आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202
श्लोक 203 से 209 पर्वत और कुमारों की संतुष्टि
अकेली विद्याधरियाँ लता सी थीं। वे फल तोड़ती थीं। नमि-विनमि पर्वत से संतुष्ट हुए। पवन ने उनका परिश्रम हटाया। वन कोयल और भ्रमरों से शब्दायमान थे। धरणेंद्र पर्वत को देख प्रसन्न हुआ।
English translation of Ādi purāṇa parv 18 – Shlok 203 to 209
श्लोक ( Shlok ) 203 – 205
अलकाली लसद्भृङ्गास्तन्वीः कोमलविग्रहाः । लतानुकारिणी रूढस्मितपुष्पोद्गमश्रियः ॥२०३॥
प्रसूनरचिताकल्पावतंसीकृतपल्लवाः । कुसुमावचये सक्ताः संचरन्तीरितस्ततः ॥ २०४॥
वनलक्ष्मीरिव व्यक्तलक्षणा वनजेक्षणाः । धारयन्तमनू द्यानं विद्याधरवधूः क्वचित् ॥२०५॥
वह पर्वत अपने प्रत्येक वन में कहीं-कहीं अकेली ही फिरती हुई विद्याधरियों को धारण कर रहा था, वे विद्याधरियाँ ठीक लता के समान जान पड़ती थी क्योंकि जिस प्रकार लता पर भ्रमर सुशोभित होते हैं उसी प्रकार उनके मस्तक पर भी केशरूपी भ्रमर शोभायमान थे, लताएं जिस प्रकार पतली होती है उसी प्रकार वे भी पतली थीं, लताएँ जिस प्रकार कोमल होती है उसी प्रकार उनका शरीर भी कोमल था और लताएं जिस प्रकार पुष्पों की उत्पत्ति से सुशोभित होती हैं उसी प्रकार वे भी मंद हास्यरूपी पुष्पोत्पत्ति की शोभा से सुशोभित हो रही थीं । उन्होंने फूलों के आभूषण और पत्तों के कर्णफूल बनाये थे तथा वे इधर-उधर घूमती हुई फल तोड़ने में आसक्त हो रही थीं । उनके नेत्र कमलों के समान थे तथा और भी प्रकट हुए अनेक लक्षणों से वे वनलक्ष्मी के समान मालूम होती थी ।।203-205।।
That mountain, in each of its forests, bore the presence of solitary wandering Vidyadhari maidens, who resembled delicate creepers in every way. Just as bees adorn a vine, their dark, flowing locks graced their foreheads like a swarm of black bees. Like vines, they were slender and graceful; like vines, they were soft and delicate; and just as vines are beautified by blooming flowers, so too were they adorned with the gentle blossoms of their radiant smiles.
They wore ornaments made of flowers and earrings crafted from leaves, and as they roamed the forests, they became engrossed in plucking fruits. Their eyes, resembling lotus petals, shone with a natural charm, and through their many enchanting qualities, they seemed like the very goddesses of the forest itself. ॥203-205॥
श्लोक ( Shlok ) 206
तमित्यद्रीन्द्रमुद्भुतमाहात्म्यं भुवनातिगम् । जिनाधिपमिवासाद्य कमारौ धृत्तिमापतुः ॥२०६॥
इस प्रकार जिसका माहात्म्य प्रकट हो रहा है और जो तीनों लोको का अतिक्रमण करने वाला है जिनेंद्रदेव के समान उस गिरिराज को पाकर वे नमि, विनमि राजकुमार अतिशय संतोष को प्राप्त हुए ।।206।।
Thus, upon beholding that majestic mountain—whose grandeur was being revealed and which transcended the three worlds like the divine Jinedradeva—the princes Nami and Vinami were filled with immense joy and satisfaction. ॥206॥
श्लोक ( Shlok ) 207
धुततटवनाभोगा भागीरथी तटवेदिका परिसर सरोवीची “भेदादुपोढपयःकणाः । वनकरिकटादाकृष्टालिव्रजा मरुतो गिरेरुपवनभुवो “यूनोरध्वश्रमं व्यपनिन्यिरे ॥२०७॥
जिसने तटवर्ती वनों के विस्तार को कंपित किया है, जिसने गंगा नदी के तटसंबंधी वेदी के समीपवर्ती तालाब की लहरों को भेदन कर अनेक जल की बूंदें धारण कर ली हैं और जिसने अपनी सुगंधि के कारण वन के हाथियों के गंडस्थल से भ्रमरों के समूह अपनी ओर खींच लिये हैं ऐसे उस पर्वत के उपवनों में उत्पन्न हुए वायु ने उन दोनों तरुण कुमारों के मार्ग का सब परिश्रम दूर कर दिया था ।।207।।
The breeze, born in the groves of that mighty mountain—one that had shaken the vast forests along its slopes, pierced through the waves of a pond near the sacred banks of the Ganga, carrying countless droplets of water, and drawn swarms of bees toward itself by the fragrance from the temples of wild elephants—soothed the path of those two young princes, relieving them of all their fatigue. ॥207॥
श्लोक ( Shlok ) 208
मदकलकलकण्ठी डिण्डिमारावरम्या मधुरविरुतभृङ्गी मङ्गलोद् गीतिहृद्याः ।
परिधृतकुसुमार्घाः संपतद्भिर्मरुद्भिः फणिपतिमिव दूरात् प्रत्युदीयु र्वनान्ताः ॥२०८॥
उस पर्वत के वन प्रदेशों से प्रचलित हुआ पवन दूर-दूर से ही धरणेंद्र के समीप आ रहा था जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो उस पर्वत के वनप्रदेश ही धरणेंद्र के सम्मुख आ रहे हों क्योंकि वे वनप्रदेश मदोन्मत्त सुंदर कोयलों के शब्दरूपी वादित्रों की ध्वनि से शब्दायमान हो रहे थे, भ्रमरियों के मधुर गुंजाररूपी मंगलगानों से मनोहर थे और पुष्परूपी अर्घ धारण कर रहे थे ।।208।।
The breeze, flowing from the forested regions of that mountain, seemed to approach Dharanendra from afar, as if the very woodlands of the mountain were coming forth to greet him. These forests resounded with the melodious music of intoxicated, enchanting cuckoos, were adorned with the sweet humming of bees as if singing auspicious songs, and carried offerings of flowers, appearing as though they were presenting sacred tributes. ॥208॥
श्लोक ( Shlok ) 209
रजत गिरिमहीन्द्रो नातिदूरादुदारं प्रसव भवनमेकं विश्वविद्यानिधीनाम् ।
जिनमिव भुवनान्तर्व्यापि कीर्ति प्रपश्यन् अमदमबि भरन्तः सार्द्धमाभ्यां युवाभ्याम् ॥ २०९॥
इस प्रकार जो बहुत ही उदार अर्थात् ऊँचा है, जो समस्त विद्यारूपी खजानों की उत्पत्ति का मुख्य स्थान है और जिसकी कीर्ति समस्त लोक के भीतर व्याप्त हो रही है, ऐसे जिनेंद्रदेव के समान सुशोभित उस विजयार्ध पर्वत को समीप से देखता हुआ वह धरणेंद्र उन दोनों राजकुमारों के साथ-साथ अपने मन में बहुत ही प्रसन्न हुआ ।।209।।
Thus, beholding the magnificent Vijayardha mountain—lofty in stature, the very source of all treasures of knowledge, and whose glory pervades the entire world—Dharanendra, in the company of the two princes, felt immense joy within his heart, as if witnessing the resplendence of Lord Jinendra himself. ॥209॥
इत्यार्षे भगवजिनसेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षण महापुराण संग्रहे धरणेन्द्रविजयाधोंपगमनं नामाष्टादशं पर्व ॥१८॥
इस प्रकार आर्ष नाम से प्रसिद्ध, भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसंग्रह मेंधरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन करने वालाअठारहवां पर्व समाप्त हुआ ।।18।।
Thus, the eighteenth canto, describing Dharanendra’s journey to Vijayardha Mountain, concludes in the revered Triṣaṣṭi-lakṣaṇa Mahāpurāṇa-saṅgraha, composed by the venerable Bhagavān Jinaseṇācārya, which is renowned by the sacred name Ārṣa. ॥18॥
आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन
पर्व 19 – श्लोक 1 से 11
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 257
आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202
मुख्य विषयवस्तु (Key Themes:):