आदिपुराण भाग – 2 पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61
श्लोक 62 से 71
भरत का राजसी वैभव
भरत ने चांदनी जैसे वस्त्र, ब्रह्मसूत्र, और मुकुट धारण किए। उनके कुण्डल सूर्य-चंद्र के समान थे। कौस्तुभ मणि और छत्र विजयलक्ष्मी के प्रतीक थे। स्थपति रत्न ने सुवर्ण और मणियों से युक्त रथ तैयार किया, जिसमें वेगशाली घोड़े जोते गए।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 26 – Shlok 62 to 71
श्लोक ( Shlok ) 62
ज्योत्स्नामये दुकूले च शुक्ले परिदधौ नृपः । शरच्छ्रियोपनीते वा मृदुनी दिव्यवाससी ॥६२॥
महाराज भरतने चांदनीसे बने हुएके समान सफेद, बारीक और कोमल जिन दो दिव्य वस्त्रोंको धारण किया था वे ऐसे जान पड़ते थे मानो शरऋतुरूपी लक्ष्मीके द्वारा ही उपहारमें लाये गये हों ।॥ ६२॥
“The two divine garments worn by King Bharata—white, fine, and soft like moonlight—appeared as if they had been presented as gifts by the goddess of Autumn herself.”(Verse 62)
श्लोक ( Shlok ) 63
आजानु लम्बिना ब्रह्मसूत्रेण विबभौ विभुः। हिमाद्रिरिव गङ्गाम्बुप्रवाहेण तटस्पृशा ॥६३॥
घुटनों तक लटकते हुए ब्रह्मसूत्रसे महाराज भरत ऐसे सुशोभित हो रहे थे, जैसा कि तटको स्पर्श करनेवाले गंगा जलके प्रवाहसे हिमवान् पर्वत सुशोभित होता है ।।६३।।
“King Bharata, adorned with a sacred thread hanging down to his knees, appeared as resplendent as the Himalaya mountain adorned by the flowing waters of the Ganga touching its slopes.”
(Verse 63)
श्लोक ( Shlok ) 64
तिरोटोदग्रमूर्धासौ कर्णाभ्यां कुण्डले दधौ । चन्द्रार्कमण्डले वक्तुमिवायाते जयोत्सवम् ॥६४॥
मुकुट लगानेसे जिनका मस्तक बहुत ऊंचा हो रहा है ऐसे भरत महाराजने अपने दोनों कानोंमें जो कुण्डल धारण किये थे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो जयोत्सवकी बधाई देनेके लिये सूर्यमण्डल और चन्द्रमण्डल ही आये हों ॥६४।।
“King Bharata, whose head was held high by the crown he wore, had earrings in both ears that appeared as though the sun and moon themselves had come to offer their congratulations for his victory celebration.”(Verse 64)
श्लोक ( Shlok ) 65
वक्षःस्थलेऽस्य रुरुचे रुचिरः कौस्तुभो मणिः । जयलक्ष्मीसमुद्वा हमङ्गलाशंसिदीपवत् ।।६५।।
भरतेश्वरके वक्षःस्थलपर देदीप्यमान कौस्तुभ मणि ऐसा सुशोभित होता था, मानो विजयलक्ष्मीके विवाहरूपी मंगलकी सूचना देनेवाला दीपक ही हो ॥६५॥
“The radiant Kaustubha gem on King Bharata’s chest shone brilliantly, appearing like a ceremonial lamp announcing the auspicious occasion of his marriage with the goddess of Victory.”
(Verse 65)
श्लोक ( Shlok ) 66
विधुबिम्बप्रतिस्पर्धि दध्रे ऽस्यातपवारणम् । तन्निभेनैन्दवं बिम्बमागत्येव सिषेविषु ॥६६॥
उन्होंने चन्द्रमण्डलके साथ स्पर्धा करनेवाले जिस छत्रको धारण किया था वह ऐसा जान पड़ता था मानो उस छत्रके बहानेसे स्वयं चन्द्रमण्डल ही आकर उनकी सेवा करना चाहता हो ।।६६।।
“The royal umbrella he bore, which seemed to rival the moon itself, appeared as though the moon had come in the guise of the umbrella to offer its service to him.”(Verse 66)
श्लोक ( Shlok ) 67
तदस्य रुचिमातेने धृतमातपवारणम् । चूडारत्नांशुभिर्भिन्नं सारुणांश्विव पङ्कजम् ॥६७॥
महाराज भरतने जो छत्र धारण किया था वह चूड़ारत्नकी किरणोंसे मिलकर ऐसा सुशोभित हो रहा था, मानो सूर्यकी लाल किरणों सहित कमल ही हो ।।६७।।
“The royal umbrella held by King Bharata, shining with the rays of the crest-jewel, appeared as if it were a lotus accompanied by the red rays of the sun.”(Verse 67)
श्लोक ( Shlok ) 68
स्वर्धुनीशीकरस्पर्धि चामराणां कदम्बकम् । “दुधुवुर्वारनार्योऽस्य दिक्कन्या इव संश्रिताः ॥६८॥
जो वारांगनाएं महाराज भरतके आस-पास गंगाके जल की बू’दोंके साथ स्पर्धा करनेवाले चमरोंके समूह ढल रहीं थीं ऐसी जान पड़ती थों मानो अच्छी तरहसे आई हुई दिक्कन्याएं ही हों ।॥ ६८।।
“The royal maidens surrounding King Bharata, gracefully waving fans that rivaled the drops of Ganga’s water, appeared as though they were celestial maidens from the directions, perfectly arrived to serve him.”(Verse 68)
श्लोक ( Shlok ) 69
ततः स्थपतिरत्नेन निर्ममे स्यन्दनो महान्। सुवर्ण मणिचित्राङ्गो मेरुकुञ्जश्रियं हसन् ॥६९॥
तदनन्तर स्थपति रत्नने एक बड़ा भारी रथ तैयार किया जो कि सुवर्ण और मणियोंसे चित्र विचित्र दिखनेवाले मेरु पर्वतके लतागृहोंकी शोभाकी ओर हँस रहा था ।।६९।।
“Thereafter, the master architect prepared a grand chariot, so splendid with gold and jewels that it seemed to mock the beauty of the vine-covered pavilions of Mount Meru.”(Verse 69)
श्लोक ( Shlok ) 70
चक्ररत्नप्रतिस्पर्धिचक्रद्वितयसङ्गतः । वज्राक्षघटितो रेजे रथोऽस्येव मनोरथः ॥७०॥
वह रथ चक्ररत्नकी प्रतिस्पर्धा करनेवाले दो पहियोंसे सहित था तथा वजूके बने हुए अक्ष (दोनों पहियोंके बीचमें पड़ा हुआ मजबूत लोहदंड-भौंरा) से युक्त था इसलिये महाराज भरतके मनोरथके समान बहुत ही ही अधिक सुशोभित हो रहा था ।।७०।।
“That chariot, equipped with two wheels rivaling the divine discus (chakra-ratna) and fitted with an axle made of refined metal, was exceedingly magnificent—just like the noble aspirations of King Bharata himself.”(Verse 70)
श्लोक ( Shlok ) 71
कामगैर्वायुरंहोभिः कुमुदोज्ज्वलकान्तिभिः । यशोवितानसंकाशैः स रथोऽयोजि वाजिभिः ॥७१॥
उस रथमें जो घोड़े जोते गये थे वे इच्छानुसार गमन करते थे, वायुके समान वेगशाली थे, कुमुदके समान उज्ज्वल कान्तिवाले थे और यशके समूह के समान जान पडते थे ॥ ७१ ॥
“The horses yoked to that chariot moved as per their will, were swift like the wind, shining bright with the radiance of lotuses, and seemed to embody the very essence of fame.”(Verse 71)
श्लोक 72 से 81
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 110 | श्लोक 111 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 143 | श्लोक 144 से 155 | श्लोक 156 से 167 | श्लोक 168 से 178 | श्लोक 179 से 190 | श्लोक 191 से 203 | श्लोक 204 से 217 | श्लोक 218 से 231 | श्लोक 232 से 244 | श्लोक 245 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281
आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61


