आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111
श्लोक 112 से 121 व्रतचर्या और व्रतावतरण क्रियाएं ( गर्भान्वय तिरेपन क्रियाएं 15 से 16)
व्रतचर्या क्रिया में ब्रह्मचारी बालक मूंज की रस्सी (कमर), सफेद धोती (जांघ), यज्ञोपवीत (वक्षःस्थल), और शुद्ध मुंडन (शिर) धारण करता है। ये चिह्न रत्नत्रय और अहिंसा आदि व्रतों की विशुद्धि के प्रतीक हैं। उसे दातौन, पान, अंजन, और हल्दी आदि से स्नान नहीं करना चाहिए, केवल जल से शुद्ध स्नान करना चाहिए। वह खाट पर नहीं सोता और अकेले पृथ्वी पर सोता है। विद्या पूर्ण होने तक यह व्रत धारण करता है, फिर श्रावकाचार और अध्यात्मशास्त्र पढ़ता है। व्याकरण, न्याय, ज्योतिष आदि का अध्ययन भी करता है। व्रतावतरण क्रिया में वह विशेष व्रत छोड़कर सामान्य व्रत पालता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 38- Shlok 112 to 121
श्लोक ( Shlok ) 112
उरोलिङ्गमथास्य स्याद् ग्रथितं सप्तभिर्गुणैः । यज्ञोपवीतकं सप्तपरमस्थानसूचकम् ॥११२॥
उसके वक्षःस्थलका चिह्न सात लरका गुंथा हुआ यज्ञोपवीत है, यह यज्ञोपवीत सात परमस्थानोंका सूचक है ।॥ ११२ ॥
The mark upon his chest is the sacred thread (Yajñopavīta), woven with seven strands—this thread is symbolic of the seven supreme states (Parama Sthānas). ॥112॥
श्लोक ( Shlok ) 113
शिरोलिङ्गं च तस्येष्टं परं मौण्ड्य मनाविलम् । मौण्ड्यं मनोवचःकायगतमस्योपबृ हयत् ॥११३॥
उसके शिरका चिह्न स्वच्छ और उत्कृष्ट मुण्डन है जो कि उसके मन, वचन, कायके मुण्डनको बढ़ानेवाला है। भावार्थ-शिर मुण्डनसे मन, वचन, काय पवित्र रहते हैं ।॥११३॥
The mark upon his head is the clean and excellent tonsure, which serves to deepen the renunciation of mind, speech, and body.Inner meaning: Through the shaving of the head, the mind, speech, and body are kept pure. ॥113॥
श्लोक ( Shlok ) 114
एवं प्रायेण लिङ्गेन विशुद्धं धारयेद् व्रतम् । स्थूलहिंसाविरत्यादि ब्रह्मचर्योपबृहितम् ॥११४॥
प्रायः इस प्रकारके चिह्नोंसे विशुद्ध और ब्रह्मचर्य से बढ़े हुए स्थूल हिंसाका त्याग (अहिंसाणु व्रत) आदि व्रत उसे धारण करना चाहिये ॥११४।।
Thus adorned with these sacred marks and elevated through the vow of Brahmacharya, the child should now undertake the vows—beginning with the renunciation of gross violence (Ahiṁsāṇuvrata)—which lead to inner purity and spiritual refinement. ॥114॥
श्लोक ( Shlok ) 115
दन्तकाष्ठग्रहो नास्य न ताम्बूलं न चाञ्जनम् । न हरिद्रादिभिः स्नानं शुद्धस्नानं दिनं प्रति ॥११५॥
इस ब्रह्मचारीको वृक्षकी दातौन नहीं करनी चाहिये, न पान खाना चाहिये, न अंजन लगाना चाहिये और न हल्दी आदि लगाकर स्नान करना चाहिये, उसे प्रतिदिन केवल जलसे शुद्ध स्नान करना चाहिये ।।११५॥
This Brahmachārī should not use twigs from trees as tooth-sticks, nor should he partake of betel leaves, apply collyrium to the eyes, or bathe with turmeric and similar substances. He must purify himself each day by bathing with plain water alone. ॥115॥
श्लोक ( Shlok ) 116
न ‘खट्वाशयनं तस्य नान्याङ्गपरिघट्टनम् । भूमौ केवलमेकाकी शयीत व्रतशुद्धये ॥११६॥
उसे खाट अथवा पलंगपर नहीं सोना चाहिये, दूसरे के शरीरसे अपना शरीर नहीं रगड़ना चाहिये, और व्रतोंको विशुद्ध रखनेके लिये अकेला पृथिवीपर सोना चाहिये ।। ११६।।
He should not sleep upon a cot or bed, nor should his body come into physical contact with another’s. To preserve the purity of his vows, he must sleep alone upon the ground. ॥116॥
श्लोक ( Shlok ) 117
यावद् विद्यासमाप्तिः स्यात् तावदस्येदृशं व्रतम् । ततोऽप्यूर्ध्वं व्रतं तत् स्याद् तन्मूलं गृहमेधिनाम् ॥११७॥
जब तक विद्या समाप्त न हो तब तक उसे यह व्रत धारण करना चाहिये और विद्या समाप्त होनेपर वे व्रत धारण करना चाहिये जो कि गृहस्थोंके मूलगुण कहलाते हैं ।।११७।।
Until his education is complete, he must steadfastly uphold this vow. Upon the conclusion of his studies, he should then undertake those vows which are known as the fundamental virtues (Mūlaguṇas) of the householder’s life. ॥117॥
श्लोक ( Shlok ) 118
सूत्रमौपासिकं चास्य स्यादध्येयं गुरोर्मुखात् । विनयेन ततोऽन्यच्च शास्त्रमध्यात्मगोचरम् ॥११८॥
सबसे पहले इस ब्रह्मचारीको गुरुके मुखसे श्रावकाचार पढ़ना चाहिये और फिर विनयपूर्वक अध्यात्मशास्त्र पढ़ना चाहिये ॥११८।।
First and foremost, the Brahmachārī should study the Śrāvakācāra at the feet of his Guru; thereafter, with humility and reverence, he should engage in the study of the scriptures concerning the inner path (Adhyātmaśāstra). ॥118॥
श्लोक ( Shlok ) 119
शब्दविद्याऽर्थशास्त्रादि चाध्येयं नास्य दुष्यति । सुसंस्कारप्रबोधाय “वैयात्यख्यातयेऽपि च ॥११९॥
उत्तम संस्कारोंको जागृत करने के लिये और विद्वत्ता प्राप्त करने के लिये इस व्याकरण आदि शब्दशास्त्र और न्याय आदि अर्थशास्त्रका भी अभ्यास करना चाहिये क्योंकि आचार-विषयक ज्ञान होनेपर इनके अध्ययन करनेमें कोई दोष नहीं है ।॥ ११९ ॥
To awaken noble impressions and to attain true scholarship, one should also study the sciences of language—such as grammar (Vyākaraṇa)—and disciplines of reasoning, like logic (Nyāya) and others. For when one possesses right knowledge of conduct (Ācāra), the study of these subjects is free from fault. ॥119॥
श्लोक ( Shlok ) 120
“ज्योतिर्ज्ञानमयच्छन्दोज्ञानं ज्ञानं च शाकुनम् । सङख्याज्ञानमितीदं च तेनाध्येयं विशेषतः ॥१२०॥ इति व्रतचर्या
इसके बाद ज्योतिष शास्त्र, छन्दशास्त्र, शकुनशास्त्र और गणितशास्त्र आदिका भी उसे विशेषरूपसे अध्ययन करना चाहिये ।। १२० ।। यह पन्द्रहवीं व्रतचर्या क्रिया है ।
Thereafter, he should also earnestly study the sciences of astrology (Jyotiṣa), prosody (Chandaḥśāstra), omens (Śakunaśāstra), mathematics (Gaṇitaśāstra), and others of similar merit.This is the fifteenth rite, known as Vratacaryā—the observance of vows. ॥120॥
श्लोक ( Shlok ) 121
ततोऽस्याधीत विद्यस्य व्रत’ वृत्त्यवतारणम् । विशेषविषयं तच्च स्थितस्यौत्सर्गिके व्रते ॥१२१॥
तदनन्तर जिसने समस्त विद्याओंका अध्ययन कर लिया है ऐसे उस ब्रह्मचारीकी व्रतावतरण क्रिया होती है। इस क्रिया में वह साधारण व्रतोंका तो पालन करता ही है परन्तु अध्ययनके समय जो विशेष व्रत ले रक्खेथे उनका परित्याग कर देता है। ॥१२१॥
Thereafter, the Vratāvataraṇa rite is performed for that Brahmachārī who has completed the study of all sacred sciences. In this rite, he continues to uphold the general vows, but renounces those stricter disciplines which were specially undertaken during his period of study. ॥121॥
श्लोक 122 से 131
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201 | श्लोक 202 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111
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