आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 91 | श्लोक 92 से 101 |
श्लोक 102 से 111 विजयार्ध पर्वत की प्राकृतिक शोभा
विजयार्ध पर्वत गंगा से सींचे वृक्षों और मेघ-चुंबित शिखरों से मेरु को जीतता था। इसके उपवन फूलों और भ्रमरों से शोभायमान थे। गंगा और सिंधु नदियाँ इसे पवित्र करती थीं। विद्याधर यहाँ भाग्य और पुरुषार्थ से फल पाते थे। यहाँ धान्य, रत्न, और फल असमय में उत्पन्न होते थे। सरोवरों पर हंस और कोयल शब्द करते थे। वायु विद्याधरियों को संतोष देता था। सिंह, हाथी, और हरिण वन में थे। हंसिनी अपने साथी के लिए रोती थी।
English translation of Ādi purāṇa parv 19 – Shlok 102 to 111
श्लोक ( Shlok ) 102
सुरसरिज्जलसिक्त तटद्रुमो जलदचुम्बितसानुवनोदयः । मणिमयैः शिखरेः खचरोषितैर्विजयते गिरिरेष सुराचलान् ॥१०२॥
जिसके किनारे पर उगे हुए वृक्ष गंगा नदी के जल से सींचे जा रहे हैं और जिसके शिखरों पर के वन मेघों से चुंबित हो रहे हैं ऐसा यह विजयार्ध पर्वत विद्याधरों से सेवित अपने मणिमय शिखरों-द्वारा मेरु पर्वतों को भी जीत रहा है ।।102।।
The majestic Vijayaradha Mountain, whose trees along the edges are nourished by the sacred waters of the Ganga and whose forested peaks are kissed by the clouds, surpasses even the great Mount Meru with its jewel-studded summits, as it remains ever-adored by the Vidyadharas. ||102||
श्लोक ( Shlok ) 103
सुरनदीस लिलप्लुतप। दपैस्तटवनैः कुसुमाञ्चितमूर्द्धिभिः। मुखरितालि भिरेष महाचलो विहसतीव सुरोपवनश्रियम् ॥१०३॥
जिनके वृक्ष गंगा नदी के जल से सींचे हुए हैं, जिनके अग्रभाग फूलों से सुशोभित हो रहे हैं और जिन में अनेक भ्रमर शब्द कर रहे हैं ऐसे किनारे के उपवनों से यह पर्वत ऐसा मालूम होता है मानो देवों के उपवनों की शोभा की हँसी ही कर रहा हो ।।103।।
With trees nourished by the sacred waters of the Ganga, blossoms adorning its peaks, and countless bees humming melodiously, the gardens along the edges of this mountain appear as if they are mocking the splendor of the divine celestial gardens. ||103||
श्लोक ( Shlok ) 104
इयमितः सुरसिन्धुरपां छटाः प्रकिरतीह विभाति पुरो दिशि । वहति सिन्धुरितश्च महानदी मुखरिता कळहंसकलस्वनैः ॥१०४॥
इधर यह पूर्व दिशा की ओर जल के छींटों की वर्षा करती हुई गंगा नदी सुशोभित हो रही है और इधर यह पश्चिम की ओर कलहंस पक्षियों के मधुर शब्दों से शब्दायमान सिंधु नदी बह रही है ।।104।।
On one side, the sacred Ganga River flows gracefully towards the east, sprinkling droplets of water as it glistens beautifully. On the other side, the Sindhu River flows westward, resonating with the sweet calls of swans, adding to the mountain’s enchanting splendor. ||104||
श्लोक ( Shlok ) 105
हिमवतः शिरसः किल निःसृते सकमलालयतः सरिताविमे । शुचितयास्य तु पादमुपाश्रिते शुचिरलङध्यतरो हि वृथोन्नतेः ॥१०५॥
यद्यपि यह दोनों ही गंगा और सिंधु नदियाँ हिमवत् पर्वत के मस्तक पर के पद्मनामक सरोवर से निकली हैं तथापि शुचिता अर्थात् पवित्रता के कारण (पक्ष में शुक्लता के कारण) इस विजयार्ध के पाद अर्थात् चरणों (पक्ष में प्रत्यंतपर्वत) की सेवा करती हैं सो ठीक है क्योंकि जो पवित्र होता है उसका कोई उल्लंघन नहीं कर सकता । पवित्रता के सामने ऊँचाई व्यर्थ है । भावार्थ―गंगा और सिंधु नदी हिमवत् पर्वत के पद्य नामक सरोवर से निकल कर गुहाद्वार से विजयार्ध पर्वत के नीचे होकर बहती हैं । इसी बात का कवि ने आलंकारिक ढंग से वर्णन किया है । यहाँ शुचि और शुक्ल शब्द श्लिष्ट हैं ।।105।।
Although both the Ganga and Sindhu rivers originate from the sacred Padma lake atop the Himalayas, they still flow down to serve the feet (or foothills) of the Vijayaradha Mountain due to its purity (or its radiant whiteness). This is only natural, for nothing can surpass true purity—mere height holds no significance before it.
Interpretation: The poet metaphorically describes how the Ganga and Sindhu rivers, emerging from the Padma lake in the Himalayas, pass through the cave-gates and flow beneath the Vijayaradha Mountain. The clever use of the words “Shuchi” (purity) and “Shukla” (whiteness) creates a poetic play on words, emphasizing that holiness and virtue are greater than mere physical elevation. ||105||
श्लोक ( Shlok ) 106
इह सदैव सदैवविचेष्टितैः सुकृतिनः “कृतिनः खचराधिपाः । कृतनयास्तनया इव सत्पितुः समुपयान्ति फलान्यमुतो गिरेः ॥१०६
जिस प्रकार नीतिमान् और नीति पुत्र श्रेष्ठ पिता से मनवांछित फल प्राप्त करते हैं उसी प्रकार पुण्यात्मा, कार्यकुशल और नीतिमान् विद्याधर अपने भाग्य और पुरुषार्थ के द्वारा इस पर्वत से सदा मनोवांछित फल प्राप्त किया करते हैं ।।106।।
Just as a wise and righteous son attains his desired rewards from a virtuous and noble father, similarly, the virtuous, skillful, and prudent Vidyadharas always obtain their heart’s desires from this mountain through their destiny and efforts. ||106||
श्लोक ( Shlok ) 107
क्षितिरकृष्टपचेलिमसस्यसूः खनिरयत्नजरत्न विशेषसूः । इह वनस्पतयश्च सदोन्नता दधति पुष्पफलर्द्धिमकालजाम् ॥१०७॥
यहाँ की पृथ्वी बिना बोये ही धान्य उत्पन्न करती रहती है, यहाँ की खानें बिना प्रयत्न किये ही उत्तम-उत्तम रत्न पैदा करती हैं और यहाँ के ऊँचे-ऊँचे वृक्ष भी असमय में उत्पन्न हुए पुष्प और फलरूप संपत्ति को सदा धारण करते रहते हैं ।।107।।
Here, the earth yields abundant grain without the need for sowing. The mines naturally produce the finest gems without any effort. The towering trees continuously bear flowers and fruits, offering their riches even out of season. ||107||
श्लोक ( Shlok ) 108
सरसि सारसहंसविकूजितैः कुसुमितासु लतास्वलिनिः स्वनैः । उपवनेषु च कोकिलनिक्वणैर्हृदि शयोऽत्र सदैव विनिद्रितः ॥१०८॥
यहाँ के सरोवरों पर सारस और हंस पक्षी सदा शब्द करते रहते हैं, फूली हुई लताओं पर भ्रमर गुंजार करते रहते हैं और उपवनों में कोयलें शब्द करती रहती हैं जिससे ऐसा जान पड़ता है मानो यहाँ कामदेव सदा ही जागृत रहा करता हो ।।108।।
At the lakes here, cranes and swans continuously call out, bees hum around the blooming creepers, and cuckoos sing melodiously in the groves. This creates the impression that Kamadeva, the god of love, is forever awake and present in this enchanting place. ||108||
श्लोक ( Shlok ) 109
कमलिनीवनरेणुविकर्षिभिः कुसुमितोपवनद्रुमधूननैः । धृतिमुपैति सदा खचरीजनो रतिपरि श्रमनुद्भिरिहानिलैः ॥१०९॥
जो कमलवन के पराग को खींच रहा है, जो उपवनों के फूले हुए वृक्षों को हिला रहा है और जो संभोगजन्य परिश्रम को दूर कर देने वाला है ऐसे वायु से यहाँ की विद्याधरियां सदा संतोष को प्राप्त होती रहती हैं ।।109।।
The Vidyadhari maidens here always find contentment in the gentle breeze that carries the fragrance of lotus pollen, sways the blossoming trees of the groves, and soothes the fatigue caused by the pleasures of love. ||109||
श्लोक ( Shlok ) 110
हरिरितः प्रतिगर्जति कानने करिकुलं वनमुज्झत्ति तद्भयात् । परिगलत्कवलं व मृगीकुलं गिरिनिकुञ्जतला दवसर्पति ॥११०।।
इधर इस वन में यह सिंह गरज रहा है उसके भय से यह हाथियों का समूह वन को छोड़ रहा है और जिनके मुख से ग्रास भी गिर रहा है ऐसा यह हरिणियों का समूह भी पर्वत के तलागृहों से निकलकर भागा जा रहा है ।।110।।
Here, in this forest, a lion roars loudly, causing a herd of elephants to flee, abandoning the woodland in fear. Even the deer, so terrified that food drops from their mouths, rush out of the mountain caves in panic. ||110||
श्लोक ( Shlok ) 111
सरसि हंसवधूरियमुत्सुका कमलरेणुविपिञ्जरमञ्जसा । समनुयाति न कोकविशङ्किनी सहचरं गलदश्रु विरौति च ॥ १११ ॥
इधर तालाब के किनारे यह उत्कंठित हुई हंसिनी, जो कमल के पराग से बहुत शीघ्र पीला पड़ गया है ऐसे अपने साथी―प्रिय हंस को चकवा समझकर उसके समीप नहीं जाती है और अश्रु डालती हुई रो रही है ।।111।।
Here, on the edge of the pond, a distressed swan, mistaking her beloved mate—who has quickly turned yellow from the lotus pollen—for a chakva bird, hesitates to approach him. Overcome with sorrow, she weeps, shedding tears. ||111||
श्लोक 112 से 121
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