आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71
श्लोक 72 से 81 : म्लेच्छ राजाओं का समर्पण
जयकुमार की गर्जना से मेघमुख देव परास्त हुए, और देवों ने उसका जयजयकार किया। भरत ने जयकुमार को मुख्य शूरवीर नियुक्त किया। नागमुख देवों के भागने से चिलात और आवर्त भयभीत होकर भरत के चरणों में प्रणाम कर दासता स्वीकार की। भरत ने सिन्धुप्रपात पर सिन्धु देवी से अभिषेक प्राप्त किया, जो सुवर्ण कलशों से जल अर्पित कर उनकी सेवा की।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 32 – Shlok 72 to 81
श्लोक ( Shlok ) 72
कुरुराजस्तदा स्फूर्जत्पर्जन्य स्तनितोर्जितैः ।गर्जितैर्निर्जयन् मेघमुखान् ख्यातस्तदाज्ञया ॥७२॥
उस समय वह जयकुमार बिजली गिरानेके पहले भयंकर शब्द करते हुए बादलोंकी गर्जनाके समान अपनी तेज गर्जनाके द्वारा मेघमुख देवोंको जीतता हुआ मेघेश्वर नामसे प्रसिद्ध हुआ था ।।७२।।
“At that time, Jai-Kumara, with his fierce roars like thunderclouds rumbling before the lightning’s strike, vanquished the Meghamukha deities and thus became renowned by the name Megheshvara—Lord of the Clouds.” ॥72॥
श्लोक ( Shlok ) 73
तोषितैरवदानेन घोषितोऽस्य जयोऽमरैः । दन्ध्वनद् दुन्दुभिध्वानबधिरीकृतदिङ्मुखैः ॥७३॥
बार-बार बजते हुए दुन्दुभियों के शब्दोंसे जिन्होंने समस्त दिशाएँ बहिरी कर दी हैं ऐसे देवों ने इस जयकुमारके पराक्रमसे सन्तुष्ट होकर इसका जयजयकार किया था ।।७३।।
“The gods, pleased by the valor of Jai-Kumara, raised cries of victory, while the resounding beat of drums—reverberating again and again—rendered all the quarters deaf with their thunderous acclaim.” ॥73॥
श्लोक ( Shlok ) 74
ततो दृष्टापदानोऽयं तुष्टुवे चक्रिणा मुहुः । नियोजितश्च सत्कृत्य वोरो वीराग्रणीपदे ॥७४॥
तदनन्तर जिसका पराक्रम देख लिया गया है ऐसे इस जयकुमारकी चक्रवर्तीने भी बार-बार प्रशंसा की और उस वीरका सत्कार कर उन्होंने उसे मुख्य शूरवीरके पदपर नियुक्त किया ।।७४।।
“Thereafter, the Chakravartin himself, having witnessed the valor of Jai-Kumara, praised him repeatedly and, honoring the hero, appointed him to the esteemed rank of chief champion among warriors.” ॥74॥
श्लोक ( Shlok ) 75
इन्द्रजाल इवामुष्मिन् व्यतिक्रान्तेऽहिविप्लवे । प्रत्यापत्तिमगाद् भूयो बलमाविर्भवज्जयम् ॥७५॥
इन्द्र-जालके समान वह नागमुख देवोंका उपद्रव शान्त हो जानेपर जिसकी जीत प्रकट हो रही है ऐसी वह भरतकी सेना पुनः स्वस्थताको प्राप्त हो गई अर्थात् उपद्रव टल जानेपर सुखका अनुभव करने लगी ।॥७५॥
“When the tumult caused by the Nāgamukha deities, akin to the workings of an illusion, subsided, the victorious army of Bharata, now manifesting its triumph, regained its composure and once again experienced the bliss of peace.” ॥75॥
श्लोक ( Shlok ) 76
विध्वस्ते पन्नगानीके विबलौ म्लेच्छनायकौ । चक्रिणश्चरणावेत्य भयभ्रान्तौ प्रणेमतुः ॥७६।।
नागमुख देवोंकी सेनाके भाग जानेपर वे दोनों ही चिलात और आवर्त नामके म्लेच्छ राजा निर्बल हो गये और भयसे घबड़ाकर चक्रवर्तीके चरणोंके समीप आकर प्रणाम करने लगे ।॥७६॥
“Upon the retreat of the Nāgamukha deities, the two Mleccha kings, Chilāta and Āvarta, weakened and, filled with fear, hastened to the feet of the Chakravartin, bowing in reverence.” ॥76॥
श्लोक ( Shlok ) 77
धनं यशोधनं चास्मै कृतागः परिशोधनम्। दत्वा प्रसीद देवेति तौ भृत्यत्वमुपेयतुः ॥७७॥
उन्होंने अपराध क्षमा कराकर भरत के लिये बहुत सा धन तथा यशरूपी धन दिया और ‘हे देव, प्रसन्न होइए’ इस प्रकार कहकर उनकी दासता स्वीकार की ।।७७।।
“Having sought pardon for their transgressions, they offered abundant wealth and fame as tribute to Bharata, and, humbly saying, ‘O Lord, be pleased,’ they accepted their subjugation.” ॥77॥
श्लोक ( Shlok ) 78
निस्सपत्नां महीमेनां कुर्वन्नर्वाङ्निधीश्वरः। आ हिमाद्रितटाद् भूयः प्रयाणमकरोद् बलैः ॥७८॥
इस समस्त पृथिवीको शत्रुरहित करते हुए प्रथम निधिपति-चक्रवर्ती ने फिर अपनी सेनाके साथ साथ हिमवान् पर्वतके किनारे तक गमन किया ।॥७८॥
“After rendering this entire earth free from the threat of enemies, the foremost sovereign, the Chakravartin, once again journeyed with his forces, all the way to the foothills of the mighty Himalayas.” ॥78॥
श्लोक ( Shlok ) 79
सिन्धुरोधोभुवः क्षुन्दन् प्रयाणे जयसिन्धुरैः । सिन्धुप्रपात मासीदन् सिन्धुदेव्या न्यषेचि सः ॥७९॥
गमन करते समय अपने विजयी हाथियोंके द्वारा सिन्धु नदी के किनारेकी भूमिको खूंदते हुए भरतेश्वर जब सिन्धुप्रपात पर पहुँचे तब सिन्धु देवीने उनका अभिषेक किया ॥७९॥
“As he journeyed, Bharateshvara, with his victorious elephants, plowing through the lands along the banks of the Sindhu River, arrived at the Sindhu Falls, where the river goddess herself bestowed upon him her sacred anointing.” ॥79॥
श्लोक ( Shlok ) 80
ज्ञात्वा समागतं जिष्णु देवी स्वावासगोचरम् । उपेयाय समुद्धृत्य रत्नार्घ सपरिच्छदा ॥८०॥
वह देवी भरतको अपने निवास स्थानके समीप आया हुआ जानकर रत्नोंका अर्घ लेकर परिवारके साथ उनके पास आई थी ।।८०।।
“The goddess, knowing that Bharata had approached her abode, came to him with her family, bearing a sacred offering of jewels.” ॥80॥
श्लोक ( Shlok ) 81
पुण्यै सिन्धुजलैरेन हेमकुम्भशतोद्धृतैः । साभ्यषिञ्चत् स्वहस्तेन भद्रासननिवेशितम् ॥८१॥
और उसने अपने हाथसे सुवर्णके सैकड़ों कलशोंमें भरे हुए सिन्धु नदीके पवित्र जलसे भद्रासनपर बैठे हुए महाराज भरतका अभिषेक किया था ॥८१॥
“With her own hands, she anointed King Bharata, seated upon the sacred throne, using the holy waters of the Sindhu River, poured from hundreds of golden vessels.” ॥81॥
श्लोक 82 से 91
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 159
आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71
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