आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 65 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 95 | श्लोक 96 से 111 | श्लोक 112 से 120 | श्लोक 121 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161
श्लोक 162 से 171 धर्म्यध्यान का फल
धर्म्यध्यान से अशुभ कर्मों की निर्जरा होती है। यह स्वर्ग और मोक्ष देता है। ध्यान छूटने पर भावनाओं का चिंतवन करना चाहिए। गौतम ने श्रेणिक को धर्म्यध्यान समझाया। शुक्लध्यान मोक्ष का कारण है। यह शुक्ल और परम शुक्ल दो भेदों का है। पहले शुक्लध्यान के दो भेद हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 21 – Shlok 162 to 171
श्लोक ( Shlok ) 162
फलं ध्यानवरस्यास्य विपुला निर्ज रैनसाम् । शुभकर्मोदयोद्भूतं सुखं च विबुधेशिनाम् ॥१६२॥
अशुभ कर्मों की अधिक निर्जरा होना और शुभ कर्मों के उदय से उत्पन्न हुआ इंद्र आदि का सुख प्राप्त होना यह सब इस उत्तम धर्म्यध्यान का फल है ।।162।।
The excellent Dharmya Dhyana results in the greater eradication (Nirjara) of inauspicious karmas and leads to the attainment of divine pleasures, such as those experienced by celestial beings (Indra and others), due to the rise of auspicious karmas. ( 162)
श्लोक ( Shlok ) 163
स्वर्गापवर्गसंप्राप्तिं फलमस्य प्रचक्षते । साक्षात्स्वर्गपरिप्राप्तिः पारम्पर्यात् परंपदम् ॥१६३॥
अथवा स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति होना इस धर्म्यध्यान का फल कहा जाता है । इस धर्म्यध्यान से स्वर्ग की प्राप्ति तो साक्षात् होती है परंतु परम पद अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति परंपरा से होती है ।।163।।
Or, the attainment of heaven and liberation (Moksha) is said to be the result of this Dharmya Dhyana. Through this meditation, one directly attains heaven, whereas the ultimate state—Moksha—is achieved gradually over time. (163)
श्लोक ( Shlok ) 164
ध्यानेऽप्युपरतें धीमानभीक्ष्णं भावयेन्मुनिः । सानुप्रेक्षाः शुभोदर्का भवाभावाय भावनाः ॥१६४॥
ध्यान छूट जाने पर भी बुद्धिमान् मुनि को चाहिए कि वह संसार का अभाव करने के लिए अनुप्रेक्षाओंसहित शुभ फल देने वाली उत्तम-उत्तम भावनाओं का चिंतवन करे ।।164।।
Even if meditation is interrupted, a wise sage should contemplate the noble and auspicious reflections (Bhavanas) along with Anuprekshas (contemplations) to weaken worldly attachments and ultimately bring about the cessation of worldly existence. (164)
श्लोक ( Shlok ) 165
इत्युक्तलक्षणं धर्म्यं मगधाधीश निश्चिनु । शुक्लध्यानमितो वक्ष्ये साक्षान्मुक्त्यङ्गमङ्गिनाम् ॥१६५॥
गौतम स्वामी राजा श्रेणिक से कहते हैं कि हे मगधाधीश, इस प्रकार जिसका लक्षण कहा जा चुका है ऐसे इस धर्म्यध्यान का तू निश्चय कर―उस पर विश्वास ला । अब आगे शुक्लध्यान का निरूपण करूंगा जो कि जीवों के मोक्ष प्राप्त होने का साक्षात् कारण है ।।165।।
Gautam Swami said to King Shrenik: “O King of Magadha, understand and have firm faith in this Dharmya Dhyana, whose characteristics have been explained. Now, I shall describe Shukla Dhyana, which is the direct cause of beings attaining Moksha (liberation).” ( 165)
श्लोक ( Shlok ) 166
कषाय मळविश्लेषात् शुक्लशब्दाभिधेयताम् । उपेयिवदिदं ध्यानं सान्तर्भेदं निबोध में ॥१६६।।
कषायरूपी मल के नष्ट होने से जो शुक्ल ऐसे नाम को प्राप्त हुआ है ऐसे इस शुक्लध्यान का अवांतर भेदों से सहित वर्णन करता हूं सो तू उसे मुझसे अच्छी तरह समझ ले ।।166।।
The Shukla Dhyana (pure meditation) is so named because it arises from the complete destruction of the impurities of passions (Kashayas). I shall now describe its various subtypes—understand them well from me. ( 166)
श्लोक ( Shlok ) 167
शुक्लं परमशुक्लं चेत्याम्नाये तद् द्विधोदितम् । छद्मस्थस्वामिकं पूर्व परं केवलिनां मतम् ॥१६७॥
वह शुक्ल ध्यान शुक्ल और परम शुक्ल के भेद से आगम में दो प्रकार का कहा गया है, उनमें से पहला शुक्लध्यान तो छद्मस्थ मुनियों के होता है और दूसरा परम शुक्लध्यान केवली भगवान् (अरहंतदेव) के होता है ।।167।।
In the scriptures, Shukla Dhyana is classified into two types: Shukla and Param Shukla. The first type, Shukla Dhyana, is attained by monks who are still in the Chhadmastha (non-omniscient) state, while the second, Param Shukla Dhyana, is exclusive to the Kevali Bhagwan (omniscient Arhant). ( 167)
श्लोक ( Shlok ) 168
द्वेधाद्यं स्यात् पृथक्त्वादि वीचारान्त वितर्कणम्। तथैकत्वाद्यवीचारपदान्तं च वितर्कणम् ॥१६८॥
पहले शुक्लध्यान के दो भेद हैं, एक पृथक्त्ववितर्कवीचार और दूसरा एकत्ववितर्कवीचार ।।168।।
The first type of Shukla Dhyana is further divided into two subtypes: Pṛthaktva-vitarka-vichāra (meditation with analytical thoughts of separateness) and Ekatva-vitarka-vichāra (meditation with analytical thoughts of oneness). ( 168)
श्लोक ( Shlok ) 169
इत्याद्यस्य भिदे” स्यातामन्वर्था श्रुतिमाश्रिते । तदर्थव्यक्तये चैतत् तन्नामद्वयनिर्वचः ॥१६९॥
इस प्रकार पहले शुक्लध्यान के जो ये दो भेद हैं, वे सार्थक नाम वाले हैं । इनका अर्थ स्पष्ट करने के लिए दोनों नामों की निरुक्ति (व्युत्पत्ति-शब्दार्थ) इस प्रकार समझना चाहिए ।।169।।
Thus, these two subtypes of the first Shukla Dhyana are meaningfully named. To clarify their meanings, the etymology (derivation and explanation) of both names should be understood as follows. ( 169)
श्लोक ( Shlok ) 170
पृथक्त्वेन वितर्कस्य वीचारो यत्र तद् विदुः । सवितर्क सवीचारं पृथक्त्वादिपदाह्वयम् ॥१७०॥
जिस ध्यान में वितर्क अर्थात शास्त्र के पदों का पृथक्-पृथक् रूप से वीचार अर्थात् संक्रमण होता रहे उसे पृथक्त्ववितर्कवीचार नाम का शुक्लध्यान कहते हैं । भावार्थ―जिसमें अर्थ व्यंजन और योगों का पृथक्-पृथक्, संक्रमण होता रहे अर्थात् अर्थ को छोड़कर व्यंजन (शब्द) का और व्यंजन को छोड़कर अर्थ का चिंतवन होने लगे अथवा इसी प्रकार मन, वचन और काय इन तीनों योगों का परिवर्तन होता रहे उसे पृथक्त्ववितर्कवीचार कहते हैं ।।170।।
The meditation in which Vitarka (analytical thought) involves the sequential transition of scriptural words (Pada) in a distinct manner is called Pṛthaktva-vitarka-vichāra Shukla Dhyana.
Explanation: In this meditation, there is a separate and alternating contemplation of meaning (Artha) and expression (Vyanjana—words), where one shifts focus from meaning to words and vice versa. Similarly, the transition between the three activities (Yoga)—mind (Manas), speech (Vachana), and body (Kaya)—occurs in a distinct sequence. This state is referred to as Pṛthaktva-vitarka-vichāra. (170)
श्लोक ( Shlok ) 171
एकत्वेन वितर्कस्य स्याद् यत्रा विचरिष्णुता । सवितर्कमवीचारमेकत्वादिपदाभिधाम् ॥१७१॥
जिस ध्यान में वितर्क के एकरूप होने के कारण वीचार नहीं होता अर्थात् जिसमें अर्थ व्यंजन और योगों का संक्रमण नहीं होता उसे एकत्ववितर्कवीचार नाम का शुक्लध्यान कहते हैं ।।171।।
The meditation in which Vitarka (analytical thought) remains uniform, causing no transition (Vichara), meaning there is no alternating contemplation of meaning (Artha) and expression (Vyanjana), nor any shift between the activities (Yoga) of mind, speech, and body, is called Ekatva-vitarka-vichara Shukla Dhyana. (171)
श्लोक 172 से 182
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209
आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192
आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 253 | श्लोक 254 से 261
आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 95 | श्लोक 96 से 111 | श्लोक 112 से 120 | श्लोक 121 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161