आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101
श्लोक 102 से 111 : गिरनार और पश्चिम के राजाओं की भेंट
भरत ने नेमिनाथ का स्मरण कर गिरनार की प्रदक्षिणा की। राजाओं ने रेशमी वस्त्र और सिल्क भेंट किए। भरत ने कुछ को सन्मान, कुछ को स्नेह और कुछ को प्रसन्न दृष्टि से अनुरक्त किया। राजाओं ने हाथी, घोड़े और रत्नों से उनकी पूजा की। तुरुष्क आदि देशों के वेगवान घोड़े और काम्बोज, सैन्धव जैसे कुलीन घोड़े भेंट किए गए। भरत को रत्नों के साथ यश की प्राप्ति हुई। सेनापति ने जल-स्थल मार्ग रोककर पहाड़ी राजाओं को जीता और देश, जंगल, नदियाँ, पर्वत पार कर भरत की आज्ञा स्थापित की।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 30 – Shlok 102 to 111
श्लोक ( Shlok ) 102
सुराष्ट्रेबूर्जयन्ताद्रिमद्रिराजमिवोच्छ्रितम् । ययौ प्रदक्षिणीकृत्य भावितीर्थमनुस्मरन् ॥१०२॥
भविष्यत् कालमें होनेवाले तीर्थ कर नेमिनाथका स्मरण करते हुए वे चक्रवर्ती सोरठ देशमें सुमेरु पर्वतके समान ऊंचे गिरनार पर्वतकी प्रदक्षिणा कर आगे बढ़े ।। १०२॥
Recalling the sacred pilgrimage that would unfold in the future at the shrine of Nemināth, the sovereign, Emperor Bharata, circled the lofty Girnār mountain—standing as high as Mount Sumeru itself—before continuing his journey.
श्लोक ( Shlok ) 103
क्षौमांशुकटुकूलैश्च चीनपट्टाम्बरैरपि । पटीभेदैश्च देशेशा ददृशुस्तमुपायनैः ॥१०३॥
उन उन देशोंके राजाओंने उत्तम उत्तम रेशमी वस्त्र, चायना सिल्क तथा और भी अनेक प्रकारके अच्छे अच्छे वस्त्र भेंट देकर महाराज भरत के दर्शन किये ।।१०३॥
The kings of those realms, presenting exquisite silken garments, fine Chinese silks, and a variety of other splendid attires, came forth to offer their homage to Maharaja Bharata.103
श्लोक ( Shlok ) 104
कांश्चित् सम्मानदानाभ्यां कांश्चिद्वि स्रम्भभाषितैः । प्रसन्नैर्वीक्षितैः कांश्चिद् भूपान्विभुररञ्जयत् ।।१०४।।
भरतने कितने ही राजाओंको सन्मान तथा दानसे, कितने ही राजाओं को विश्वास तथा स्नेहपूर्ण बातचीतसे और कितने ही राजाओंको प्रसन्नतापूर्ण दृष्टिसे अनुरक्त किया था ।।१०४।।
Emperor Bharata endeared himself to many kings through honor and generous gifts, to others through trust and affectionate conversation, and to still more by gazing upon them with eyes full of warmth and joy. 104
श्लोक ( Shlok ) 105
गजप्रवे कैर्जात्यश्वै रत्नैरपि पृथग्विधैः । तमानर्चुनू पास्तुष्टाः स्वराष्ट्रोपगतं प्रभुम् ॥१०५।।
कितने ही राजाओंने संतुष्ट होकर उत्तम हाथों, कुलीन घोड़े और अनेक प्रकारके रत्नोंसे अपने देशमें आये हुए महाराज भरतकी पूजा की थी-॥१०५॥
Many kings, filled with satisfaction, honored Maharaja Bharata—who had arrived in their lands—by offering the finest steeds, noble horses, and a multitude of precious gems.105
श्लोक ( Shlok ) 106
तरस्विभिर्वपुर्मेधावयःसत्त्वगुणान्वितैः । तुरङ्गमैस्तुरुष्का द्यैर्विभुमाराधयन् परे ॥१०६।।
अन्य कितने ही राजाओंने वेगसे चलनेवाले, तथा शरीर, बुद्धि, अवस्था और बल आदि गुणोंसे सहित तुरुष्क आदि देशोंमें उत्पन्न हुए घोड़ोंके द्वारा भरतकी सेवा की थी ॥१०६।।
Numerous other kings, with great swiftness, rendered service to Bharata through steeds—bred in lands such as Tūrushka and endowed with excellence in body, intellect, stature, and strength.106
श्लोक ( Shlok ) 107 –108
केचित्काम्बोजबाह्लीकतैतिलारट्टसैन्धवैः । वानायुकैः सगान्धारैर्वापेयेरपि वाजिभिः ॥१०७॥कुलोपकुलसम्भूतै र्नानादिग्देशचारिभिः । आजानेयैः समग्राङ्गैः प्रभुमेक्षन्त पार्थिवाः ॥१०८।।
कितने ही राजाओंने उसी देशके घोड़े घोड़ियोंसे उत्पन्न हुए, तथा एक देशके घोड़े और अन्य देशकी घोड़ियोंसे उत्पन्न हुए, नाना दिशाओं और देशोंमें संचार करनेवाले, कुलीन और पूर्ण अंगोंपाङ्ग धारण करनेवाले, काम्बोज, वाल्हीक, तैतिल, आरट्ट, सैन्धव, वानायुज, गान्धार और बाण देशमें उत्पन्न हुए घोड़े भेंट कर महाराज के दर्शन किये थे ।। १०७-१०८।।
Many kings presented horses to Maharaja Bharata—horses born of the steeds and mares of that very land, as well as those born of horses from one country and mares from another. These horses, which traversed various directions and lands, were noble, with complete and perfect limbs. They hailed from regions such as Kamboja, Valhika, Taitila, Aratta, Saindhava, Vanayuja, Gandhara, and Bana.107 –108
श्लोक ( Shlok ) 109
प्रतिप्रयाणमित्यस्य रत्नलाभो न केवलम् । यशोलाभश्च दुःसाध्यान् बलात् साधयतो नृपान् ॥१०९॥
इस प्रकार भरत को प्रत्येक पड़ावपर केवल रत्नोंकी ही प्राप्ति नहीं हुई थी किन्तु अपने पराक्रमसे बड़े बड़े दुःसाध्य (कठिनाइयोंसे जीते जाने योग्य) राजाओंको जीत लेनेसे यशकी भी प्राप्ति हुई थी ।।१०९।।
Thus, at every halting place, Maharaja Bharata did not only acquire gems, but through his valour, he also gained renown by conquering mighty and formidable kings, worthy of being subdued through great effort.109
श्लोक ( Shlok ) 110
जलस्थलपथान् विप्वगारुध्य जयसाधनैः । प्रत्यन्तपालभूपालान जयत्तच्चमूपतिः ॥११०।।
भरतके सेनापतिने अपनो विजयी सेनाओंके द्वारा चारों ओरसे जल तथा स्थलके मार्ग रोककर पहाड़ी राजाओंको जीता ॥ ११०॥
The commander of Bharata’s army, through his victorious forces, subdued the mountain kings by blocking both the water and land routes from all directions.110
श्लोक ( Shlok ) 111
विलङ्ध्य विविधान् देशान रण्यानीः सरिद् गिरीन् । तत्र तत्र विभोराज्ञां सेनानीराश्वशुश्रुवत् ॥१११।’
सेनापतिने अनेक प्रकारके देश, बड़े बड़े जंगल, नदियां और पर्वत उल्लंघन कर सब जगह शीघ्र ही सम्राट् भरतकी आज्ञा स्थापित की ।। १११।।
The commander, having swiftly crossed various lands, vast forests, rivers, and mountains, established the command of Emperor Bharata everywhere.
श्लोक 112 से 121
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 169
आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101