आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 |
श्लोक 22 से 31 बाहुबली का अधोभाग और प्रभाव
बाहुबली के चरणों की कोमलता और शोभा का वर्णन, जो लाल कमलों से तुलनीय थे। उनके विशाल शरीर के बावजूद वे स्त्रियों के हृदय में प्रवेश कर गए, जो आश्चर्यजनक था। उनकी सुंदरता ऐसी थी कि स्त्रियाँ उन्हें स्वप्न में भी देखती थीं। सभी पुत्रों का यौवन वसंत ऋतु की तरह मनोहर था।
English translation of Ādi purāṇa parv 16 – Shlok 22 to 31
श्लोक ( Shlok ) 22
क्रमौ मृदुतलौ तस्य लसदङ्गुलिसदूलौ। रुचिं दधतुरारक्तौ रक्ताम्भोजस्य सश्रियः ॥२२॥
उसके दोनों ही चरण लालकमल की शोभा धारण कर रहे थे क्योंकि जिस प्रकार कमल कोमल होता है उसी प्रकार उसके चरणों के तलवे भी कोमल थे, कमलों में जिस प्रकार दल (पंखुरियां) सुशोभित होते हैं उसी प्रकार उसके चरणों में अँगुलियांरूपी दल सुशोभित थे, कमल जिस प्रकार लाल होते हैं उसी प्रकार उसके चरण भी लाल थे और कमलों पर जिस प्रकार लक्ष्मी निवास करती है उसी प्रकार उसके चरणों में भी लक्ष्मी (शोभा) निवास करती थी ।।22।।
Both of his feet radiated the beauty of red lotuses. Just as a lotus is soft, so were the soles of his feet. Just as a lotus has delicate petals, his feet were adorned with elegant toes. Just as a lotus is naturally red, his feet too had a reddish hue. And just as Goddess Lakṣmī resides upon lotuses, so did divine grace and splendor dwell upon his feet. ||22||
श्लोक ( Shlok ) 23
इत्यसौ परमोदारं दधानश्चरमं वपुः । संमाति स्म कथं नाम मानिनीहृत्कुटीरके ॥२३॥
इस प्रकार परम उदार और चरमशरीर को धारण करने वाला वह बाहुबली मानिनी स्त्रियों के हृदयरूपी छोटी-सी कुटी में कैसे प्रवेश कर गया था ? भावार्थ―स्त्रियों का हृदय बहुत ही छोटा होता है और बाहुबली का शरीर बहुत ही ऊँचा (सवा पाँच-सौ धनुष) था इसके सिवाय वह चरमशरीरी वृद्ध, (पक्ष में उसी भव से मोक्ष जाने वाला) था, मानिनी स्त्रियाँ चरमशरीरी अर्थात् वृद्ध पुरुष को पसंद नहीं करती है, इन सब कारणों के रहते हुए भी उसका वह शरीर स्त्रियों का मान दूर कर उनके हृदय में प्रवेश कर गया यह भारी आश्चर्य की बात थी ।।23।।
How did the supremely generous and final-bodied Bāhubali enter the small cottage-like hearts of proud women?
(Explanation)—A woman’s heart is very small, whereas Bāhubali’s body was extraordinarily tall (measuring over five hundred and twenty-five bows in height). Moreover, he was a charamshariri (one destined for liberation in the same lifetime), which meant he was spiritually mature and near the end of his worldly journey. Proud women typically do not favor such final-bodied beings, yet despite these factors, his presence captivated their hearts and dissolved their pride. This was indeed a great wonder! ||23||
श्लोक ( Shlok ) 24
स्वप्नेऽपि तस्य तद्रूपमनन्यमनसोऽङ्गनाः । पश्यन्ति स्म मनोहारि निखातमिव चेतसि ॥२४॥
जिनका मन दूसरी जगह नहीं जाकर केवल बाहुबली में ही लगा हुआ है ऐसी स्त्रियाँ स्वप्न में भी उस बाहुबली के मनोहर रूप को इस प्रकार देखती थीं मानो वह रूप उनके चित्त में उकेर ही दिया गया हो ।।24।।
The women, whose minds were entirely devoted to Bāhubali and nowhere else, beheld his enchanting form even in their dreams, as if his image had been permanently engraved upon their hearts. ||24||
श्लोक ( Shlok ) 25
मनोभवो मनोजश्च मनोभूर्मन्मथो ऽङ्गजः । मदनोऽनन्यजश्चेति व्याजह्रु स्तं तदाङ्गनाः ॥२५॥
उस समय स्त्रियां उसे मनोभव, मनोज, मनोभू, मन्मथ, अंगज, मदन और अनन्यज आदि नामों से पुकारती थीं ।।25।।
At that time, women addressed him with names such as Manobhava, Manoja, Manobhu, Manmatha, Angaja, Madana, and Ananyaja, all of which are epithets of the god of love. ||25||
श्लोक ( Shlok ) 26
सुमनोमञ्जरीयाणैरिक्षुधन्वा किलाङ्गजः । जगत्संमोहकारीति कः श्रद्दध्या दयुक्तिकम् ॥२६॥
ईख ही जिसका धनुष है ऐसा कामदेव अपने पुष्पों की मंजरीरूपी बाणों से समस्त जगत् का संहार कर देता है, इस बुद्धिरहित बात पर भला कौन विश्वास करेगा ?
भावार्थ―कामदेव के विषय में ऊपर लिखे अनुसार जो किंवदंती प्रसिद्ध है वह सर्वथा युक्तिरहित है, हाँ, बाहुबली-जैसे कामदेव ही अपने अलौकिक बल और पौरुष के द्वारा जगत् का संहार कर सकते थे ।।26।।
Who would ever believe the unreasonable notion that Kāmadeva, whose bow is merely a stalk of sugarcane, could destroy the entire world with his flower-clustered arrows?
(Explanation)—The popular legend about Kāmadeva’s power is entirely irrational. In reality, only a true Kāmadeva like Bāhubali, with his extraordinary strength and valor, could conquer the world. ||26||
श्लोक ( Shlok ) 27
समा भरतराजेन राजन्याः सर्व एव ते। विद्यया कलया दीप्त्या कान्त्या सौन्दर्यलीलया ॥२७॥
इस प्रकार वे सभी राजकुमार विद्या, कला, दीप्ति, कांति और सुंदरता की लीला से राजकुमार भरत के समान थे ।।27।।
Thus, all the princes were equal to Prince Bharata in their knowledge, skills, brilliance, radiance, and divine beauty. ||27||
श्लोक ( Shlok ) 28
शतमेकोतरं पुत्रा भर्तुस्ते भरतादयः । क्रमात् प्रापुर्युवावस्थां मदावस्थामिव द्विपाः ॥२८॥
जिस प्रकार हाथी क्रम-क्रम से मदावस्था का प्राप्त होते हैं उसी प्रकार भगवान् वृषभदेव के वे भरत आदि एक सौ एक पुत्र क्रम-क्रम से युवावस्था को प्राप्त हुए ।।28।।
Just as elephants gradually enter a state of musth (intoxication), in the same way, the 101 sons of Lord Ṛṣabhadeva, including Bharata, gradually attained the prime of their youth. ||28||
श्लोक ( Shlok ) 29
तद्यौवनमभूत्तेषु रमणीयतरं तदा। उद्यानपादपाधेषु वसन्तस्येव जृम्भितम् ॥२९॥
जिस प्रकार बगीचे के वृक्ष समूहों पर वसंतऋतु का विस्तार अतिशय मनोहर जान पड़ता हुए उस प्रकार उस समय उन राजकुमारों में वह यौवन अतिशय मनोहर जान पड़ता था ।।29।।
Just as the arrival of spring enhances the beauty of the trees in a garden, in the same way, the blooming youth of those princes appeared exceedingly enchanting at that time. ||29||
श्लोक ( Shlok ) 30
स्मितांशुमञ्जरीः शुभ्राः सताम्रानू पाणिपल्लवानू । भुजशाखाः फलोदग्रास्ते दधुर्युवपार्थिवा ॥३०॥
युवावस्था को प्राप्त हुए वे सभी पार्थिव अर्थात् राजकुमार पार्थिव अर्थात् पृथ्वी से उत्पन्न होने वाले वृक्षों के समान थे क्योंकि वे सभी वृक्षों के समान ही मंदहास्यरूपी सफेद मंजरी, लाल वर्ण के हाथरूपी पल्लव और फल देने वाली ऊँची-ऊँची भुजारूपी शाखाओं को धारण करते थे ।।30।।
Having attained youth, all those princely sons were like pārthiva (earth-born) trees. They resembled trees in the way they bore:The white blossoms of their gentle smiles,The red-hued budding leaves in the form of their hands, and The high-reaching branches in the form of their strong, fruit-bearing arms.||30||
श्लोक ( Shlok ) 31
ततामोदेन धूपेन वासितास्तच्छिरोरुहाः । गन्धान्धेरलिभिर्लींनैः कृताः सोपचया इव ॥३१॥
जिसकी सुगंधि सब ओर फैल रही है ऐसी धूप से उन राजकुमारों के शिर के बाल सुगंधित किये जाते थे, उस सुगंधि से अंध होकर भ्रमर आकर उन बालों में विलीन होते थे जिससे वे बाल ऐसे मालूम होते थे जिससे मानो वृद्धि से सहित ही हो रहे हों ।।31।।
The hair of those princes was perfumed with incense whose fragrance spread in all directions. Drawn by this enchanting aroma, bees, overcome with delight, swarmed around and merged into their hair, making it appear as if their locks were growing even fuller and more luxuriant. ||31||
श्लोक 32 से 41
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