आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
श्लोक 52 से 64 ध्यान की तैयारी
रौद्रध्यान का फल नरकगति है। आर्त और रौद्र का त्याग करना चाहिए। धर्म्य और शुक्ल उत्तम हैं। मुनि एकांत, श्मशान, नदी किनारे पर ध्यान करते हैं। पर्यंक आसन से शरीर सम रखते हैं। हाथ ऊपर, आँखें संतुलित रखते हैं। धीरे श्वास लेते हैं। मन को हृदय आदि में स्थिर कर तत्त्वों का चिंतवन करते हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 21 – Shlok 52 to 64
श्लोक ( Shlok ) 52
प्रतीतलिङ्ङ्गमेवैतद् रौद्रध्यानद्वयं भुवि । नारकं दुःखमस्याहु फलं रौद्रस्य दुस्तरम् ॥५२॥
स्तेयानंद और संरक्षणानंद इन दोनों रौद्रध्यानों के बाह्य चिह्न संसार में प्रसिद्ध हैं । गणधरदेव ने इस रौद्रध्यान का फल अतिशय कठिन नरकगति के दुःख प्राप्त होना बतलाया है ।।52।।
The external signs of Steyānanda (delight in stealing) and Rakṣaṇānanda (obsession with protecting possessions) are well known in the world.
The revered Gaṇadhara Deva has declared that the consequence of engaging in Raudra Dhyāna (wrathful meditation) is immense suffering in the extremely torturous realms of hell. 52
श्लोक ( Shlok ) 53
बाह्यं तु लिङ्ङ्गमस्याहुर्भ्रू भङ्गं मुखविक्रियाम् । प्रस्वेदमङ्गकं पञ्च नेत्रयोश्चातिताम्र ताम् ॥५३॥
भौंह टेढ़ी हो जाना, मुख का विकृत हो जाना, पसीना आने लगना, शरीर कंपने लगना और नेत्रों का अतिशय लाल हो जाना आदि रौद्रध्यान के बाह्य चिह्न कहलाते हैं ।।53।।
Furrowing the eyebrows, distortion of the face, excessive sweating, trembling of the body, and intense redness of the eyes—these are considered the external signs of Raudra Dhyāna (wrathful meditation). 53
श्लोक ( Shlok ) 54
प्रयत्नेन विनैवैतदसद्ध्या नद्वयं भवेत् । अनादिवासनोद्भूतमतस्तद्विसृजेन्मुनिः ॥५४॥
अनादिकाल की वासना से उत्पन्न होने वाले ये दोनों (आर्त और रौद्र) ध्यान बिना प्रयत्न के ही हो जाते हैं इसलिए मुनियों को इन दोनों का ही त्याग करना चाहिए ।।54।।
Both Ārtta Dhyāna (distressful meditation) and Raudra Dhyāna (wrathful meditation) arise effortlessly due to the deep-rooted tendencies (Vāsanā) accumulated since beginningless time.
Therefore, ascetics (Munis) should completely renounce both of these meditations.54
श्लोक ( Shlok ) 55 – 56
ध्यानद्वयं विसृज्याद्यमस त्संसारकारणम् । यदोत्तरं द्वयं ध्यानं मुनिनाभ्यसिसिप्यते ॥५५॥
तदेदं परिकर्मेष्टं देशा वस्थाद्युपाश्रयम् । बहिःसामग्य्रधीनं हि फलमत्र द्वयात्मकम् ॥५६॥
संसार के कारणस्वरूप पहले कहे हुए दोनों खोटे ध्यानों का परित्याग कर मुनि लोग अंत के जिन दो ध्यानों का अभ्यास करते हैं वे उत्तम है, देश तथा अवस्था आदि की अपेक्षा रखते हैं, बाह्य सामग्री के अधीन हैं और इन दोनों का फल भी गौण तथा मुख्य की अपेक्षा दो प्रकार का है ।।55-56।।
By renouncing the two previously mentioned impure meditations (Ārtta Dhyāna and Raudra Dhyāna), which are the root causes of worldly existence, ascetics (Munis) engage in the practice of the two superior types of meditation that follow.
These higher meditations are influenced by factors such as place (Deśa), spiritual stage (Avasthā), and external conditions (Bāhya Sāmagri).
The results of these two meditations are also of two types—one being secondary (Gauna) and the other primary (Mukhya). 55-56
श्लोक ( Shlok ) 57 – 64
शून्यालये स्मशाने वा जरदुद्यानकेऽपि वा। सरित्पुलिनगिर्यग्रगह्वरे द्रुमकोटरे ॥५७॥
शुचावन्यतमे देशे चित्तहारिण्यपातके । नात्युष्णशिशिरे नापि प्रवृद्धत्तरमारुते ॥५८॥
विमुक्तत्रर्ष संबाधे सूक्ष्मजन्वनुपद्रुते । जलसंपात निर्मुक्ते मन्दमन्दनभस्वति ॥५९॥
पल्यङ्कमासनं बद्ध्वा सुनिविष्टो महीतले । सममृज्वायतं विभ्रद्गात्रमस्तब्ध वृत्तिकम् ॥६०॥
स्वपर्यङ्के करं वामं न्यस्योत्तानतलं पुनः । तस्योपरीतरं पाणिमपि विन्यस्य तत्समम् ॥६१॥
नात्युन्मिषन्न चात्यन्तं निमिषन्मन्दमुच्छ्रयसन् । दन्तैर्दन्ताग्रसंधानपरी धीरो ‘निरुद्धधीः ॥६२॥
हृदि मूर्घ्नि ललाटे वा नाभेरूर्ध्व परत्र वा । स्वाभ्यासवशतश्चित्तं निधायाध्यात्मविन्मुनिः ॥६३॥
ध्यायेद् द्रव्यादियाथात्म्यमागमार्थानुसारतः । परीषहोत्थिता बाधाः सहमानो निराकुलः ॥६४॥
अध्यात्म के स्वरूप को जानने वाला मुनि, सूने घर में, श्मशान में, जीर्ण वन में, नदी के किनारे, पर्वत के शिखर पर, गुफा में, वृक्ष की कोटर में अथवा और भी किसी ऐसे पवित्र तथा मनोहर प्रदेश में, जहाँ आतप न हो, अतिशय गरमी और सर्दी न हो, तेज वायु न चलता हो, वर्षा न हो रही हो, सूक्ष्म जीवों का उपद्रव न हो, जल का प्रपात न हो और मंद-मंद वायु बह रही हो, पर्यंक आसन बाँधकर पृथ्वीतल पर विराजमान हो, उस समय अपने शरीर को सम, सरल और निश्चल रखे, अपने पर्यंक में बाँया हाथ इस प्रकार रखे कि जिससे उसकी हथेली ऊपर की ओर हो, इसी प्रकार दाहिने हाथ को भी बाँया हाथ पर रखे, आंखों को न तो अधिक खोले ही और न अधिक बंद ही रखे, धीरे-धीरे उच्छ्वास ले, ऊपर और नीचे की दोनों दाँतों की पंक्तियों को मिलाकर रखे और धीर-वीर हो मन की स्वच्छंद गति को रोके । फिर अपने अभ्यास के अनुसार मन को हृदय में, मस्तक पर, ललाट में, नाभि के ऊपर अथवा और भी किसी जगह रखकर परीषहों से उत्पन्न हुई बाधाओं को सहता हुआ निराकुल हो आगम के अनुसार जीव-अजीव आदि द्रव्यों के यथार्थस्वरूप का चिंतवन करे ।।57-64।।
A monk who understands the nature of spirituality should seek solitude in a quiet and serene place—such as an abandoned house, a cremation ground, an ancient forest, a riverbank, a mountaintop, a cave, the hollow of a tree, or any other pure and peaceful location.
This place should be free from direct sunlight, extreme heat or cold, strong winds, rainfall, disturbances from minute living beings, and the noise of flowing water. The air should be gently blowing.
Seated on the ground in the Paryaṅka Āsana (cross-legged posture), the monk should keep his body upright, steady, and still. His left hand should be placed on his lap with the palm facing upward, and the right hand should rest on top of the left. His eyes should be neither fully open nor completely closed.
He should breathe gently, keep his upper and lower teeth lightly touching, and with a calm and courageous mind, restrain the uncontrolled movements of his thoughts.
Then, according to his level of practice, he should focus his mind on a chosen point—such as the heart, head, forehead, or navel—while enduring hardships without disturbance. Remaining undisturbed, he should contemplate the true nature of the six substances (Dravyas)—living beings (Jīva), non-living matter (Ajīva), and so on—as described in the scriptures. 57-64
श्लोक 65 से 71
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192
आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 253 | श्लोक 254 से 261
आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51