आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
English translation of Ādi purāṇa parv 17 – Shlok 52 to 61
श्लोक ( Shlok ) 52
सुमनोऽञ्जलयो मुक्ता बभुर्लौकान्तिकामरैः । विभोरुपासितुं पादौ स्वचित्तांशा इवार्पिताः ॥५२॥
उन लौकांतिक देवों ने आकर जो पुष्पांजलि छोड़ी थी वह ऐसी मालूम होती थी मानो उन्होंने भगवान के चरणों की उपासना करने के लिए अपने चित्त के अंश ही समर्पित किए हों ।।52।।
“The floral offerings scattered by the Laukantika deities appeared as if they had surrendered fragments of their own hearts in devotion at the feet of the Lord.”
श्लोक ( Shlok ) 53
तेऽभ्यर्च्य भगवत्पादौ प्रसूनैः सुरभूरुहाम्। ततः स्तुतिमिरर्थ्याभिः स्त्रोतुं प्रारेभिरे विभुम् ॥५३॥
उन देवों ने प्रथम ही कल्पवृक्ष के फूलों से भगवान् के चरणों की पूजा की और फिर अर्थ से भरे हुए स्तोत्रों से भगवान की स्तुति करना प्रारंभ की ।।53।।
“First, those deities worshiped the Lord’s feet with flowers from the celestial wish-fulfilling trees, and then they began praising Him with meaningful hymns.”
श्लोक ( Shlok ) 54
मोहारिविजयोद्योगमधुना संविवित्सुना। भगवन् भव्यलोकस्य बन्धुकृत्यं त्वयेहितम् ॥५४॥
हे भगवन्, इस समय जो आपने मोहरूपी शत्रु को जीतने के उद्योग की इच्छा की है उससे स्पष्ट सिद्ध है कि आपने भव्यजीवों के साथ भाईपने का कार्य करने का विचार किया है अर्थात् भाई की तरह भव्य जीवों की सहायता करने का विचार किया है ।।54।।
“O Lord, your desire to conquer the enemy in the form of delusion clearly proves that you intend to act as a brother to the noble souls, meaning you wish to assist them like a true sibling.”
श्लोक ( Shlok ) 55
स्वं देव परमं ज्योतिस्त्वा माहुः कारणं परम्। त्वमिदं विश्वमज्ञानप्रपातादुद्धरिष्यसि ॥५५॥
हे देव, आप परम ज्योति स्वरूप हैं, सब लोग आपको समस्त कार्यों का उत्तम कारण कहते हैं और हे देव, आप ही अज्ञानरूपी प्रपात से संसार का उद्धार करेंगे ।।55।।
“O Lord, You are the supreme embodiment of light, and all beings recognize You as the ultimate cause of all noble deeds. O Divine One, You alone will rescue the world from the abyss of ignorance.”
श्लोक ( Shlok ) 56
स्वयाद्य दर्शितं धर्मतीर्थमासाद्य दुस्तरम् । भव्याः संसारभीमाब्धिमुत्तरिष्यन्ति ‘हेलया ॥५६॥
हे देव, आज आपके द्वारा दिखलाये हुए धर्मरूपी तीर्थ को पाकर भव्यजीव इस दुस्तर और भयानक संसाररूपी समुद्र से लीला मात्र में पार हो जायेंगे ।।56।।
“O Lord, by attaining the sacred pilgrimage of righteousness shown by You today, noble souls will effortlessly cross the vast and dreadful ocean of worldly existence.”
श्लोक ( Shlok ) 57
तव वागंशवो दीप्रा द्योतयन्तोऽखिलं जगत् । भव्यपद्माकरे बोधमाधा स्यन्ति रवेरिव ॥५७॥
हे देव, जिस प्रकार सूर्य की दैदीप्यमान किरणें समस्त जगत् को प्रकाशित करती हुई कमलों को प्रफुलित करती हैं उसी प्रकार आपके वचनरूपी दैदीप्यमान किरणें भी समस्त संसार को प्रकाशित करती हुई भव्यजीवरूपी कमलों को प्रफुल्लित करेंगी ।।57।।
“O Lord, just as the radiant rays of the sun illuminate the entire world and cause lotuses to bloom, in the same way, the radiant beams of Your divine words will enlighten the whole world and bring joy to the noble souls, like lotuses in full bloom.”
श्लोक ( Shlok ) 58
धातारमामनन्ति त्वां जेतारं कर्मविद्विषाम् । नेतारं धर्मतीर्थस्य त्रात्तारं च जगद्गुरुम् ॥५८॥
हे देव, लोग आपको जगत् का पालन करने वाले ब्रह्मा मानते हैं, कर्मरूपी शत्रुओं को जीतने वाले विजेता मानते हैं, धर्मरूपी तीर्थ के नेता मानते हैं और सबकी रक्षा करने वाले जगद्गुरु मानते हैं ।।58।।
“O Lord, people regard You as Brahma, the sustainer of the world; as the victorious conqueror of the enemies in the form of karma; as the leader of the sacred path of righteousness; and as the universal teacher who protects all.”
श्लोक ( Shlok ) 59
मोहपङ्के महत्यस्मिन् जगन्मग्नमशेषतः । धर्महस्तावलम्बेन त्वया मङ्क्षुद्धरिष्यते ॥५९॥
हे देव, यह समस्त जगत् मोहरूपी बड़ी भारी कीचड़ में फँसा हुआ है इसका आप धर्मरूपी हाथ का सहारा देकर शीघ्र ही उद्धार करेंगे ।।59।
“O Lord, this entire world is trapped in the deep mire of delusion. You will soon rescue it by extending the helping hand of righteousness.”
श्लोक ( Shlok ) 60
त्वं स्वयंभूःस्वयंबुद्धसन्मार्गो मुक्तिपद्धतिम् । यत्प्रबोधयिता स्यस्मानकस्मात् करुणार्द्रधीः ॥६०॥
हे देव, आप स्वयंभू हैं, आपने मोक्षमार्ग को स्वयं जान लिया है और आप हम सबको मुक्ति के मार्ग का उपदेश देंगे इससे सिद्ध होता है कि आपका हृदय बिना कारण ही करुणा से आर्द्र है ।।60।।
“O Lord, You are self-enlightened, having realized the path of liberation on Your own. Since You will now preach this path to us all, it is evident that Your heart is naturally filled with boundless compassion.”
श्लोक ( Shlok ) 61
त्वं बुद्धोऽसि स्वयंबुद्धः त्रिभबोधामललोचनः । यद्वेत्सि स्वत एवाद्य मोक्षस्य पदवीं त्रयीम् ॥६१॥
हे भगवन् आप स्वयंभू हैं, आप मति श्रुत और अवधिज्ञानरूपी तीन निर्मल नेत्रों को धारण करने वाले हैं तथा सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र इन तीनों की एकता रूपी मोक्षमार्ग को आपने आप ही जान लिया है इसलिए आप बुद्ध हैं ।।61।।
“O Lord, You are self-enlightened, possessing the three pure eyes of sensory knowledge, scriptural knowledge, and clairvoyance. You have independently realized the path of liberation, which is the unity of right faith, right knowledge, and right conduct. Therefore, You are truly the Enlightened One (Buddha).”
श्लोक 62 से 71
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51