आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 82 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
श्लोक 222 से 231 धर्मध्यान की सिद्धि
भगवान ने सिद्धों के आठ गुणों का चिंतवन किया। अनंत सम्यक्त्व आदि गुणों का ध्यान किया। बारह अनुप्रेक्षाओं से धर्मध्यान साधा। आज्ञाविचय आदि चार धर्मध्यान धारण किए। वे प्रमादरहित सातवें गुणस्थान में थे। उनकी शुक्ल लेश्या दैदीप्यमान थी।
English translation of Ādi purāṇa parv 20 – Shlok 222 to 231
श्लोक ( Shlok ) 222
चेतसा सोऽभिसं धाय परं पदमनुत्तरम् । दधौ सिद्धगुणानष्टौ प्रागेव सुविशुद्धधीः ॥२२२॥
अतिशय विशुद्ध बुद्धि को धारण करने वाले भगवान् वृषभदेव ने सबसे पहले सर्वश्रेष्ठ मोक्ष-पद में अपना चित्त लगाया और सिद्ध परमेष्ठी के आठ गुणों का चिंतवन किया ।।222।।
Lord Rishabhadeva, possessing an exceptionally pure intellect, first focused His mind on the supreme state of liberation and contemplated the eight attributes of the perfected supreme beings (Siddha Paramesthi). ॥222॥
श्लोक ( Shlok ) 223 – 225
सम्यक्त्वं दर्शनं ज्ञानमनन्तं वीर्यमद्भुतम् । सौक्ष्म्या वगाह्या व्याबाधाः सहागुरुलघुत्वकाः ॥२२३॥
प्रोक्ताः सिद्धगुणा ह्यष्टौ ध्येयाः सिद्धिभभीप्सुना । द्रव्यतः क्षेत्रतः कालाद् भावतश्च तथा परे ॥ २२४॥
गुणैर्द्वादश भिर्युक्तो मुक्तः सूक्ष्मो निरन्जनः । स ध्येयो योगिभिर्व्यक्तो नित्यः शुद्धो मुमुक्षुभिः॥२२५॥
अनंत सम्यक्त्व, अनंतदर्शन, अनंतज्ञान, अनंत और अद्भुत वीर्य, सूक्ष्मत्व, अवगाहनत्व, अव्याबाधत्व और अगुरुलघुत्व ये आठ सिद्धपरमेष्ठी के गुण कहे गये हैं, सिद्धि प्राप्त करने की इच्छा करने वालों को इन गुणों का अवश्य ध्यान करना चाहिए । इसी प्रकार द्रव्य, क्षेत्र, काल तथा भाव की अपेक्षा उनके और भी चार साधारण गुणों का चिंतवन करना चाहिए । इस तरह जो ऊपर कहे हुए बारह गुणों से युक्त हैं, कर्मबंधन से रहित हैं, सूक्ष्म हैं, निरंजन हैं―रागादि भाव कर्मों से रहित हैं, व्यक्त हैं, नित्य हैं और शुद्ध हैं ऐसे सिद्ध भगवान् का मोक्षाभिलाषी मुनियों को अवश्य ही ध्यान करना चाहिए ।।223-225।।
The eight attributes of the perfected supreme beings (Siddha Paramesthi) are said to be: infinite right faith (Anant Samyaktva), infinite perception (Anant Darshan), infinite knowledge (Anant Jnan), infinite and extraordinary energy (Anant and Adbhut Veerya), subtlety (Sookshmatva), interpenetrability (Avagahanatva), freedom from obstruction (Avyabadhtva), and neither heaviness nor lightness (Agurulaghutva).
Those who desire liberation must meditate upon these qualities. Similarly, one should also contemplate the additional four general qualities of the Siddhas based on substance (Dravya), space (Kshetra), time (Kal), and modifications (Bhav).
Thus, the Siddhas, who possess these twelve supreme attributes, are free from the bondage of karma, subtle, pure, free from passions and karmic influences, manifest, eternal, and completely pure. Liberation-seeking monks must certainly meditate upon such a perfected Lord. ॥223-225॥
श्लोक ( Shlok ) 226
ततो दध्यावनुप्रेक्षा “दिध्यासुर्धर्म्यमुत्तमम् । पारि कर्ममितास्तस्य शुभा द्वादशभावनाः ॥ २२६॥
पश्चात् उत्तम धर्मध्यान की इच्छा करने वाले भगवान् ने अनुप्रेक्षाओं का चिंतवन किया क्योंकि शुभ बारह अनुप्रेक्षाएँ ध्यान की परिवार अवस्था को ही प्राप्त हैं अर्थात् ध्यान का ही अंग कहलाती हैं ।।226।।
Thereafter, desiring to engage in supreme righteous meditation (Dharmadhyana), the Lord contemplated the Anuprekshas (reflections), as the twelve noble Anuprekshas are considered integral to meditation and are regarded as its essential components. ॥226॥
श्लोक ( Shlok ) 227
तासां नामस्वरूपं च पूर्वमेवानुवर्णितम् । ततो धर्म्यमसौ ध्यानं प्रपेदे धीद्ध शुद्धिकः ॥२२७॥
उन बारह अनुप्रेक्षाओं के नाम और स्वरूप का वर्णन पहले ही किया जा चुका है । तदनंतर बुद्धि की अतिशय विशुद्धि को धारण करने वाले भगवान् धर्मध्यान को प्राप्त हुए ।।227।।
The names and nature of those twelve Anuprekshas have already been described earlier. Thereafter, the Lord, possessing an exceptionally pure intellect, attained Dharmadhyana (righteous meditation). ॥227॥
श्लोक ( Shlok ) 228 – 229
आशाविचयमाद्यं तदपाय विचयं तथा । विपाक विचयं चान्यत् संस्थानविचयं परम् ॥२२८॥
स्वनामव्यक्ततत्वा नि धर्म्यध्यानानि सोऽध्यगात्। यतो महत्तमं पुण्यं स्वर्गाग्र सुखसाधनम् ॥२२९॥
आज्ञाविचय, अपायविचय, विपाकविचय और संस्थानविचय इस प्रकार धर्मध्यान के चार भेद हैं । जिनका स्वरूप अपने नाम से प्रकट हो रहा है ऐसे ऊपर कहे हुए चारों धर्मध्यान जिनेंद्रदेव ने धारण किये थे क्योंकि उनसे स्वर्ग लोक के श्रेष्ठ सुखों के कारणस्वरूप बड़े भारी पुण्य की प्राप्ति होती है ।।228-229।।
Ājñāvicaya, Apāyavicaya, Vipākavicaya, and Sansthānavicaya—these are the four types of Dharmadhyana (righteous meditation). Their nature is evident from their names. Lord Jinedra practiced these four types of Dharmadhyana, as they lead to the attainment of great merit (puṇya), which is the cause of the supreme pleasures of the heavenly realms. ॥228-229॥
श्लोक ( Shlok ) 230
क्षालितागःपरागस्य विरागस्यास्य योगिनः । प्रमादः क्वाप्यभून्नेत स्तदा ज्ञानादिशक्तिभिः ॥ २३०॥
जिनका पापरूपी पराग (धूलि) धुल गया है और राग-द्वेष आदि विभाव नष्ट हो गये हैं ऐसे योगिराज वृषभदेव के अंतःकरण में उस समय ज्ञान, दर्शन आदि शक्तियों के कारण किसी भी जगह प्रमाद नहीं रह सका था । भावार्थ―धर्मध्यान के समय जिनेंद्रदेव प्रमादरहित हो अप्रमत्त संयत नाम के सातवें गुणस्थान में विद्यमान थे ।।230।।
The supreme yogi, Lord Rishabhadeva, whose sin-like dust had been cleansed and whose passions such as attachment and aversion had been destroyed, had no trace of negligence (Pramāda) in His consciousness at that time due to the powers of knowledge, perception, and other spiritual faculties.
Meaning: During the state of Dharmadhyana, Lord Jinedra was entirely free from negligence and resided in the seventh spiritual stage (Gunasthana) known as Apramatta-Samyata (the state of vigilant self-restraint). ॥230॥
श्लोक ( Shlok ) 231
ज्ञानादिपरिणामेषु परां शुद्धिमुपेयुषः । लेशतोऽप्यस्य नाभूवन् दुर्लेश्याः क्लेशहेतवः ॥२३१॥
ज्ञान आदि परिणामों में परम विशुद्धता को प्राप्त हुए जिनेंद्रदेव के क्लेश उत्पन्न करने वाली अशुभ लेश्याएँ अंशमात्र भी नहीं थी । भावार्थ―उस समय भगवान् के शुक्ल लेश्या ही थी ।।231।।
Lord Jinedradeva, having attained supreme purity in His states of knowledge and other spiritual faculties, had not even the slightest trace of inauspicious Leshyas (karmic energies that cause affliction).
Meaning: At that time, the Lord possessed only Shukla Leshya (the purest state of consciousness). ॥231॥
श्लोक 232 से 241
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 257
आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202 | श्लोक 203 से 209
आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192
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