आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121
श्लोक 122 से 131 पुत्रों को शास्त्र उपदेश
बाहुबली को कामनीति, आयुर्वेद, धनुर्वेद आदि शास्त्र सिखाए गए। भगवान का 20 लाख पूर्व का कुमारकाल पूर्ण हुआ। इस बीच कल्पवृक्ष और औषधियाँ नष्ट हो गईं।
English translation of Ādi purāṇa parv 16 – Shlok 122 to 131
श्लोक ( Shlok ) 122
विश्वकर्ममतं चास्मै वास्तुविद्यामुपादिशत् । अध्यायविस्तरस्तत्र बहुभेदोऽवधारितः ॥१२२॥
इसी अनंतविजय पुत्र के लिए उन्होंने सूत्रधार की विद्या तथा मकान बनाने की विद्या का उपदेश दिया । उस विद्या के प्रतिपादक शास्त्रों में अनेक अध्यायों का विस्तार था तथा उसके अनेक भेद थे ।।122।।
“For his son Anantavijaya, Lord Rishabhadeva also imparted the knowledge of architecture and construction (Sutradhara Vidya). The scriptures expounding this discipline contained numerous chapters and detailed its various branches and classifications.”
श्लोक ( Shlok ) 123 –124
कामनीतिमथ स्त्रीणां पुरुषाणां च लक्षणम् । आयुर्वेदं धनुर्वेदं तन्त्रं चाश्वेभगोचरम् ॥१२३॥
तथा रत्नपरीक्षां च बाहुबल्याख्यसूनवे। व्याचख्यो बहुधाम्नातैर ध्यायैरतिविस्तृतैः ।।१२४॥
बाहुबली पुत्र के लिए उन्होंने कामनीति, स्त्री-पुरुषों के लक्षण, आयुर्वेद, धनुर्वेद, घोड़ा-हाथी आदि के लक्षण जानने के तंत्र और रत्नपरीक्षा आदि के शास्त्र अनेक प्रकार के बड़े-बड़े अध्यायों के द्वारा सिखलाये ।।123-124
“For his son Bāhubali, Lord Rishabhadeva taught Kāmanīti (the principles of love and relationships), the science of physiognomy (characteristics of men and women), Ayurveda (the science of life and medicine), and Dhanurveda (the science of warfare and archery). He also instructed him in the Tantras related to identifying the traits of horses, elephants, and other animals, as well as Ratnapariksha (the science of gem examination), all through extensive and detailed chapters.”
श्लोक ( Shlok ) 125
किमत्र बहुनोक्तेन शास्रं लोकोपकारि यत् । तत्सर्वमादिकर्त्तासौ स्वाः समन्वशिषत् प्रजाः ॥१२५॥
इस विषय में अधिक कहने से क्या प्रयोजन है ? संक्षेप में इतना ही बस है कि लोक का उपकार करने वाले जो-जो शास्त्र थे भगवान् आदिनाथ ने वे सब अपने पुत्रों को सिखलाये थे ।।125।।
“What is the need to say more on this subject? In short, Lord Adinath (Rishabhadeva) taught all the sciences and scriptures that were beneficial for the welfare of the world to his sons.”
श्लोक ( Shlok ) 126
समुद्दीपितविद्यरय काप्यासीद्दीप्तीता विभोः । स्वभावभास्वरस्येव भास्वतः शरदागमे ॥ १२६॥
जिस प्रकार स्वभाव से दैदीप्यमान रहने वाले सूर्य का तेज शरद्ऋतु के आने पर और भी अधिक हो जाता है उसी प्रकार जिन्होंने अपनी समस्त विद्याएं प्रकाशित कर दी है ऐसे भगवान् वृषभदेव का तेज उस समय भारी अद्भुत हो रहा था ।।126।।
“Just as the radiance of the naturally shining sun becomes even more intense with the arrival of autumn, similarly, Lord Rishabhadeva, having illuminated all branches of knowledge, shone with extraordinary and marvelous brilliance at that time.”
श्लोक ( Shlok ) 127
सुतैरधीत निश्शेषविद्यैरद्युतदीशिता । किरणैरिव तिग्मांशु रासादितशरद्युतिः ॥१२७॥
जिन्होंने समस्त विद्याएँ पढ़ ली है ऐसे पुत्रों से भगवान् वृषभदेव उस समय उस प्रकार सुशोभित हो रहे थे जिस प्रकार कि शरद्ऋतु में अधिक कांति को प्राप्त होने वाला सूर्य अपनी किरणों से सुशोभित होता है ।।127।।
“Lord Rishabhadeva, surrounded by his sons who had mastered all branches of knowledge, shone magnificently—just like the autumn sun, which becomes even more radiant and splendid with its glowing rays.”
श्लोक ( Shlok ) 128
पुत्रैरिष्टैः कलत्रैश्च वृतस्य भुवनेशिनः । महान् कालो व्यतीयाय दिव्यैर्भोगैरनारतैः ॥ १२८॥
अपने इष्ट पुत्र और इष्ट स्त्रियों से घिरे हुए भगवान् वृषभदेव का बहुत भारी समय निरंतर अनेक प्रकार के दिव्य भोग भोगते हुए व्यतीत हो गया ।।128।।
“Surrounded by his beloved sons and cherished wives, Lord Rishabhadeva spent a significant period of time enjoying various divine pleasures continuously.”
श्लोक ( Shlok ) 129
ततः कुमारकालोऽस्य कलितो मुनिसत्तमैः । विंशतिः पूर्वलक्षाणां पूर्यते स्म महाधियः ॥१२९॥
इस प्रकार अनेक प्रकार के भोगों का अनुभव करते हुए भगवान् का बीस लाख पूर्व वर्षों का कुमारकाल पूर्ण हुआ था ऐसी उत्तम मुनि गणधरदेव ने गणना की है ।।129।।
“In this way, while experiencing various pleasures, Lord Rishabhadeva completed twenty lakh Purva years of his youthful stage (Kumārakāla)—as recorded by the great sage and Ganadhara Deva.”
श्लोक ( Shlok ) 130
अत्रान्तरे महौषध्यो’ दीप्तोषध्यश्च पादपाः। ससर्वोषधयः कालाज्जाताः प्रक्षीणशक्तिकाः ॥१३०॥
इसी बीच में काल के प्रभाव से महौषधि, दिव्यौषधि, कल्पवृक्ष तथा सब प्रकार की औषधियाँ शक्तिहीन हो गयी थी ।।130।।
“In the meantime, due to the influence of time, the great medicinal herbs (Mahauṣadhi), divine herbs (Divyauṣadhi), wish-fulfilling trees (Kalpavṛkṣa), and all other types of medicinal plants lost their potency.”
श्लोक ( Shlok ) 131
सस्यान्यकृष्टपच्यानि यान्यासन् स्थितये नृणाम् । प्रायस्तान्यपि कालेन ययुर्विरलतां भुवि ॥१३१॥
मनुष्यों के निर्वाह के लिए जो बिना बोये हुए उत्पन्न होने वाले धान्य थे वे भी काल के प्रभाव से पृथ्वी में प्राय: करके विरलता को प्राप्त हो गये थे―जहाँ कहीं कुछ-कुछ मात्रा में ही रह गये थे ।।131।।
“The naturally growing grains, which sustained human life without the need for cultivation, also became scarce due to the influence of time—remaining in only a limited quantity in certain places on Earth.”
श्लोक 132 से 141
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आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121