आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131
श्लोक 132 से 141 जयकुमार का पराक्रम
जयकुमार ने क्रोधित होकर वज्रकाण्ड धनुष से युद्ध शुरू किया। उसके बाण दूतों और कपट युद्ध की तरह तीक्ष्ण और प्रभावी थे, जो शत्रुओं के हृदय को भेदते थे। उसने विद्याधरों को भयभीत कर उनके बाणों को नष्ट किया। उसकी सेना ने शत्रुओं को पीछे हटाया, और युद्ध में उसका पराक्रम सूर्य की तरह चमका।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 44- Shlok 132 to 141
श्लोक ( Shlok ) 132
‘सायकोद्भिन्नमालोक्य कान्तस्य हृदयं प्रिया । परासुरासीच्चितेऽस्य वदन्तीवात्मनः स्थितिम् ।।१३२।।
कोई स्त्री अपने पतिका हृदय बाणसे विदीर्ण हुआ देखकर प्राणरहित हो गई थी मानो वह कह रही थी कि मेरा निवास इसीके हृदय में है ॥१३२॥
“A woman, beholding her husband’s heart pierced by an arrow, gave up her life, as though declaring—‘My dwelling is within his heart alone.’” ॥132॥
श्लोक ( Shlok ) 133
छिन्नदण्डैः फलैः कश्चित् ‘सर्वाङ्गीणैर्भटाग्रणीः । कीलिताशुरिवाकम्प्रतस्थैव युयुधे चिरम् ॥१३३॥
जिनके दण्ड टूट गये हैं और जो सब शरीरमें घुस गये हैं ऐसे बाणोंकी नोकोंसे जिसके प्राण मानो कीलित कर दिये गये हैं ऐसा कोई योद्धा पहलेकी तरह ही निश्चल हो बहुत देरतक लड़ता रहा था ।।१३३।।
“A warrior, whose life seemed as though nailed down by arrow-tips—some with shattered shafts and others embedded deep within his flesh—fought on for a long time, motionless as before, unwavering in battle.” ॥133॥
श्लोक ( Shlok ) 134 – 135
विलोक्य विलयज्वालि❜ ज्वालालोलशिखोपमैः । शिलीमुखैर्बलं “छिन्नं स्वं” विपक्षधनुर्धरैः ॥१३४॥ गृहीत्वा वज्रकाण्डाख्यं सज्जीकृत्य शरासनम् । स्वयं योद्धुं समारब्धं सक्रोधः सानुजो जयः ॥१३५॥
शत्रुओंके धनुषधारी योद्धाओंने प्रलयकालकी जलती हुई अग्निकी चंचल शिखाओंके समान तेजस्वी बाणोंके द्वारा मेरी सेनाको छिन्नभिन्न कर दिया है यह देख जयकुमारने अपने छोटे भाइयों सहित क्रोधित हो वज्रकाण्ड नाम-का धनुष लिया और उसे सजाकर स्वयं युद्ध करना प्रारम्भ किया ।।१३४-१३५॥
“Beholding his army torn asunder by the enemy’s bowmen—whose blazing arrows flashed like the flickering tongues of flame at the time of cosmic dissolution—Jayakumāra, enraged, took up the bow named Vajrakaṇḍa. Adorning it with care, he began to wage battle himself, accompanied by his younger brothers.” ॥134–135॥
श्लोक ( Shlok ) 136 –137
‘कर्णाभ्यर्णीकृतास्तस्य गुणयुक्ताः सुयोजिताः । पत्रैर्लघुसमुत्थानाः ‘कालक्षेपाविधायिनः ॥१३६॥मार्गे प्रगुणसञ्चाराः प्रविश्य हृदयं द्विषाम् । कृच्छ्रार्थ साधयन्ति स्म “निस्सृष्टार्थसमाः शराः ॥१३७॥
उस समय जयकुमारके बाण निःसृष्टार्थ (उत्तम) दूतके समान जान पड़ते थे क्योंकि जिस प्रकार उत्तम दूत स्वामीके कानके पास रहते हैं अर्थात् कानसे लगकर बातचीत करते हैं उसी प्रकार बाण भी जयकुमारके कानके पास रहते थे अर्थात् कानतक खींचकर छोड़े जाते थे, जिस प्रकार उत्तम दूत गुण अर्थात् रहस्य रक्षा आदिसे युक्त होते हैं उसी प्रकार बाण भी गुण अर्थात् डोरीसे युवत थे, जिस प्रकार उत्तम दूतकी योजना अच्छी तरह की जाती है उसी प्रकार बाणोंकी योजना भी अच्छी तरह की गई थी जिस प्रकार उत्तम दूत पत्र लेकर जल्दी उठ खड़े होते हैं उसी प्रकार बाण भी अपने पंखोंसे जल्दी जल्दी उठ रहे थे-जा रहे थे, जिस प्रकार उत्तम दूत व्यर्थ समय नहीं खोते हैं उसी प्रकार बाण भी व्यर्थ समय नहीं खोते थे, जिस प्रकार उत्तम दूत मार्ग में सीधे जाते हैं उसी प्रकार बाण भी मार्गमें सीधे जा रहे थे और जिस प्रकार उत्तम दूत शत्रुओं के हृदयमें प्रवेशकर कठिनसे कठिन कार्यको सिद्ध कर लेते हैं उसी प्रकार बाण भी शत्रुओंके हृदयमें घुसकर कठिनसे कठिन कार्य सिद्ध कर लेते थे ।।१३६-१३७॥
“At that time, the arrows of Jayakumāra appeared like noble envoys of highest rank. Just as such envoys remain close to the master’s ear, whispering counsel, so too did the arrows rest near his ear—drawn back to the bowstring. As noble envoys are adorned with virtues such as secrecy and discretion, so too were the arrows adorned with the virtue of the bowstring. As the mission of a true envoy is carefully planned, so too was the flight of each arrow precisely calculated. As envoys rise swiftly bearing messages, so too did the arrows rise swiftly, winged in haste. As envoys waste no time, so too did the arrows move without delay. As envoys walk the straight path, so too did the arrows fly in straight courses. And just as noble envoys penetrate the hearts of enemies and accomplish the most difficult of missions, so too did the arrows pierce the hearts of foes and fulfill their deadly purpose.” ॥136–137॥
श्लोक ( Shlok ) 138
पत्रवन्तः प्रतापोग्राः समग्रा विग्रहे द्रुताः। अज्ञातपोतिनश्चक्रुः कूटयुद्धं शिलीमुखाः ॥१३८॥
अथवा ऐसा जान पड़ता था मानो वे बाण कपट युद्ध कर रहे हों क्योंकि जिस प्रकार कपट युद्ध करनेवाले पत्रवंत अर्थात् सवारी सहित और प्रतापसे उग्र होते हैं उसी प्रकार वे बाण भी पत्रवंत अर्थात् पंखों सहित और अधिक संतापसे उग्र थे, जिस प्रकार कपट युद्ध करनेवाले युद्धमें शीघ्र जाते हैं और सबसे आगे रहते हैं उसी प्रकार वे बाण भी युद्धमें शीघ्र जा रहे थे और सबसे आगे थे तथा कपट युद्ध करनेवाले जिस प्रकार बिना जाने सहसा आ पड़ते हैं उसी प्रकार वे बाण भी बिना जाने सहसा आ पड़ते थे ।।१३८ ।।
“Or rather, those arrows seemed to wage a treacherous war—for just as deceitful warriors are mounted and fierce with blazing might, so too were the arrows feathered and burning with intense heat; just as such warriors rush swiftly into battle and lead from the front, so too did the arrows dart forward, ever at the forefront; and just as those who wage deceitful war descend suddenly and without warning, so too did the arrows strike unexpectedly, without foreknowledge.” ॥138॥
श्लोक ( Shlok ) 139 –140
प्रस्फुरद्भिः फलोपेतैः सुप्रमाणैः सुकल्पितैः । विरोधोद्भाविना विश्वगोचरैर्विजयावहैः ॥१३९॥ वादिनेव जयेनोच्चैः कीर्ति क्षिप्रं जिघृक्षुणा । प्रतिपक्षः प्रतिक्षिप्तः शस्त्रै शास्त्रर्जिगीषुणा ॥१४०॥
जिस प्रकार विजयके द्वारा उत्तम कीर्ति को शीघ्र प्राप्त करनेवाला और जीतनेकी इच्छा रखनेवाला वादी प्रकाशमान, अज्ञाननाशादि फलोंसे युक्त, उत्तम प्रमाणोंसे सहित, अच्छी तरह रचना किये हुए, संसारमें प्रसिद्ध और विजय प्राप्त कराने वाले शास्त्रोंसे विरोधी-प्रतिवादीको हराता है उसी प्रकार विजयके द्वारा शीघ्र ही उत्तम कीर्ति सम्पादन करनेवाले, जीतनेकी इच्छा रखनेवाले तथा विरोधी प्रकट करनेवाले जय-कुमारने देदीप्यमान, नुकीले, प्रमाणसे बने हुए, अच्छी तरह चलाये हुए, संसारमें प्रसिद्ध और विजय प्राप्त करानेवाले शस्त्रोंसे शत्रुओंकी सेना पीछे हटा दी थी ।। १३९-१४०॥
“Just as a skilled debater—desiring victory and swift attainment of noble fame—vanquishes his opponent through radiant discourse, armed with truth, adorned with sound reasoning, well-structured, renowned in the world, and yielding the fruits of knowledge and the dispelling of ignorance, even so did Jayakumāra—eager for triumph, intent on glory, and revealing the strength of his foes—repel the enemy host with radiant, sharp, well-crafted, expertly wielded, world-renowned, and victory-bringing weapons.” ॥139–140॥
श्लोक ( Shlok ) 141
खगाः खगान्प्रति प्रास्ताः प्रोद्भिद्य गगनं गताः । निवर्तन्ते न यावत्ते ते भियेवापतन्मृताः ॥१४१।।
जयकुमार ने विद्याधरोंके प्रति जो बाण चलाये थे वे आकाशको भेदनकर आगे चले गये थे और वहांसे वे जबतक लौटे भी नहीं थे तबतक वे विद्याधर मानो भयसे ही डरकर गिर पड़े थे ।।१४१॥
“The arrows loosed by Jayakumāra against the Vidyādharas pierced through the sky and sped far ahead—and even before they could return, the Vidyādharas seemed to fall, as though struck down by fear itself.” ॥141॥
श्लोक 142 से 152
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208
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आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131