आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 102
श्लोक 103 से 111
समुद्र में रथ का वेग और चक्रवर्ती का प्रभाव
चक्रवर्ती भरत ने गंभीर समुद्र को तुच्छ समझकर सिद्ध परमेष्ठी को नमस्कार किया और रथ को शीघ्र बढ़ाने की आज्ञा दी। उनका रथ मन-सा वेगवान घोड़ों द्वारा समुद्र में जहाज की भाँति तेजी से चला। जल में भी रथ और घोड़े स्थल की तरह दौड़ रहे थे, जो चक्रवर्ती के पुण्य का आश्चर्य था। लहरें घोड़ों का परिश्रम दूर करती थीं, और रथ के पहियों से उछलता जल ध्वजा को भारी करता था। घोड़ों का अंगराग केवल जल के छींटों से धुल गया।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 28 – Shlok 103 to 111
श्लोक ( Shlok ) 103
दृष्ट्वाऽथ तं महाभागः कृतधीर्धी निःस्वनम् । दुष्टयैवातुलयच्चक्री गोप्प दावज्ञयार्णवम् ॥१०३॥
तदनन्तर-महाभाग्यशाली बुद्धिमान् भरत ने गम्भीर शब्द करते हुए उस समुद्रको देखकर, दृष्टि मात्रसे ही उसे गाय के खुर के समान तुच्छ समझ लिया ॥१०३।।
“Thereafter, the highly fortunate and wise Bharata, beholding that ocean resounding with deep murmurs, considered it as insignificant as a cow’s hoof-print, merely by the glance of his eye.” (Verse 103)
श्लोक ( Shlok ) 104
ततोऽभिमतसंसिद्ध्यै कृतसिद्धनमस्क्रियः । रथं प्रचोदयेत्युच्चैः प्राजितारमचोदयत् ॥१०४।।
और फिर अपने मनोरथ की सिद्धिके लिये सिद्ध परमेष्ठी को नमस्कार कर ‘शीघ्र ही रथ बढ़ाओ’ इस प्रकार सारथि के लिये जोर से प्रेरणा की ।। १०४।।
“And then, to accomplish his cherished goal, he bowed to the accomplished Supreme Lord and firmly urged his charioteer, saying, ‘Drive the chariot swiftly!'” (Verse 104)
श्लोक ( Shlok ) 105
विमुक्तप्रग्र हेर्वाहैरुह्यमानो मनोजवै । लवणाब्धौ द्रुतं “प्रायाद यानपात्रायितो रथः ॥१०५।।
जिनकी रास ढीली कर दी गई है और जिनका वेग मन के समान है ऐसे घोड़ोंके द्वारा ले जाया जानेवाला वह रथ लवणसमुद्र में जहाज की नाई शीघ्रताके साथ जा रहा था ॥ १०५।।
Drawn by horses whose reins had been loosened and whose speed rivaled that of the mind, that chariot advanced swiftly across the Salt Ocean, like a ship gliding over the waves. ॥105॥
श्लोक ( Shlok ) 106
रथो मनोरथात पूर्व रथात् पूर्व मनोरथः । इति सम्भाव्यवेगोऽसौ रथो वार्धिं व्यगाहत ॥१०६॥
मनोरथसे पहले रथ जाता है अथवा रथसे पहले मनोरथ जाता है इस प्रकार जिसके वेगकी सम्भावना की जा रही है ऐसा वह रथ समुद्र में बड़े वेगके साथ जा रहा था ।।१०६।।
“Whether the chariot precedes the mind or the mind precedes the chariot — as such was the swiftness being pondered — that chariot was moving through the ocean with great speed.” (106)
श्लोक ( Shlok ) 107
जलस्तम्भः प्रयुक्तो नु जलं न स्थलतां गतम् । स्यन्दनं यदमी वाहा जले निन्युः स्थलास्थया ॥१०७।।
क्या वह जलस्तम्भिनी विद्या से थंभा दिया गया था अथवा स्थलपने को ही प्राप्त हो गया था क्योंकि चक्रवर्ती के घोड़े स्थल समझकर ही जलमें रथ खींचे लिये जा रहे थे ।। १०७।।
“Had the ocean been stilled by the magic of water-controlling powers, or had it itself turned into solid ground? For the emperor’s horses were pulling the chariot across the water as if it were land.” (107)
श्लोक ( Shlok ) 108
तथैव चक्रचीत्कारः तथैवोच्चैः प्रधौरितम् । यथा बहिर्जलं पूर्वमहो पुण्यं रथाङ्गिनः ॥१०८॥
जिस प्रकार जलके बाहर पहियों का चीत्कार शब्द होता था उसी प्रकार जलके भीतर भी हो रहा था और जिस प्रकार जल के बाहर घोड़े दौड़ते थे उसी प्रकार जल के भीतर भी दौड़ रहे थे, अहा ! चक्रवर्ती का पुण्य भी कैसा आश्चर्यजनक था ! ॥१०८॥
Just as the wheels screeched upon the ground outside the water, so too did they resound within the ocean; and just as the horses raced upon the land, so too did they race through the waters. Ah! How wondrous was the merit of the Emperor! (108)
श्लोक ( Shlok ) 109
महद्भिरपि कल्लोलः ‘शीक्यमानास्तुरङ्गमाः । रथं निन्युरनायासात् प्रत्युतैषां स’ विश्रमः ॥१०९।।
वे घोड़े बड़ी बड़ी लहरों से सींचे जानेपर भी बिना किसी परिश्रमके रथको ले जा रहे थे। उन लहरोंसे उन्हें कुछ दुःख नहीं होता था बल्कि उनका परिश्रम दूर होता जाता था ।।१०९।।
Even when drenched by the mighty waves, those horses carried the chariot effortlessly. The waves caused them no suffering; rather, they seemed to wash away their fatigue. (109)
श्लोक ( Shlok ) 110
रथचक्रस “मुत्पीडाज्जलोत्पीडः खमुत्पतन् । न्यधाद् ध्वजांशु के जाडयं जलानामीदृशी गतिः ॥११०।।
रथके पहियेके आघात से आकाश की ओर उछलनेवाले जल के समूह ने ध्वजाके वस्त्रमें भी जाड्य अर्थात् भारीपन ला दिया था सो ठीक ही है क्योंकि जलका ऐसा ही स्वभाव होता है। भावार्थ-संस्कृत काव्योंमें ड और ल के बीच कोई भेद नहीं माना जाता इसलिये जलानाम् की जगह जडानाम् पढ़कर चतुर्थ चरणका ऐसा अर्थ करना चाहिये कि मूर्ख मनुष्योंका यही स्वभाव होता है कि वे दूसरोंमें भी जाड्य अर्थात् मूर्खता उत्पन्न कर देते हैं ।॥ ११०॥
It is but natural that the mass of water, hurled skyward by the blow of the chariot wheels, brought heaviness even to the banner’s cloth — for such is the nature of water. (Deeper meaning: In Sanskrit poetry, no distinction is made between ‘ḍ’ and ‘l’; thus, reading “jaḍānām” (of the dull-witted) instead of “jalānām” (of the waters), the fourth quarter means: it is the nature of the foolish to spread their dullness even to others.) (110)
श्लोक ( Shlok ) 111
नाङ्गरागस्तुरङ्गाणामार्दितः श्रमघर्मितैः । क्षालितः खुरवेगोत्यैः केवलं शीकरैरपाम् ॥१११॥
घोड़ों के शरीर पर लगाया हुआ अंगराग (लेप) परिश्रम से उत्पन्न हुए पसीनेसे गीला नहीं हुआ था केवल खुरों के वेग से उठे हुए जल के छींटों से ही धुल गया था ।।१११।।
The body of the horses, smeared with a red ointment, was not wet with sweat from exertion; it was only cleansed by the splashes of water raised by the force of their hooves. (111)
श्लोक 112 से 121
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 128 | श्लोक 129 से 147 | श्लोक 148 से 150
आदिपुराण पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152
आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 102