आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
श्लोक 22 से 34 : वनों और पर्वतों का सौन्दर्य
वनों में फलों से लदे वृक्ष कल्पवृक्ष जैसे लगे। लताओं से लिपटे फलदार वृक्ष सैनिकों को संतुष्ट करते थे। सिंहल द्वीप की स्त्रियाँ नारियल की मदिरा पीकर भरत का यश गाती थीं। त्रिकूट, मलय और पाण्डयकबाटक पर्वतों पर किन्नर देवियाँ और मलय-सह्य के वनों में भील स्त्रियाँ भरत का यश गा रही थीं। मलय गिरि के लतागृहों में चन्दन को हिलाता वायु अतिथि सत्कार करता प्रतीत हुआ। केरल की युवतियाँ सुगन्धित निःश्वास, चन्दन-लेपित शरीर, नृत्य और गीतों से भरत का मन मोह रही थीं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 30 – Shlok 22 to 34
श्लोक ( Shlok ) 22
विदश्य मञ्जरीस्तीक्ष्णा मरीचानां सशङ्कितम् । शिरो विधुन्वतोऽपश्यत् प्रभुस्तरुणमर्कटान् ॥२२॥
जो तरुण वानर बहुत तेज मिरचों के गुच्छोंको निःशंक रूपसे खाकर बादमें चरपरी लगनेसे शिर हिला रहे थे उन्हें भी महाराजने देखा ॥२२॥
“Bharata also saw the young monkeys, fearlessly devouring clusters of fiery chilies, only to later shake their heads in discomfort from the burning sensation.” ॥22॥
श्लोक ( Shlok ) 23
वनस्पतीन् फलानम्रान् वीक्ष्य लोकोपकारिणः । जाताः कल्पद्मास्तित्वे निरारेकास्तदा जनाः ॥२३॥
उस समय वहां फलोंसे झुके हुए तथा लोगोंका उपकार करनेवाले वृक्षोंको देखकर लोग कल्प-वृक्षोंके अस्तित्वमें शंकारहित हो गये थे ॥ २३॥
“In that place, the soldiers of Bharata, having crossed the region where the sun sets, set up camp and rested, their bodies invigorated by the fruits and the cool breeze of the forest.” (Verse 23)
श्लोक ( Shlok ) 24
लतायुवतिसंसक्ताः प्रसवाढ्या वनद्रुमाः । करदा इव तस्यासन् प्रीणयन्तः फलैर्जनान् ॥२४।।
जो लतारूप स्त्रियोंसे लिपटे हुए हैं और अनेक फलोंसे युक्त हैं ऐसे वनके वृक्ष अपने फलोंसे सेनाके लोगोंको संतुष्ट करते हुए ऐसे जान पड़ते थे मानो भरत के लिये कर ही दे रहे हों ।॥ २४।।
“The trees of the forest, entwined with creeping vines and laden with various fruits, seemed to offer their bounty to the soldiers, as though they were fulfilling the desires of Bharata himself.” ॥24॥
श्लोक ( Shlok ) 25
नालिकेरासवैर्मत्ताः किञ्चिदा धूर्णितेक्षणाः । यशोऽस्य जगुरामन्द्रकुहरं सिंहलाङ्गनाः ॥२५।।
जो नारियलकी मदिरा पीकर उन्मत्त हो रही हैं और इसीलिये जिनके नेत्र कुछ कुछ घूम रहे हैं ऐसी सिंहल द्वीपकी स्त्रियां वहां गद्गद कण्ठसे महाराज भरतका यश गा रही थीं ।॥ २५॥
“The women of Ceylon, intoxicated by coconut wine and their eyes somewhat dazed, sang with voices full of emotion the praises of Maharaja Bharata.” ॥25॥
श्लोक ( Shlok ) 26
त्रिकूट मलयोत्सङगे गिरौ पाण्डयकवाटके। जगुरस्य यशो मन्द्रमुर्च्छनाः किन्नराङ्गनाः ॥२६॥
त्रिकूट पर्वतपर, मलय गिरिके मध्यभाग पर और पाण्डयकबाटक नामके पर्वतपर किन्नर जातिकी देवियाँ गंभीर स्वरसे चक्रवर्ती का यश गा रही थीं ।। २६ ।।
“On the Trikuta Mountain, in the heart of the Malaya range, and on the peak known as Pandayakbat, the celestial women of the Kinnara tribe sang in deep voices the praises of the sovereign emperor.” ॥26॥
श्लोक ( Shlok ) 27
मलयोपान्तकान्तारे सह्याचलवनेषु च। यशो वनेचरस्त्रीभिरुज्जगेऽस्य जयार्जितम् ॥२७॥
इसी प्रकार मलय गिरिके समीपवर्ती वनमें और सह्य पर्वतके वनोंमें भीलोंकी स्त्रियां विजयसे उत्पन्न हुआ महाराजका यश जोर जोरसे गा रहीं थीं ॥२७॥
“Similarly, in the forests near the Malaya mountains and those of the Sahya range, the women of the Bhilla tribe were loudly singing the praises of the king, born of victory.” ॥27॥
श्लोक ( Shlok ) 28
चन्दनोद्यानमाधूय मन्दं गन्धवहो ववौ । मलयाचलकुञ्जेभ्यो हरन्निर्झरशीकरान् ॥२८॥
उस समय मलय गिरिके लतागृहोंसे झरनोंके जलके छोटे छोटे कण हरण करता हुआ तथा चन्दनके बगीचेको हिलाता हुआ वायु धीरे धीरे बह रहा था ।। २८ ।।
“At that time, a gentle breeze was blowing from the vine-clad groves of the Malaya mountains, carrying with it the small droplets of water from the waterfalls and stirring the sandalwood orchards.” ॥28॥
श्लोक ( Shlok ) 29
विष्वग्विसारी दाक्षिण्यं समुज्झन्नपि सोऽनिलः । सम्भावयन्निवातिथ्यैर्विभोः श्रममपाहरत् ॥२९॥
वह वायु दक्षिण दिशा को छोड़कर चारों ओर बह रहा था और ऐसा जान पड़ता था मानो अतिथि सत्कारके द्वारा भरतका सन्मान करता हुआ ही उनका परिश्रम दूर कर रहा था । भावार्थ इस श्लोकमें दाक्षिण्य शब्दके श्लेष तथा अपि शब्दके सन्निधानसे नीचे लिखा हुआ विरोध प्रकट होता है-‘वह वायु यद्यपि दाक्षिण्य (स्वामीके इच्छानुसार प्रवृत्ति करना) भावको छोड़कर स्वच्छन्दता पूर्वक चारों ओर घूम रहा था तथापि उसने एक आज्ञाकारी सेवककी तरह भरतका अतिथि-सत्कार कर उनका सब परिश्रम दूर कर दिया था, जो स्वामीके विरुद्ध आचरण करता है वह उसकी सेवा क्यों करेगा ? यह विरोध है परन्तु दाक्षिण्य शब्दका दक्षिण दिशा अर्थ लेनेसे वह विरोध दूर हो जाता है (‘दक्षिणो दक्षिणोद्भूतसरलच्छन्दतिषु’ इति मेदिनी दक्षि-णस्य भावो दाक्षिण्यम्, पक्षे दक्षिणैव दाक्षिण्यम्) ।॥२९॥
“The breeze, leaving the southern direction, blew gently in all directions, as though honoring Bharata through the hospitality it offered, alleviating his fatigue. The verse presents an apparent paradox: although the breeze, by moving freely in all directions, seemed to abandon the graciousness of the southern direction, it nonetheless acted like a dutiful servant, easing the king’s exertion as if performing a ritual of welcome. The apparent contradiction is resolved by interpreting dākṣiṇya (graciousness) as referring to the southern direction, where it naturally resides, thereby harmonizing the actions of the breeze with its implied service.” ॥29॥
श्लोक ( Shlok ) 30 – 34
एलालवङ्गसंवाससुरभिश्वसितैर्मुखै । स्तनैरापाण्डुभिः सान्द्र चन्दनद्रवर्चितैः ॥३०॥सलीलमृदुभिर्यातैनितम्बभरमन्थरैः । स्मितैरनङ्गपुष्पास्त्रस्तबकोद्भेदविभ्रमैः ॥ ३१॥ कोकिलालापमधुरै र्ज्वलितै (जल्पितै) रनतिस्फुटैः । मृदुबाहुलतान्दोलसुभगैश्च विचेष्टितैः ॥३२॥ लास्यैः स्खलत्पदन्यासैर्मुक्ताप्रायैर्विभूषणैः । मदमञ्जुभिरुदगीतैः जितालिकुलशिञ्जितैः ॥३३॥ तमालवनवीथीपु सञ्चरन्त्यो यदृच्छया । मनोऽस्य जहुरारूढयौवनाः केरलस्त्रियः ॥३४॥
तमाल वृक्षोंके वनकी गलियोंमें इच्छानुसार इधर-उधर घूमती हुई केरल देशकी तरुण स्त्रियाँ इलायची, लौंग आदि सुगन्धित वस्तुओंके सम्बन्धसे जिनके निःश्वास सुगन्धित हो रहे हैं ऐसे मुखोंसे, जो घिसे हुए चन्दनके गाढ़ लेपसे सुशोभित हो रहें हैं ऐसे स्तनोंसे, नितम्बोंके भारके साथ ईर्ष्या करनेवाले लीलासहित सुकोमल गमनसे, जो कामदेवके पुष्परूपी शस्त्रोंके गुच्छोंके खिलने के समान सुशोभित हो रहे हैं ऐसे मन्द हास्यसे, कोयलकी कूकके समान मनोहर तथा अव्यक्त वाणीसे, सुकोमल बाहु-रूपी लताओंके इधर उधर फिरानेसे सुन्दर चेष्टाओंसे, जिसमें स्खलित होते हुए पैर पड़ रहे हैं ऐसे नृत्योंसे, अधिकतर मोतियोंके बने हुए आभूषणोंसे, भूमरसमूहकी गुंजारको जीतनेवाले मदसे मनोहर उत्कृष्ट गीतोंसे चक्रवर्ती भरतका मन हरण कर रही थीं ।॥ ३०-३४।।
“In the groves of tamala trees, the young women of Kerala, wandering freely as they pleased, captivated the heart of Emperor Bharata. Their breaths, infused with the fragrance of cardamom and cloves, escaped from lips adorned with the rich paste of ground sandalwood, while their breasts, full and radiant, glowed with grace. Their movements, filled with playful elegance and the sway of their hips, were as enchanting as the blossoms of Kama’s flowery arrows. Their soft, melodic laughter, like the cooing of the cuckoo, and their voices, tender and barely audible, further added to their allure. Their delicate gestures, like tendrils of vines swaying gently, and their dances, where feet faltered and stumbled, charmed him completely. Adorned with pearls and captivating jewels, their beauty and the intoxicating melodies of their songs, resplendent like the hum of a gathering of bees, utterly stole the heart of the sovereign.” ॥30-34॥
श्लोक 35 से 50
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 169
आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21