आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211
श्लोक 212 से 223 इन्द्रावतार और हिरण्योत्कृष्टजन्मता क्रिया
इन्द्रावतार क्रिया में इंद्र अर्हंत पूजन कर मनुष्य जन्म लेने की इच्छा करता है ताकि शीघ्र मोक्ष प्राप्त कर सके। शुभ स्वप्नों के माध्यम से वह स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतार लेता है। हिरण्योत्कृष्टजन्मता क्रिया में वह महादेवी के गर्भ में रत्नमय गर्भागार में जन्म लेता है। कुबेर द्वारा रत्नवर्षा, मंद वायु, दुंदुभि वाज, और कल्पवृक्ष की मालाओं के साथ श्री, बुद्धि, धृति आदि देवियां उसकी सेवा करती हैं। वह पवित्र राजमंदिर में हिरण्यगर्भ भगवान के रूप में जन्म लेता है, जो पुण्य का निवास है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 38- Shlok 212 to 223
श्लोक ( Shlok ) 212
इत्यनुत्सुकतां तेषु भावयन्ननुशिष्य तान् । कुर्वन्निन्द्रपदत्यागं स व्यथां नैति धीरधीः ॥२१२॥
इस प्रकार उन सब देवोंमें अपनी अनुत्कण्ठा अर्थात् उदासीनताका अनुभव करता हुआ इन्द्र उन सबके लिये शिक्षा दे और धीरवीर बुद्धिका धारक हो, इन्द्र पदका त्याग कर दुःखी न हो ।।२१२।।
Thus, having instilled in all the gods a spirit of non-attachment, that Indra—firm in wisdom, steadfast in courage—offers them his parting counsel,and, relinquishing the throne of Indra, he remains untouched by sorrow.212
श्लोक ( Shlok ) 213
इन्द्रत्यागक्रिया सैषा तत्स्वर्भोगातिसर्जनम् । धोरास्त्यजन्त्यनायासादैश्यं तादृशमप्यहो ॥२१३॥ इति इन्द्रत्यागः ।
इस तरह जो स्वर्ग के भोगोंका त्याग करता है वह इन्द्रत्याग क्रिया है। यह भी एक आश्चर्य की बात है कि धीरवीर पुरुष स्वर्ग के वैसे ऐश्वर्यको भी बिना किसी कष्टके छोड़ देते हैं ।॥ २१३।। इस प्रकार यह सैंतीसवीं इन्द्रत्याग क्रिया है ।
Thus, the renunciation of heavenly pleasures is known as the Indratyāga Kriyā.Truly, it is a wonder that steadfast and valiant souls can relinquish such celestial splendor without the slightest sorrow.
In this manner, this is the thirty-seventh rite, called Indratyāga Kriyā.213
श्लोक ( Shlok ) 214
अवतारक्रियाऽस्यान्या ततः संपरिवर्तते । कृतार्हत्पूजनस्यान्ते स्वर्गादवतरिप्यतः ॥२१४॥
तदनन्तर-जो इन्द्र आयुके अन्तमें अरहन्तदेवका पूजन कर स्वर्गसे अवतार लेना चाहता है उसके आगेकी अवतार नामकी क्रिया होती है ॥ २१४।॥
Thereafter, when Indra, at the end of his celestial lifespan, worships the Blessed Arhat and desires to descend from heaven,the next rite that unfolds is known as Avatāra Kriyā—the sacred descent.214
श्लोक ( Shlok ) 215
‘सोऽयं नृजन्मसंप्राप्त्या सिद्धि द्रागभिलाषुकः । चेतः सिद्धनमस्यायां समाधत्ते सुराधिराट् ।।२१५।।
मैं मनुष्य जन्म पाकर बहुत शीघ्र मोक्ष प्राप्त किया चाहता हूं यही विचार कर वह इन्द्र अपना चित्त सिद्ध भगवान्को नमस्कार करने में लगाता है ॥ २१५।।
With the thought, “May I attain liberation swiftly upon taking human birth,” that Indra directs his mind in deep reverence toward the Perfected Lord, offering salutations with a heart full of devotion.215
श्लोक ( Shlok ) 216
शुभः षोडशभिः स्वप्नैः संसूचितमहोदयः । तदा स्वर्गावताराख्यां कल्याणीमश्नुते क्रियाम् ॥२१६॥इति इन्द्रावतारः ।
शुभ सोलह स्वप्नोंके द्वारा जिसने अपना बड़ा भारी अभ्युदय-माहात्म्य सूचित किया है ऐसा वह इन्द्र उस समय कल्याण करनेवाली स्वर्गावतार नामकी क्रियाको प्राप्त होता है ।। २१६।। यह अड़तीसवीं इन्द्रावतार क्रिया है।
He who, through the auspicious vision of sixteen noble dreams, has signaled the rise of a great and glorious destiny—such an Indra at that moment attains the sacred rite known as Svargāvatāra, the Blessed Descent from Heaven.This is the thirty-eighth rite, known as Indrāvatāra Kriyā.216
श्लोक ( Shlok ) 217
ततोऽवतीर्णो गर्भेऽसौ रत्नगर्भगृहोपमे । जनयित्र्या महादेव्या ‘श्रीदेवीभिर्विशोधिते ॥२१७॥
तदनन्तर-वे माता महादेवीके श्री आदि देवियोंक द्वारा शुद्ध किये हुए रत्नमय गर्भागारके समान गर्भमें अवतार लेते हैं ।॥ २१७।।
Thereafter, he descends into the jeweled womb—purified by the auspicious Mahādevī, the divine mother, along with the foremost goddesses—as if entering a sanctified temple of gems, prepared for the birth of a noble soul.217
श्लोक ( Shlok ) 218 –223
हिरण्यवृष्टि धनदे प्राक् षण्मासान् प्रवर्षति । ‘अन्वायान्त्यामिवानन्दात् स्वर्गसंपदि भूतलम् ॥२१८॥ अमृतश्वसने मन्दमावाति व्याप्तसौरभे । भूदेव्या इव निःश्वासे प्रक्लृप्ते पवनामरैः ॥२१९॥ दुन्दुभिध्वनिते मन्द्रमुत्थिते पथि वार्मुचाम् । अकालस्तनिताशङ्कामातन्वति शिखण्डिनाम् ॥२२०॥मन्दारस्त्रजमम्लानिमा मोदाहृतषट्पदाम् । मुञ्चत्सु गुह्यकाख्येषु निकायेष्वमृताशिनाम् ॥२२१॥देवीषूपचरन्तीष देवीं भुवनमातरम् । लक्ष्म्या समं समागत्य श्रीह्रोधीधृतिकीर्तिषु ॥ २२२॥कस्मिंश्चित् सुकृतावासे” पुण्ये राजर्षिमन्दिरे । हिरण्यगर्भो धत्तेऽसौ हिरण्योत्कृष्टजन्मताम् ॥२२३॥
गर्भमें आनेके छह महीने पहलेसे जब कुबेर घरपर रत्नोंकी वर्षा करने लगता है और वह रत्नोंकी वर्षा ऐसी जान पड़ती है मानो आनन्दसे स्वर्गकी सम्पदा ही भगवान्के साथ साथ पृथिवीतलपर आ रही हो ।। जब अमृतके समान सुख देनेवाली वायु मन्द मन्द बहकर सब दिशाओंमें फैल रही हो तथा ऐसी जान पड़ती हो मानो पवनकुमार देवोंके द्वारा निर्माण किया हुआ पृथिवीरूपी देवीका निःश्वास ही हो । जब आकाशमें उठी हुई फैली हुई दुन्दुभि वाजोंकी गंभीर आवाज मयूरोंको असमय में होनेवाली मेघगर्जनाकी शंका उत्पन्न कर रही हो। जब गुह्यक नामके देवोंके समूह कभी म्लान न होनेवाली और सुगन्धिके कारण भ्रमरोंको अपनी ओर खींचने वाली कल्पवृक्षके फूलों की मालाओंको बरसा रहे हों। और जब श्री, ही, बुद्धि, धृति और कीर्ति नामकी देवियां लक्ष्मी के साथ आकर स्वयं जगन्माता महादेवीकी सेवा कर रही हों उस समय पुण्यके निवासभूत किसी पवित्र राजमन्दिर में वे हिरण्यगर्भ भगवान् हिरण्योत्कृष्ट जन्म धारण करते हैं ।॥ २१८-२२३।।
Six months prior to his descent into the womb, when Kubera begins to shower jewels upon the royal household—a rain of gems so wondrous that it seems as though the very wealth of heaven, in joyous welcome, is descending to Earth alongside the Lord—when the wind, sweet as nectar, moves gently and pervades all directions,as though it were the breath of the Earth-Goddess herself, crafted by the divine Wind-God for the comfort of the blessed—when the resonant sound of celestial kettledrums echo through the skies, so deep and expansive that even peacocks, mistaking it for untimely thunder, grow restless—when hosts of Guhyaka deities rain garlands made from the blossoms of the Kalpavṛkṣa, flowers that never fade and whose fragrance draws swarms of bees—and when the goddesses Śrī, Hrī, Buddhi, Dhṛti, and Kīrti arrive with Lakṣmī herself to serve the World-Mother Mahādevī—then, in a sanctified royal palace, dwelling-place of merit itself,the golden-wombed Lord (Hiraṇyagarbha) takes birth in a form of unsurpassed radiance—his birth, a divine manifestation of resplendent glory. 218 –223
श्लोक 224 से 231
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201 | श्लोक 202 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211
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