आदिपुराण 36 पर्व सारांश
Summary of Ādi purāṇa Parv 36 by Acharya Jinasena
संक्षिप्त सारांश: आदिपुराण पर्व 36 (श्लोक 1 से 212)
चक्रवर्ती भरत, बाहुबली को वश करने के लिए दूत के वचनों से प्रेरित होकर विशाल सेना के साथ प्रस्थान करते हैं। उनकी सेना पैदल सैनिकों, घुड़सवारों, हाथियों, रथों, और विद्याधरों-देवों के साथ छह विभागों में विभक्त होकर चलती है, जो पर्वतों-सी शोभती है। योद्धा पराक्रमी और उत्साहित होकर युद्ध की तैयारी करते हैं, पर लोग इस युद्ध को सेवकों के लिए हानिकारक मानते हैं। बाहुबली रणभूमि में प्रतीक्षा करते हैं, और दोनों सेनाएं आमने-सामने होती हैं। मंत्रियों के आग्रह पर क्रूर युद्ध के बजाय धर्मयुद्ध का निर्णय होता है, जिसमें दृष्टियुद्ध, जलयुद्ध, और बाहुयुद्ध निर्धारित किए जाते हैं। बाहुबली तीनों युद्धों में भरत को पराजित करते हैं, अंत में उन्हें कंधे पर उठाकर विजय प्राप्त करते हैं, पर सम्मान में भूमि पर नहीं पटकते। क्रोधित भरत का चक्ररत्न बाहुबली पर निष्फल रहता है। बाहुबली विषयों और राज्यलक्ष्मी की नश्वरता पर विचार कर इसे त्याग देते हैं। वे भरत को उनके कृत्य की नीचता बताकर दीक्षा ग्रहण करते हैं। पुत्र महावली को राज्य सौंपकर वे एकवर्षीय कायोत्सर्ग तप करते हैं। लताओं और सर्पों से घिरे, वे हरिचंदन वृक्ष-से शोभते हैं। तप से उनकी ऋद्धियां और ज्ञान बढ़ते हैं, और वे परिषहों को जीत लेते हैं। दश धर्मध्यान और बारह अणुप्रेक्षाओं के चिंतन से वे शुक्लध्यान में लीन होते हैं। एक वर्ष के उपवास के अंत में भरत की पूजा से उन्हें केवलज्ञान प्राप्त होता है। भरत और देव रत्नमयी पूजा करते हैं। बाहुबली का तेज वन को शांत करता है, जहां जीव वैर छोड़कर निर्भय रहते हैं। केवलज्ञान प्राप्त कर वे कैलास पर्वत पर वृषभदेव के समीप पहुंचते हैं। उनकी कीर्ति विश्व में फैलती है, और वे मोक्षलक्ष्मी प्रदान करते हैं।
पर्व 36 हिन्दी-भाषानुवाद
श्लोक 1 से 11 भरत की सेना का प्रस्थान
दूत के वचनों से प्रेरित होकर चक्रवर्ती भरत की सेना, आकाश और पृथ्वी को व्याप्त करती हुई चल पड़ती है। नगाड़ों के गंभीर शब्दों से विद्याधर भयभीत होते हैं। सेना पैदल सैनिकों, घुड़सवारों, हाथियों, रथों, और विद्याधरों-देवों के साथ छह विभागों में विभक्त होकर आगे बढ़ती है। भरत बाहुबली को जीतने की इच्छा से राजाओं के साथ प्रस्थान करते हैं। विजय पताकाओं से सुशोभित मदोन्मत्त हाथी पर्वतों-से प्रतीत होते हैं, जिनके मदजल से भूमि सींची जाती है। महावत और घुड़सवार पराक्रमी योद्धाओं-से लगते हैं।
श्लोक 12 से 21 सेना की शोभा और योद्धाओं का उत्साह
धनुर्धारी योद्धा बाणों से भरे तरकसों के साथ वृक्षों-से सुशोभित होते हैं। रथी योद्धा युद्धरूपी समुद्र पार करने वाले खेवटियों-से प्रतीत होते हैं। कवच और तलवारों से सजे योद्धा उल्काओं-से चमकते हैं, जो शत्रुओं के सामने पराक्रम प्रदर्शित करते हैं। कुछ योद्धा तलवार में अपना प्रतिबिंब देखकर या उसे तोलकर स्वामी के सम्मान का गौरव अनुभव करते हैं। मुकुटबद्ध राजाओं की सेनाएं रत्नों की किरणों से दीप्तिमान होकर लोकपालों-सी शोभती हैं। योद्धा व्याकुल स्त्रियों को आश्वासन देते हैं।
श्लोक 22 से 31 युद्ध की तैयारी और चिंतन
घोड़ों के खुरों से उठी धूल आकाश को ढक लेती है, जिसमें चक्ररत्न का प्रकाश ही मार्गदर्शन करता है। राजा योद्धाओं के वार्तालाप से उत्साहित होते हैं। बाहुबली रणभूमि को तैयार कर प्रतीक्षा करते हैं, जबकि भरत उच्छृंखल होकर उनके समक्ष जाते हैं। लोग चिंतित होकर कहते हैं कि यह युद्ध सेवकों के लिए हानिकारक है। वे भरत के युद्ध को ऐश्वर्य के मद में अयोग्य मानते हैं और दोनों भाइयों को रोकने की कामना करते हैं। बाहुबली को सिंह-सा शूरवीर और भरत को चक्रधारी असाधारण पुरुष मानते हैं।
श्लोक 32 से 41 युद्ध की शांति की कामना
लोग मध्यस्थ भाव से युद्ध की शांति की कामना करते हैं, क्योंकि यह अनेक लोगों के विनाश का कारण बन सकता है। कुछ पक्षपात से अपने पक्ष की प्रशंसा करते हैं। राजा बाहुबली के समीप पहुंचते हैं, जहां उनकी भुजाओं का दर्प देखकर भरत के योद्धा भयभीत होते हैं। बाहुबली की सेना समुद्र-सी क्षुब्ध हो उठती है। दोनों सेनाएं युद्ध की तैयारी करती हैं, पर मंत्रियों को यह क्रूर युद्ध अशांतिपूर्ण लगता है। वे कहते हैं कि दोनों भाइयों को क्षति नहीं होगी, पर सेवकों का नाश होगा।
श्लोक 42 से 51 धर्मयुद्ध की घोषणा
मंत्री धर्मयुद्ध की घोषणा करते हैं, जिसमें मनुष्य संहार से बचने के लिए तीन प्रकार के युद्ध—दृष्टियुद्ध, जलयुद्ध, और बाहुयुद्ध—निर्धारित होते हैं। वे कहते हैं कि विजय और पराजय को अहंकार या क्रोध के बिना स्वीकार करना भाइयों का धर्म है। दोनों भाई आग्रह के बाद इसे स्वीकार करते हैं। राजाओं को दोनों पक्षों में बांटा जाता है। भरत और बाहुबली नील और सुमेरु पर्वत-से शोभते हैं। बाहुबली शांत दृष्टि से दृष्टियुद्ध में विजय प्राप्त करते हैं।
श्लोक 52 से 61 जलयुद्ध और बाहुयुद्ध
दृष्टियुद्ध में बाहुबली की विजय के बाद दोनों भाई जलयुद्ध के लिए सरोवर में प्रवेश करते हैं। बाहुबली का जल प्रवाह भरत के वक्ष पर पड़ता है, पर भरत का जल बाहुबली के मुख तक नहीं पहुंचता, क्योंकि बाहुबली का कद अधिक है। बाहुबली जलयुद्ध में भी विजयी होते हैं। फिर बाहुयुद्ध में दोनों भाई पराक्रमी सिंहों-से युद्ध करते हैं। बाहुबली भरत को लीला में घुमा देते हैं और उन्हें कंधे पर उठाकर विजय प्राप्त करते हैं, पर बड़े भाई के सम्मान में उन्हें भूमि पर नहीं पटकते।
श्लोक 62 से 71 भरत का अपमान और वैराग्य
बाहुबली की विजय पर उनके पक्ष के राजा हर्षोल्लास करते हैं, जबकि भरत के पक्षवाले लज्जित होकर सिर झुकाते हैं। क्रोधित भरत चक्ररत्न का स्मरण करते हैं, पर वह बाहुबली के अवध्य होने से उनकी प्रदक्षिणा कर रुक जाता है। राजा भरत को धिक्कारते हैं, जिससे वे संतापग्रस्त होते हैं। बाहुबली भरत को कंधे से उतारकर सम्मानपूर्वक रखते हैं। वे उनकी प्रशंसा करते हैं, पर साम्राज्य को नश्वर और व्यभिचारिणी स्त्री-सा मानकर वैराग्य भाव से इसे तुच्छ समझते हैं।
श्लोक 72 से 81 विषयों की नश्वरता और हानि
बाहुबली विषयों की क्षणभंगुरता और निंदनीयता पर विचार करते हैं। वे कहते हैं कि विषय प्राणियों को अनंत दुख देते हैं, जैसे विष बार-बार मारता है। विषय प्रारंभ में सुखद, पर अंत में दुखदायी होते हैं, जैसे विषम फल। ये शत्रु-से उद्वेग उत्पन्न करते हैं, जो शस्त्र या सर्प भी नहीं कर सकते। मूर्ख पुरुष भोगों की लालसा में समुद्र, युद्ध, वन, नदी, और पर्वतों में प्रवेश करते हैं, बिना यह जाने कि ये भयंकर और हानिकारक हैं।
श्लोक 82 से 91 बुढ़ापे और शरीर की नश्वरता
बाहुबली बुढ़ापे को अनिष्ट स्त्री-सी बताते हैं, जो जबरन आलिंगन करती है। भोगों में लिप्त व्यक्ति हित-अहित नहीं समझता, और वृद्धावस्था मृत्यु-सी है। बुढ़ापा शीतज्वर-सा शरीर को कंपित और पतनशील बनाता है। जरा और मदिरा शरीर, बुद्धि, और वचनों को शिथिल करते हैं। आयु काल-रूपी हाथी द्वारा उखाड़ दी जाती है, और शरीर रोगों से नष्ट हो जाता है। बाहुबली भरत के मोह को दुखद मानते हैं, जो नश्वर राज्य को स्थायी समझते हैं।
श्लोक 92 से 101 बाहुबली का भरत को संबोधन
बाहुबली भरत को संबोधित कर कहते हैं कि उन्होंने मोहवश अनुचित साहस किया। उनका चक्र बाहुबली के शरीर पर निष्फल रहा, जैसे वज्र पर वज्र। भरत ने भाइयों की सामग्री नष्ट कर अधर्म और यश-हानि की। वे व्यंग्य करते हैं कि भरत ने कुल का उद्धार किया। बाहुबली राज्यलक्ष्मी को पापमय और नश्वर मानकर त्यागते हैं, क्योंकि यह बंधन सज्जनों के लिए नहीं। वे तपरूपी लक्ष्मी को अपनाने की इच्छा रखते हैं और अपनी चंचलता के लिए क्षमा मांगते हैं। उनकी वाणी भरत के संतप्त मन को शांत करती है।
श्लोक 102 से 111 बाहुबली की दीक्षा और तप
भरत अपनी दुष्टता पर संतप्त होकर पश्चाताप करते हैं। बाहुबली उन्हें प्रसन्न कर पुत्र महावली को राज्य सौंपकर जैनी दीक्षा ग्रहण करते हैं। परिग्रह त्यागकर वे कुश-लता से आलिंगित वृक्ष-से प्रतीत होते हैं। गुरु की आज्ञा से शास्त्राध्ययन और एकवर्षीय कायोत्सर्ग योग अपनाते हैं। लताओं और सर्पों से घिरे, वे हरिचंदन वृक्ष-से शोभते हैं। वासंती लता उनका आलिंगन करती है, मानो सखी हो। बाहुबली कठिन तप से देदीप्यमान होते हैं।
श्लोक 112 से 121 बाहुबली की तपस्या और परिषह-जय
बाहुबली का शरीर तप से कृश हो जाता है, और उनके कर्म नष्ट होते हैं। उनका धैर्य अचिंत्य है, जो उन्हें विकारों से मुक्त रखता है। वे भूख, प्यास, शीत, गर्मी, और डांस-मच्छर जैसे परिषह सहन करते हैं। नाग्न्य व्रत और ब्रह्मचर्य की रक्षा करते हैं। रति-अरति, स्त्री-परिषह, और चर्या-शय्या जैसे परिषहों को वे आसानी से जीत लेते हैं। बाहुबली बंध और आक्रोश परिषह भी सहन करते हैं, शरीर को नश्वर मानकर निःस्पृह रहते हैं।
श्लोक 122 से 131 बाहुबली का परिषह-जय और कषाय-विजय
बाहुबली याचना परिषह सहन कर मौन रहते हैं। वे क्षमा से क्रोध, सरलता से माया, और संतोष से लोभ जीतते हैं। स्वेद, मल, तृण-स्पर्श, और रोग-परिषह को धैर्यपूर्वक सहन करते हैं। ज्ञान के अहंकार का त्याग कर प्रज्ञा-परिषह जीतते हैं। सत्कार-पुरस्कार और अलाभ-परिषह में संतुष्ट रहते हैं। कामदेव को जीतकर इंद्रियों पर नियंत्रण पाते हैं। वे आहार, भय, मैथुन, और परिग्रह जैसी संज्ञाओं को नष्ट करते हैं। परिषह-जय से उनकी कर्म-निर्जरा होती है।
श्लोक 132 से 141 बाहुबली के गुण और रत्नत्रय की रक्षा
बाहुबली 28 मूलगुणों और 84 लाख उत्तरगुणों का पालन करते हैं, जिसमें महाव्रत, समितियां, इंद्रिय-दमन, और एक बार आहार शामिल हैं। वे तप की किरणों से देदीप्यमान होते हैं। रस, शब्द, और ऋद्धि-गौरव से मुक्त, दशधर्मों से मोक्षमार्ग में दृढ़ रहते हैं। तीन गुप्तियों और पांच समितियों से कर्म-शत्रुओं को जीतते हैं। कषाय-चोरों से रत्नत्रय की रक्षा करते हैं। मौन रहकर विकथाओं से दूर रहते हैं। उनका मन ज्ञान-दीपक से प्रकाशित रहता है, जिससे सभी पदार्थ उनके ध्यान के योग्य होते हैं।
श्लोक 142 से 151 बाहुबली का ज्ञान और तप
बाहुबली मति और श्रुत ज्ञान से संसार के पदार्थों का चिंतन करते हैं, जिससे जगत् उन्हें स्पष्ट प्रतीत होता है। परिषह और इंद्रिय-जय से वे तपरूपी राज्य का अनुभव करते हैं। तप के बल से उनकी ऋद्धियां प्रकट होती हैं, जो तीनों लोकों में क्षोभ उत्पन्न करती हैं। मतिज्ञान और श्रुतज्ञान की वृद्धि से कोष्ठबुद्धि और अंग-ज्ञान की शक्ति बढ़ती है। वे सर्वावधि और विपुलमति मनःपर्यय ज्ञान प्राप्त करते हैं। ज्ञान की शुद्धि से तप शुद्ध होता है। उग्र, महाउग्र, दीप्त, तप्तघोर, और महाघोर तपों से वे सूर्य-से देदीप्यमान होते हैं।
श्लोक 152 से 161 बाहुबली की ऋद्धियां और ध्यान
बाहुबली के तप से अणिमा, महिमा आदि आठ विक्रिया-ऋद्धियां प्रकट होती हैं। औषधि-ऋद्धि से वे प्राणियों का उपकार करते हैं। भोजन न लेने पर भी उनकी रस और बल-ऋद्धियां प्रकट होती हैं। वे अक्षीणसंवास और अक्षीणमहानस ऋद्धियां धारण करते हैं। अध्यात्म में निपुण, वे मन को ध्यान में लगाते हैं। दश धर्मध्यान-भावनाएं और बारह अणुप्रेक्षाओं का चिंतन करते हैं। आज्ञा, अपाय, विपाक, और कर्मों का चिंतन कर धर्मध्यान में लीन रहते हैं।
श्लोक 162 से 171 बाहुबली के तप का प्रभाव
बाहुबली के ध्यान से कर्म नष्ट होते हैं, जैसे दीपक की कज्जल। उनकी दीप्ति वन को नीलमणि-सी कान्ति से भर देती है। उनके चरणों के समीप मृग निर्भय रहते हैं, और सिंह जैसे दुष्ट जीव शांत हो जाते हैं। विरोधी जीव वैर छोड़कर एकत्र होते हैं। सर्प उनके चरणों पर नीलकमल-से शोभते हैं, जो उनके माहात्म्य को दर्शाते हैं।
श्लोक 172 से 181 प्रकृति की शांति
वन की लताएं फूलों से नमस्कार-सी करती हैं, और वृक्ष नृत्य-से प्रतीत होते हैं। सर्प रत्न-किरणों से नृत्य करते हैं, और मोर कोकिलों के स्वरों पर नाचते हैं। बाहुबली के माहात्म्य से वन शांत हो जाता है, जहां कोई जीव एक-दूसरे को बाधा नहीं पहुंचाता। उनका तेज तीर्थंकरों का अंधकार दूर करता है। विद्याधर उनकी पूजा करते हैं, और देवों के आसन उनके माहात्म्य से कंपित होते हैं।
श्लोक 182 से 191 बाहुबली का केवलज्ञान
विद्याधरियां बाहुबली के शरीर की लताएं हटाती हैं। शुक्लध्यान से उनकी तप-शक्ति बढ़ती है। एक वर्ष के उपवास के अंत में भरत उनकी पूजा करते हैं, जिससे बाहुबली को केवलज्ञान प्राप्त होता है। भरत का हृदय शल्य-मुक्त होता है। भरत केवलज्ञान से पहले अपराध-क्षमा और बाद में ज्ञान-उत्सव के लिए पूजा करते हैं। दोनों भाइयों का प्रेम और धर्म-निष्ठा उनकी पूजा को उत्कृष्ट बनाती है।
श्लोक 192 से 201 भरत और देवों की पूजा
भरत मंत्रियों, राजाओं, और स्त्रियों के साथ बाहुबली की पूजा करते हैं। वे रत्नों का अर्घ, गंगा-जल, मोतियों से अक्षत, और पारिजात-पुष्पों से पूजा करते हैं। इंद्र आदि देव रत्न-छत्र, सिंहासन, और गंधकुटी से उनकी पूजा करते हैं। स्वर्ग के वृक्षों से फूल बरसते हैं, और नगाड़े बजते हैं। केवलज्ञान से युक्त बाहुबली मुनियों के मध्य चंद्रमा-से शोभते हैं।
श्लोक 202 से 212 बाहुबली की महिमा
बाहुबली अर्हंत अवस्था प्राप्त कर संसार में विहार करते हैं। वे वृषभदेव के समीप कैलास पर्वत पहुंचते हैं। उन्होंने युद्धों में भरत को पराजित कर, राज्य को तुच्छ मानकर दीक्षा ली। उनकी कीर्ति विश्व में फैलती है। सर्पों का विष उनके चरणों से शांत होता है। भरत के मुकुट-रत्नों से उनके चरण चमकते हैं। सभी ऋतुओं में तप करने वाले बाहुबली की स्मृति प्राणियों को मोक्षलक्ष्मी प्रदान करती है।
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आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena
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