आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 |
श्लोक 162 से 171 रानियों का विलाप
रानियाँ शोक से मूर्च्छित हुईं। उनके हार टूटे, केश खुले। कुछ को सांत्वना दी गई। वृद्ध स्त्रियों ने शोक न करने की सलाह दी।
English translation of Ādi purāṇa parv 17 – Shlok 162 to 171
श्लोक ( Shlok ) 162
क्व प्रस्थितोऽसि हा नाथ क्व गत्वास्मान् प्रतीक्षसे। कियदूरं च गन्तव्यमित्यन्या मुमुहुर्मुहुः ॥१६२॥
कितनी ही देवियाँ बार-बार यह कहती हुई मूर्च्छित हो रही थीं कि हा नाथ, आप कहाँ जा रहे हैं ? कहाँ जाकर हम लोगों की प्रतीक्षा करेंगे और अब आपको कितनी दूर जाना है ।।162।।
Many divine ladies kept fainting repeatedly, saying, “Alas, Lord! Where are you going? Where will you wait for us? And how far do you still have to go?” ( 162)
श्लोक ( Shlok ) 163
हृदि वेपथुमुत्कम्पं स्तनयोम्लनिता तनौ । वाचि गद्गदतामक्ष्णोर्बाष्पं चान्याः शुचा दधुः ॥१६३॥
वे देवियाँ शोक से हृदय में धड़कन को, स्तनों में उत्कंप को, शरीर में म्लानता को, वचनों में गद्गदता को और नेत्रों में आँसूओं को धारण कर रही थीं ।।163।।
Those divine ladies, overwhelmed with sorrow, bore trembling in their hearts, quivering in their breasts, weakness in their bodies, choking in their words, and tears in their eyes. ( 163)
श्लोक ( Shlok ) 164
अमङ्गलमलं बाले रुदित्वेति निवारिता । काचिदन्तर्निरुद्धाश्रुः स्फुटन्तीव शुचाभवत् ॥१६४॥
हे बाले, रोकर अमंगल मत कर इस प्रकार निवारण किये जाने पर किसी स्त्री ने रोना तो बंद कर दिया था परंतु उसके आँसू नेत्रों के भीतर ही रुक गये थे इसलिए वह ऐसी जान पड़ती थी मानो शोक से फूट रही हो ।।164।।
“O dear one, do not weep and invite misfortune.” Upon being consoled in this way, some women stopped crying, but their tears remained held within their eyes, making them appear as if they were breaking apart with grief. ( 164)
श्लोक ( Shlok ) 165
प्रस्थानमङ्गलं भक्तुमक्षमाः काप्युदश्रुदृक् । ‘शुचमन्तः प्रविष्टेव दृष्ट्वा दृक्पुत्रिकाछलात् ॥१६५
कोई स्त्री प्रस्थानकाल के मंगल को भंग करने के लिए असमर्थ थी इसलिए उसने आँसुओं को नीचे गिरने से रोक लिया परंतु ऐसा करने से उसके नेत्र आँसुओं से भर गए थे जिससे वह ऐसी जान पड़ती थी मानो नेत्रों की पुत्तलिका के छल से शोक के भीतर ही प्रविष्ट हो गयी हो ।।165।।
Some women, unable to disrupt the auspiciousness of the departure, held back their tears from falling. However, their eyes filled with unshed tears, making it seem as if the very essence of their sorrow had retreated deep within, hidden behind the illusion of their gaze. ( 165)
श्लोक ( Shlok ) 166
गतिसंभ्रमविच्छिन्न हारव्याकीर्ण मौक्तिकाः । स्थूलानश्रुलवान् काश्चि च्छन्न तच्छद्मनामुचन् ॥१६६॥
वेग से चलने के कारण कितनी ही स्त्रियों के हार टूट गये थे और उनके मोती बिखर गये थे, उन बिखरे हुए मोतियों से वे ऐसी मालूम होती थीं मानो मोतियों के छल से आँसुओं की बड़ी-बड़ी बूँदें ही छोड़ रही हो ।।166।।
Due to their hurried pace, many women’s necklaces broke, scattering pearls all around. These scattered pearls made it seem as if, through an illusion, they were shedding large drops of tears. ( 166)
श्लोक ( Shlok ) 167
विस्त्रस्तकबरी भारविगलत्कुसुमस्त्रजः। स्त्रस्तस्तनांशुकाः सास्त्राः काश्चिच्छोच्यां दशामंधुः ॥१६७॥
कितनी ही स्त्रियों के केशपाश खुलकर नीचे की ओर लटकने लगे थे उनमें लगी हुई फूलों की मालाएँ नीचे गिरती जा रही थीं, उनके स्तनों पर के वस्त्र भी शिथिल हो गये थे और आँखों से आँसू बह रहे थे इस प्रकार वे शोचनीय अवस्था को धारण कर रही था ।।167।।
The hair of many women became loose and hung downward, with their floral garlands falling to the ground. Their garments over their breasts loosened, and tears flowed from their eyes, leaving them in a pitiable state. ( 167)
श्लोक ( Shlok ) 168
‘उत्क्षिप्य शिविकास्वन्या निक्षिप्ताः शोकविक्लवाः। कथंकथमपि प्राणैर्नव्ययुज्यन्त सान्त्विताः । १६८।
कितनी ही स्त्रियाँ शोक से अत्यंत विह्वल हो गयी थीं इसलिए लोगों ने उठाकर उन्हें पालकी में रखा था तथा अनेक प्रकार से सांत्वना दी थी, समझाया था । इसीलिए वे जिस किसी तरह प्राणों से वियुक्त नहीं हुई थीं―जीवित बची थीं ।।168।।
Many women were so overwhelmed with grief that they had to be lifted and placed in palanquins, where they were consoled and reassured in various ways. It was only because of this comfort that they somehow managed to stay alive and did not succumb to their sorrow. ( 168)
श्लोक ( Shlok ) 169
धीराः काश्चिदधीराक्ष्यो धीरिताः स्वामिसंपदा । विभुमन्वीयुरव्यग्रा राजपत्न्यः शुचिव्रताः ॥१६९॥
धीर-वीर किंतु चंचल नेत्रों वाली कितनी ही राजपत्नियाँ अपने स्वामी के विभव से ही (देवों द्वारा किये हुए सम्मान से ही) संतुष्ट हो गयी थी इसलिए वे पतिव्रताएं बिना किसी आकुलता के भगवान के पीछे-पीछे जा रही थी ।।169।।
Many royal consorts, though steadfast and courageous yet having restless eyes, felt content with the honor bestowed upon their lord by the gods. Therefore, these devoted wives followed the Lord without any distress or agitation. ( 169)
श्लोक ( Shlok ) 170
प्रस्थानमङ्गले जातं नाभिजातं प्ररोदनम् । नाथः शनैरनुव्राज्यो मातर्मा स्म शुचं गमः ॥१७०॥
हे माता, यह भगवान् का प्रस्थान मंगल हो रहा है इसलिए अधिक रोना अच्छा नहीं धीरे-धीरे स्वामी के पीछे-पीछे चलना चाहिए । शोक मत करो ।।170।।
“O Mother, the Lord’s departure is an auspicious event, so excessive weeping is not appropriate. We should follow our Lord slowly and steadily. Do not grieve.” ( 170)
श्लोक ( Shlok ) 171
त्वर्यतां चर्यता देवि शोकवेगोऽपवार्यताम् । देवोऽयं नीयते देवैः दिष्टयास्मद् दृष्टिगोचरे ॥१७१॥
हे देवि, शीघ्रता करो, शीघ्रता करो, शोक के वेग को रोको, यह देखो देव लोग भगवान् को लिये जा रहे हैं अभी हमारे पुण्योदय से भगवान् हमारे दृष्टिगोचर हो रहे हैं―हम लोगों को दिखाई दे रहे हैं ।।171।।
“O Devi, hurry, hurry! Restrain the surge of sorrow. Look, the divine beings are leading the Lord away. By the rise of our merits, the Lord is still visible to us for now.” ( 171)
श्लोक 172 से 181
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आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 |