आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वतकी गुफाका द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
श्लोक 22 से 31: सेना के प्रभाव से वन का क्षोभ
सेना के शोर से वन के पशु, जैसे श्वेत हाथी, सिंह, भैंसा, और छोटे जीव, भयभीत होकर गुफाओं में छिप गए। हरिण, सूअर और अन्य प्राणी अपने स्थान छोड़कर भागे। सेना के शांत होने पर ही पशु धीरे-धीरे अपने स्थानों पर लौटे। इस प्रकार, भरत की सेना का प्रभाव वन के प्राणियों पर गहरा पड़ा, और प्रकृति भी उनके आगमन से प्रभावित हुई।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 31 – Shlok 22 to 31
श्लोक ( Shlok ) 22
अभूतपूर्वमुद्भूतप्रतिध्वानं बलध्वनिम् । श्रुत्वा ‘बलवदुत्त्रेसुस्तिर्यञ्चो वनगोचराः ॥२२॥
जो पहले कभी सुननेमें नहीं आया था और जिसकी प्रतिध्वनि उठ रही थी ऐसा सेनाका कलकल शब्द सुनकर वनमें रहनेवाले पशु बहुत ही भयभीत और दुःखी हो गये थे ॥२२॥
“At the tumultuous roar of the army—unheard of until then, and echoing through the heights—the forest-dwelling beasts were seized with terror and sorrow, their hearts shaken by the unfamiliar sound.”22
श्लोक ( Shlok ) 23
बलक्षोभादिभो निर्यन् बलक्षोऽभाद् वनान्तरात् । सुरेभः सुविभक्ताङ्गः सुरेभ इन वर्ष्मणा ॥२३॥
जो अपने शरीरकी अपेक्षा ऐरावत हाथीके समान था, जिसके समस्त अंगो-पाङ्गोंका विभाग ठीक ठीक हुआ था, और जो मधुर गर्जना कर रहा था ऐसा कोई सफेद रंगका हाथी सेनाके क्षोभसे वनके भीतरसे निकलता हुआ बहुत ही अच्छा सुशोभित हो रहा था ।।२३।।
“From within the forest emerged a white elephant—majestic as Airāvata, with every limb and feature perfectly proportioned, and uttering a deep, melodious roar. Stirred by the commotion of the army, it appeared most splendid and resplendent as it came forth.”23
श्लोक ( Shlok ) 24
प्रबोधजृम्भणादास्यं व्याददौ किल केसरी। न मेऽस्त्यंतर्भयं किञ्चित् पश्यतेऽतीव दर्शयन् ॥२४।।
मेरे मनमें कुछ भी भय नहीं है जिसकी इच्छा हो सो देख ले इस प्रकार दिखलाता हुआ ही मानो कोई सिंह जागकर जमुहाई लेता हुआ मुँह खोल रहा था ।। २४।।
“As though to declare, ‘I know no fear—let any who dare behold me,’ a lion awakened, yawning wide, opening its jaws in majestic defiance.”24
श्लोक ( Shlok ) 25
शरभो रभसादूर्ध्वमुत्पत्योत्तानितः पतन् । सुस्थ एव पदैः पृष्ठचैः रभूनिर्मातृकौशलात् ॥२५॥
अष्टापद बड़े वेगसे ऊपरकी ओर उछलकर ऊपरकी ओर मुँह करके नीचे पड़ गया था परन्तु बनानेवाले (नामकर्म) की चतुराईसे पीठपरके पैरोंसे ठीक ठीक आ खड़ा हुआ था उसे कोई चोट नहीं आई थी ॥२५॥
“The Aṣṭāpada, having leapt swiftly upward, fell back down with its face turned skyward—but by the skill of its maker, it landed perfectly upon its hind legs and stood firm, unscathed by the fall.”25
श्लोक ( Shlok ) 26
“विषाणोल्लिखित स्कन्धो रुषिताऽऽताम्रितेक्षणः । खुरोत्खातावनिः सैन्यैः ददृशे महिषो विभीः ॥२६॥
जो पत्थरसे अपने कन्धे घिस रहा है, जिसके नेत्र क्रोधित होनेसे कुछ कुछ लाल हो रहे हैं और जो खुरोंसे पृथिवी खोद रहा है ऐसा एक निर्भय भैंसा सेनाके लोगोंने देखा था ॥२६॥
“The soldiers beheld a fearless buffalo—rubbing its shoulders against stone, its eyes tinged red with the flush of anger, and its hooves furiously tearing into the earth.”26
श्लोक ( Shlok ) 27
चमृरवश्रवोद्भूत साध्वसाः क्षुद्रका मृगाः । विजयार्द्धगुहोत्सगान् युगक्षय इवाश्रयन् ॥२७॥
सेनाके शब्द सुननेसे जिनके भय उत्पन्न हो रहा है ऐसे छोटे छोटे पशु प्रलयकालके समान विजयार्ध पर्वतकी गुफाओंके मध्य भागका आश्रय ले रहे थे। भावार्थ-जिस प्रकार प्रलयकालके समय जीव विजयार्धकी गुफाओंमें जा छिपते हैं उसी प्रकार उस समय भी अनेक जीव सेनाके शब्दोंसे डरकर विजयार्थकी गुफाओंमें जा छिपे थे ॥ २७॥
“Terrified by the sound of the advancing army, the smaller creatures sought refuge deep within the caves of the Vijayārtha Mountain—just as beings in the time of cosmic dissolution flee to its hollows for shelter, so too did they now, as if the end of the world had come upon them.” 27
श्लोक ( Shlok ) 28
अनुद्रुता मृगाः शावैः पलायां चक्रिरेऽभितः । वित्रस्ता वेपमानाङ्गाः सिक्ताभयरसैरिव ॥२८॥
जिनके पीछे पीछे बच्चे दौड़ रहे हैं और जिनका शरीर कँप रहा है ऐसे डरे हुए हरिण चारों ओर भाग रहे थे तथा वे उस समय ऐसे मालूम होते थे मानों भयरूपी रससे सींचे ही गये हों ।॥२८॥
“Frightened deer, their bodies trembling and their fawns trailing behind in haste, scattered in all directions—appearing, in that moment, as though they had been drenched in the very essence of fear.”28
श्लोक ( Shlok ) 29
वराहारति मुक्त्वा वराहा मुक्तपल्वलाः । विनेषु र्विस्फुटद्यूथाः श्चमृक्षोभादितोऽमुतः ॥२९॥
सेनाके क्षोभसे जिन्होंने जलसे भरे हुए छोटे छोटे तालाब (तलैया) छोड़ दिये हैं और जिनके झुण्ड विश्वर गये हैं ऐसे सूअर अपने उत्तम आहारमें प्रेम छोड़कर इधर उधर घुस रहे थे ॥ २९॥
“Disturbed by the tumult of the army, the herds of swine abandoned their water-filled pools, their groups scattered and broken; forsaking even their cherished food, they darted anxiously here and there, seeking shelter.”29
श्लोक ( Shlok ) 30
वरणावरणास्तस्थुः करिणोऽन्ये भयद्रुताः । हरिणा हरिणा रातिगुहान्तानधिशिश्यिरे ॥३०॥
कितने ही अन्य हाथी भयसे भागकर वृक्षोंसे ढकी हुई जगहमें छिपकर जा खड़े हुए थे और हरिण सिहोंकी गुफाओं के भीतर ही जा ठहरे थे ।। ३० ।।
“Many other elephants, driven by fear, fled and sought refuge in the tree-covered sanctuaries, while the deer took shelter deep within the caves of the lions.”30
श्लोक ( Shlok ) 31
इति सत्त्वा वनस्येव प्राणाः प्रचलिता भृशम् । प्रत्यापत्ति’ चिरादीयु सैन्यक्षोभे प्रसेदुषि ॥३१॥
इस प्रकार वनके प्राणोंके समान अत्यन्त चंचल हुए प्राणी सेनाका क्षोभ शान्त होनेपर बहुत देरमें अपने अपने स्थानोंपर वापिस लौटे थे ।। ३१।।
“Thus, the creatures of the forest, once restless as the very breath of the wilderness, returned to their respective dwellings only after the tumult of the army had long since subsided.”31
श्लोक 32 से 41
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 169
आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वतकी गुफाका द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21