आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201
श्लोक 202 से 211
समुद्र और भरत की समानता, छावनी में वापसी
सारथि ने समुद्र और भरत की समानता बताई: दोनों आश्चर्यों, रत्नों, गंभीरता, और शक्ति से युक्त हैं, पर भरत मूर्खों से मुक्त हैं। भरत आनंदित होकर छावनी की ओर प्रस्थान करते हैं। सारथि ने कठिनाई से रथ लौटाया, और समुद्र की लहरें रथ का पीछा करती प्रतीत हुईं। रथ किनारे पहुँचा, और लोग भरत के पुण्य और सकुशल वापसी की प्रशंसा करते हैं। राजा और सैनिक जयघोष के साथ उनका स्वागत करते हैं। भरत छावनी में प्रवेश कर राजभवन पहुँचते हैं, जहाँ मंगलाक्षत और आशीर्वाद प्राप्त होते हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 28 – Shlok 202 to 211
श्लोक ( Shlok ) 202
आयुष्मन्निति बहुविस्मयोऽयमब्धिः सद्रत्नः सकलजगज्जनोपजीव्यः । गम्भीरप्रकृतिरनलसत्त्वयोगः प्रायस्त्वामनु हरते विना जडिम्ना ॥ २०२॥
हे आयुष्मन्, जिस प्रकार आप अनेक आश्चर्योंसे भरे हुए हैं उसी प्रकार यह समुद्र भी अनेक आश्चर्योंसे भरा हुआ है, जिस प्रकार आपके पास अच्छे अच्छे रत्न हैं उसी प्रकार इस समुद्रके पास भी अच्छे अच्छे रत्न हैं, जिस प्रकार संसारके समस्त प्राणी आपके उपजीव्य हैं अर्थात् आपकी सहायतासे ही जीवित रहते हैं उसी प्रकार इस समुद्रके भी उपजीव्य हैं अर्थात् समुद्रमें उत्पन्न हुए रत्न मोती तथा जल आदिसे अपनी आजीविका करते हैं, जिस प्रकार आप गंभीर प्रकृतिवाले हैं उसी प्रकार यह समुद्र भी गंभीर (गहरी) प्रकृतिवाला है और जिस प्रकार आप अनल्पसत्त्व योग अर्थात् अनन्त शक्तिको धारण करनेवाले हैं उसी प्रकार यह समुद्र भी अनल्पसत्त्व योग अर्थात् बड़े बड़े जलचर जीवोंसे सहित है अथवा जिस प्रकार आप अनालसत्व योग अर्थात् आलस्यके सम्बन्धसे रहित हैं उसी प्रकार यह समुद्र भी अनालसत्व योग अर्थात् नाल (नरा) रहित जीवोंके सम्बन्धसे सहित हैं इस प्रकार यह समुद्र ठीक आपका अनुकरण कर रहा है। यदि अन्तर है तो केवल इतना ही है कि यह जलकी ऋद्धिसे सहित है और आप जल अर्थात् मूर्ख (जड़) मनुष्योंकी ऋद्धिसे रहित हैं ।॥ २०२॥
O blessed one, just as you are filled with countless wonders, this ocean too is full of marvels. As you possess precious jewels, so does the ocean hold its own valuable gems. Just as all creatures in the world depend on you for their sustenance and live through your grace, so too do the beings of the ocean — its gems, pearls, and waters — sustain their lives. Just as you are of profound nature, this ocean also has a deep and mysterious nature. And just as you are endowed with infinite power, so is the ocean filled with mighty aquatic creatures. Similarly, just as you are free from laziness, this ocean too is free from sluggish beings. Thus, the ocean mirrors you in every way. The only difference is that the ocean is filled with the power of water, while you are free from the power of water, which is the domain of foolish and ignorant men.202
श्लोक ( Shlok ) 203
इत्थं नियन्तरि परां श्रियमम्बुराशेरावर्णयत्यनुगतैर्ववनैर्विचित्रैः ।प्राप प्रमोदमधिकं नविराच्च सम्म्राट् सेनानिवेशमभियातुमना बभूव ॥ २०३॥
इस प्रकार जब सारथिने समुद्रकी उत्कृष्ट शोभाका वर्णन किया तब सम्राट् भरत बहुत ही अधिक आनन्दको प्राप्त हुए तथा शीघ्र ही अपनी छावनीमें जानेके लिये उद्यत हुए ॥२०३।।
Thus, when the charioteer described the ocean’s supreme beauty, Emperor Bharat was filled with immense joy and quickly prepared to return to his camp.203
श्लोक ( Shlok ) 204
अथ रथपरिवृत्त्यै सारथौ कृच्छ्रकृच्छ्राद् विषमवलन भुग्नग्रीवमश्वान्नुनुत्सौ ।धुवति मरुति मन्दं वीचिवेगोपशान्ते शिबिरमभिनिधीनामीशिता सम्प्रतस्थे ॥ २०४॥
अथानन्तर -जब सारथि ने बड़ी कठिनाईसे रथ लौटाने के लिये विपम रूपसे घूमने-के कारण गले को कुछ टेढ़ा कर घोड़ोंको हांका, मन्द मन्द वायु बहने लगा और लहरोंका वेग शान्त हो गया तब निधियोंके स्वामी भरतने छावनीकी ओर प्रस्थान किया ।॥२०४।।
Then, after the charioteer, with great effort, turned the chariot around, causing the horses to strain with a slight twist of his neck due to the difficult maneuver, a gentle breeze began to blow and the force of the waves calmed. At that moment, Bharat, the lord of treasures, set off toward his camp.204
श्लोक ( Shlok ) 205
कथमपि रथचक्रं “सारयित्वाम्बु रुद्धं प्रवहणकृतकोपान् वाजिनोऽनुप्रसाध्य । रथमधि जलमब्धौ चोदयामास सूतो ” जलधिरपि नृपानु” व्रज्ययेवोच्चचाल ॥२०५॥
पानीसे रुके हुए रथके पहियों को किसी तरह बाहर निकालकर और बार बार हांकने अथवा बोझ धारण करनेके कारण कुपित हुए घोड़ोंको प्रसन्न कर सारथि समुद्र में जलके भीतर ही रथ चला रहा था, और वह समुद्र भी उस रथके पीछे पीछे जाने के लिये ही मानो उछल रहा था ।।२०५।।
After somehow freeing the chariot wheels, which were stuck in the water, and calming the horses, who had become angry from the repeated urging and burden-bearing, the charioteer continued to drive the chariot through the waters of the ocean. It seemed as though the ocean itself was leaping behind the chariot, as if it too were eager to follow.205
श्लोक ( Shlok ) 206
अयमयमुदभारो वारिराशेर्वरूथं स्थगयति रथवेगादेष भिन्नोर्मिरब्धिः ।इति किल ‘तटसद्भिस्तकर्यमाणो रथोऽयं जवनतुरगकृष्टः प्राप पारेसमुद्रम् ॥२०६।।
अरे, यह समुद्रकी बड़ी भारी लहर रथकी छतरीको अवश्य ही ढक लेगी और इधर रथके वेग से समुद्रकी लहरें भी फट गई हैं इस प्रकार किनारे पर खड़े हुए लोग जिसके विषयमें अनेक प्रकारके तर्क-वितर्क कर रहे हैं ऐसा वह वेगशाली घोड़ोंसे खींचा हुआ रथ समुद्रके किनारेपर आ पहुंचा ।।२०६।।
“Alas! This massive wave of the ocean will surely engulf the chariot’s canopy.” And indeed, as the chariot sped forward, the ocean’s waves were torn apart by its force. In this way, the chariot, drawn by swift horses and the subject of much speculation among those standing on the shore, reached the very edge of the sea.206
श्लोक ( Shlok ) 207
तरङगात्यस्तोऽयं समघटितसर्वाङ्गघटनो रथः क्षेमात् प्राप्तो रथचरण “हेतिश्च कुशली । तुरङ्गा धोताङ्गा जलधिसलिलैरक्षतखुरा महत्पुण्यं जिष्णोरिति किल जजल्पुस्तटजुषः ॥२०७॥
जिसके समस्त अंगोंकी रचना एक समान सुन्दर है ऐसा यह रथ लहरों को उल्लंघन करता हुआ कुशलतापूर्वक किनारे तक आ गया है, चक्ररत्नको धारण करनेवाले चक्रवर्ती भरत भी सकुशल आ गये हैं और समुद्रके जलसे जिनके समस्त अंग धुल गये हैं तथा जिनके खुर भी नहीं घिसे हैं ऐसे घोड़े भी राजी-खुशी आ पहुंचे हैं। अहा! विजयी चक्रवर्तीका बड़ा भारी पुण्य है, इस प्रकार किनारे पर खड़े हुए लोग परस्परमें वार्तालाप कर रहे थे ।। ॥२०७॥
The chariot, whose every part is equally beautiful, skillfully navigated through the waves and reached the shore. Emperor Bharat, the mighty Chakravarti who holds the wheel-jewel, also arrived safely, and the horses — whose bodies were washed clean by the ocean’s waters and whose hooves remained untouched — reached the shore happily and unharmed. “Ah! The great merit of the victorious Chakravarti!” Thus, those standing on the shore were conversing among themselves.207
श्लोक ( Shlok ) 208
नृपैर्गङ्गाद्वारे प्रणतमणिमौल्यर्पितकरैरधस्तात्तद्वेद्याः सजयजयघोषैरधिकृतैः । बहिर्दारं सैन्यैर्युगपदसकृद्धोषितजयै र्विभुर्दृष्टः प्रापत् स्वशिबिरबहिस्तोरणभुवम् ॥२०८।।
जो वेदीके नीचे गङ्गाद्वार पर नियुक्त किये गये हैं, जिन्होंने नवाये हुए मणिमय मुकुटों पर अपने अपने हाथ जोड़कर रखे हैं और जो जय जय शब्दका उच्चारण कर रहे हैं ऐसे राजा लोग, तथा दरवाजेके बाहर एक साथ बार बार जयघोष करनेवाले सैनिक लोग जिसे देख रहे हैं ऐसा वह भरत अपनी छावनीके बाहरवाली तोरणभूमिपर आ पहुंचा ॥२०८।।
The kings, who were stationed at the Ganga Gate beneath the altar, with their hands placed reverently upon their newly adorned jeweled crowns, and who were chanting “Victory! Victory!” in unison, along with the soldiers outside the gates who were repeatedly shouting victory chants, were all watching as Bharat, having arrived at the gateway of his camp, reached the open space outside. 208
श्लोक ( Shlok ) 209
तत्रोद्धोषितमङ्गलैर्जयजयेत्यानन्दितो वन्दिभिर्गत्वातः शिबिरं नृपालयमहाद्वारं समासादयन् । ‘अन्तर्वंशिकलोकवारवनितादत्ताक्षताशासनः प्राविक्षन्निजकेतनं निधिपतिर्वातोल्लसत्केतनम् ॥२०९।॥
वहां पर जय जय इस प्रकार मंगलशब्द करते हुए बन्दीजन जिन्हें आनन्दित कर रहे हैं ऐसे वे महाराज भरत छावनीके भीतर जाकर राजभवनके बड़े द्वारपर जा पहुंचे वहां परिवारके लोगों तथा वेश्याओंने उन्हें मंगलाक्षत तथा आशीर्वाद दिये। इस प्रकार निधियोंके स्वामी भरतने जिसपर वायुके द्वारा ध्वजाएं फहरा रही हैं ऐसे अपने तम्बू में प्रवेश किया ।।२०९।।
As the joyous chants of “Victory! Victory!” echoed, the prisoners, filled with delight, were cheered by Maharaja Bharat. He entered his camp and reached the grand entrance of the royal palace. There, his family members and courtesans greeted him with auspicious rice and blessings. Thus, the lord of treasures, Bharat, entered his tent, where banners fluttered in the breeze.209
श्लोक ( Shlok ) 210
देवोऽयमक्षततनु र्विजिताब्धिरागात् ते यूयमानयत साक्षतसिद्धशेषाः । आशीध्वमाध्वमिह सम्मुखमेत्य तूर्णमित्युत्थितः कलकलः कटके तदाभूत् ॥२१०।।
जिन्होंने शरीर में कुछ चोट लगे बिना ही समुद्र को जीत लिया है ऐसे ये भरत महाराज आ गये हैं, इसलिये तुम मंगलाक्षत सहित सिद्ध तथा शेषाक्षत लाओ, तुम आशीर्वाद दो और तुम बहुत शीघ्र सामने जाकर खड़े होओ इस प्रकार उस समय सेना में बड़ा भारी कोलाहल उठ रहा था ॥२१०।।
Maharaja Bharat, who has conquered the ocean without any injury to his body, has arrived. Therefore, bring the auspicious rice mixed with the sacred grains, offer your blessings, and quickly go stand before him. At that moment, a great uproar arose within the army.210
श्लोक ( Shlok ) 211
जीवेति नन्दतु भवानिति वधिषीष्ठाः देवेति निर्जयरियूनिति गां जयेति । त्वं “स्ताच्चिरायुरिति कामितमाप्नुहीति पुण्याशिषां शतमलम्भि तदा स वृद्धैः ॥२११॥
हे देव, आप चिरकाल तक जीवित रहें, समृद्धिमान् हों, सदा बढ़ते रहें, आप शत्रुओंको जीतिये, पृथिवीको जीतिये, आप चिरायु रहिये और समस्त मनोरथोंको प्राप्त कीजिये-आपकी सब इच्छाएं पूर्ण हों इस प्रकार उस समय वृद्ध मनुष्योंने भरत महाराजके लिये सैकड़ों पवित्र आशीर्वाद प्राप्त कराये थे ।। २११॥
“O Lord, may you live for a long time, be prosperous, and always grow in strength. May you conquer your enemies, conquer the earth, live a long life, and fulfill all your desires — may all your wishes be granted.” Thus, at that time, the elderly men gathered and bestowed hundreds of sacred blessings upon Maharaja Bharat.211
श्लोक 212 से 221
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150
आदिपुराण पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152
आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201