आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 |
श्लोक 92 से 102 मानस्तंभ की शोभा
धूलीसाल के भीतर चार मानस्तंभ थे। ये गोपुरद्वारों से घिरी पीठिका पर थे। अभिषेक जल से पवित्र थे। ये आकाश को स्पर्श करते थे। घंटाओं और ध्वजाओं से युक्त थे। इनके मूल में जिन प्रतिमाएँ थीं। मिथ्यादृष्टि का मान नष्ट करते थे। इंद्रध्वज कहलाते थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 22 – Shlok 92 to 102
श्लोक ( Shlok ) 92
ततोऽन्तरन्तरं किंचिद् गत्वा हाटकनिर्मिताः । रेजुर्मध्येषु वीथीनां मानस्तम्माः समुच्छ्रिताः ॥९२॥
उस धूलीसाल के भीतर कुछ जाकर गलियों के बीचो-बीच में सुवर्ण के बने हुए और अतिशय ऊँचे मानस्तंभ सुशोभित हो रहे थे । भावार्थ―चारों दिशाओं में एक-एक मानस्तंभ था ।।92।।
Inside the Dhūlīsāla, in the middle of the pathways, stood exceedingly tall and splendid golden Mānastambhas (pride-pillars), radiating magnificence.
Interpretation: There was one Mānastambha in each of the four directions. ||92||
श्लोक ( Shlok ) 93 – 95
चतुर्गोपुरसंबद्धसाल त्रितयवेष्टिताम् । जगती जमतीनाथस्नपनाम्बुपवित्रिताम् ॥९३॥
हैमषोडशसोपानां स्वमध्यार्पितपीठिकाम् । न्यस्तपुप्पोपहारार्चा मर्च्या नृसुरदानवैः ॥९४॥
अधिष्ठिता विरेजुस्तै मानस्तम्भा नभोलिह । ये दूराद्वीक्षिता मानं स्तम्भयन्त्याशु
दुर्दृशाम् ॥९५॥
जिस जगती पर मानस्तंभ थे वह जगती चार-चार गोपुरद्वारों से युक्त तीन कोटों से घिरी हुई थी, उसके बीच में एक पीठिका थी । वह पीठिका तीनों लोकों के स्वामी जिनेंद्रदेव के अभिषेक के जल से पवित्र थी, उस पर चढ़ने के लिए सुवर्ण की सोलह सीढ़ियाँ बनी हुई थीं, मनुष्य देव-दानव आदि सभी उसकी पूजा करते थे और उस पर सदा पूजा के अर्थ पुष्पों का उपहार रखा रहता था, ऐसी उस पीठिका पर आकाश को स्पर्श करते हुए वे मानस्तंभ सुशोभित हो रहे थे जो दूर से दिखाई देते ही मिथ्यादृष्टि जीवों का अभिमान बहुत शीघ्र नष्ट कर देते थे ।।93-95।।
The platform on which the Mānastambhas stood was surrounded by three enclosures, each adorned with four majestic entrance towers (Gopura gates). At the center of this sacred enclosure was a Peethika (pedestal), sanctified by the consecration water of Jinendra, the Lord of the three worlds.
To ascend this Peethika, there were sixteen golden steps. It was revered by humans, celestial beings, and demons alike, who worshiped it with devotion. Offerings of flowers were always placed upon it for ritual purposes.
On this sacred Peethika, the towering Mānastambhas, touching the sky, radiated their grandeur. Their mere sight from afar would instantly shatter the arrogance of those with false beliefs. ||93-95||
श्लोक ( Shlok ) 96
नमःस्पृशो महामाना घण्टाभिः परिवारिताः । सचामरध्वज रेजुः + स्ते दिग्गजायिताः ॥९६॥
वे मानस्तंभ आकाश का स्पर्श कर रहे थे, महाप्रमाण के धारक थे, घंटाओं से घिरे हुए थे, और चमर तथा ध्वजाओं से सहित थे इसलिए ठीक दिग्गजों के समान सुशोभित हो रहे थे क्योंकि दिग्गज भी आकाश का स्पर्श करने वाले, महाप्रमाण के धारक, घंटाओं से युक्त तथा चमर और ध्वजाओं से सहित होते हैं ।।96।।
Those Mānastambhas touched the sky, bore immense proportions, were surrounded by bells, and adorned with fly whisks (Chamaras) and flags. Thus, they appeared just like the Diggajas (mythical elephants of the directions), for Diggajas too are sky-touching, of great magnitude, decorated with bells, and accompanied by Chamaras and flags. ||96||
श्लोक ( Shlok ) 97
दिक्चतुष्टयमाश्रित्य रेजे स्तम्भचतुष्टयम्। त त्तद्व्या जादिवोद् भूतं जिनानन्तचतुष्टयन् ॥९७॥
चार मानस्तंभ चार दिशाओं में सुशोभित हो रहे थे और ऐसे जान पड़ते थे मानो उन मानस्तंभों के छल से भगवान् के अनंतचतुष्टय ही प्रकट हुए हो ।।97।।
The four Mānastambhas, shining in the four directions, appeared as if they had magically manifested the Anant Chatushtaya (the four infinities of the Lord) through their divine splendor. ||97||
श्लोक ( Shlok ) 98
हिरण्मयी र्जिनेन्द्रार्च्या स्तेषां बुध्नप्रतिष्ठिताः । देवेन्द्राः पूजयन्ति स्म क्षीरोदाम्भोऽभिषेचनैः ॥९८॥
उन मानस्तंभों के मूल भाग में जिनेंद्र भगवान् की सुवर्णमय प्रतिमाएँ विराजमान थीं जिनकी इंद्र लोग क्षीरसागर के जल से अभिषेक करते हुए पूजा करते थे ।।98।।
At the base of those Mānastambhas, golden idols of Jinendra Bhagwan were enshrined. The Indras (celestial kings) worshiped them, performing consecration rituals with the sacred waters of the Kshirasagara (Ocean of Milk). ||98||
श्लोक ( Shlok ) 99
नित्यातोद्य महावाद्यैर्नित्यसंगीतमङ्गलैः । नृत्तैर्नित्य प्रवृत्तैश्च मानस्तम्भाः स्म भान्त्यमी ॥९९॥
वे मानस्तंभ निरंतर बजते हुए बड़े-बड़े बाजों से निरंतर होने वाले मंगलमय गानों और निरंतर प्रवृत्त होने वाले नृत्यों से सदा सुशोभित रहते थे ।।99।।
Those Mānastambhas were always adorned with the continuous sounds of grand musical instruments, the ever-resonating auspicious songs, and the unceasing performances of divine dances. ||99||
श्लोक ( Shlok ) 100 -102
पीठिका जगतीमध्ये तन्मध्ये च त्रिमेखलम् । पीठं तन्मूर्धिन सद् बुध्ना मानस्तम्भाः प्रतिष्ठिताः ॥१००॥
हिरण्मयाङ्गाः प्रोतुङ्गा मूर्ध्निच्छत्रत्रयाङ्किताः । सुरेन्द्रनिर्मितत्वाच्च प्राप्तेन्द्र ध्वजरुढिकाः ॥१०१॥
मानस्तम्भान्महामान योगात्त्रैलोक्यमाननात् । अन्वर्थसञ्ज्ञया तज्ज्ञैर्मानस्तम्भाः प्रकीर्तिताः ॥१०२॥
ऊपर जगती के बीच में जिस पीठिका का वर्णन किया जा चुका है उसके मध्यभाग में तीन कटनीदार एक पीठ था । उस पीठ के अग्रभाग पर ही वे मानस्तंभ प्रतिष्ठित थे, उनका मूल भाग बहुत ही सुंदर था, वे सुवर्ण के बने हुए थे, बहुत ऊँचे थे, उनके मस्तक पर तीन छत्र फिर रहे थे, इंद्र के द्वारा बनाये जाने के कारण उनका दूसरा नाम इंद्रध्वज भी रूढ़ हो गया था । उनके देखने से मिथ्यादृष्टि जीवों का सब मान नष्ट हो जाता था, उनका परिमाण बहुत ऊँचा था और तीन लोक के जीव उनका सम्मान करते थे इसलिए विद्वान् लोग उन्हें सार्थक नाम से मानस्तंभ कहते थे ।।100-102।।
At the center of the Jagati, on the previously described Peethika, stood a magnificent three-tiered pedestal. On the front part of this pedestal, the Mānastambhas were enshrined. Their base was exquisitely crafted, they were made of pure gold, and they soared to great heights.
At their summit, three royal umbrellas revolved, signifying their divine grandeur. Since they were constructed by Indra, they also came to be known as Indradhvaja (Indra’s banners). Merely beholding them would instantly shatter the pride of those with false beliefs.
These Mānastambhas were of immense stature, and beings from all three worlds revered them. Hence, the wise aptly named them Mānastambha—pillars that destroy arrogance. ||100-102||
श्लोक 103 से 111
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 253 | श्लोक 254 से 261
आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 95 | श्लोक 96 से 111 | श्लोक 112 से 120 | श्लोक 121 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 205 | श्लोक 206 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 |