आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121
श्लोक 122 से 131 श्रेयान्स का यश और दान की शुरुआत
श्रेयान्स के यश से संसार भर गया। दान की प्रथा श्रेयान्स से शुरू हुई। भरत को आश्चर्य हुआ कि उसने भगवान का अभिप्राय कैसे जाना। देवों ने श्रेयान्स की पूजा की। भरत ने श्रेयान्स से अभिप्राय पूछा। श्रेयान्स ने कहा कि भगवान के रूप से उसे जातिस्मरण हुआ।
English translation of Ādi purāṇa parv 20 – Shlok 122 to 131
श्लोक ( Shlok ) 122
अहो श्रेय इति श्रेयस्तच्छ्रे यश्चेत्यभूत्तदा। श्रेयों यशोमयं विश्वं सहानं हि यशःप्रदम् ॥१२२॥
उस समय ‘अहो कल्याण, ऐसा कल्याण, और उस प्रकार का कल्याण’ इस तरह समस्त संसार राजकुमार श्रेयान्स के यश से भर गया था सो ठीक ही है क्योंकि उत्तम दान यश को देने वाला होता ही है ।।122।।
“At that time, the entire world was filled with the glory of Prince Shreyans, with people exclaiming, ‘Oh, what great merit! Such great merit!’ And rightly so, for an excellent donation always bestows great fame.” ( 122)
श्लोक ( Shlok ) 123
तदादितदुपज्ञं तद्दानं जगत्ति पप्रथे । ततो विस्मयमासेदुः भरताद्या नरेश्वराः ॥१२३॥
संसार में दान देने की प्रथा उसी समय से प्रचलित हुई और दान देने की विधि भी सबसे पहले राजकुमार श्रेयान्स ने ही जान पायी थी । दान की इस विधि से भरत आदि राजाओं को बड़ा आश्चर्य हुआ था ।।123।।
“The tradition of giving alms began in the world from that very moment, and it was Prince Shreyans who first understood the method of donation. Kings like Bharat and others were greatly astonished by this practice of charity.” (123)
श्लोक ( Shlok ) 124
कथंभर्तुरभिप्रायो विदितोऽनेन मौनिनः । कलयन्निति” चित्तेन भरतेशो विसिष्मिये ॥१२४॥
महाराज भरत अपने मन में यही सोचते हुए आश्चर्य कर रहे थे कि इसने मौन धारण करने वाले भगवान् का अभिप्राय कैसे जान लिया? ।।124।।
“King Bharat, wondering in his mind, was astonished—how did he understand the intent of the Lord, who had taken a vow of silence?” ( 124)
श्लोक ( Shlok ) 125
सुराश्च विस्मयन्ते स्म ते संभूय समागताः । प्रतीताः कुरुराजं तं पूजयामासुरादरात् ॥ १२५॥
देवों को भी उससे बड़ा आश्चर्य हुआ था, जिन्हें श्रेयान्स पर बड़ा भारी विश्वास उत्पन्न हुआ था ऐसे उन देवों ने एक साथ आकर बड़े आदर से उसकी पूजा की थी ।।125।।
“The gods were also greatly astonished, and they developed immense faith in Shreyans. With great reverence, they gathered together and worshiped him.” (125)
श्लोक ( Shlok ) 126
ततो भरतराजेन श्रेयानप्रच्छि सादरम् । महादानपते ब्रूहि कथं ज्ञातमिदं त्वया ॥१२६॥
तदनंतर महाराज भरत ने आदरसहित राजकुमार श्रेयान्स से पूछा कि हे महादानपते, कहो तो सही तुमने भगवान् का यह अभिप्राय किस प्रकार जान लिया ।।126।।
“Then, with great respect, King Bharata asked Prince Shreyans, ‘O great lord of charity, tell me, how did you understand the intention of the Lord?'” ( 126)
श्लोक ( Shlok ) 127
अदृष्टपूर्व लोकेऽस्मिन् दानं कोऽर्हति वेदितुम्। भगवानिव पूज्योऽसि कुरुराज त्वमद्य नः ॥१२७॥
इस संसार में पहले कभी नहीं देखी हुई इस दान की विधि को कौन जान सकता है । हे कुरुराज, आज तुम हमारे लिए भगवान् के समान ही पूज्य हुए हो ।।127।।
“Who could have known this method of charity, which has never been seen before in this world? O King of the Kurus, today you have become as worthy of worship for us as the Lord Himself.” ( 127)
श्लोक ( Shlok ) 128
त्वं दानतीर्थकृच्छ्रे यान् त्वं महापुण्यभागसि। ततस्त्वामिति पृच्छामि यत्सत्यं कथयाद्य मे ॥१२८॥
हे राजकुमार श्रेयान्स, तुम दानतीर्थ की प्रवृत्ति करने वाले हो, और महापुण्यवान् हो इसलिए तुम से यह सब पूछ रहा हूँ कि जो सत्य हो वह आज मुझसे कहो ।।128।।
“O Prince Shreyans, you are the initiator of the sacred tradition of charity and a being of great merit. That is why I ask you—tell me the truth today.” ( 128)
श्लोक ( Shlok ) 129
इत्यसौ तेन संपृष्टः श्रेयान् प्रत्यब्रवीदिदम् । दशांशुकलापेन ज्योत्स्नां तन्वन्निवान्तरे ॥१२९॥
इस प्रकार महाराज भरत द्वारा पूछे गये श्रेयान्सकुमार अपने दाँतों की किरणों के समूह से बीच में चाँदनी को फैलाते हुए के समान नीचे लिखे अनुसार उत्तर देने लगे ।।129।।
“Thus, in response to King Bharata’s inquiry, Prince Shreyans, whose teeth shone like beams of moonlight spreading radiance all around, began to answer as follows.” ( 129)
श्लोक ( Shlok ) 130 – 131
रुजाहरमिवासाद्य सामयः परमौषधम् । विपासितो वा स्वच्छाम्बुकलितं सोत्पलं सरः ॥१३०॥
दृष्ट्वा भागवतं रूपं परं प्रीतोऽस्म्यतो मम । जातिस्मरत्व मुदभूते नाभुत्सि गुरोर्मतम् ॥१३१॥
कि जिस प्रकार रोगी मनुष्य रोग को दूर करने वाली किसी उत्कृष्ट औषधि को पाकर प्रसन्न होता है अथवा प्यासा मनुष्य स्वच्छ जल से भरे हुए और कमलों से सुशोभित तालाब को देखकर प्रसन्न होता है उसी प्रकार भगवान् के उत्कृष्ट रूप को देखकर मैं अतिशय प्रसन्न हुआ था और इसी कारण मुझे जातिस्मरण हो गया था जिससे मैंने भगवान् का अभिप्राय जान लिया था ।।130-131।।
“Just as a sick person feels joy upon obtaining an excellent medicine that cures their ailment, or as a thirsty person rejoices upon seeing a clear, lotus-filled pond, in the same way, I was immensely delighted upon witnessing the divine form of the Lord. Due to this great joy, I attained recollection of my past lives (Jatismaran), through which I understood the Lord’s intent.” (Verses 130-131)
श्लोक 132 से 141
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आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202 | श्लोक 203 से 209
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