आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41
श्लोक 42 से 51 जयकुमार की प्रशंसा और युद्ध का विरोध
अनवद्यमति ने जयकुमार के पराक्रम और दिग्विजय की प्रशंसा की, जो चक्रवर्ती के सेनापति रहे हैं। उन्होंने अर्ककीर्ति को समझाया कि नाथवंश और सोमवंश का नाश करना अनुचित है, क्योंकि इससे चक्रवर्ती क्रोधित होंगे और अधर्म फैलेगा। सुलोचना को जबरदस्ती हासिल करना असंभव है, और अन्य कन्याएँ भी उपलब्ध हैं। युद्ध से कीर्ति के बजाय अपकीर्ति होगी।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 44- Shlok 42 to 51
श्लोक ( Shlok )42
“एतस्य दिग्जये सर्वैर्दृष्टमेवेह पौरुषम् । अनेन वः कृतः प्रेषः स्मर्तव्यो ननु स त्वया ॥४२॥
दिग्विजयके समय इसका पुरुषार्थ संसारमें सबने देखा था। उस समय इसने जो पराक्रम दिखाया था वह भी तुम्हें याद रखना चाहिये ॥४२॥
In the time of world-conquest, his valour was witnessed by all the earth;the mighty deeds he performed in that hour—those too thou oughtest well to remember. ॥42॥
श्लोक ( Shlok )43
ज्ञात्वा “सम्भाव्यशौर्योऽपि स मान्यो भर्त भिर्भटः । दृष्टसारः स्वसाध्येऽर्थे साधितार्थः किमुच्यते ॥४३॥
जिस योद्धामें शूरवीरपनेकी संभावना हो राजाओं को जानकर उसका भी सन्मान करना चाहिये फिर भला जिसका पराक्रम देखा जा चुका है और जिसने अत्यन्त असाध्य कार्यको भी सिद्ध कर दिया है उसकी तो बात ही क्या है ? ।।४३।।
A warrior in whom even the promise of valour is seen deserves honour from discerning kings;then what need be said of him whose might stands proven,and who hath accomplished deeds scarce attainable? ॥43॥
श्लोक ( Shlok )44
विना चक्राद् विना रत्नैर्भोग्येयं श्रीस्त्वया तदा । जयात्ते मानुषी सिद्धिदैवी पुण्योदयाद्यथा ॥४४॥
आगे चलकर जिस समय बिना चक्र और बिना रत्नोंके यह लक्ष्मी तुम्हारे उपभोग करने योग्य होगी उस समय तुम्हारी दैवी सिद्धि जिस प्रकार पुण्य कर्मके उदयसे होगी उसी प्रकार तुम्हारी मानुषी अर्थात् मनुष्योंसे होनेवाली सिद्धि जयकुमारसे ही होगी ॥४४।।
In times to come, when this fortune shall be thine to enjoy without the Discus and without the imperial Jewels,then, even as thy divine success shall arise through the merit of past deeds,so shall thy worldly triumph be wrought through Jayakumāra alone. ॥44॥
श्लोक ( Shlok )45
तृणकल्पोऽपि संवाह्यस्तव नीतिरियं कथम् । नाथेन्दुवंशावुच्छेद्यौ लक्ष्म्याः साक्षाद्भुजायितौ ॥४५॥
जब कि तृणके समान तुच्छ पुरुषकी भी रक्षा करनी चाहिये यह आपकी नीति है तब राज्य लक्ष्मीके साक्षात् भुजाओं के समान आचरण करनेवाले नाथ वंश और सोम वंश उच्छेद करने योग्य कैसे हो सकते हैं ? ॥४५॥
When even the lowliest of men, as blades of grass,are to be protected—such is thy noble creed—how then can the Nātha and Lunar lineages,who uphold royal fortune as with their very arms,be deemed fit for destruction? ॥45॥
श्लोक ( Shlok )46
बन्धुभूत्यक्षयाद्भूयस्तुभ्यं चक्र्यपि कुप्यति । अधर्मश्चायुगस्थायी त्वया स्यात् सम्प्रवर्तितम् ॥४६॥
इन भाइयोंके समान सेवकोंका नाश करनेसे चक्रवर्ती भी तुमपर अधिक क्रोध करेंगे और युगके अन्ततक टिकनेवाला यह अधर्म भी तुम्हारे द्वारा चलाया हुआ समझा जायगा ।।४६।।
By destroying loyal servants such as these noble brothers,even the Cakravartin shall grow wroth with thee;and this unrighteous deed—enduring till the close of the age—shall be remembered as thine own doing. ॥46॥
श्लोक ( Shlok )47
परदाराभिलाषस्य प्राथम्यं’ मा वृथा कृथाः । अवश्यमाहृताप्येषा न कन्या ते भविष्यति ॥४७॥
तुम्हें व्यर्थ ही परस्त्रीकी अभिलाषाका प्रारम्भ नहीं करना चाहिये क्योंकि यह निश्चय है, यह कन्या जबरदस्ती हरी जाकर भी तुम्हारी नहीं होगी ॥४७॥
Thou shouldst not, without cause, kindle desire for another’s bride;for be assured—though seized by force,this maiden shall never truly be thine. ॥47॥
श्लोक ( Shlok )48
सप्रतापं यशः स्थास्नु जयस्य स्यादहर्यथा । तव रात्रिरिवाकीर्तिः स्थायिन्यत्र मलीमसा ॥४८॥
जयकुमारका प्रताप सहित यश दिनके समान सदा विद्यमान रहेगा और तुम्हारी मलिन अकीर्ति रात्रिके समान सदा विद्यमान रहेगी ॥४८॥
Jayakumāra’s fame, radiant with valour,shall endure ever like the light of day;while thy darkened infamy shall abide forever, like the shadow of night. ॥48॥
श्लोक ( Shlok )49
सर्वमेतन्ममैवेति मा मस्था साधनं युधः । बहवोऽप्यत्र भूपालाः सन्ति तत्पक्षपातिनः ॥४९॥
ये सब राजा लोग युद्धमें मेरी सहायता करेंगे ऐसा मत समझिये क्योंकि इनमें भी बहुतसे राजा लोग उनके पक्षपाती हैं ।॥४९॥
Think not that all these kings shall aid thee in battle,for know this—many among them are, in truth, devoted to his cause. ॥49॥
श्लोक ( Shlok ) 50
पुरुषार्थत्रयं पुम्भिर्दुष्प्रापं तत्त्वयाऽर्जितम् । न्यायमार्ग समुल्लङ्ध्य वृथा तत्किं विनाशयेः ॥५०॥
जो धर्म अर्थ और कामरूप तीन पुरुषार्थ पुरुषोंको अत्यन्त दुर्लभ हैं वे तुझे प्राप्त हो गये हैं इसलिये अब न्याय मार्गका उल्लंघन कर उन्हें व्यर्थ ही क्यों नष्ट कर रहें हो ॥५०॥
The threefold aims of life—Dharma, Artha, and Kāma—so rare to attain even for the worthiest of men,have already been granted unto thee;why then, by transgressing the path of justice,wouldst thou cast them heedlessly away? ॥50॥
श्लोक ( Shlok ) 51
अकम्पनस्य सेनेशो जयः प्रागिव चक्रिणः । वीरलक्ष्यास्तुलारोहं मुधा त्वं कि विधास्यसि ॥५१॥
यह जयकुमार जिस प्रकार पहले चक्रवर्तीका सेना-पति बना था उसी प्रकार अब अकम्पनका सेनापति बना है तुम व्यर्थ ही वीरलक्ष्मीको तुलापर आरूढ क्यों कर रहे हो । भावार्थ-वीरलक्ष्मीको संशयमें क्यों डाल रहे हो ।॥५१।।
This Jayakumāra, who once served as commander to the former Cakravartin,now leads the armies of Akampana as well;why then dost thou, without cause, place the goddess of valour upon the scales?—Why cast doubt upon the very fortune of heroism? ॥51॥
श्लोक 52 से 61
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 264 | श्लोक 265 से 275 | श्लोक 276 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41
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