आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111
श्लोक 112 से 121 : कृतमाल देव की सहायता और गुफा द्वार का उद्घाटन
कृतमाल देव ने भरत को सर्वत्र भ्रमण करने वाला और पर्वत का मर्मज्ञ बताया, फिर चौदह आभूषण भेंट किए। भरत ने हर्षित होकर सत्कार किया और देव को गुफा द्वार खोलने का उपाय बताने हेतु विदा किया। सेनापति को गुफा शांत होने तक पश्चिम खंड जीतने की आज्ञा दी गई। सेनापति दंडरत्न और अश्वरत्न के साथ गुफा की ओर बढ़ा, सिन्धु नदी की वेदी को पार कर विजयार्थ पर्वत की वेदिका पर पहुँचा।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 31 – Shlok 112 to 121
श्लोक ( Shlok ) 112
गर्भज्ञोऽहं गिरेरस्मीत्यत्यल्पमिदमुच्यते । द्वीपाब्धिवलये कृत्स्ने नास्माकं कोऽप्यगोचरः ॥११२॥
अथवा में ‘इस पर्वतका भीतरी हाल जाननेवाला हूँ’ यह बहुत ही थोड़ा कहा गया है क्योंकि समस्त द्वीप और समुद्रोंके भीतर ऐसा कोई भी प्रदेश नहीं है जो हम लोगोंका जाना हुआ न हो ।।११२।।
Or rather, to say merely that I know the inner reaches of this mountain is an understatement—for there exists no region within all the continents and oceans that we Vyantaras have not traversed and known.Verse 112
श्लोक ( Shlok ) 113
वटस्थान’ वटस्थांश्च कूटस्थान् कोटरोटजान्’ । “अक्षपाटान् क्षपाटांश्च विद्धि नः सार्व सर्वगान् ।। ११३।।
हे सार्व अर्थात् सबका हित करनेवाले, वटके वृक्षोंपर, छोटे छोटे गड्ढों में, पहाड़ोंकी शिखरोंपर, वृक्षोंकी खोलों और पत्तोंकी झोपड़ियों में रहनेवाले तथा दिन और रात्रिमें भ्रमण करनेवाले हम लोगोंको आप सब जगह जाने वाले समझिये ।।११३।।
O Sārva—Benefactor of all! Know us to be those who dwell upon banyan trees, within tiny hollows, atop mountain peaks, in the bark of trees and leaf-thatched huts—wanderers who roam both day and night, and who are familiar with every corner of creation.Verse 113
श्लोक ( Shlok ) 114
इति प्रशान्तभोजस्वि वचः सम्भाव्य सादरम् । सोऽमरो विततारास्मै भूषणानि चतुर्दश ॥११४॥
इस प्रकार आदर सहित शान्त और ओजपूर्ण वचन कहकर उस देवने भरतके लिये चौदह आभूषण दिये ॥११४।।
Thus, having spoken these calm yet powerful words with reverence, that divine being presented to Bharata fourteen radiant ornaments.Verse 114
श्लोक ( Shlok ) 115
तान्यनन्योपलभ्यानि प्राप्य चक्री परां मुदम् । भेजे तत्कृत सत्कारैः सुरः सोऽप्याप सम्मदम् ॥११५॥
जो किसी दूसरेको प्राप्त नहीं हो सकते थे ऐसे उन आभूषणोंको पाकर चक्रवर्ती परम हर्षको प्राप्त हुए और चक्रवर्तीके द्वारा किये हुए सत्कारोंसे वह देव भी अत्यन्त हर्षको प्राप्त हुआ ।।११५।।
Receiving those ornaments—unattainable by any other—the Emperor was filled with supreme delight; and in return, the divine being too was overcome with joy, gladdened by the gracious honors bestowed upon him by the Chakravartin.Verse 115
श्लोक ( Shlok ) 116
तं रूप्याद्रिगुहाद्वारप्रवेशोपायशंसिनम् । प्रविसर्ज्यं स्वसेनान्यं प्राहिणोत् प्रभुरग्रतः ।।११६।।
तदनंतर विजयार्ध पर्वतकी गुफा के द्वार से प्रवेश करनेका उपाय बतलाने वाले उस देवको भरत चक्रवर्ती ने बिदा किया और गुफाका द्वार खोलनेके लिये सबसे आगे अपना सेनापति भेजा ।११६।।
Thereafter, Emperor Bharata respectfully bade farewell to that divine being who had revealed the means of entering the cave of Mount Vijayārdha, and then sent forth his commander-in-chief at the forefront to open the gateway to the cavern.Verse 116
श्लोक ( Shlok ) 117
त्वमुद्धाट्य गुहाद्वारं यावन्निर्वाति” सा गुहा । तावत् पाश्चात्यखण्डस्य निर्जयाय कुरूद्यमम् ॥ ११७।।
चक्रवर्तीने सेनापतिसे कहा कि तुम गुफाका द्वार उघाड़कर जब तक गुफा शान्त हो तब तक पश्चिम खण्डको जीतनेका उद्योग करो ।। ११७।।
The Chakravartin said to his commander: “Unseal the entrance to the cave, and while its depths remain undisturbed, set forth with resolve to conquer the western realm.”Verse 117
श्लोक ( Shlok ) 118 –119
इति चक्रधरादेशं मूर्ध्वा माल्यमिवोद्वहन् । कृतमालामरोद्दिष्टकृत्स्नोपायप्रयोगवित् ।।११८।। कृती कतिपयैरेष तुरङ्गै सपरिच्छदैः । प्रतस्थे वाजिरत्नेन दण्डपाणिश्चमूपतिः ॥११९॥
इस प्रकार चक्रवर्तीकी आज्ञाको मालाके समान मस्तकपर धारण करता हुआ और कृतमाल देवके द्वारा बतलाये हुए समस्त उपायोंके प्रयोगको जाननेवाला वह चतुर सेनापति कुछ घोड़े और सैनिकों के साथ दंडरत्न हाथमें लेकर अश्वरत्नपर आरूढ़ होकर चला ।।११८-११९॥
Thus, bearing the Emperor’s command upon his head like a sacred garland, and well-versed in all the means revealed by Kṛtamāla, that wise commander set forth. With a few horsemen and soldiers by his side, the Staff Jewel in hand, and mounted upon the Steed Jewel, he advanced toward his charge.Verses 118–119
श्लोक ( Shlok ) 120
किंचिञ्चान्तरमुल्लंघ्य स सिन्धोर्वनवेदिकाम् । विगाह्य विजयार्द्धस्य संप्रापत् तटवेदिकान् ॥१२०॥
और कुछ थोड़ी दूर जाकर तथा सिन्धु नदीके बनकी वेदीको उल्लंघन कर विजयार्ध पर्वतके तटकी वेदी पर जा पहुंचा ।।१२० ।।
And having journeyed a short distance, crossing the wooded altar of the Sindhu River, he arrived at the sacred terrace upon the banks of Mount Vijayārdha.Verse 120
श्लोक ( Shlok ) 121
तत्सोपानेन रूप्याद्रेरारुह्य जगतीतलम् । प्रत्यङ्मुखो गुहोत्सङ्ग माससाद चमूपतिः ॥१२१॥
प्रथम ही वह सेनापति सीढियोंके द्वारा विजयार्ध पर्वतकी वेदिकापर चढ़ा और फिर पश्चिम की ओर मुहकर गुफाके आगे जा पहुंचा ॥१२१॥
First ascending the terrace of Mount Vijayārdha by way of the stone steps, the commander then turned westward and advanced to the mouth of the great cave.Verse 121
श्लोक 122 से 131
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 169
आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111