श्लोक 1 से 11 भगवान का तप और कायोत्सर्ग
भगवान वृषभदेव ने शरीर से ममत्व छोड़कर मौन धारण किया। उन्होंने छह माह के उपवास की प्रतिज्ञा की। वे कायोत्सर्ग में खड़े हुए, पैरों में अंतर था। कठिन शिला पर पद्मासन से शोभायमान थे। वे अस्पष्ट पाठ पढ़ते हुए पर्वत से जान पड़ते थे। उनकी भुजाएँ लटक रही थीं। केशलोंच से उनका शिर सूर्य से स्पर्धा करता था। उनका मुख निश्चल और सुंदर था। भ्रमर उनकी श्वास से आकर्षित थे। वे कल्पवृक्ष से शोभायमान थे। तप से छत्र होने पर भी अपरिग्रही थे।
श्लोक 12 से 21 तप की महिमा और राजाओं का क्षोभ
हिलते वृक्ष चमर से क्लेश दूर करते दिखे। दीक्षा के बाद उन्हें मनःपर्यय ज्ञान प्राप्त हुआ। चार ज्ञानों से वे परलोक देखते थे। कच्छ आदि राजाओं का धैर्य टूटने लगा। दो-तीन माह में परीषह से उनका धैर्य छूट गया। वे भगवान के कठिन मार्ग पर चलने में असमर्थ थे। वे भगवान के धैर्य और बल की प्रशंसा करने लगे। वे सोचते थे कि भगवान कितने समय खड़े रहेंगे। उन्हें लगा कि भगवान उन्हें क्लेशित कर रहे हैं।
श्लोक 22 से 31 राजाओं की शिकायतें
राजा सोचते थे कि भगवान भोजन कर खड़े रहते तो ठीक था। वे उनके उद्देश्य को नहीं समझते थे। उन्हें लगा कि भगवान नीति नहीं जानते। वे तप से खिन्न हो गए। वे कंद-मूल से जीवन निर्वाह करने को तैयार हुए। कुछ तप से उदासीन हो दीन वचन बोले। कुछ मूर्ख मुनि भगवान के समीप खड़े हुए। वे कहते थे कि राज्य में वे भगवान के साथ चलते थे, अब तप में असमर्थ हैं। उन्होंने जल-भोजन नहीं लिया। वे भगवान को निर्दयी मानने लगे।
श्लोक 32 से 41 राजाओं की चिंता
वे सोचते थे कि भगवान घर नहीं लौटेंगे। वे परिवार और प्रजा को याद करने लगे। कुछ घर जाने को भगवान को नमस्कार करते थे। कुछ उनकी धीरता की प्रशंसा करते थे। वे सोचते थे कि भगवान राज्य लौटकर उन्हें अपमानित करेंगे। कुछ डरते थे कि भरत उन्हें कष्ट देगा। वे योग समाप्ति तक सहन करने को तैयार हुए। वे मानते थे कि भगवान उन्हें अंगीकृत करेंगे। कुछ धैर्य से दुःखी नहीं हुए।
श्लोक 42 से 51 तप से विरक्ति
कई अभिमानी वहाँ रहे। कुछ अशक्त हो भगवान के चरण स्मरण करते थे। वे तप से विरक्त हो जीविका सोचने लगे। कुछ लज्जा से मुख फेरकर चले। कुछ प्रदक्षिणा कर प्राणयात्रा सोचने लगे। वे भगवान को शरण मानते थे। कुछ काँपते हुए व्रत छोड़ गए। कुछ रक्षा माँगते हुए चले गए। वे तप में असमर्थ हो भ्रष्ट हुए। वे फल-पानी के लिए वन में फैले।
श्लोक 52 से 61 द्रव्यलिंगियों का पाखंड
वन-देवताओं ने उन्हें फल-पानी से रोका। वे डरकर विभिन्न वेष धारण करने लगे। कुछ ने वल्कल, लंगोटी, भस्म, और दंड धारण किए। वे वन में छाल, जल, और कंद से जीवन चलाने लगे। भरत के डर से वे नगर नहीं गए। वे पाखंडी और परिव्राजक बन गए। वे भगवान की पूजा करते थे। मरीचिकुमार परिव्राजक बन मिथ्या शास्त्र सिखाने लगा।
श्लोक 62 से 72 भगवान का तप
मरीचि ने योग और सांख्य शास्त्र शुरू किए। भगवान तप करते रहे। वे मेरु से निष्कंप और समुद्र से क्षोभरहित थे। तप से उनका शरीर दैदीप्यमान था। तीन गुप्तियाँ उनकी रक्षा करती थीं। छह बाह्य और अंतरंग तप उनके थे। अट्ठाईस मूलगुण उनके सैनिक थे।
श्लोक 73 से 81 : तप का प्रभाव
छह माह उपवास में उनका शरीर दैदीप्यमान रहा। आहार न लेने पर भी परिश्रम नहीं हुआ। उनके केश जटाएँ बन गए। जटाएँ कालिमा सी फैलीं। वन में उनकी कांति सूर्य सी थी। वृक्ष और लताएँ उनकी भक्ति करती थीं। फूल उनके चरणों में गिरते थे। हरिण शांतता दिखाते थे।
श्लोक 82 से 92 वन की शांति
सिंह-हरिण बैर छोड़ साथ रहते थे। बाघ चमरियों के बाल सुलझाते थे। हरिण बाघनियों का दूध पीते थे। हाथी कमल चढ़ाते थे। शांति किरणों ने पशुओं को वश किया। उपवास में भूख न हुई। इंद्रों के आसन काँपने लगे। छह माह क्षणभर से व्यतीत हुए। नमि-विनमि सेवा को आए।
श्लोक 93 से 101 नमि-विनमि और धरणेंद्र
नमि-विनमि भोग माँगते हुए ध्यान में विघ्न करने लगे। वे भगवान से आग्रह करते थे। धरणेंद्र ने आसन कंपन से यह जाना। वह पूजा सामग्री लेकर आया। भगवान ध्यान में लवलीन थे। वे यज्वा और कुंजर से शोभायमान थे।
श्लोक 102 से 111 भगवान की तपस्थिति और धरणेंद्र का आगमन
भगवान वृषभदेव सुमेरु पर्वत से अकंपायमान और दृढ़ थे। उनके शरीर की शांति क्रूर जीवों और इंद्रों से उपासित थी। उनका अंतःकरण ध्यान में निश्चल था। वे समुद्र से गंभीर और दोषरहित थे। धरणेंद्र उनके पास पहुँचा। उसने प्रदक्षिणा, प्रणाम, और स्तुति की। उसने नमि-विनमि से कहा कि वे भयंकर हैं, तपोवन शांत है। उसने भोगों की निंदा की। उसने कहा कि भगवान भोगरहित हैं।
श्लोक 112 से 121 धरणेंद्र और कुमारों का संवाद
धरणेंद्र ने कहा कि भोग अंत में संताप देते हैं। उसने सुझाव दिया कि वे भरत से भोग माँगें। उसने भगवान को मोक्षगामी बताया। नमि-विनमि ने जवाब दिया कि धरणेंद्र उनके कार्य में हस्तक्षेप न करे। उन्होंने कहा कि वे योग्य-अयोग्य जानते हैं। उन्होंने अवस्था का भेद मिथ्या बताया। उन्होंने धरणेंद्र को ढीठ कहा।
श्लोक 122 से 131 कुमारों की प्रतिक्रिया
कुमारों ने धरणेंद्र को दुष्ट और चापलूस कहा। उन्होंने बुद्धिमानों की प्रशंसा की। उन्होंने धरणेंद्र के तेज और वेष की सराहना की। उन्होंने पूछा कि वह उनके कार्य में विघ्न क्यों डाल रहा है। उन्होंने कहा कि भगवान को प्रसन्न करना उनका लक्ष्य है। उन्होंने भगवान को कल्पवृक्ष बताया।
श्लोक 132 से 141 धरणेंद्र का प्रत्युत्तर
कुमारों ने भरत को तुच्छ माना। उन्होंने अभिमान से कहा कि वे उदार स्थान चाहते हैं। धरणेंद्र उनके धैर्य से संतुष्ट हुआ। उसने उनकी भक्ति की प्रशंसा की। उसने अपना परिचय नागकुमार इंद्र के रूप में दिया। उसने कहा कि वह भगवान की आज्ञा से भोग देने आया है।
श्लोक 152 से 161 विजयार्ध पर्वत का वर्णन
पर्वत की मेखला मेघों से ढकी थी। सुवर्ण किनारे दावानल सी शोभा देते थे। झरनों से मेघ जर्जरित थे। लताएँ भ्रमरों से ढकी थीं। किन्नर गीतों से सुंदर प्रदेश थे। विद्याधरियाँ झूलों पर झूलती थीं। उनके मुख कमलों से पर्वत शोभायमान था।
श्लोक 162 से 171 पर्वत की शोभा
पर्वत स्फटिक भूमियों से लाल था। गुफाओं में सिंह निर्झर से थे। देव-देवियाँ संभोग और विनोद करते थे। शिखरों पर निर्झर पताकाएँ से थे। चंद्रकांतमणियाँ पानी बहाती थीं। पर्वत सुमेरु से हँसता था। वह विद्याधरों और नदियों से विजयी था।
श्लोक 172 से 181 पर्वत का माहात्म्य
पर्वत जिनेंद्र से अचल और शुद्ध था। वह दो गुफाओं से शोभायमान था। नौ कूट मुकुट से थे। वह पचास योजन चौड़ा और पचीस योजन ऊँचा था। रत्न पाषाण गरम थे। सिंह और कोयल शब्दायमान थे।
श्लोक 182 से 191 पर्वत की विविधता
इंद्रधनुष लता बनती थी। देवांगनाओं के नुपूर शब्द गूँजते थे। हाथी क्रीड़ा करते थे। सर्प और सुरागाएँ शब्द करते थे। पर्वत साँस लेता और झूमता था। विद्याधरियाँ विचार करती थीं। भौंरे संगीत करते थे।
श्लोक 192 से 202 विद्याधरियों का वर्णन
विद्याधरियाँ तरुणों संग विहार करती थीं। उनके मुख सुगंधित थे। नेत्र कामदेव के अस्त्र थे। केश काले और अस्त-व्यस्त थे। अधर बिंबफल से थे। स्तन नख चिह्नों से शोभित थे। भुजाएँ लता सी थीं। चरण कमल से झंकृत थे।
श्लोक 203 से 209 पर्वत और कुमारों की संतुष्टि
अकेली विद्याधरियाँ लता सी थीं। वे फल तोड़ती थीं। नमि-विनमि पर्वत से संतुष्ट हुए। पवन ने उनका परिश्रम हटाया। वन कोयल और भ्रमरों से शब्दायमान थे। धरणेंद्र पर्वत को देख प्रसन्न हुआ।
English translation of Ādi purāṇa parv 18 – Shlok 1 to 11
श्लोक ( Shlok ) 1
अथ कायं समुत्सृज्य तपोयोगे समाहितः । वाचंयमत्वमास्थाय तस्थौ विश्वेङ् विमुक्तये ॥१॥
अथानंतर समस्त लोक के अधिपति भगवान वृषभदेव शरीर से ममत्व छोड़कर तथा तपोयोग में सावधान हो मौन धारणकर मोक्षप्राप्ति के लिए स्थित हुए ।।1।।
Thereafter, Lord Rishabha, the supreme ruler of all people, renounced attachment to the body, remained vigilant in the practice of austerity and yoga, and embraced silence while being firmly established in the pursuit of liberation. ||1||
श्लोक ( Shlok ) 2
षण्मासानशनं धीरः प्रतिज्ञाय महाधृतिः। योगेकाग्यनिरुद्धान्तर्बहिष्करण विक्रियः ॥ २।!
योगों की एकाग्रता से जिन्होंने मन तथा बाह्य इंद्रियों के समस्त विकार रोक दिये हैं और धीर-वीर महासंतोषी भगवान छह महीने के उपवास की प्रतिज्ञा कर स्थित हुए थे ।।2।।
With the concentration of yoga, He restrained all disturbances of the mind and external senses. The steadfast, courageous, and supremely content Lord took a vow of fasting for six months and remained firmly established. ||2||
श्लोक ( Shlok ) 3
*वितस्त्यन्तरपादाग्रं तत्त्र्यंशान्तरपार्ष्णिकम् । सममृज्वागतं स्थानमास्थाय रचितस्थितिः ॥३॥
वे भगवान् सम, सीधी और लंबी जगह में कायोत्सर्ग धारण कर खड़े हुए थे । उस समय उनके दोनों पैरों के अग्र भाग में एक वितस्ति अर्थात् बारह अंगुल का और एड़ियों में चार अंगुल का अंतर था ।।3।।
The Lord stood in the posture of kāyotsarga (abandoning attachment to the body) in a level, straight, and spacious place. At that time, the distance between the front parts of His feet was one vitasti (twelve fingers), and the gap between His heels was four fingers. ||3||
श्लोक ( Shlok ) 4
कठिनेऽपि शिलापट्टे न्यस्तपादपयोरुहः । लक्ष्म्योपढौकितं गूढमास्थितः पद्मविष्टरम् ॥४॥
वे भगवान् कठिन शिला पर भी अपने चरणकमल रखकर इस प्रकार खड़े हुए थे मानो लक्ष्मी के द्वारा लाकर रखे हुए गुप्त पद्मासन पर ही खड़े हों ।।4।।
The Lord stood even on the hard rock with His lotus feet, as if He were standing on a hidden lotus seat brought and placed there by Goddess Lakshmi herself. ||4||
श्लोक ( Shlok ) 5
किमप्यन्तर्गतं जल्पन्नव्यक्ताक्षरमक्षरः । निगूढनिर्झरारावगुञ्जद्गुह इवाचलः ।।५॥
वे अक्षर अर्थात् अविनाशी भगवान भीतर-ही-भीतर अस्पष्ट अक्षरों से कुछ पाठ पढ़ रहे थे जिससे ऐसे मालूम होते थे मानो जिसकी गुफाएं भीतर छिपे हुए निर्झरनों के शब्द से गुंज रही हैं ऐसा कोई पर्वत ही हो ।।5।।
The imperishable Lord was inwardly reciting indistinct syllables, making Him appear like a mountain whose caves resonate with the sound of hidden waterfalls. ||5||
श्लोक ( Shlok ) 6
सुप्रसन्नोज्ज्वलां मूर्ति प्रलम्बितभुजद्वयाम् । शुमस्येव परां मूर्ति दधानो ध्यानसिद्धये ॥६॥
जिसमें दोनों भुजाएँ नीचे की ओर लटक रही हैं ऐसी अत्यंत प्रसन्न और उज्ज्वल मूर्ति को धारण करते हुए वे भगवान् मालूम होते थे मानो ध्यान की सिद्धि के लिए प्रशमगुण की उत्कृष्ट मूर्ति ही धारण कर रहे हों ।।6।।
With both arms hanging downwards, the Lord manifested an extremely serene and radiant form. He appeared as if He had assumed the very embodiment of supreme tranquility for the attainment of meditative perfection. ||6||
श्लोक ( Shlok ) 7
शिरः शिरोरुहापायात् सुव्यक्तपरिमण्डलम् । रोचिप्णूप्णीष मुष्णांशुमण्डलस्पर्द्धिं धारयन् ॥७॥
केशों का लोंच हो जाने से जिसका गोल परिमंडल अत्यंत स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था, जिसका ब्रह्मद्वार अतिशय दैदीप्यमान था और जो सूर्य के मंडल के साथ स्पर्द्धा कर रहा था, ऐसे शिर को वे भगवान् धारण किये हुए थे ।।7।।
The Lord bore a head on which the circular shape was distinctly visible due to the plucking of His hair. His brahmadwara (crown chakra) shone brilliantly, radiating such immense light that it seemed to rival the sun itself. ||7||
श्लोक ( Shlok ) 8
अभ्र भङ्गमपापाङ्ग वीक्षणं स्तिमितेक्षणम् । बिभ्राणो मुखमक्लिष्टं सुश्लिष्टदशनच्छदम् ॥८॥
जो भौंहों के भंग और कटाक्ष अवलोकन से रहित था, जिसके नेत्र अत्यंत निश्चल और ओठ खेदरहित तथा मिले हुए थे ऐसे सुंदर मुख को भगवान् धारण किये हुए थे ।।8।।
The Lord bore a beautiful face, free from the movement of eyebrows and sidelong glances. His eyes were completely still, and His lips were untroubled and gently closed. ||8||
श्लोक ( Shlok ) 9
सुगन्धिमुखनिः श्वास गन्धाहूतैरलिव्रजैः । बहिर्निंष्कासिताशुद्ध लेश्यांशैरिव लक्षितः ॥९॥
उनके मुख पर सुगंधित नि:श्वास की सुगंध से जो भ्रमरों के समूह उड़ रहे थे वे ऐसे मालूम होते थे मानो अशुद्ध (कृष्ण नील आदि) लेश्याओं के अंश ही बाहर को निकल रहे हों ।।9।।
The swarm of bees hovering around His face, drawn by the fragrance of His aromatic breath, appeared as if the remnants of impure (Krishna, Neel, etc.) leshyaas (mental dispositions) were being expelled outward. ||9||
श्लोक ( Shlok ) 10
प्रलम्बित महाबाहुदीप्र प्रोतुङ्गविग्रहः । कल्पाङ्ग्रिप इवावाग्र शाखाद्वयपरिष्कृतः ॥१०
उनकी दोनों बड़ी-बड़ी भुजाएँ नीचे की ओर लटक रही थीं और उनका शरीर अत्यंत दैदीप्यमान तथा ऊँचा था इसलिए वे ऐसे जान पड़ते थे मानो अग्रभाग में स्थित दो ऊँची शाखाओं से सुशोभित एक कल्पवृक्ष ही हो ।।10।।
His two large arms hung downwards, and His body was immensely radiant and tall. Thus, He appeared like a Kalpavriksha (wish-fulfilling tree) adorned with two lofty branches at its forefront. ||10||
श्लोक ( Shlok ) 11
अलक्ष्येणातपत्रेण तपोमाहात्म्यजन्मना । कृतच्छायो ऽप्य नर्थित्वादकृतेच्छः परिच्छदे ॥११॥
तपश्चरण के माहात्म्य से उत्पन्न हुए अलक्षित (किसी को नहीं दिखने वाले) छत्र ने यद्यपि उन पर छाया कर रखी थी तो भी उसकी अभिलाषा न होने से वे उससे निष्ठित ही थे―अपरिग्रही ही थे ।।11।।
Although an invisible divine umbrella, born from the greatness of His austerity, cast its shade over Him, He remained detached from it, having no desire for its comfort—truly embodying non-possessiveness (Aparigraha). ||11||
श्लोक 12 से 21
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
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