतों से युक्त थे। दूसरी ओर, जयकुमार विजयार्ध हाथी पर सवार होकर सिंह की तरह गर्ज रहा था। उसकी सेना की ध्वजाएँ अनुकूल वायु में लहरा रही थीं, और शस्त्रों की दीप्ति से दिशाएँ प्रकाशित हो रही थीं। नगाड़ों और घंटियों की ध्वनि से युद्धक्षेत्र भयंकर हो गया। जयकुमार ने प्रलयकाल की लहरों को ललकारते हुए युद्ध में उत्कृष्टता दिखाई।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 44- Shlok 204 to 212
श्लोक ( Shlok ) 204
मन्दमन्दं प्रकृत्यैव मन्दा युद्धभयान्मृगाः । जग्मुर्निर्हेतुकं “भद्रास्तदत्राशुभसूचनम् ॥२०४।।
मन्द जातिके हाथी स्वभावसे ही मन्द मन्द चल रहे थे, मृग जातिके हाथी युद्धके भयसे धीरे धीरे जा रहे थे और भद्र जातिके हाथी बिना ही कारण धीरे धीरे चल रहे थे परन्तु युद्धमें उनका धीरे-धीरे चलना अशुभको सूचित करनेवाला था ॥ २०४॥
The elephants of the manda lineage moved slowly, as was their nature.Those of the mṛga breed, gripped by fear of battle, advanced with hesitant steps.And the noble bhadra elephants, though unprovoked, too marched languidly.Yet, in that hour of war, their collective sluggishness was a grim portent of impending ill.204
श्लोक ( Shlok ) 205
विजिगीषोर्विपुण्यस्य वृथा प्रणिधयो यथा । तथाऽर्ककीर्तयन्नृणां ते” गजेषु नियोजिताः ॥२०५॥
जिस प्रकार विजयकी इच्छा करने-वाले किन्तु पुण्यहीन मनुष्यके गुप्त सेवक व्यर्थ हो जाते हैं-अपना काम करनेमें सफल नहीं हो पाते हैं उसी प्रकार अर्कैकीर्ति के लिये उन हाथियोंसे कही हुई महावत लोगोंकी प्रार्थनाएं व्यर्थ हो रही थों ॥२०५॥
Just as the secret agents of a man who longs for victory, yet lacks merit,prove futile—failing in their mission despite intent and effort—even so, the pleas of the mahouts to their elephants,spoken for Arkaikīrti’s cause, were rendered vain and fruitless. 205
श्लोक ( Shlok ) 206 – 212
लङ्घयन्नेत्रयोर्दीप्त्या पारिभद्रोद्गमच्छविम् । प्रकटभ्रू कुटीबन्धसन्धानितशरासनः ॥ २०६॥ रिपुं कुपितभोगीन्द्रस्फुटाटोप भयङ्करः । कुर्वन्विलोक नातष्ततीव्र नाराचगोचरम् ॥२०७॥गिरीन्द्रशिखराकारमारुह्य हरिविक्रमः । गजेन्द्रं विजयार्द्धाख्यं गर्जन्मेघ स्वरस्तदा ॥२०८॥अनुकूलानिलोत्क्षिप्तपुरःसर्पद् ध्वजांशुकैः । क्रान्तद्विपारिविक्रान्तविख्यातारूढयोधनैः ॥२०९llप्रस्फुरच्छस्त्रसङ्घातदीप्तिदीपितदिङ्मुखैः । धूतदुन्दुभिसद्ध्वानबृहद्ब्रू हितभीषणैः ॥२१०॥प्रस्फुरच्छस्त्रसङघातदीप्तिदीपितदिङमुखैः । धूतदुन्दुभिसद्ध्वानबृहद्बृंहितभीषणैः ॥२१०॥ घण्टामधुरनिर्घोषनिर्भिन्न भुवनत्रयैः । सद्यः समुत्सरद्दर्वैरपि सिंहान् जिगीषुभिः ॥२११॥प्रापद्युद्धोत्सुकः सार्द्ध गजैर्वि जयसूचिभिः । “क्षयवेलानिलोद्धूतसिन्धुवेलां विडम्बयन् ॥२१२॥
उधर जो अपने दोनों नेत्रोंकी कान्तिसे कल्पवृक्षके फूलकी कान्तिको जीत रहा है, जिसने अपनी भौंहोंकी रचनाके समान ही प्रकटरूपसे बाण चढ़े धनुषका आकार बनाया है, क्रोधित हुए महा सर्पके समान जिसका शरीर कुछ ऊपर उठा हुआ है और इसीलिये जो भयंकर है, जो अपने शत्रुको अपनी दृष्टि तथा तपे हुए बाणोंका निशाना बना रहा है, एवं सिंहके समान जिसका पराक्रम है ऐसा मेघस्वर जयकुमार उस समय गर्जता हुआ मेरुकी शिखर के समान आकारवाले विजयार्ध नामके उत्तम हाथीपर सवार होकर, अनुकूल वायु चलनेसे जिनकी ध्वजाओंके वस्त्र उड़कर आगेकी ओर जा रहे हैं, आक्रमण करते हुए सिंहके समान प्रसिद्ध पराक्रमवाले योद्धा जिनपर बैठे हैं, देदीप्यमान शस्त्रोंके समूहकी दीप्तिसे जिन्होंने समस्त दिशाओं के मुख प्रकाशित कर दिये हैं, बजते हुए नगाड़ोंके बड़े बड़े शब्दोंसे बढ़ती हुई गर्जनाओं से जो भयंकर हैं, घंटाओंके मधुर शब्दोंसे जिन्होंने तीनों लोक भर दिये हैं, तत्काल उठते हुए अहंकारसे जो सिंहोंको भी जीतना चाहते हैं और जो विजयकी सूचना करनेवाले हैं ऐसे हाथियों के साथ, प्रलय कालकी वायुसे उठी हुई समुद्रकी लहरोंको उल्लंघन करता हुआ युद्धकी उत्कंठा से आ पहुंचा ॥२०६-२१२॥
There came Meghasvara Jayakumāra,his eyes ablaze with a brilliance that outshone the bloom of the celestial Kalpavṛkṣa,his bow—arched like the curve of his fierce, furrowed brows—drawn and ready, like a wrathful serpent rising in poised menace.His gaze, like a blazing shaft, fixed upon the enemy—and his valor, akin to a lion’s majestic fury.Mounted upon the noble elephant Vijayārddha,whose towering form rivaled the summit of Mount Meru,he thundered forth, a storm in motion,as favorable winds flung his banner’s silken streamers forward in proud advance.Around him surged a host of mighty warriors—
glorious lions of battle, their arms radiant,their flashing weapons casting brilliance to the farthest quarters of the sky.Their kettledrums boomed with deepening roars,mingled with the melodious tolling of bells that filled all the three worlds.These war-elephants—sweeping forward with the pride of awakened gods,driven by a storm of triumph,their swelling might seeking to out-roar even the lions of the earth—seemed as though they would overleap the tempest-tossed waves of the ocean at the end of days.So came he, stirred by an unquenchable thirst for war,an embodied tempest of victory,rising like destiny itself upon the battlefield.206 – 212
श्लोक 213 से 221
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 264 | श्लोक 265 से 275 | श्लोक 276 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 332 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 203