आदिपुराण भाग – 2 पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 128 | श्लोक 129 से 147 | श्लोक 148 से 150
आदिपुराण पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
श्लोक 22 से 31
प्रकृति और गंगा की शोभा
भौंरे कमल के पराग से पीले होकर कामरूपी अग्नि के स्फुलिंग समान हैं। स्थल कमल शरद् लक्ष्मी के तंबू प्रतीत होते हैं। हंस कमल को स्थल समझकर पानी में डूब जाता है, मृणाल को मक्खन समझकर बच्चों को देता है, और चकवी को न देखकर करुण स्वर में रोता है। गंगा के किनारे सप्तपर्ण वृक्ष चंदोवा की शोभा धारण करते हैं। गंगा की लहरों से उठा पवन थकान हरता है और वनों को हिलाता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 27 – Shlok 22 to 31
श्लोक ( Shlok ) 22
मनोजशरपुङ्खाब्जै पक्षैर्मधुकरा इमे। विचरन्त्यब्जिनीषण्डे मकरन्दरसोत्सुकाः ॥२२॥
जो मकरन्द रसका पान करनेके लिये उत्कण्ठित हो रहे हैं ऐसे ये भ्रमर कामदेवके बाणोंकी मूठके समान आभावाले अपने पंखोंसे कमलिनियोंके समूहमें जहां तहां विचरण कर रहे हैं घूम रहे हैं ।॥ २२॥
“These bees, eager to drink the nectar, are fluttering their wings like the shafts of Kama’s arrows, wandering and roaming here and there among the clusters of lotuses.” (22)
श्लोक ( Shlok ) 23
रुषिताः कञ्जकिञ्जल्कैरा भान्त्येते मधुव्रताः। सुवर्णकपिशैरङ्गैः कामाग्नेरिव मुर्मुराः ॥२३॥
जिनके अंगोपांग कमलकी केशरसे रूषित होनेके कारण सुवर्णके समान पीले पीले हो गये हैं ऐसे ये भ्रमर कामरूपी अग्निके स्फुलिङ्गोंके समान जान पड़ते हैं ।।२३।।
“These bees, whose bodies have turned yellow like gold due to being stained by the pollen of the lotuses, appear like sparks of fire, resembling the flames of Kama (the god of love).” (23)
श्लोक ( Shlok ) 24
स्थलेषु स्थलपद्मिन्यो विकसन्त्यश्चकासति । शरच्छ्रियो जिगीषन्त्या दूष्यशाला इवोत्थिताः ॥२४॥
जगह जगह पृथिवीपर फूले हुए स्थल-कमलिनियोंके पेड़ ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो सबको जीतनेकी इच्छा करने-बाली शरदऋतुरूपी लक्ष्मीके खड़े हुए कपड़ेके तम्बू ही हों ॥२४॥
“The trees of land lotuses, blooming here and there on the earth, were adorned in such a way that they seemed like the tents of autumn, symbolizing the goddess Lakshmi, who desires to conquer all.” (24)
श्लोक ( Shlok ) 25
स्थलाब्जशङ्किनी हंसी सरस्यब्जरजस्तते । संहृत्य पक्षविक्षेपं विशन्तीयं निमज्जति ॥२५॥
जो कमलोंकी परागसे व्याप्त हो रहा है ऐसे सरोवरमें कमलको स्थलकमल समझती हुई यह हंसी पंखोंके विक्षेपकी रोककर अर्थात् पंख हिलाये बिना ही प्रवेश करती है और पानी में डूब जाती है ।॥ २५॥
“In a lake filled with the pollen of lotuses, this swan, mistaking the lotus for a land lotus, enters without flapping its wings, causing no disturbance, and submerges itself in the water.” (25)
श्लोक ( Shlok ) 26
अभ्येति बरटावाङ्की धार्तराष्ट्रः कृतस्वनम्। सरस्तरङ्गशुभ्राङ्गी कोककान्तामनिच्छतीम् ॥२६॥
यह हंस चन्द्रमाकी किरणोंके समान कोमल और देदीप्यमान मृणालको अपनी चोंचसे उठाकर और क्षीर-सहित मक्खनके समान कोई पदार्थ समझकर अपने बच्चेके लिये दे रहा है ॥ २६॥
“This swan, with its beak, lifts a soft and radiant lotus stalk, resembling the rays of the moon, and, thinking it to be something like butter mixed with milk, offers it to its young.” (26)
श्लोक ( Shlok ) 27
‘कृतयत्नाः प्लवन्तेऽमी राजहंसाः सरोजले । सरोजिनीरजःकीर्णें धूतपक्षाः शनैः शनैः ॥२७॥
कमलिनीके परागसे भरे हुए तालाबके जलमें ये हंस धीरे धीरे पंख हिलाते हुए बड़े प्रयत्नसे तैर रहे हैं ।॥२७॥
“In the water of a pond filled with the pollen of lotuses, these swans are swimming slowly, gently flapping their wings with great effort.” (27)
श्लोक ( Shlok ) 28
चक्रवाकी सरस्तीरे तरङ्गैः स्थगिताममूम्। अपश्यन् करुणं रोति चक्राह्वः साश्रुलोचनः ॥२८॥
तालाबके तीरपर तरंगोंसे तिरोहित हुई चकवीको नहीं देखता हुआ यह हंस आंखों में आंसू भरकर बड़ी करुणाके साथ रो रहा है ।॥ २८॥
“This swan, not seeing the waterfowl that has vanished from the waves at the edge of the pond, is crying with tears in its eyes, weeping in great sorrow.” (28)
श्लोक ( Shlok ) 29
अभ्येति बरटावाङ्की धार्तराष्ट्रः कृतस्वनम्। सरस्तरङ्गशुभ्राङ्गी कोककान्तामनिच्छतीम् ॥२९॥
संभोगकी इच्छा करनेवाला यह शब्द करता हुआ हंस, तालाबकी तरंगोंसे जिसका शरीर सफेद हो गया है ऐसी चकवी के सन्मुख जा रहा है जब कि वह चकवी इस हंसकी इच्छा नहीं कर रही है ॥ २९॥
“This swan, making sounds and desiring union, is approaching the waterfowl whose body has turned white due to the pond’s waves, while the waterfowl, however, is not reciprocating the swan’s desire.” (29)
श्लोक ( Shlok ) 30
अनुगङ्गातटं भाति साप्तपर्णमिदं वनम् । सुमनोरेणुभिर्व्योम्नि वितानश्रियमादधत् ॥३०॥
गङ्गा नदी के किनारे किनारे यह सप्तपर्ण जातिके वृक्षोंका वन ऐसा सुशोभित हो रहा है मानो अपने फूलोंकी परागसे आकाशमें चंदोवाकी शोभा ही धारण कर रहा हो ॥३०॥
“Along the banks of the river Ganga, the forest of these Sapta-Varna trees is so beautifully adorned, as if it is wearing the radiance of the moon in the sky, with the pollen of its flowers.” (30)
श्लोक ( Shlok ) 31
मन्दाकिनीतरङ्गोत्थ पवनोऽध्वश्रमं हरन् । शनैः स्पृशति “नोऽङ्गानि रोधोवनविधूननः ।॥३१।।
मार्गकी थकावट को दूर करता हुआ और किनारे के वनोंको हिलाता हुआ यह गङ्गाकी लहरोंसे उठा हुआ पवन हम लोगोंके शरीरको धीरे धीरे स्पर्श कर रहा है ।॥३१॥
“The breeze, rising from the waves of the Ganga, which relieves the fatigue of the journey and stirs the trees on the banks, is gently touching our bodies.” (31)
श्लोक 32 से 41
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 |
आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 110 | श्लोक 111 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 143 | श्लोक 144 से 155 | श्लोक 156 से 167 | श्लोक 168 से 178 | श्लोक 179 से 190 | श्लोक 191 से 203 | श्लोक 204 से 217 | श्लोक 218 से 231 | श्लोक 232 से 244 | श्लोक 245 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281
आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 128 | श्लोक 129 से 147 | श्लोक 148 से 150
आदिपुराण पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21