आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213
श्लोक 214 से 221 वसंत ऋतु का आगमन
राजा अकम्पन स्वयंवर भवन देखकर संतुष्ट हुए। वसंत ऋतु का प्रारंभ हुआ, जिसमें मलयानिल चंदन, इलायची और लवंग की सुगंध लिए बह रहा था। लताएँ और वृक्ष शाखाएँ मलयानिल का आलिंगन करती थीं। सूर्य उत्तरायण में था, और कोयलें मधुर स्वर कर रही थीं। चंपा, अशक, चमेली और मौलश्री के वृक्ष फूलों से लदे थे, जो भक्तों और भमरों को आकर्षित करते थे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 43- Shlok 214 to 221
श्लोक ( Shlok ) 214
तं निरीक्ष्य क्षितेर्भर्त्ता लक्ष्मीलीलागृहायितम् । नासीत् स्वाङ्गे” स सन्तोषात् सन्मित्रात् किन्न जायते ।।
लक्ष्मीके लीलागृहके समान उस स्वयंवर भवनको देखकर राजा अकंपन संतोषसे अपने शरीरमें नहीं समा रहे थे सो ठीक ही है व्योंकि उत्तम मित्रोंसे क्या नहीं होता है ? अर्थात् सभी कुछ होता है ।।२१४।।
Beholding that svayamvara hall—radiant like the playful mansion of Goddess Lakṣmī—King Akampana was overwhelmed with such joy that he could scarcely contain himself within the bounds of his own body. And rightly so, for what may not be accomplished through the aid of noble friends? Indeed, with true companions, all things become possible. ॥214॥
श्लोक ( Shlok ) 215
अथ प्रादुरभूत् कालः “सुरभिर्मत्तमन्मथः । मुदं मवं च सञ्चिन्वन् कामिषु भ्रमरेषु च ॥ २१५॥
अथानन्तर-कामको उन्मत्त करनेवाले तथा कामी लोगों और भ्रमरोंसें क्रमशः आनन्द और मदको बढ़ानेवाले वसन्तऋतुका प्रारम्भ हुआ ।।२१५।।
Thereafter began the season of spring—enchanted harbinger of love—stirring madness in the hearts of the passionate, and intensifying delight and intoxication alike in lovers and bees, each in their turn. ॥215॥
श्लोक ( Shlok ) 216
ववौ भन्दं गजोद् घृष्टचन्दनद्रवसारभृत् । एलालवङ्गसंसर्ग पङ्गुलो मलयानिलः ॥२१६॥
हाथियोंके द्वारा घिसे हुए चन्दन-वृक्षोंके निष्यन्दरूपी सारको धारण करनेवाला तथा इलायची और लवंगके संसर्गसे कुछ कुछ पीला हुआ मलयपर्वतका वायु धीरे धीरे बहने लगा ॥ २१६।॥
The gentle breeze from Mount Malaya began to blow softly—laden with the essence of sandalwood trees, whose trunks had been rubbed smooth by elephants, and tinged faintly with a golden hue by the mingling scent of cardamom and clove. ॥216॥
श्लोक ( Shlok ) 217
मलयानिलमाश्लेष्टुं सम्बन्धिनमुपागतम् । लताद्रुमाः सुशाखानां ‘प्रसारणभिवादधुः ।:२१७॥
उस समय लताओं और वृक्षों-की जो शाखाएं फैल रही थीं उनसे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो समीप आये हुए अपने सम्बन्धी मलयानिलका आलिंगन करनेके लिये ही भुजारूप शाखाएं फैला रहे हों ॥ २१७॥
At that time, the vines and trees, with their outstretched branches and tendrils, seemed as though they were extending arms in loving embrace—eager to welcome the approaching breeze of Malaya, their near and dear companion. ॥217॥
श्लोक ( Shlok ) 218
यमसम्बन्धिदिक्त्यागं रविर्भीत इवाकरोत् । मदेन कोकिलाः काले कूजन्ति स्म निरङ्कुशम् ॥२१८।।
उस समय सूर्यने मानो डरकर ही यम सम्बन्धी दक्षिण दिशाका त्याग कर दिया था अर्थात् उत्तरायण हो गया था और कोयलें मदसे निरंकुश होकर मधुर शब्द कर रही थीं ॥ २१८॥
At that time, the sun, as though in fear, forsook the southern quarter associated with Yama, and turned northward—ushering in Uttarāyaṇa. The cuckoos, intoxicated with the bliss of spring, sang forth in unrestrained sweetness. ॥218॥
श्लोक ( Shlok ) 219
पुष्पमार्तवमाप्ता नः शाखा न स्पृशतेति तान्। अलीन् वासं निषिध्यन्तश्चम्पकाञ्चलपल्लवैः ।। २१९ ॥
‘ये हमारी शाखाएं आर्तव अर्थात् वसन्त ऋतुमें उत्पन्न होनेवाले अथवा रजस्वला अवस्थामें प्रकट होने वाले पुष्पको प्राप्त हो रही हैं-धारण कर रही हैं इसलिये इन्हें मत छुओ’ यही कहते हुए मानो चंपाके वृक्ष अपने हिलते हुए पल्लवोंके द्वारा भ्रमरोंको वहांपर निवास करनेका निषेध कर रहे थे ।।२१९॥
“These are our branches, bearing blossoms born of Ārtava—of the springtide, or of the sacred feminine flow—touch them not!” As though uttering this warning, the champaka trees, with their trembling leaves, seemed to forbid the bees from dwelling upon them. ॥219॥
श्लोक ( Shlok ) 220
वसन्तश्रीवियोगो वा सशोकोऽशोकभूरुहः । सपुष्पपल्लवो नाम सार्धं तत्सङ्गमाद् व्यधात् ॥२२०॥
जो वसन्त ऋतुरूपी लक्ष्मीके वियोगमें सशोक था अर्थात् शोक धारण कर रहा था ऐसा अशोकका वृक्ष उस वसन्त ऋतुके सम्वन्धसे फूल और पल्लवोंसे सहित हो अपना अशोक नाम सार्थक कर रहा था ।। २२०॥
The Ashoka tree, which once bore sorrow in the absence of Spring—Lakṣmī’s own season—now, adorned with blossoms and tender shoots at the arrival of Spring, rendered its name Ashoka—”freed from sorrow”—most fitting and true. ॥220॥
श्लोक ( Shlok ) 221
मूलस्कन्धाग्रमध्येषु चूताद्यैरिव मत्सरात् । सुरभीणि प्रसूनानि सुरभिश्च तदा दधे ॥ २२१॥
उस समय चमेलीने आम आदि वृक्षोंके साथ ईर्ष्या होनेके कारण ही मानो जड़, स्कन्ध, मध्यभाग और ऊपर सभी जगह सुगन्धित फूल धारण किये थे ॥२२१।।
At that time, out of envy toward the mango and other trees, the jasmine seemed to have adorned itself with fragrant blossoms from root to trunk, from middle to crown—as though determined to surpass them in beauty and scent. ॥221॥
श्लोक 222 से 232
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213
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