आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192
आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 |
श्लोक 12 से 21 भगवान का नगरों में विहार
ईर्यासमिति से गमन कर पृथ्वी को भार से बचाया। भगवान ने नगरों, ग्रामों में विहार किया। लोग प्रसन्न हो उन्हें प्रणाम करते थे। कुछ लोग पूछते थे कि क्या काम है। कुछ रत्न लाकर पूजा स्वीकारने को कहते थे। करोड़ों पदार्थ और सवारियाँ लाते थे, पर भगवान आगे बढ़ते थे। माला, वस्त्र, और कन्याएँ लाए गए, पर वे उदासीन रहे। लोग स्नान और भोजन के लिए प्रार्थना करते थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 20 – Shlok 12 to 21
श्लोक ( Shlok ) 12
धात्री पदमराक्रान्ता संन्यमंक्ष्यदधस्तले । नाभविष्यत्प्रयत्नश्चेत्तपसीर्याश्रिते विभोः ॥१२॥
यदि उस समय भगवान् वृषभदेव ने ईर्यासमिति से युक्त तपश्चरण धारण करने में प्रयत्न न किया होता तो सचमुच ही यह पृथिवी उनके चरणों के भार से दबकर अधोलोक में डूब गयी होती । भावार्थ―भगवान ईर्यासमिति से गमन करने के कारण पोले-पोले पैर रखते थे इसलिए पृथ्वी पर उनका अधिक भार नहीं पड़ता था ।।12।।
“Had Lord Rishabhadeva not undertaken his ascetic practice with utmost care in movement (Īryā-samiti) at that time, the earth would have truly sunk into the lower realms under the weight of his footsteps.
Meaning: Since the Lord walked with careful, gentle steps following Īryā-samiti, his feet exerted minimal pressure on the earth.” ||12||
श्लोक ( Shlok ) 13
ततः पुराकरग्रामान् समडम्बान् सखर्वडान् । सखेटान् विजहारोच्चैः स श्रीमान् जङ्गमाद्रिवत् ॥ १३॥
तदनंतर चलते हुए पर्वत के समान उन्नत और शोभायमान भगवान् वृषभदेव ने अनेक नगर, ग्राम, मडंब, खर्वट और खेटों में विहार किया था ।।13।।
“After that, the lofty and radiant Lord Rishabhadeva, resembling a moving mountain, wandered through many cities, villages, hamlets, settlements, and towns.” ||13||
श्लोक ( Shlok ) 14
यतो यतः पदं धत्ते मौनीं चर्या स्म संश्रितः । ततस्ततो जनाः प्रीताः प्रणमन्त्येत्य सम्भ्रमात् ॥१४॥
मुनियों की चर्या को धारण करने वाले भगवान् जिस-जिस ओर कदम रखते थे अर्थात् जहाँ-जहाँ जाते थे वहीं-वहीं के लोग प्रसन्न होकर और बड़े संभ्रम के साथ आकर उन्हें प्रणाम करते थे ।।14।।
“Wherever Lord Rishabhadeva, who upheld the conduct of ascetics, set foot or traveled, the people of those places, filled with joy and deep reverence, would come forward and bow to him with great devotion.” ||14||
श्लोक ( Shlok ) 15
प्रसीद देव किं कृत्यमिति केचिज्ज गुर्गिरम् । तूष्णीम्भावं व्रजन्तं च केचित्तमनुवव्रजुः ॥१५॥
उनमें से कितने ही लोग कहने लगते थे कि हे देव, प्रसन्न होइए और कहिए कि क्या काम है तथा कितने ही लोग चुपचाप जाते हुए भगवान् के पीछे-पीछे जाने लगते थे ।।15।।
“Some of them would say, ‘O Lord, be pleased with us and tell us what service we can offer you,’ while many others would silently follow behind him as he walked.” ||15||
श्लोक ( Shlok ) 16
परे परार्ध्य रत्नानि समानीय पुरो न्यधुः । इत्यूचुश्च प्रसीदैनामिज्यां प्रतिगृहाण नः ॥१६॥
अन्य कितने ही लोग बहुमूल्य रत्न लाकर भगवान् के सामने रखते थे और कहते थे कि देव, प्रसन्न होइए और हमारी इस पूजा को स्वीकृत कीजिए ।।16।।
“Many others would bring precious gems and place them before the Lord, saying, ‘O Lord, be pleased with us and kindly accept our offering of devotion.'” ||16||
श्लोक ( Shlok ) 17
वस्तुवाहनकोटीश्च विभोः केचिदढौकयन्। भगवांस्वास्वनर्थित्वात् तूष्णीकां विजहार सः ॥१७॥
कितने ही लोग करोड़ों पदार्थ और करोड़ों प्रकार की सवारियां भगवान् के समीप लाते थे परंतु भगवान् को उन सबसे कुछ भी प्रयोजन नहीं था इसलिए वे चुपचाप आगे विहार कर जाते थे ।।17।।
“Many people brought countless treasures and various luxurious vehicles before the Lord, but he had no use for any of them. Thus, he silently continued his journey forward.” ||17||
श्लोक ( Shlok ) 18
केचित् स्रग्वस्त्रगन्धादीनानयन्ति स्म सादरम् । भगवन् परिधत्स्वेति पटल्यां सह भूषणैः ॥१८॥
कितने ही लोग माला, वस्त्र, गंध और आभूषणों के समूह आदरपूर्वक भगवान् के समीप लाते थे और कहते थे कि हे भगवन् इन्हें धारण कीजिए ।।18।।
“Many people respectfully brought garlands, clothes, fragrances, and ornaments before the Lord and requested him, saying, ‘O Lord, please accept and wear these offerings.'” ||18||
श्लोक ( Shlok ) 19
केचित् कन्याः समानीय रूपयौवनशालिनीः । परिणाययितुं देवमुद्यता धिग्विमूढताम् ॥१९॥
कितने ही लोग रूप और यौवन से शोभायमान कन्याओं को लाकर भगवान् के साथ विवाह कराने के लिए तैयार हुए थे सो ऐसी मूर्खता को धिक्कार हो ।।19।।
“Some people, blinded by ignorance, even brought beautiful and youthful maidens, hoping to arrange their marriage with the Lord—such folly is truly to be condemned!” ||19||
श्लोक ( Shlok ) 20 – 21
केचिन्मज्जनसामग्र्या संश्रित्यो पारुधन् विभुम् । परे मोजनसामग्रीं पुरस्कृत्योपतस्थिरें ॥२०॥
विभो भोजनमानीतं प्रसीदोपविशासने । समं मज्जनसामग्रया निर्विश स्नानभोजने ॥२१।।
कितने ही लोग स्नान करने की सामग्री लाकर भगवान् को घेर लेते थे और कितने ही लोग भोजन की सामग्री सामने रखकर प्रार्थना करते थे कि विभो, मैं स्नान की सामग्री के साथ-साथ भोजन लाया हूँ, प्रसन्न होइए, इस आसन पर बैठिए और स्नान तथा भोजन कीजिए ।।20-21।।
“Many people gathered around the Lord, bringing bathing essentials, while others placed food before him and earnestly requested, ‘O Lord, I have brought both bathing and food offerings. Please be pleased, take a seat, and partake in the bath and meal.'” ||20-21||
श्लोक 22 से 31
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 257
आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202 | श्लोक 203 से 209
आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192
आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 |