आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 |
श्लोक 42 से 51 मरुदेवी का मुख वर्णन
मरुदेवी का मुख चंद्रमा से श्रेष्ठ, ओठ मूंगा से सुंदर, कंठ राग प्रसिद्ध, कपोल केश धारण करने वाले, नाक सुगंधित, नेत्र कमल, कान शास्त्रालंकृत, ललाट दर्पण, भौंहें धनुष समान थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 12 – Shlok 42 to 51
श्लोक ( Shlok ) 42
मुखमस्याः सरोजाक्ष्या जहास शशिमण्डलम् । सकलं विकलङ्क च विकलं सकलङ्ककम् ॥४२॥
उस कमलनयनी का मुख चंद्रमंडल की हंसी उड़ा रहा था क्योंकि उसका मुख सदा कलाओं से सहित रहता था और चंद्रमा का मंडल एक पूर्णिमा को छोड़कर बाकी दिनों में कलाओं से रहित होने लगता है, उसका मुख कलंकरहित था और चंद्रमंडल कलंक से सहित था ।।42।।
The face of that lotus-eyed beauty was mocking the moon’s orb because her face always remained full of all graces, whereas the moon’s orb, except on the full moon night, gradually loses its phases. Her face was free from blemishes, while the moon’s orb was marked with stains.
श्लोक ( Shlok ) 43
वैधव्य दूषितेन्दुश्रीरब्जश्रीः पङ्कदूषिता । तस्याः सदोज्ज्वलास्यश्रीर्वद केनोपमीयते ॥४३॥
चंद्रमा की शोभा दिन में चंद्रमा के नष्ट हो जाने के कारण वैधव्य दोष से दूषित हो जाती है और कमलिनी कीचड़ से दूषित रहती हैं इसलिए सदा उज्ज्वल रहने वाले उसके मुख की शोभा की तुलना किस पदार्थ से की जाये ? तुम्हीं कहो ।।43।।
The beauty of the moon is tainted by the flaw of widowhood during the day when the moon fades away, and the lotus remains sullied by the mud. So, tell me, with what can the radiance of her ever-bright face be compared?
श्लोक ( Shlok ) 44
दशनच्छदरागोऽस्याः स्मितांशुभिरनुद्रतः । पयःकणावकीर्णस्य विद्रमस्याजय च्छियम् ॥४४॥
उसके मंदहास्य की किरणों से सहित दोनों ओठों की लाली जल के कणों से व्याप्त मूंगा की भी शोभा जीत रही थी ।।44।।
The redness of her lips, adorned with the rays of her gentle smile, surpassed even the beauty of coral covered with droplets of water.
श्लोक ( Shlok ) 45
सुकण्ठ्याः कण्ठरागोऽस्या गीतगोष्ठीपु पप्रथे । मौर्वीरव इवाकृष्टधनुषः पुष्पधन्वनः ॥४५॥
उत्तम कंठ वाली उस मरुदेवी के कंठ का राग (स्वर) संगीत की गोष्ठियों में ऐसा प्रसिद्ध था मानो कामदेव के खींचे हुए धनुष की डोरी का शब्द ही हो ।।45।।
The melody of that desert goddess’s excellent throat was so renowned in musical gatherings as if it were the very sound of Kamadeva’s bowstring being drawn.
श्लोक ( Shlok ) 46
कपोलावलकानस्या दधतुः प्रतिबिम्वितान् । शुद्धिभाजोऽनुगृह्णन्ति मलिनानपि संश्रितान् ॥४६॥
उसके दोनों ही कपोल अपने में प्रतिबिंबित हुए काले केशों को धारण कर रहे थे सो ठीक ही है शुद्धि को प्राप्त हुए पदार्थ शरण में आये हुए मलिन पदार्थों पर भी अनुग्रह करते हैं―उन्हें स्वीकार करते हैं ।।46।।
Both her cheeks seemed to bear the reflection of her dark tresses, which is only natural—for pure things graciously accept even impure elements that seek their refuge.
श्लोक ( Shlok ) 47
तस्या नासाग्रमव्यग्रं १० बभौ मुखमभिस्थितम् । तदामोदमिवाघ्रातुं तन्निःश्वसितमुत्थितम् ॥४७॥
लंबा और मुख के सम्मुख स्थित हुआ उसकी नासिका का अग्रभाग ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो उसके श्वास की सुगंधि को सूँघने के लिए ही उद्यत हो ।।47।।
Her long and slightly upturned nose, positioned gracefully before her face, seemed to be poised as if eager to inhale the fragrance of her own breath.
श्लोक ( Shlok ) 48
नयनोत्पलयोः कान्तिस्तस्याः कर्णान्तमाश्रयत् । कर्णेजपत्वमन्योऽन्यस्पर्धयेव चिकीर्षतोः ॥४८॥
उसके नयन-कमलों की कांति कान के समीप तक पहुँच गयी थी जिससे ऐसी जान पड़ती थी मानो दोनों ही नयन-कमल परस्पर की स्पर्धा से एक दूसरे की चुगली करना चाहते हों ।।48।।
The radiance of her lotus-like eyes extended all the way to her ears, making it seem as if both eyes, in their rivalry, were trying to slander each other.
श्लोक ( Shlok ) 49
श्रुतेनालंकृतावस्याः कणों पुनरलंकृतौ । कर्णाभरणविन्यासैः श्रुतदेव्या इवार्चनैः ॥४९॥
यद्यपि उसके दोनों कान शास्त्र श्रवण करने से अलंकृत थे तथापि सरस्वती देवी की पूजा के पुष्पों के समान कर्णभूषण पहनाकर फिर भी अलंकृत किये गये थे ।।49।।
Although both her ears were already adorned by the wisdom of hearing the scriptures, they were further embellished with earrings, just like the ears of Goddess Saraswati are adorned with worship flowers.
श्लोक ( Shlok ) 50
ललाटेनाष्टमीचन्द्रचारुणास्या विदिद्युते । मनोजश्रीविलासिन्या दर्पणेनेव हारिणा ॥५०॥
अष्टमी के चंद्रमा के समान सुंदर उसका ललाट अतिशय दैदीप्यमान हो रहा था और ऐसा मालूम पड़ता था मानो कामदेव की लक्ष्मीरूपी स्त्री का मनोहर दर्पण ही हो ।।50।।
Her forehead, radiant like the eighth-day moon, shone brilliantly, appearing as if it were the enchanting mirror of Kamadeva’s Lakshmi-like consort.
श्लोक ( Shlok ) 51
विनीलैरलकैरस्या मुखाब्जे मधुपायितम् । भ्रूभ्यां च निर्जिता सज्या मदनस्य धनुर्लता ॥५१॥
उसके अत्यंत काले केश मुखकमल पर इकट्ठे हुए भौंरों के समान जान पड़ते थे और उसकी भौंहों ने कामदेव की डोरीसहित धनुष-लता को भी जीत लिया था ।।51।।
Her deep black tresses appeared like a swarm of bees gathered around her lotus-like face, while her eyebrows surpassed even the bowstring-adorned bow of Kamadeva.
श्लोक 52 से 61
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318 आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 |श्लोक 32 से 41 |