आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90
श्लोक 91 से 101
दक्षिण देशों के राजाओं की विजय
चक्रवर्ती भरत के सेनापति ने कर्णाटक, आंध्र, कलिंग, ओण्ड्र, चोल, केरल, पाण्ड्य और अन्य देशों के राजाओं को अपनी विजयी सेना द्वारा वश में किया। ये राजा अपनी विशेषताओं जैसे यश, कठोरता, कला-कौशल, मूर्खता, कुटिलता, सरलता और पराक्रम के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने भयपूर्वक भेंट देकर और दूर से प्रणाम कर चक्रवर्ती की कृपा प्राप्त की। भरत ने कर वसूली द्वारा दक्षिण दिशा को वशीभूत किया और समुद्र तट के सुगंधित वनों को देखकर संतोष प्राप्त किया, जहाँ वायु और वन उनकी सेवा करते प्रतीत हुए।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 29 – Shlok 91 to 101
श्लोक ( Shlok ) 91 – 96
कर्णाटकान् स्फुटाटो पविकटोद्भट वेषकान् । हरिद्राञ्जनताम्बूलप्रियान् प्रायो यशोधनान् ॥९१॥
आन्ध्रान् रुन्द्रप्रहारेषु कृतलक्षान् कदर्यकान्। पाषाणकठिनानङ्गैर्न परं हृदयैरपि ॥९२॥
कालिङगकान् गज प्रायसाधनान् सकलाधनान् । प्रायेण तावृशानोड्रान् जडानुड्ड” मरप्रियान् ॥९३॥
चोलिकान्नालिकप्रायान्” प्रायशोऽनृजुचेष्टितान्। केरलान् सरलालापान् कलागोष्ठीषु चुञ्चुकान्।l९४ll
पोण्ड्यान् प्रचण्डदोर्दण्डखण्डिता रातिमण्डलान् । प्रायो गजप्रियान् धन्विकुन्तभूयिष्ठसाधनान् ॥९५॥
‘दृष्टापदानानन्यांश्च तत्र तत्र व्युदुत्थितान् । जयसैन्यैरवस्कन्द्य सेनानीरनयद् वशम् ॥९६॥
प्रकट रूपसे धारण किये हुए आडम्बरों से जिनका वेष विकट तथा शूरवीरता को उत्पन्न करनेवाला है, जिन्हें हल्दी, तांबूल और अंजन बहुत प्रिय हैं, तथा जिनके यश ही धन है ऐसे कर्णाटक देशके राजाओंको, जो कठिन प्रहार करनेमें सिद्धहस्त हैं जो बड़े कृपण हैं और जो केवल शरीरकी अपेक्षा ही पाषाणके समान कठोर नहीं हैं किन्तु हृदय की अपेक्षा भी पाषाण के समान कठोर हैं ऐसे आंध्र देशके राजाओं को, जिनके प्रायः हाथियों की सेना है और जो कला-कौशल रूप धन से सहित हैं ऐसे कलिङ्ग देशके राजाओंको, जो प्रायः कलिङ्ग देशके समान हैं, मूर्ख हैं और लड़नेवाले हैं ऐसे ओण्ड्र देशके राजाओंको, जिन्हें प्रायः झूठ बोलना बहुत प्रिय है और जिनकी चेष्टाएं कुटिल हैं ऐसे चोल देशके राजाओं को, मधुर गोष्ठी करने में प्रवीण तथा सरलतापूर्वक वार्तालाप करनेवाले केरल देशके राजाओंको, जिनके भुजदण्ड अत्यन्त बलिष्ठ हैं, जिन्होंने शत्रुओंके समूह नष्ट कर दिये हैं, जिन्हें हाथी बहुत प्रिय हैं और जो युद्धमें प्रायः धनुष तथा भाला आदि शस्त्रोंका अधिकतासे प्रयोग करत हैं ऐसे पाण्ड्य देशके राजाओंको और जिन्होंने प्रतिकूल खड़े होकर अपना पराक्रम दिखलाया है ऐसे अन्य देशके राजाओंको सेनापतिने अपनी विजयी सेनाके द्वारा आक्रमण कर अपने आधीन किया था ।।९१-९६।।
“Clad in ostentatious garb that gave them a fierce appearance and stirred a sense of valor, delighting in turmeric, betel, and collyrium, and possessing fame alone as their treasure—such were the kings of the Karṇāṭaka region whom he subdued. Likewise, he brought under his sway the kings of Āndhra—adept in delivering fierce blows, miserly by nature, and harder than stone not merely in body but even more so in heart.
He conquered the kings of Kaliṅga, whose armies abounded with elephants and who were adorned with the wealth of art and skill. Then the rulers of Oṇḍra, much like those of Kaliṅga—foolish and warlike.
Next, the kings of Cola, who were fond of falsehood and crooked in their ways; those of Kerala, adept in sweet discourse and gentle conversation. He vanquished the kings of the Pāṇḍya realm, whose mighty arms had destroyed hosts of enemies, who cherished elephants, and who in battle chiefly wielded bows and spears.
Finally, those monarchs of other southern realms, who had dared stand in opposition and displayed their valor, were likewise subdued by the commander with his victorious host.” (91–96)
श्लोक ( Shlok ) 97
ते व सत्कृत्य सेनान्यं पुरस्कृत्य ससाध्वसम् । चक्रिणं प्रणमन्ति स्म दूरादूरीकृतायतिम् ॥९७।।
उन राजाओं ने सेनापति का सत्कार कर तथा भय सहित कुछ भेंट देकर जिन्होंने उनका भविष्यत्काल अर्थात् आगे राजा बना रहने देना स्वीकार कर लिया है ऐसे चक्र-वर्ती को दूर से ही प्रणाम किया था ।। ९७।।
“Those kings, having honored the commander and offered gifts in fear, acknowledged the overlordship of the Emperor—who had consented to let them retain their thrones in the future—and thus paid homage to him from afar.” (97)
श्लोक ( Shlok ) 98
करग्रहेण सम्पीड्य दक्षिणाशां वधूमिव । ‘प्रसभं हृततत्सारो दक्षिणाब्धिमगात् प्रभुः ॥९८॥
जिस प्रकार पुरुष करग्रह अर्थात् पाणिग्रहण संस्कार से किसी स्त्रीको वशीभूत कर लेता है उसी प्रकार चक्रवर्ती भरतने करग्रह अर्थात् टैक्स वसूलीसे दक्षिण दिशाको अपने वश कर लिया था और फिर जबरदस्ती उसके सार पदार्थों को छीनकर दक्षिण समुद्र की ओर प्रयाण किया था ।। ९८।।
“Just as a man subjugates a woman through the rite of marriage, even so did Emperor Bharata bring the southern quarter under his dominion through the imposition of tribute; and having forcefully seized its choicest riches, he advanced toward the southern ocean.” (98)
श्लोक ( Shlok ) 99
लवङ्गलवलीप्रायमेलागुल्मलतान्तिकम् । वेलोपान्तवन पश्यन् महतीं धृतिमाप सः ॥९९॥
वहां वह चक्रवर्ती, जिनमें प्रायः लवंग और चन्दन की लताएं लगी हुई हैं तथा जो इलायची के छोटे छोटे पौधोंकी लताओंसे सहित है ऐसे किनारेके समीपवर्ती वनको देखता हुआ बहुत भारी संतोषको प्राप्त हुआ था ।।९९।।
“There, upon beholding the coastal forest—laden with clove and sandalwood vines, and adorned with the delicate creepers of cardamom—the Emperor was filled with deep and abiding contentment.” (99)
श्लोक ( Shlok ) 100
तमासिषेविरे मन्दमान्दोलितसरोजलाः । एलासुगन्धयः सौम्या वेलान्तवनवायवः ॥१००॥
जो तालाबों के जलको हिला रहा है, जिसमें इलायची की सुगन्धि मिली हुई है और जो सौम्य है ऐसे किनारेके वन की वायु उस चक्रवर्ती की सेवा कर रही थी ।। १००।।
“The gentle breeze of the coastal forest—fragrant with the scent of cardamom, and stirring the waters of the lotus-laden ponds—was as if rendering devoted service to the Emperor.” (100)
श्लोक ( Shlok ) 101
मरुदुद्धतशाखाग्रैविकीर्णसुमनोऽञ्जलिः । नूनं प्रत्यगृहीदेनं वनोद्देशो विशाम्पतिम् ॥१०१॥
वायु से हिलती हुई शाखाओं के अग्रभाग से जिसने फूलोंकी अंजलि बिखेर रखी है ऐसा वह वन का प्रदेश ऐसा जान पड़ता था मानो इस चक्रवर्ती की अगवानी ही कर रहा हो ।। १०१ ।।
“With its gently swaying branches scattering handfuls of blossoms, stirred by the breeze, that woodland realm appeared as though it were offering a floral welcome to the Emperor himself.” (101)
श्लोक 102 से 111
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152
आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90