Summary of Ādi purāṇa Parv 45 by Acharya Jinasena
संक्षिप्त सारांश: आदिपुराण पर्व 45 (श्लोक 1 से 219)
युद्ध समाप्त होने के बाद जयकुमार अपने निवास में ठहर गया। महाराज अकम्पन ने जिनेन्द्र की स्तुति की और कायोत्सर्ग में खड़ी सुलोचना का सत्कार किया। उन्होंने सुलोचना को नियम संकोच करने की आज्ञा दी। अकम्पन ने मंत्रियों से विचार कर अर्ककीर्ति सहित सभी विद्याधर राजाओं को मुक्त किया और उनका सम्मानपूर्वक सत्कार किया।
अकम्पन ने अर्ककीर्ति से विनम्रतापूर्वक क्षमा माँगी, उसे सूर्य के समान बताया तथा दूसरी पुत्री अक्षमाला (लक्ष्मीमती) देने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने महाभिषेक और शान्तिपूजा कराई। जयकुमार को भी बुलाकर दोनों पक्षों में संधि कराई और अत्यन्त प्रेम स्थापित किया। अर्ककीर्ति को अक्षमाला, वैभव और सम्पदा देकर सम्मानपूर्वक विदा किया। अन्य राजाओं को भी रत्न-धन देकर बिदा किया।
देव ने जयकुमार-सुलोचना विवाह का उत्सव सम्पन्न किया। अकम्पन ने सुमुख दूत को चक्रवर्ती भरत के पास भेजा। दूत ने स्वयंवर, युद्ध और अपराध की पूरी घटना सुनाई तथा दण्ड की प्रार्थना की। चक्रवर्ती ने कहा कि अकम्पन उनके पिता तुल्य हैं, स्वयंवर मार्ग उन्होंने ही चलाया। उनका चक्रवर्तीपन जयकुमार के पराक्रम से है। अर्ककीर्ति ने अकीर्ति फैलाई। जयकुमार ने न्याय किया। अपराधी को दण्ड देना उचित है। भरत ने न्याय को प्राथमिकता दी और अर्ककीर्ति को दण्ड नहीं दिया। दूत ने लौटकर दोनों को प्रसन्न किया।
जयकुमार सुलोचना सहित विजयार्ध हाथी पर सवार होकर छोटे भाइयों और हेमांगद आदि के साथ गंगा तट की ओर चला। गंगा किनारे पड़ाव डाला। सुलोचना को वहीं रखकर कुछ साथियों के साथ अयोध्या पहुँचा। चक्रवर्ती भरत से मिला, प्रणाम किया। भरत ने प्रेमपूर्ण वार्तालाप किया और सत्कार किया। जयकुमार ने विनम्रता से उत्तर दिया। भरत ने वस्त्र-आभूषण देकर विदा किया।
मार्ग में शकुन से जयकुमार मूर्छित हुआ। हाथी गढ़े में चला गया। कालिका देवी (मगर रूप में) ने हाथी को पकड़ा। सुलोचना ने पंचनमस्कार मंत्र स्मरण कर कायोत्सर्ग किया। गंगादेवी ने सबको बचाया। सुलोचना ने बताया कि गंगादेवी उसकी सहेली विन्ध्यश्री थी जो सर्पदंश से मरकर देवी बनी।
जयकुमार ने सुलोचना को गंगा की सुन्दरता का वर्णन किया। कुरुजांगल पहुँचकर हस्तिनागपुरी में प्रवेश किया। नगरी सुलोचना की तरह सुशोभित थी। राजभवन में सुखपूर्वक निवास किया। शुभ लग्न में सुलोचना का पट्टबन्ध किया। हेमांगद आदि को भोग-विनोद से संतुष्ट कर धन-रत्न देकर बनारस विदा किया।
कुछ समय बाद अकम्पन ने शरीर की असारता, संसार की अनित्यता पर विचार कर वैराग्य प्राप्त किया। हेमांगद का राज्याभिषेक किया। वृषभदेव के समीप दीक्षा ली और केवलज्ञान प्राप्त किया।
जयकुमार सुलोचना के प्रेम में डूबा रहा। दोनों ने परस्पर अनुकूल रहकर इन्द्रियों से संभोग सुख भोगा। प्रेम पूर्णता को प्राप्त हुआ। पर विषय सुख की सीमा होने से इच्छाएँ पूरी नहीं हुईं। पर्व जयकुमार-सुलोचना के सुख भोग वर्णन के साथ समाप्त हुआ।
45 पर्व हिन्दी-भाषानुवाद
श्लोक 1 से 11 युद्धोपरांत शान्ति और सुलोचना का सत्कार
युद्ध समाप्त होने के बाद जयकुमार अपने विशाल निवास में ठहर गया। महाराज अकम्पन ने जिनेन्द्रदेव की स्तुति की और कायोत्सर्ग में खड़ी सुलोचना का सत्कार किया। उन्होंने सुलोचना को आश्वासन दिया, उसके गुणों की प्रशंसा की तथा नियम संकोच करने की आज्ञा दी। फिर राजभवन में प्रवेश कर सुलोचना को उसके महल में भेज दिया। अकम्पन ने मंत्रियों से विचार कर विद्याधर राजाओं को मुक्त किया और उनका सत्कार किया।
श्लोक 12 से 21 अकम्पन द्वारा अर्ककीर्ति को क्षमा और समझाना
अकम्पन ने अर्ककीर्ति से कहा कि नाथवंश और सोमवंश दोनों उसके द्वारा ही स्थापित और बढ़ाए गए हैं। महात्मा लोग अपराध क्षमा करते हैं। उन्होंने अर्ककीर्ति को सूर्य के समान बताया और उसके क्रोध को पूर्वजन्म के पाप का फल कहा। जयकुमार को उसका सेवक बताकर अपराध न मानने की सलाह दी। सुलोचना छोटी बात है, सब कुछ अर्ककीर्ति का ही है। उन्होंने अर्ककीर्ति को दूसरी पुत्री लक्ष्मीमती (अक्षमाला) देने का प्रस्ताव रखा।
श्लोक 22 से 31 : संधि, विवाह और विदाई
अकम्पन ने अर्ककीर्ति को प्रसन्न कर महाभिषेक और शान्तिपूजा कराई। जयकुमार को भी बुलाकर दोनों में संधि कराई और अत्यन्त प्रेम उत्पन्न किया। अर्ककीर्ति को अक्षमाला कन्या, वैभव और सम्पदा देकर सम्मानपूर्वक विदा किया। अन्य विद्याधर और भूमिगोचरी राजाओं को भी रत्न, हाथी, घोड़े देकर बिदा किया। सभी लोग लज्जा और वैर त्यागकर अपने नगर लौट गए।
श्लोक 32 से 41 : जयकुमार-सुलोचना विवाह और दूत प्रेषण
देव ने सुलोचना-जयकुमार विवाह का उत्सव सम्पन्न किया। जयकुमार ने सहायकों को धन देकर बिदा किया। अकम्पन ने जयकुमार से सलाह कर सुमुख दूत को चक्रवर्ती के पास भेजा। दूत ने चक्रवर्ती को प्रणाम कर अकम्पन का संदेश सुनाया कि सुलोचना जयकुमार को स्वयंवर में दी गई थी। अर्ककीर्ति ने विरोध किया, किसी दुष्ट ने उसे भड़काया।
श्लोक 42 से 51 : दूत द्वारा चक्रवर्ती को विस्तृत संदेश
दूत ने कहा कि अर्ककीर्ति युवा है, दोष हमारा है। अकम्पन ने स्वयंवर में सबकी सहमति ली थी। चक्रवर्ती सर्वज्ञ हैं, सब जानते हैं। अकम्पन ने अपराध स्वीकार कर दण्ड की प्रार्थना की—फांसी, क्लेश या धन हरण। उन्होंने कहा कि आपकी आज्ञा से हम लोक-परलोक में धन्य होंगे।
श्लोक 52 से 61 : चक्रवर्ती भरत का उत्तर
चक्रवर्ती ने दूत को पास बुलाया और कहा कि अकम्पन उनके पिता तुल्य और ज्येष्ठ हैं। स्वयंवर मार्ग अकम्पन द्वारा ही चलाया गया। उनका चक्रवर्तीपन जयकुमार के पराक्रम से है। अर्ककीर्ति ने अकीर्ति फैलाई। जयकुमार ने न्याय किया। अपराधी को दण्ड देना उचित है, चाहे वह पुत्र ही क्यों न हो।
श्लोक 62 से 72 चक्रवर्ती का न्यायपूर्ण निर्णय
चक्रवर्ती ने कहा कि अकम्पन ने अक्षमाला देकर अर्ककीर्ति को पूज्य बना दिया। उन्होंने अर्ककीर्ति को दण्ड न देकर न्याय को प्राथमिकता दी। दूत ने दोनों का प्रणाम निवेदन किया। चक्रवर्ती ने दूत को प्रसन्न कर वापस भेजा। दूत ने लौटकर अकम्पन और जयकुमार को प्रसन्न किया।
श्लोक 73 से 81 जयकुमार का ससुराल में सुख
दूत को सम्मानित किया गया। जयकुमार सुख से श्वसुर गृह में रहा। सुलोचना के प्रति उसका प्रेम बढ़ा। कामदेव के फूलों के बाणों से वह घायल हुआ। जयकुमार ने सुलोचना की लज्जा दूर की, उसे हँसाया, निर्भय किया। दोनों ने परस्पर प्रेम में समय व्यतीत किया।
श्लोक 82 से 91 सुलोचना और जयकुमार का प्रेमालाप
सुलोचना का मन कामदेव से प्रभावित हुआ। उसकी लज्जा, भय और धैर्य कम होने लगा। दोनों ने परस्पर सुख प्राप्त किया। वे एक-दूसरे की इच्छा पूरी करते रहे। संभोग के अंत में दोनों असमर्थ हुए, पर आनन्द में डूबे रहे। उनकी दृष्टियाँ एक-दूसरे में खो गईं।
श्लोक 92 से 103 जयकुमार की वापसी
जयकुमार ने अकम्पन से जाने की इच्छा व्यक्त की। अकम्पन व्याकुल हुए, पर सहमति दी। शुभ दिन में वधू-वर को धन-रत्न देकर विदा किया। अकम्पन कुछ दूर तक साथ गए और शोक में लौट आए। जयकुमार अपनी प्रजा के पास लौट गया।
श्लोक 104 से 113 जयकुमार का गंगा तट पर पड़ाव और अयोध्या प्रस्थान
जयकुमार सुलोचना सहित विजयार्ध हाथी पर सवार होकर छोटे भाइयों, हेमांगद आदि के साथ उत्सवपूर्ण मार्ग पर गंगा तट की ओर चला। गंगा किनारे यथोचित स्थान पर सेना का पड़ाव डाला। पड़ाव स्वर्ग जैसा सुशोभित था। जयकुमार ने सुलोचना को उतारा, उसे सुख से विराजमान किया, विनोदों से संतुष्ट किया। रात्रि व्यतीत कर सुलोचना और हेमांगद आदि को वहीं रखा तथा कुछ साथियों के साथ अयोध्या की ओर प्रस्थान किया।
श्लोक 114 से 123 अयोध्या में प्रवेश और चक्रवर्ती से मिलन
अयोध्या पहुँचने पर अर्ककीर्ति आदि ने स्वागत किया। जयकुमार ने प्रेम से अयोध्या में प्रवेश किया। राजभवन के बाह्य द्वार पर हाथी से उतरा और रत्नमण्डप में चक्रवर्ती भरत के समक्ष पहुँचा। भरत सिंहासन पर सूर्य की तरह सुशोभित थे। जयकुमार ने आठ अंगों से प्रणाम किया। भरत ने उसे पास बिठाया और प्रसन्न किया। जयकुमार तेज से सुशोभित हुआ।
श्लोक 124 से 131 चक्रवर्ती का प्रेमपूर्ण वार्तालाप
चक्रवर्ती ने जयकुमार से पूछा कि बहू को क्यों नहीं लाए, विवाह में क्यों नहीं बुलाया। जयकुमार ने अपराधी की तरह मुँह नीचा किया और विनम्र होकर उत्तर दिया। उसने स्वयंवर की विधि और दैव के उलट प्रभाव का उल्लेख किया। युद्ध शान्त होने पर चरणों में आया।
श्लोक 132 से 141 जयकुमार की विनम्रता और भरत का सत्कार
जयकुमार ने कहा कि वह चक्रवर्ती के चरणों के भ्रमर हैं। भरत ने उसे वस्त्र, आभूषण, सवारी से सत्कारा। सुलोचना के लिए भी भेंट दी। जयकुमार ने प्रणाम कर विदा ली। नगर से बाहर निकलकर गंगा तट पर पहुँचा।
श्लोक 142 से 152 गंगा में संकट और गंगादेवी की रक्षा
मार्ग में कौए के शकुन से जयकुमार मूर्छित हुआ। पुरोहित ने आश्वासन दिया। हाथी गढ़े में चला गया। कालिका देवी (मगर रूप में) ने हाथी को पकड़ा। सुलोचना ने पंचनमस्कार मंत्र स्मरण कर कायोत्सर्ग किया। गंगादेवी ने सबको बचाया और सुलोचना की पूजा की।
श्लोक 153 से 160 सुलोचना की पूर्व कथा और गंगादेवी का परिचय
सुलोचना ने बताया कि विन्ध्यश्री उसकी सहेली थी, जो सर्पदंश से मरकर गंगादेवी बनी। गंगादेवी ने सुलोचना के मंत्र से देवीत्व प्राप्त किया। जयकुमार ने विदा की। सब डेरे में लौटे।
श्लोक 161 से 181 गंगा तट पर यात्रा और हस्तिनागपुरी प्रवेश
जयकुमार ने सुलोचना को गंगा की सुन्दरता का वर्णन किया। गंगा को प्रेममयी बताया। कुरुजांगल पहुँचकर हस्तिनागपुरी में प्रवेश किया। नगरी सुलोचना की तरह सुशोभित थी। राजभवन में सुखपूर्वक निवास किया।
श्लोक 182 से 191 सुलोचना का पट्टबन्ध और विदाई
शुभ लग्न में सुलोचना का पट्टबन्ध किया। हेमांगद आदि को भोग, विनोद, सवारी से संतुष्ट किया। रत्न, धन देकर बनारस विदा किया। हेमांगद आदि अकम्पन के पास पहुँचे और प्रसन्न रहे।
श्लोक 192 से 201 अकम्पन का वैराग्य और दीक्षा
अकम्पन ने शरीर की असारता पर विचार कर वैराग्य प्राप्त किया। शरीर को अपवित्र बताया। संसार की अनित्यता समझी। हेमांगद का राज्याभिषेक किया। वृषभदेव के समीप दीक्षा ली और केवलज्ञान प्राप्त किया।
श्लोक 202 से 211 जयकुमार-सुलोचना का प्रेम सुख
जयकुमार सुलोचना के प्रेम में डूबा रहा। इन्द्रियों से सुख प्राप्त किया। दोनों ने परस्पर अनुकूल रहकर संभोग सुख भोगा। प्रेम पूर्णता को प्राप्त हुआ।
श्लोक 212 से 219 : संभोग सुख की सीमा और पर्व समापन
दोनों ने संभोग के सुख को चरम तक पहुँचाया, पर इच्छाएँ पूरी नहीं हुईं। आचार्य ने कहा कि विषय सुख की भी निन्दा है। पर्व जयकुमार-सुलोचना के सुख भोग वर्णन के साथ समाप्त हुआ।
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