आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 205 | श्लोक 206 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 261
श्लोक 262 से 268 अर्हंत और गौतम का उपदेश
अर्हंत का रूप प्रकाशमान है। उनका मुख शासकपना सिखाता है। गौतम ने ध्यानतत्त्व का निरूपण किया। मुनि संतुष्ट हुए। वे गौतम और वृषभदेव की स्तुति कर उनकी लक्ष्मी सुनने को तैयार हुए।
English translation of Ādi purāṇa parv 21 – Shlok 262 to 268
श्लोक ( Shlok ) 262
इश्यन्वर्थानि नामानि यस्य लोकेशिनः प्रभोः । विदुषां हृदयेष्वाप्तबुद्धिं कर्तुमलंतराम् ॥२६२॥
इस प्रकार जिस त्रैलोक्यनाथ प्रभु के अनेक सार्थक नाम हैं वही अरहंतदेव विद्वानों के हृदय में आप्तबुद्धि करने के लिए समर्थ हे अर्थात् विद्वान पुरुष उन्हें ही आप्त मान सकते हैं ।।262।।
“Thus, the Lord of the Three Worlds (Trailokyanātha), who possesses numerous meaningful names, is the only one capable of instilling trust and wisdom in the hearts of the wise.
In other words, only the truly wise can recognize the Arahant Deva as the supreme authority (Āpta).“ 262
श्लोक ( Shlok ) 263
यस्य रूपमधिज्योति रनम्बरविभूषणम् । शास्ति कामज्वरापायमकटाक्षनिरीक्षणम् ॥२६३॥
जिनका रूप वस्त्र और आभूषणों से रहित होने पर भी अतिशय प्रकाशमान है और जिनका कटाक्षरहित देखना कामरूपी ज्वर के अभाव को सूचित करता है ।।263।।
“Though devoid of clothing and ornaments, their form radiates an extraordinary brilliance.
Their gaze, free from any trace of desire, signifies the absence of the fever of passion (kāma-roga).“ 263
श्लोक ( Shlok ) 264 – 265
निरायुधत्वान्निर्धूतभयकोपमकोपनात् । अरक्तनयनं सौम्यं सदा प्रहसितायितम् ॥२६४॥
रागाद्यशेषदोषाणां निर्जयादतिमानुषम् । मुखाब्जं यस्य शास्तृत्वमनुशास्ति सुमेधसः ॥२६५॥
शस्त्ररहित होने के कारण जो भय और क्रोध से रहित हैं तथा क्रोध का अभाव होने से जिसके नेत्र लाल नहीं हैं, जो सदा सौम्य और मंद मुसकान से पूर्ण रहता है, राग आदि समस्त दोषों के जीत लेने से जो समस्त अन्य पुरुषों के मुखों से बढ़कर है ऐसा जिनका मुखकमल ही विद्वानों के लिए उत्तम शासकपना का उपदेश देता है अर्थात् विद्वान् लोग जिनका मुख-कमल देखकर ही जिन्हें उत्तम शासक समझ लेते हैं ।।264-265।।
“Being without weapons, they are free from fear and anger.
Due to the absence of anger, their eyes are never red, and they always remain serene, adorned with a gentle smile.
Having conquered all defects such as attachment and aversion, their lotus-like face surpasses the radiance of all others.
Thus, their very face itself preaches the supreme path of righteousness, making the wise recognize them as the ultimate guides and rulers (Shāstṛ).“264-265
श्लोक ( Shlok ) 266
स एवाप्तो जगद्वयाप्तज्ञानवैराग्यवैभवः । तदुपज्ञमतो ध्यानं श्रेयं श्रेयोऽर्थिनामिदम् ॥२६६॥
इसके सिवाय जिनके ज्ञान और वैराग्य का वैभव समस्त जगत् में फैला हुआ है ऐसे अरहंतदेव ही आप्त हैं । यह ध्यान का स्वरूप उन्हीं के द्वारा कहा हुआ है इसलिए कल्याण चाहने वालों के लिए कल्याणस्वरूप है ।।266।।
“Moreover, the Arahant Deva alone is the true Āpta (trustworthy one), as their glory of knowledge and detachment spreads throughout the entire world.
Since the nature of meditation (dhyāna) has been revealed by them, it is indeed the embodiment of ultimate well-being for those who seek liberation.”266
श्लोक ( Shlok ) 267
इति गदत्ति गणेन्द्रे ध्यानतत्वं महद्धौं मुनिसदसि मुनीन्द्राः प्रातुषन्भक्तिभाजः ।
घनपुलकित मूहुर्गात्रमा विर्मु खाब्जं ‘दिनकरकरयोगादाकरा वाम्बुजानाम् ॥२६७॥
इस प्रकार बड़ी-बड़ी ऋद्धियों को धारण करने वाले गौतम गणधर ने जब मुनियों की सभा में ध्यानतत्त्व का निरूपण किया तब भक्ति को धारण करने वाले वे मुनिराज बहुत ही संतुष्ट हुए । उनके शरीर हर्ष से रोमांचित हो उठे और जिस प्रकार सूर्य की किरणों के संपर्क से कमलों का समूह प्रफुल्लित हो जाता है उसी प्रकार हर्ष से उनके मुखकमल भी प्रफुल्लित हो गये थे ।।267।।
“Thus, when Gautama Ganadhara, endowed with great supernatural powers (ṛddhis), expounded the essence of meditation (dhyāna-tattva) in the assembly of monks,
the ascetic sages, filled with devotion, were deeply satisfied.
Their bodies thrilled with joy, and just as lotuses bloom upon contact with the sun’s rays, their lotus-like faces radiated with delight.” 267
श्लोक ( Shlok ) 268
स्तुतिमुखरमुखास्ते योगिनो योगिमुख्यं क्षणमिव जिनसेनाधीश्वरं तं प्रणुत्य ।
प्रणिदधुरथ चेतः श्रोतुमार्हन्त्य लक्ष्मीं समधिगतसमग्रज्ञानधाम्नः स्वधाम्नः ॥२६८।
अथानंतर स्तुति करने से जिनके मुख वाचालित हो रहे हैं ऐसे उन सभी योगियों ने योगियों में मुख्य और जिनसेनाधीश्वर अर्थात् जिनेंद्र भगवान की चार संघरूपी सेना के अथवा आचार्य जिनसेन के स्वामी गौतमगणधर की थोड़ी देर तक स्तुति कर, जिन्हें समस्त ज्ञान का तेज प्राप्त हुआ है और जो अपने आत्मस्वरूप में ही स्थिर हैं ऐसे भगवान् वृषभदेव की आर्हंत्य लक्ष्मी को सुनने के लिए चित्त स्थिर किया ।।268।।
“Afterward, all those yogis, whose lips moved in praise,offered brief eulogies to the foremost among yogis, the Supreme Lord of the Jina army,or to Acharya Jinsen’s master, Gautama Ganadhara.
Then, they steadied their minds to listen to the divine glory of Lord Rishabha Deva,who is radiant with the brilliance of absolute knowledge and remains ever established in his true self.” 268
इत्यार्षे भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसंयहे ध्यानतत्त्वानुवर्णनं नाम एकविंशं पर्व ॥२१॥
इस प्रकार भगवज्जिनसेनाचार्य प्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराण संग्रह (के हिंदी भाषानुवाद) में ध्यानतत्त्व का वर्णन करने वाला इक्कीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ।।21।।
“Thus, the twenty-first canto, which describes the principles of meditation (Dhyānatattva), concludes in the Triṣaṣṭi-lakṣaṇa Mahāpurāṇa Saṅgraha, composed by the venerable Acharya Jinseṇa.”(21)
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन
पर्व 22 – श्लोक 1 से 11
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209
आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192
आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 253 | श्लोक 254 से 261
आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 95 | श्लोक 96 से 111 | श्लोक 112 से 120 | श्लोक 121 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 205 | श्लोक 206 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 261