आदिपुराण पर्व 38 में भगवान वृषभदेव की महिमा और चक्रवर्ती भरत द्वारा द्विजों की उत्पत्ति व गर्भान्वय-दीक्षान्वय क्रियाओं का वर्णन है।
श्लोक 1 से 11 अरहंत भगवान की महिमा और भरत की दिग्विजय
अरहंत भगवान की वाणी अज्ञान के अंधकार को नष्ट करने वाली और सूर्य की किरणों की तरह देदीप्यमान है। भगवान वृषभदेव ने अपनी विद्या से संसार को मोह के विष से जागृत किया। गौतम स्वामी राजा श्रेणिक को द्विजों की उत्पत्ति की कथा सुनाते हैं। चक्रवर्ती भरत ने साठ हजार वर्षों में भारतवर्ष पर दिग्विजय प्राप्त की और लौटने पर उनके मन में संपत्ति का उपयोग दूसरों के उपकार के लिए करने का विचार आया। वे जिनेंद्रदेव का महामह यज्ञ करना चाहते थे, लेकिन निःस्पृह मुनि धन स्वीकार नहीं करते। अतः उन्होंने अणुव्रत धारण करने वाले, धीर, और गृहस्थों में श्रेष्ठ व्यक्तियों को सत्कार योग्य माना। भरत ने सत्कार योग्य व्यक्तियों की परीक्षा के लिए सभी राजाओं को आमंत्रित किया और अपने आंगन में हरे अंकुर, पुष्प, और फल रखवाए।
श्लोक 12 से 21 व्रतियों की परीक्षा और सत्कार
अव्रती लोग बिना सोच-विचार के आंगन में प्रवेश कर गए, जिन्हें भरत ने एक ओर हटा दिया। व्रतधारी, उच्च कुलों में जन्मे लोग हरे अंकुरों के कारण आंगन में प्रवेश नहीं करना चाहते थे, क्योंकि वे पाप और जीव हिंसा से डरते थे। भरत के आग्रह पर वे प्रासुक मार्ग से आए। उन्होंने बताया कि पर्व के दिन हरे अंकुर, पुष्प, और फलों में जीवों का विनाश नहीं करना चाहिए, क्योंकि सर्वज्ञ ने कहा है कि इनमें अनंत निगोदिया जीव रहते हैं। उनके वचनों से प्रभावित होकर भरत ने व्रतियों की प्रशंसा की और उन्हें दान, मान, और सत्कार से सम्मानित किया। पद्म निधि से प्राप्त ब्रह्मसूत्र से उनकी पहचान की।
श्लोक 22 से 31 व्रतियों का सम्मान और पूजा के प्रकार
भरत ने व्रतियों का सम्मान किया, जिससे वे अपने व्रतों में और दृढ़ हुए। उन्होंने उपासकाध्ययनांग से इज्या, वार्ता, दत्ति, स्वाध्याय, संयम, और तप का उपदेश दिया। अर्हंत भगवान की पूजा चार प्रकार की बताई गई: सदार्चन (नित्यमह), चतुर्मुख, कल्पद्रुम, और आष्टाह्निक। सदार्चन में प्रतिदिन जिनालय में पूजा, मंदिर निर्माण, और दान शामिल हैं। चतुर्मुख यज्ञ राजाओं द्वारा किया जाता है, और कल्पद्रुम यज्ञ में चक्रवर्ती सभी की इच्छाएं पूरी करते हैं।
श्लोक 32 से 41 पूजा और दत्ति के प्रकार
आष्टाह्निक यज्ञ सभी के लिए प्रसिद्ध है, और ऐन्द्रध्वज यज्ञ इंद्र द्वारा किया जाता है। पूजा में नैवेद्य, अभिषेक, और संध्या उपासना शामिल हैं। विशुद्ध आचरण से खेती करना वार्ता है, और दत्ति चार प्रकार की हैं: दयादत्ति (भय दूर करना), पात्रदत्ति (मुनियों को आहार देना), समदत्ति (समान गृहस्थ को दान), और सकलदत्ति (वंश की प्रतिष्ठा के लिए दान)। स्वाध्याय, तप, और संयम द्विजों की छह विशुद्ध वृत्तियां हैं।
श्लोक 42 से 51 द्विजों की परिभाषा और संस्कार
द्विज तप, शास्त्रज्ञान, और जन्म से होते हैं, लेकिन केवल जन्म से द्विज होना पर्याप्त नहीं। व्रत, तप, और शास्त्राभ्यास से ही द्विज का संस्कार पूर्ण होता है। आजीविका के भेद से चार जातियां हैं: ब्राह्मण (व्रत संस्कार), क्षत्रिय (शस्त्र धारण), वैश्य (न्यायपूर्वक धनार्जन), और शूद्र (नीच वृत्ति)। भरत ने सम्यग्दृष्टि पुरुषों के लिए तीन प्रकार की क्रियाएं बताईं: गर्भान्वय, दीक्षान्वय, और कर्त्रन्वय। ये क्रियाएं शुभ और उत्तम फल देने वाली हैं।
श्लोक 52 से 63 गर्भान्वय और दीक्षान्वय क्रियाएं
गर्भान्वय क्रियाएं तिरेपन हैं, जैसे आधान, प्रीति, आदि। दीक्षान्वय क्रियाएं अड़तालीस हैं, जो उपासकाध्ययनांग से प्राप्त ज्ञान पर आधारित हैं। इनमें आधान, विवाह, दीक्षा, और निर्वाण तक की क्रियाएं शामिल हैं। ये क्रियाएं गर्भ से निर्वाण तक के जीवन चक्र को दर्शाती हैं।
श्लोक 64 से 71 कर्त्रन्वय क्रियाएं और आधान
कर्त्रन्वय क्रियाएं सात हैं: सज्जाति, सद्गृहित्व, पारिव्राज्य, सुरेन्द्रता, साम्राज्य, परमार्हन्त्य, और परमनिर्वाण। ये अर्हंत के वचनों के आस्वादन से प्राप्त होती हैं। आधान क्रिया में गर्भाधान से पूर्व अर्हंत की पूजा और मंत्र द्वारा संस्कार किया जाता है, जिसमें जिन प्रतिमा के पास चक्र, छत्र, और अग्नि स्थापित की जाती हैं।
श्लोक 72 से 81 गर्भाधान और प्रीति-सुप्रीति क्रियाएं ( गर्भान्वय तिरेपन क्रियाएं 1 से 3)
अर्हंत भगवान, गणधरदेवों, और केवलियों के निर्वाण के समय प्रयुक्त तीन पवित्र अग्नियों को सिद्ध प्रतिमा की वेदी के समीप स्थापित करना चाहिए। गर्भाधान क्रिया में अर्हंत की पूजा के बाद शेष पवित्र द्रव्यों से मंत्रपूर्वक इन अग्नियों में आहुति देनी चाहिए, जिनके मंत्र सात प्रकार के हैं। श्रावकों को व्यामोह छोड़कर इन मंत्रों का उपयोग करना चाहिए। गर्भाधान के बाद संतान हेतु बिना विषयानुराग के समागम करना चाहिए। तीसरे माह में प्रीति क्रिया होती है, जिसमें मंत्रपूर्वक जिन पूजा, तोरण बंधन, और दो पूर्ण कलश स्थापित किए जाते हैं। गृहस्थ प्रतिदिन घंटा-नगाड़े बजवाएं। पांचवें माह में सुप्रीति क्रिया होती है, जिसमें अग्नि और देवता की साक्षी में समस्त विधियां की जाती हैं।
श्लोक 82 से 91 धृति, मोद, प्रियोद्भव, और नामकर्म क्रियाएं ( गर्भान्वय तिरेपन क्रियाएं 4 से 8)
सातवें माह में धृति क्रिया की जाती है, जिसमें गर्भवृद्धि के लिए उत्तम गृहस्थ पिछले विधियों के अनुसार कार्य करते हैं। नौवें माह में मोद क्रिया होती है, जिसमें गर्भिणी के शरीर पर मंत्रपूर्वक बीजाक्षर लिखे जाते हैं, मंगलमय आभूषण और रक्षासूत्र बांधे जाते हैं। प्रसूति के बाद प्रियोद्भव (जातकर्म) क्रिया होती है, जिसमें जिनेंद्र स्मरण के साथ विधियां की जाती हैं। जन्म के बारहवें दिन नामकर्म क्रिया में अर्हंत और ऋषियों की पूजा, द्विजों का सत्कार, और वंशवृद्धि के लिए शुभ नाम रखा जाता है। घटपत्र विधि से जिनेंद्र के 1008 नामों में से एक नाम चुना जाता है। इसके बाद बहिर्यान क्रिया में शुभ दिन तुरही आदि के साथ बालक को प्रसूतिगृह से बाहर लाया जाता है।
श्लोक 92 से 101 निषद्या, अन्नप्राशन, व्युष्टि, और केशवाप क्रियाएं ( गर्भान्वय तिरेपन क्रियाएं 9 से 12)
निषद्या क्रिया में बालक को मंगल द्रव्यों के साथ उत्तम आसन पर बैठाया जाता है और सिद्ध भगवान की पूजा की जाती है। सात-आठ माह बाद अन्नप्राशन क्रिया में अर्हंत पूजा के बाद बालक को अन्न खिलाया जाता है। एक वर्ष पूर्ण होने पर व्युष्टि (वर्षवर्धन) क्रिया में दान, जिन पूजा, और भोजन कराया जाता है। केशवाप (चौल) क्रिया में शुभ दिन देव-गुरु पूजा के साथ बालक का मुंडन किया जाता है। बालों को गंधोदक से गीला कर अक्षत रखे जाते हैं, स्नान करवाकर आभूषण पहनाए जाते हैं, और मुनियों को नमस्कार करवाया जाता है।
श्लोक 102 से 111 लिपिसंख्यान और उपनीति क्रियाएं ( गर्भान्वय तिरेपन क्रियाएं 13 से 14)
पांचवें वर्ष में लिपिसंख्यान क्रिया में बालक को अक्षरों का दर्शन कराया जाता है और व्रती गृहस्थ को अध्यापक नियुक्त किया जाता है। आठवें वर्ष में उपनीति (यज्ञोपवीत) क्रिया में केश मुंडन, व्रतबंधन, और मौंजीबंधन होता है। जिनालय में अर्हंत पूजा के बाद बालक को मूंज की रस्सी बांधी जाती है। सफेद धोती, दुपट्टा, और यज्ञोपवीत धारण करने वाला बालक ब्रह्मचारी कहलाता है। उसे भिक्षावृत्ति से निर्वाह करना चाहिए, और प्राप्त भिक्षा का अग्रभाग अर्हंत को समर्पित कर शेष भोजन करना चाहिए।
श्लोक 112 से 121 व्रतचर्या और व्रतावतरण क्रियाएं ( गर्भान्वय तिरेपन क्रियाएं 15 से 16)
व्रतचर्या क्रिया में ब्रह्मचारी बालक मूंज की रस्सी (कमर), सफेद धोती (जांघ), यज्ञोपवीत (वक्षःस्थल), और शुद्ध मुंडन (शिर) धारण करता है। ये चिह्न रत्नत्रय और अहिंसा आदि व्रतों की विशुद्धि के प्रतीक हैं। उसे दातौन, पान, अंजन, और हल्दी आदि से स्नान नहीं करना चाहिए, केवल जल से शुद्ध स्नान करना चाहिए। वह खाट पर नहीं सोता और अकेले पृथ्वी पर सोता है। विद्या पूर्ण होने तक यह व्रत धारण करता है, फिर श्रावकाचार और अध्यात्मशास्त्र पढ़ता है। व्याकरण, न्याय, ज्योतिष आदि का अध्ययन भी करता है। व्रतावतरण क्रिया में वह विशेष व्रत छोड़कर सामान्य व्रत पालता है।
श्लोक 122 से 131 व्रतावतरण और विवाह क्रियाएं ( गर्भान्वय तिरेपन क्रियाएं 16 से 17)
व्रतावतरण क्रिया 12-16 वर्ष बाद गुरु की साक्षी में जिन पूजा के साथ होती है। द्विजों का सत्कार कर वस्त्र, आभूषण ग्रहण किए जाते हैं। क्षत्रिय शस्त्र धारण कर सकता है। ब्रह्मव्रत का त्याग होता है, पर काम त्याग बना रहता है। विवाह क्रिया में उत्तम कुल की कन्या से गुरु की आज्ञा से विवाह होता है। सिद्ध भगवान और तीन अग्नियों की पूजा के बाद विवाहोत्सव होता है। वधू-वर अग्नि की प्रदक्षिणा देकर बैठते हैं और सात दिन तक ब्रह्मचर्य पालते हैं।
श्लोक 132 से 141 विवाह और वर्णलाभ क्रियाएं ( गर्भान्वय तिरेपन क्रियाएं 17 से 18)
विवाह के बाद वर-वधू तीर्थ विहार कर घर में प्रवेश करते हैं और ऋतुकाल में संतान हेतु काम-सेवन करते हैं। वर्णलाभ क्रिया में विवाहित पुरुष को स्वतंत्र आजीविका के लिए पिता धन-धान्य और मकान देता है। सिद्ध प्रतिमा पूजन और श्रावकों की साक्षी में पिता पुत्र को धर्म और यश अर्जन की प्रेरणा देता है। पुत्र गृहस्थधर्म का पालन करता है।
श्लोक 142 से 151 कुलचर्या, गृहीशिता, और प्रशान्ति-गृहत्याग क्रियाएं ( गर्भान्वय तिरेपन क्रियाएं 19 से 21)
कुलचर्या क्रिया में गृहस्थ निर्दोष आजीविका और देवपूजा आदि छह कार्य करता है, जो उसका कुलधर्म है। गृहीशिता क्रिया में वह धर्म में दृढ़ होकर गृहस्थों का स्वामी बनता है। शुभ वृत्ति, शास्त्रज्ञान, और चारित्र से वह उन्नत होता है और वर्णोत्तम, महीदेव आदि नामों से सम्मानित होता है। प्रशान्ति क्रिया में वह पुत्र को गृहस्थी का भार सौंपकर विषयासक्ति त्यागता है, स्वाध्याय और उपवास करता है। गृहत्याग क्रिया में वह सिद्ध भगवान की पूजा कर, इष्टजनों की साक्षी में पुत्र को सब कुछ सौंपकर गृहत्याग करता है।
श्लोक 152 से 161 गृहत्याग और दीक्षाद्य-जिनरूपता क्रिया
गृहत्याग क्रिया में गृहस्थ ज्येष्ठ पुत्र को बुलाकर उसे कुलधर्म पालन का उपदेश देता है। वह धन के तीन भाग करता है: एक धर्मकार्य, एक घर खर्च, और एक भाई-बहनों में बांटने के लिए। पुत्र को शास्त्र, सदाचार, और पूजा के माध्यम से कुलधर्म निभाने का निर्देश देता है। इसके बाद वह निराकुल होकर दीक्षा के लिए घर छोड़ता है। दीक्षाद्य क्रिया में सम्यग्दृष्टि गृहस्थ एक वस्त्र धारण कर दीक्षा की तैयारी करता है। जिनरूपता क्रिया में वह परिग्रह त्यागकर दिगंबर रूप धारण करता है, जो धीर-वीर पुरुषों के लिए उपयुक्त है। यह क्रिया अहिंसा और संयम की ओर ले जाती है।
श्लोक 162 से 171 मौनाध्ययनवृत्तत्व और तीर्थकृद्भावना क्रिया
मौनाध्ययनवृत्तत्व क्रिया में दीक्षा के बाद साधु मौन धारण कर शास्त्रों का गहन अध्ययन करता है। विनययुक्त और शुद्ध मन-वचन-काय वाला साधु गुरु के मार्गदर्शन में शास्त्र पढ़ता है, जो इस लोक में योग्यता और परलोक में प्रसन्नता देता है। तीर्थकृद्भावना क्रिया में साधु तीर्थंकरों के गुणों का चिंतन करता है और उनके तीर्थ की रक्षा व प्रचार करता है। सोलह भावनाएं, जैसे सम्यग्दर्शन की विशुद्धि, इस क्रिया के लक्षण हैं। यह क्रिया उसे आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाती है।
श्लोक 172 से 181 गुरुस्थानाभ्युपगम और गणोपग्रहण क्रिया
गुरुस्थानाभ्युपगम क्रिया में साधु, जिसने समस्त विद्याएं सीख ली हैं और अंतःकरण को वश किया है, गुरु की अनुमति से उनका स्थान ग्रहण करता है। वह विनयवान और धर्मात्मा होकर शिष्यों को धर्मोपदेश देता है। गणोपग्रहण क्रिया में आचार्य मुनि, आर्यिका, श्रावक-श्राविकाओं का गण बनाकर उनका पोषण करता है। वह शास्त्र अध्ययन की इच्छा वालों को दीक्षा देता है, सदाचारियों को प्रेरित करता है, और दुराचारियों को दूर रखता है। यह क्रिया संघ की रक्षा और धर्म प्रचार पर केंद्रित है।
श्लोक 182 से 191 स्वगुरुस्थानसंक्रान्ति और निःसंगत्वात्मभावना-योगनिर्वाणसंप्राप्ति क्रिया
स्वगुरुस्थानसंक्रान्ति क्रिया में आचार्य योग्य शिष्य को अपना स्थान सौंपता है। शिष्य गुरु के आचरणों का पालन कर संघ का पोषण करता है। निःसंगत्वात्मभावना क्रिया में साधु अकेले विहार करता है, परिग्रह से मुक्त होकर आत्मा की शुद्धि पर ध्यान देता है। योगनिर्वाणसंप्राप्ति क्रिया में वह सल्लेखना धारण करता है, राग-द्वेष त्यागकर शरीर को कृश करता है, और मोक्ष के लिए भावना करता है। वह एकत्व और अन्यत्व भावनाओं का चिंतन कर कल्याण की प्राप्ति हेतु प्रयास करता है।
श्लोक 192 से 201 योगनिर्वाण साधन और इन्द्रोपपाद-इन्द्राभिषेक-विधिदान-सुखोदय क्रिया
योगनिर्वाण साधन क्रिया में साधु समाधि द्वारा मन, वचन, काय को स्थिर कर पंचपरमेष्ठियों के चरणों में चित्त लगाता है। यह क्रिया उसे निर्वाण की ओर ले जाती है। इन्द्रोपपाद क्रिया में पुण्य के बल से साधु इंद्र के रूप में जन्म लेता है। इन्द्राभिषेक क्रिया में देवता उसका अभिषेक करते हैं, और वह देदीप्यमान मुकुट व आभूषणों से सुशोभित होकर जयजयकार प्राप्त करता है। विधिदान क्रिया में वह देवों को उनके पदों पर नियुक्त करता है, और सुखोदय क्रिया में वह स्वर्ग के सुखों का अनुभव करता है।
श्लोक 202 से 211 इन्द्रत्याग क्रिया
इन्द्रत्याग क्रिया में इंद्र, आयु समाप्ति के निकट स्वर्ग के भोगों का त्याग करता है। वह देवों को उपदेश देता है कि उसने उन्हें पिता, पुत्र, मित्र, और सेवक के रूप में पाला और सम्मानित किया। अब वह स्वर्ग का साम्राज्य छोड़कर अगले इंद्र के लिए सौंपता है। वह उदासीनता के साथ धीर-वीर बुद्धि से यह त्याग करता है, जिससे वह दुखी नहीं होता। यह क्रिया स्वर्ग के ऐश्वर्य को बिना कष्ट छोड़ने की महिमा दर्शाती है।
श्लोक 212 से 223 इन्द्रावतार और हिरण्योत्कृष्टजन्मता क्रिया
इन्द्रावतार क्रिया में इंद्र अर्हंत पूजन कर मनुष्य जन्म लेने की इच्छा करता है ताकि शीघ्र मोक्ष प्राप्त कर सके। शुभ स्वप्नों के माध्यम से वह स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतार लेता है। हिरण्योत्कृष्टजन्मता क्रिया में वह महादेवी के गर्भ में रत्नमय गर्भागार में जन्म लेता है। कुबेर द्वारा रत्नवर्षा, मंद वायु, दुंदुभि वाज, और कल्पवृक्ष की मालाओं के साथ श्री, बुद्धि, धृति आदि देवियां उसकी सेवा करती हैं। वह पवित्र राजमंदिर में हिरण्यगर्भ भगवान के रूप में जन्म लेता है, जो पुण्य का निवास है।
श्लोक 224 से 231 हिरण्योत्कृष्ट जन्मता और मन्दराभिषेक-गुरुपूजन-यौवराज्य क्रिया
हिरण्योत्कृष्ट जन्मता क्रिया में भगवान गर्भ में रहते हुए तीन ज्ञान धारण करते हैं और सुवर्ण वर्षा से जन्म की उत्कृष्टता प्रकट करते हैं। उनकी माता विश्वेश्वरी, महादेवी आदि नामों से जानी जाती है, और श्री, बुद्धि, धृति आदि छह देवियां उनकी सेवा करती हैं। मन्दराभिषेक क्रिया में जन्म के बाद इंद्र मेरु पर्वत पर क्षीरसागर के जल से भगवान का अभिषेक करते हैं। गुरुपूजन क्रिया में भगवान बिना शिष्य भाव के गुरु बनते हैं, और इंद्र उनकी पूजा करते हैं। यौवराज्य क्रिया में कुमारकाल में भगवान को युवराज पद प्राप्त होता है, और उनका राज्यपट्ट बंधन व अभिषेक होता है।
श्लोक 232 से 240 स्वराज्य, चक्रलाभ, और दिग्विजय क्रिया
स्वराज्य क्रिया में भगवान सम्राट बनते हैं और समुद्र पर्यंत पृथ्वी का शासन करते हैं। चक्रलाभ क्रिया में उन्हें निधियां और चक्ररत्न प्राप्त होता है, और प्रजा उनका अभिषेक सहित पूजन करती है। दिग्विजय क्रिया में भगवान चक्ररत्न को आगे रखकर समस्त पृथ्वी को जीतते हैं। यह क्रिया दिशाओं को जीतने के उनके प्रयास को दर्शाती है।
श्लोक 241 से 251 चक्राभिषेक क्रिया
चक्राभिषेक क्रिया में दिग्विजय के बाद भगवान अपने वैभवशाली राजभवन में प्रवेश करते हैं। आनंदमंडप में विराजमान होकर वे चमरों से सुशोभित सुमेरु पर्वत जैसे प्रतीत होते हैं। निधियों और रत्नों की पूजा कर वे किमिच्छक दान देते हैं और राजाओं का सम्मान करते हैं। चार मुख्य राजा उनके मस्तक पर मुकुट रखते हैं। भगवान रत्नों, कुंडलों, हार, यज्ञोपवीत, और करधनी से सुशोभित होकर लक्ष्मी के पुंज जैसे दिखते हैं। अन्य राजा उनकी स्तुति करते हैं, और नगरवासी उनके चरणों का अभिषेक कर चरणोदक धारण करते हैं।
श्लोक 252 से 261 साम्राज्य क्रिया
साम्राज्य क्रिया में भगवान प्रातःकाल राजसिंहासन पर विराजमान होते हैं, चमर ढुलाए जाते हैं, और वे धृति, शांति आदि गुणों से युक्त होकर प्रजा का उपकार करते हैं। वे राजाओं को न्यायपूर्वक प्रजा पालन, दुष्टों का निग्रह, और शिष्टों के संरक्षण की शिक्षा देते हैं। दिव्य अस्त्रों की आराधना से युद्ध में विजय प्राप्त होती है। यह धर्मविजयी राजा यश, वैभव, और परलोक में स्वर्ग प्राप्त करता है। इस क्रिया से वह दोनों लोकों में समृद्धि पाता है।
श्लोक 262 से 271 निष्क्रान्ति क्रिया
निष्क्रान्ति क्रिया में भगवान भेदविज्ञान प्राप्त कर दीक्षा के लिए उद्यत होते हैं। लौकांतिक देव उन्हें प्रबोधित करते हैं। वे पुत्र को राज्य सौंपकर प्रजा पालन की शिक्षा देते हैं कि न्याय ही धन है, और प्रजा कामधेनु के समान मनोरथ पूर्ण करती है। राजा को धन संग्रह, वृद्धि, रक्षा, और दान करना चाहिए। बुद्धि की रक्षा, कुलमर्यादा का पालन, और आत्मरक्षा अनिवार्य है।
श्लोक 272 से 281 निष्क्रान्ति क्रिया (जारी)
निष्क्रान्ति क्रिया में भगवान पुत्र को बुद्धि, कुलमर्यादा, और आत्मरक्षा की शिक्षा देते हैं। राजा को पक्षपातरहित होकर प्रजा को समान दृष्टि से देखना चाहिए। क्रूरता, कठोर वचन, और दंड की कठिनता से बचना चाहिए। काम, क्रोध आदि छह शत्रुओं को जीतकर राजा दोनों लोकों में समृद्धि पाता है। यह क्षात्रधर्म यश, धर्म, और विजय देता है।
श्लोक 282 से 293 निष्क्रान्ति क्रिया (पूर्ण)
भगवान पुत्र को क्षात्रधर्म की शिक्षा देकर दीक्षा के लिए प्रस्थान करते हैं। महादान देकर साम्राज्य छोड़कर वे वन की ओर जाते हैं। राजा और देव उन्हें पालकी पर ले जाते हैं, जो सूर्य के विमान जैसी है। आकाश मार्ग में सुर-असुर, सेना, और निधि-रत्न उनके पीछे चलते हैं। देवों के तुरही-नृत्य और किन्नरी गीतों के बीच भगवान पवित्र आश्रम में शिलातल पर दीक्षा लेते हैं। इंद्र उनकी पूजा करते हैं।
श्लोक 294 से 303 योगसंमह और आर्हन्त्य क्रिया
योगसंमह क्रिया में भगवान बाह्य-अभ्यंतर परिग्रह त्यागकर जिनकल्प तप धारण करते हैं। क्षपक श्रेणी पर चढ़कर शुक्लध्यान से घातिया कर्म जलाते हैं, और केवलज्ञान की ज्योति प्रकट होती है। यह क्रिया ज्ञान-ध्यान के संयोग से तेज उत्पन्न करती है। आर्हन्त्य क्रिया में इंद्र उनकी पूजा करते हैं, और आठ प्रातिहार्य, बारह सभाएं, स्तूप आदि अद्भुत विभूतियां प्रकट होती हैं।
श्लोक 304 से 313 विहार, योगत्याग, और अग्रनिवृति क्रिया ( तिरेपन क्रियाएं 51 से 53)
विहार क्रिया में भगवान धर्मचक्र के साथ तीर्थ विहार करते हैं। योगत्याग क्रिया में विहार समाप्त कर वे समवसरण विघटित करते हैं और योगनिरोध करते हैं। केबलि-समुद्घात इस क्रिया में शामिल है। अग्रनिवृति क्रिया में समस्त योगों का निरोध कर भगवान अघातिया कर्म नष्ट करते हैं और मोक्षस्थान पर पहुंचते हैं। ये तिरेपन क्रियाएं भव्य पुरुषों को पालनी चाहिए। भरत महाराज ने द्विजों को इन गर्भान्वय और दीक्षान्वय क्रियाओं में स्थापित किया। इनका पालन करने वाला भव्य पुरुष मोक्ष प्राप्त करता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 38- Shlok 1 to 11
श्लोक ( Shlok ) 1
जयन्त्यखिल’ वाङ्मार्गगामिन्यः सूक्तयोऽर्हताम्। धूतान्धतमसा दीप्रा यास्त्विषोंऽशुमतामिव ॥१॥
जो समस्त भाषाओंमें परिणत होनेवाली है, जिसने अज्ञानरूपी गाढ अन्धकारको नष्ट कर दिया है और जो सूर्यकी किरणोंके समान देदीप्यमान है वह अरहन्त भगवान्की सुन्दर वाणी सदा जयवन्त हो ।।१।।
Victorious ever be the radiant speech of the Blessed Arhat—which shines like the sun’s resplendent rays,which has dispelled the dense darkness of ignorance,and which flows forth, capable of transforming into all tongues.1
श्लोक ( Shlok ) 2
स जीयात् वृषभो मोहविषसुप्तमिदं जवात् । पटविद्येव यद्विद्या सद्यः समुदतिष्ठपत् ॥२॥
गारुड़ी विद्याके समान जिनकी विद्याने मोहरूपी विषसे सोये हुए इस समस्त संसारको बहुत शीघ्र जगा दिया वे भगवान् वृषभदेव सदा जयवन्त रहें ।॥२॥
Eternally victorious be Lord Ṛṣabhadeva,whose sacred knowledge, like the divine incantation of Garuḍa,swiftly awakened this slumbering world—lulled into stupor by the venom of delusion.2
श्लोक ( Shlok ) 3
तं नत्वा परमं ज्योतिर्वृषभं वीरमन्वतः । द्विजन्मनामथोत्पतिं वक्ष्ये श्रेणिक भोः शृणु ॥३॥
गौतमस्वामी राजा श्रेणिक से कहते हैं कि हे श्रेणिक, में उन परमज्योति-स्वरूप भगवान् वृषभदेव तथा भगवान् महावीर स्वामी को नमस्कार कर अब यहांसे द्विजोंकी उत्पत्ति कहता हूं सो सुनो ॥ ३॥
Gautama Svāmī said unto King Śreṇika:“O Śreṇika, bowing in reverence to the supreme effulgence—Lord Ṛṣabhadeva and Lord Mahāvīra—I shall now recount the sacred origin of the twice-born; hearken with devotion.”3
श्लोक ( Shlok ) 4
भरतो भारतं वर्ष निर्जित्य सह पार्थिवै । षष्ट्या वर्षसहस्त्रैस्तु दिशां निववृते जयात् ॥४॥
भरत चक्रवर्ती अनेक राजाओंके साथ भारतवर्षको जीतकर साठ हजार वर्षमें दिग्विजयसे वापिस लौटे ॥४।।
Having conquered the vast expanse of Bhāratavarṣa,alongside a multitude of mighty kings,the illustrious Emperor Bharata returned from his world-victory after sixty thousand years of triumphant conquest.4
श्लोक ( Shlok ) 5
कृतकृत्यस्य तस्यान्तश्चिन्तेयमुदपद्यत । परार्थे सम्पदास्माकी सोपयोगा कथं भवेत् ॥५॥
जब वे सब कार्य कर चुके तब उनके चित्तमें यह चिन्ता उत्पन्न हुई कि दूसरेके उपकारमें मेरी इस संपदाका उपयोग किस प्रकार हो सकता है ? ।।५।।
When all his sovereign duties had been fulfilled,there arose within his heart a noble reflection:“How might this vast wealth of mine be employed for the welfare of others?”5
श्लोक ( Shlok ) 6
महामहमहं कृत्वा जिनेन्द्रस्य महोदयम् । प्रीणयामि जगद्विश्वं विष्वग् “विश्राणयन् धनम् ॥६॥
मैं श्री जिनेन्द्रदेवका बड़े ऐश्वर्यके साथ महामह नामका यज्ञ कर धन वितरण करता हुआ समस्त संसारको संतुष्ट करूं ? ।।६।।
“May I, with great splendor, perform the grand Mahāmaha sacrifice in honor of the venerable Lord Jina,distributing wealth in abundance—and thus bring contentment to the entire world.”6
श्लोक ( Shlok ) 7
नानगारा वसून्यस्मत् प्रतिगृह्णन्ति निःस्पृहाः । सागारः कतमः पूज्यो धनधान्यसमृद्धिभिः ॥७৷৷
सदा निःस्पृह रहनेवाले मुनि तो हम लोगोंसे धन लेते नहीं हैं परन्तु ऐसा गृहस्थ भी कौन है जो धन-धान्य आदि सम्पत्तिके द्वारा पूजा करनेके योग्य है ।।७।।
The ever-dispassionate sages accept no riches from us—yet where is that householder who, through wealth and grain and earthly treasure,is truly worthy of worship?7
श्लोक ( Shlok ) 8
‘येऽणुव्रतधरा धीरा धौरेया गृहमेधिनाम् । तर्पणीया हि तेऽस्माभिरीप्सितैर्वसुवाहनै ।॥८॥
जो अणु व्रतको धारण करनेवाले हैं, धीर वीर हैं और गृहस्थोंमें मुख्य हैं ऐसे पुरुष ही हम लोगोंके द्वारा इच्छित धन तथा सवारी आदिक वाहनोंके द्वारा तर्पण करने के योग्य हैं ।।८।।
They who uphold the Aṇu-vratas, steadfast and valiant of spirit,foremost among householders—such noble men alone are worthy to receive our offerings:of wealth desired, of conveyances and steeds,and all manner of princely gifts.8
श्लोक ( Shlok ) 9
इति निश्चित्य राजेन्द्रः सत्कर्तुमुचितानिमान् । ‘परीचिक्षिषुराह्वास्त तदा सर्वान् महीभुजः ॥९॥
इस प्रकार निश्चय कर सत्कार करनेके योग्य व्यक्तियोंकी परीक्षा करनेकी इच्छासे राजराजेश्वर भरतने उस समय समस्त राजाओंको बुलाया ।।९।।
Thus resolved, and desiring to discern those truly worthy of honor and reverence, the sovereign of sovereigns, Emperor Bharata,summoned in that very hour all the kings of the realm.9
श्लोक ( Shlok ) 10
सदाचारैर्निजैरिष्टै रनुजीविभिरन्विताः । अद्यास्मदुत्सवे यूयमा यातेति पृथक् पृथक् ॥१०॥
और सबके पास खबर भेज दी कि आप लोग अपने अपने सदाचारी इष्ट मित्र तथा नौकर चाकर आदिके साथ आज हमारे उत्सव में अलग अलग आवें ।।१०।।
And to each he sent a royal summons, proclaiming:“Let each of you, with your virtuous kinsmen, trusted friends,and loyal attendants,grace our great festival this day—each in his own distinguished retinue.”10
श्लोक ( Shlok ) 11
हरितैरङ्कुरैः पुष्पैः फलैश्चाकीर्णमङ्गणम् । संम्राडचीकरत्तेषां परीक्षायै स्ववेश्मनि ॥११॥
इधर चक्रवर्तीने उन सबकी परीक्षा करनेके लिये अपने घरके आंगनमें हरे हरे अंकुर, पुष्प और फल खूब भरवा दिये ।।११।।
Meanwhile, the Chakravartin, to test their worthiness,had his courtyard adorned with lush green sprouts,and abundantly filled with blossoms and ripe fruits. 11
श्लोक 12 से 21
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201 | श्लोक 202 से 205
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