आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 |
श्लोक 232 से 241 भगवान का अलंकरण
भगवान को मुकुट और पट्टबंध से अलंकृत किया गया। उन्होंने कर्मभूमि की रचना की और प्रजा का पालन शुरू किया।
English translation of Ādi purāṇa parv 16 – Shlok 232 to 241
श्लोक ( Shlok ) 232
नाभिराजः स्वहस्तेन मौलिमारोपयत् प्रभोः । महामुकुटबद्धानामधिराड् भगवानिति ॥२३२॥
‘महामुकुटबद्ध राजाओं के अधिपति भगवान वृषभदेव ही हैं’ यह कहते हुए महाराज नाभिराज ने अपने मस्तक का मुकुट अपने हाथ से उतारकर भगवान् के मस्तक पर धारण किया था ।।232।।
“Proclaiming that Bhagwan Rishabhdev is the supreme ruler of all crown-bearing kings, Maharaj Nabhiraj reverently removed his own crown with his hands and placed it upon Bhagwan’s head.”
श्लोक ( Shlok ) 233
पट्टबन्धोर्जंगट्यन्धोर्लंलाटे विनिवेशितः । बन्धनं राजलक्ष्म्याः स्विद् गत्वर्याः स्थैर्यसाधनम् ॥२३३॥
जगत् मात्र के बंधु भगवान् वृषभदेव के ललाट पर पट्टबंध भी रखा जो कि ऐसा मालूम होता था मानो यहाँ-वहाँ भागने वाली चंचल राज्यलक्ष्मी को स्थिर करने वाला एक बंधन ही हो ।।233।।
“A ceremonial headband was also placed on the forehead of Bhagwan Rishabhdev, the universal benefactor. It appeared as if it were a binding force, securing the ever-wandering and restless Goddess of Royal Prosperity in place.”
श्लोक ( Shlok ) 234 –238
स्रग्वी सदंशुकः कर्णद्वयोल्लसितकुण्डलः । दधानो मकुटं मूर्ध्ना लक्ष्म्याः क्रीडाचलायितम् ॥२३४॥
कण्ठे हारलतां बिभ्रत् कटिसूत्रं कटीतटे । ब्रह्मसूत्रों पवीताङ्गः स गाङ्गौघमिवाद्रि राट् ॥ २३५॥
कटकाङ्गदकेयूरभूषिताय तदोर्युगः । पर्युस्लसन्महाशाखः कल्पशाखीव जङ्गमः ॥२३६॥
सनीलरत्ननिर्माणनू पुरावुद्वहत्क्रमौ । निलीनभृङ्गसं फुल्लरक्त तामरसश्रियौ ॥२३७॥
इति प्रत्यङ्गसंगिन्या बभौ भूषणसम्पदा । भगवानादिमो ब्रह्मा भूषणाङ्ग इवाङ्घ्रिपः ॥२३८॥
उस समय भगवान् मालाएँ पहने हुए थे, उत्तम बल धारण किये हुए थे, उनके दोनों कानों में कुंडल सुशोभित हो रहे थे । वे मस्तक पर लक्ष्मी के क्रीड़ाचल के समान मुकुट धारण किये हुए थे, कंठ में हारलता और कमर में करधनी पहने हुए थे । जिस प्रकार हिमवान् पर्वत गंगा का प्रवाह धारण करता है उसी प्रकार वे भी अपने कंधे पर यज्ञोपवीत धारण किये थे । उनकी दोनों लंबी भुजाएं कड़े, बाजूबंद और अनंत आदि आभूषणों से विभूषित थीं । उन भुजाओं से भगवान् ऐसे मालूम होते थे मानो शोभायमान बड़ी-बड़ी शाखाओं से सहित चलता-फिरता कल्पवृक्ष ही हो । उनके चरण नीलमणि के बने हुए नुपूरों से सहित थे इसलिए ऐसे जान पड़ते थे मानो जिन पर भ्रमर बैठे हुए हैं ऐसे खिले हुए दो लाल कमल ही हों । इस प्रकार प्रत्येक अंग में पहने हुए आभूषणरूपी संपदा से आदि ब्रह्मा भगवान् वृषभदेव ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो भूषणांग जाति के कल्पवृक्ष ही हो ।।234-238।।
“At that moment, Bhagwan Rishabhdev was adorned with divine ornaments, radiating unmatched splendor.
- He wore beautiful garlands and possessed extraordinary strength.
- His earrings shone brilliantly in both ears.
- A magnificent crown, resembling the playground of Goddess Lakshmi, graced His forehead.
- A pearl necklace adorned His neck, while a golden girdle encircled His waist.
- Just as the Himalayan mountains bear the sacred flow of the Ganga, He bore the sacred thread (Yajnopavita) over His shoulder.
- His long, powerful arms were decorated with bracelets, armlets, and celestial ornaments like Ananta, making Him appear like a wish-fulfilling Kalpavriksha with splendid, outstretched branches.
- His lotus-like feet, adorned with sapphire-studded anklets, resembled blooming red lotuses upon which bees had settled.
In this way, Bhagwan Rishabhdev, the Adi Brahma, shone resplendently, appearing like a divine Kalpavriksha whose very form was adorned with celestial jewels.”
श्लोक ( Shlok ) 239
ततः सानन्दमानन्दनाटकं नाट्यवेदवित् । प्रयुज्यास्थायिका रङ्ग प्रत्यगाद् गां सहस्रगुः ॥२३९॥
तदनंतर नाट्यशास्त्र को जानने वाला इंद्र उस सभारूपी रंगभूमि में आनंद के साथ आनंद नाम का नाटक कर स्वर्ग को चला गया ।।239।।
“After that, Indra, who was well-versed in the art of drama, joyfully performed a play named ‘Ananda’ in that grand assembly, resembling a celestial stage. Having done so, he then returned to heaven.”
श्लोक ( Shlok ) 240
व्रजन्तमनुजग्मुस्तं कृतकार्या सुरासुराः । भगवत्पादसंसेवानियुक्तस्वान्तवृत्तयः ॥२४०॥
जो अपना कार्य समाप्त कर चुके हैं और जिनके चित्त की वृत्ति भगवान के चरणों की सेवा में लगी हुई है ऐसे देव और असुर उस इंद्र के साथ ही अपने-अपने स्थानों पर चले गये ।।240।।
“The gods and asuras, who had completed their duties and whose minds were devoted to the service of Bhagwan’s feet, departed to their respective realms along with Indra.”
श्लोक ( Shlok ) 241
अथाधिराज्यमासाद्य नाभिराजस्य संनिधौ । प्रजानां पालने यत्नमकरोदिति विश्वसृट् ॥२४१॥
अथानंतर कर्मभूमि की रचना करने वाले भगवान् वृषभदेव ने राज्य पाकर महाराज नाभिराज के समीप ही प्रजा का पालन करने के लिए नीचे लिखे अनुसार प्रयत्न किया ।।241।।
“Afterward, Bhagwan Rishabhdev, the creator of Karmabhumi (the land of action), having attained kingship, made efforts to govern and nurture His subjects while residing near Maharaj Nabhiraj, as described below.”
श्लोक 242 से 251
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 |