आदिपुराण भाग – 2 पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121
श्लोक 122 से 131
शिबिर की ओर प्रस्थान
मध्याह्न में सूर्य रानियों के मुख की कान्ति मलिन करता था, पर छत्ररत्न और रथ के कारण भरत को गर्मी का कष्ट नहीं हुआ। रथ का वेग और वृद्धों की कथाओं ने मार्ग को सरल बनाया। ध्वजा मार्ग सूचित करती थी। अन्य राजा कठिनाई से भरत के रथ के समीप पहुंचे। शिबिर के रावडी तंबू, चांदी के खंभे, और स्थलकमल जैसे अग्रभाग मनोहर थे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 27 – Shlok 122 to 131
श्लोक ( Shlok ) 122
ततोऽवरोधनवधूमुखच्छायाविलङ्घिनि। मध्यन्दिनातपे सम्राट सम्प्राप शिबिरान्तकम् ॥१२२॥
तदनन्तर ज़ब मध्याह्न का सूर्य अन्तःपुर की स्त्रियों के मुख की कान्ति को मलिन कर रहा था तब सम्म्राट् भरत शिबिर के समीप पहुंचे ॥ १२२॥
“Thereafter, when the midday sun was dimming the radiance of the faces of the women of the inner quarters, Emperor Bharata arrived near the encampment.” ॥122॥
श्लोक ( Shlok ) 123
छत्ररत्तकृतच्छायो दिव्यं रथमधिष्ठितः । न तदातपसंबाधां विदामास विशाम्पतिः ॥१२३॥
जिनपर छत्ररत्नके द्वारा छाया की जा रही है और जो देवनिर्मित सुन्दर रथपर बैठे हुए हैं ऐसे महाराज भरतको उस दोपहर के समय भी गर्मी का कुछ भी दुःख मालूम नहीं हुआ था ।।१२३।।
“Shaded by a royal parasol adorned with precious gems and seated in a beautiful, divine chariot, King Bharata felt no discomfort from the heat, even in the midst of the midday sun.” ॥123॥
श्लोक ( Shlok ) 124
वर्षीयोभिरयासःरारब्धसु खसंकथः । प्रयात्मपि नाध्वानं विवेद भरताधिपः ॥ १२४॥
जिन्होंने समीप में चलने वाले वृद्ध जनों के साथ साथ अनेक प्रकारकी कथाएं प्रारम्भ की हैं ऐसे भरतेश्वर को बीते हुए मार्ग का भी पता नहीं चला था ॥१२४।।
“Engaged in various conversations with the elderly men walking beside him, King Bharata became so absorbed that he did not even realize how the journey had passed.” ॥124॥
श्लोक ( Shlok ) 125
नोद्तःघातः कोऽप्यभूदङ्गे रथाङ्गपरिवर्तनैः । रथवेगेऽपि नास्याभूत् क्लेशो दिव्यानुभावतः ॥ १२५।।
दिव्य सामर्थ्य होने के कारण रथके पहियों की चाल से उनके शरीरमें कुछ भी उद्घात (दचका) नहीं लगा था और न रथ का तीव्र वेग होनेपर भी उनके शरीरमें कुछ क्लेश हुआ था ।।१२५।।
“Owing to the divine excellence of the chariot, King Bharata felt neither any jolt from the turning of its wheels nor any discomfort from its great speed.” ॥125॥
श्लोक ( Shlok ) 126
रथवेगानिलोदस्तं व्यायतं तद्ध्वजांशुकम् । पश्चादागामिसैन्यानामिव मार्गमसूत्रयत् ॥१२६॥
रथ के वेग से उत्पन्न हुए वायु से ऊपर की ओर फहराता हुआ उनकी ध्वजा का लम्बा वस्त्र ऐसा जान पड़ता था मानो पीछे आनेवाली सेनाके लिये मार्ग ही सूचित कर रहा हो ॥१२६।।
“The long cloth of the banner, fluttering upward in the wind created by the chariot’s speed, seemed as though it were signaling the path for the advancing army.” ॥126॥
श्लोक ( Shlok ) 127
रथ्रोद्धतगतिक्षोभादुद्भूताङ्गपरिश्रमाः । कथं कथमपि प्रापन् रथिनोऽन्ये रयं प्रभोः ॥१२७॥
रथकी उद्धत गतिके क्षोभसे जिनके अंग अंगमें पीड़ा उत्पन्न हो रही है ऐसे रथ पर सवार हुए अन्य राजा लोग बड़ी कठिनाईसे महाराज भरतके रथके समीप पहुंच सके थे ।।१२७।।
“Due to the tumult caused by the chariot’s reckless speed, the other kings, who were experiencing pain in every part of their bodies, struggled greatly to reach King Bharata’s chariot.” ॥127॥
श्लोक ( Shlok ) 128
तमध्वशेषमध्वन्यैस्तुरङ्गे रत्यवाहयन्। सादिनः प्रभुणा सार्ध शिबिरं प्रविविक्षवः ॥१२८॥
जो घुड़सवार लोग महाराज भरतके साथ ही शिबिर में प्रवेश करना चाहते थे उन्होंने बचे हुए मार्गको अपने उन्हीं चलते हुए श्रेष्ठ घोड़ों से बड़ी शीघ्रता के साथ तय किया था ॥१२८॥
“The horsemen who wished to enter the camp along with King Bharata swiftly covered the remaining path with their finest steeds, moving at great speed.” ॥128॥
श्लोक ( Shlok ) 129
दूराद्दूप्यकुटीभेदानु त्थितान् प्रभुरैक्षत । सेनानिवेशमभितः सौधशोभापहासिनः ॥१२९॥
जो राजभवनों की शोभा की ओर भी हँस रहे हैं ऐसे शिबिर के चारों ओर खड़े किये हुए रावटी तम्बू आदि डेराओं को महाराज भरतने दूर से ही देखा ॥ १२९॥
“King Bharata, from a distance, saw the rows of tents and camp structures, such as the royal pavilions, which were adorned with the splendor of the royal residences, even as they seemed to smile in their beauty.” ॥129॥
श्लोक ( Shlok ) 130
रौप्यदण्डेषु विन्यस्तान् विस्तृतान् पटमण्डपान् । सोऽपश्यज्जनतातापहारिणः सुजनानिव ॥१३०॥
उन्होंने चांदी के खंभोंपर खड़े किये हुए बहुत बड़े बड़े कपड़े के उन मण्डपों को भी देखा था जो कि सज्जन पुरुषों के समान लोगों का संताप दूर कर रहे थे ।।१३०।।
“He also saw the grand tents, set up on silver pillars, which were alleviating the suffering of people, much like virtuous men do.” ॥130॥
श्लोक ( Shlok ) 131
किमेतानि स्थलाब्जानि हंसयूथान्यमूनि वा । इत्याशङ्कय स्थूलाग्राणि” दूराद्ददृशिरे जनेः ॥१३१॥
क्या ये स्थलकमल हैं अथवा हंसोंके समूह हैं इस प्रकार आशंका कर लोग दूरसे ही उन तम्बुओंके अग्रभागोंको देख रहे थे ।।१३१॥
“Wondering whether these are lotus flowers or groups of swans, people were observing the fronts of the tents from a distance.” ॥131॥
श्लोक 132 से 141
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 128 | श्लोक 129 से 147 | श्लोक 148 से 150
आदिपुराण पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41