राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 303 से 317 | श्लोक 318 से 332 | श्लोक 333 से 353 | श्लोक 354 से 364 | श्लोक 365 से 382 | श्लोक 383 से 401 | श्लोक 402 से 412
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 413 to 422
श्लोक ( Shlok ) 413
न चेद्विनमिवंशैकभूषणस्य महात्मनः । नानारूपमिदं कर्म धर्म-शर्मविघातकृत् ॥ ४१३ ॥
यदि आप सीताको न भेजेंगे तो विनमि वंशके एक रत्न और महात्मा स्वरूप आपका यह विचित्र कार्य धर्म तथा सुखका विधात करनेवाल होगा ।। ४१३ ।।
“If you do not return Sita, then this strange act of yours—you, who are a gem of the Vinami dynasty and an embodiment of greatness—will become the destroyer of both your righteousness (Dharma) and your happiness.” [413]
श्लोक ( Shlok ) 414
“कुलपुत्रमहाम्भोधेर्न युक्तं मलधारणम् । सीताविमोचनोत्तुङ्गत्तरङ्गैः क्षिप्यतां बहिः ॥ ४१४ ॥
कुलीन पुत्ररूपी महासागरको यह कलङ्क धारण करना उचित नहीं है। अत सीताको छोड़ने रूप बड़ी-बड़ी तरङ्गोंके द्वारा इसे बाहर फेंक देना चाहिए ॥ ४१४ ॥
“It is not appropriate for an ocean-like noble son to bear this stain of dishonor. Therefore, it should be cast far away by the massive waves of releasing Sita.” [414]
श्लोक ( Shlok ) 415 – 416
इति तत्प्रोक्तमाकर्ण्य प्रत्युवाच खगेश्वरः । सीतां नानवबुध्याहमानैषं किन्तु “भूभुजः ॥ ४१५ ॥ ममैव सर्वरत्नानि खीरत्नं तु विशेषतः । प्रेषयत्विति किं वक्तुं युक्त मां ते महीपतेः ॥४१६॥
अणुमान्के यह वचन सुनकर रावणने उत्तर दिया कि मैं सीताको बिना जाने नहीं लाया हूं किन्तु जानकर लाया हूं। मैं राजा हूं अतः सर्वं रत्न मेरे ही हैं और विशेष कर स्त्रीरत्न तो मेरा ही है। तुम्हारे राजरामचन्द्रने जो कहला भेजा है कि सीताको भेज दो सो क्या ऐसा कहना उसे योग्य है ।। ४१५-४१६ ॥
“Hearing these words from Anuman (Hanuman), Ravana replied, ‘I did not bring Sita here unknowingly; rather, I brought her knowingly. I am the king, therefore all gems belong to me alone—and especially the gem among women (Stri-ratna) is rightfully mine. As for what your King Ramachandra has sent as a message, asking to return Sita—is it even fitting for him to say such a thing?'” [415-416]
श्लोक ( Shlok ) 417 – 418
जित्वा मां विग्रहेणाशु गृह्णीयात्केन वार्यते । इति तन्नाशसंसूचिवचनं दैवचोदितम् ॥ ४१७ ॥ श्रुत्वा रामोदयापादिनिमित्तं शुभसूचकम् । इदमेवात्र नोऽभीष्टमिति चित्तेऽनिलात्मजः ॥ ४१८ ॥
[ वह अभिमानियोंमें बड़ा अभिमानी मालूम होता है। वह मेरी श्रेष्ठताको नहीं जानता है। ‘मेरे चक्ररत्न उत्पन्न हुआ है’ यह समाचार क्या उसके कानोंके समीप तक नहीं पहुँचा है? भूमिगोचरियों तथा विद्याधर राजाओंके मुकुटों पर मेरे चरण-युगल, स्थल-कमल – गुलाबके समान सुशोभित होते हैं यह बात आबाल-गोपाल प्रसिद्ध है–बड़ेसे लेकर छोटे तक सब जानते हैं। सीता मेरी है यह बात तो बहुत चौड़ी है किन्तु समस्त विजयांर्ध पर्वत तक मेरा है। मेरे सिवाय सीता किसी अन्यकी नहीं हो सकती। तुम्हारा राजा जो इसे ग्रहण करना चाहता है वह पराक्रमी नहीं है- शूर-वीर नहीं है। इस सीताको अथवा अन्य किसी स्त्रीको ग्रहण करनेकी उसमें शक्ति है तो वह यहाँ आवे और युद्धके द्वारा मुझे जीत कर शीघ्र ही सीताको ले जावे । कौन मना करता है?] इस प्रकार भाग्यकी प्रेरणासे रावणके नाशको सूचित करनेवाले वचन सुनकर अणुमान् ने मनमें विचार किया कि इस समय रामचन्द्रके अभ्युदयको प्रकट करनेवाले शुभ सूचक निमित्त हो रहे हैं और इस विषयमें मुझे भी यही इष्ट है- मैं चाहता हूँ कि रामचन्द्र यहाँ आकर युद्धमें रावणको परास्त करें और अपना अभ्युदय बढ़ावें ।॥ ४१७-४१८ ।।
“[He seems to be the proudest among the proud. He does not know my supremacy. Has the news that ‘the divine discus (Chakraratna) has manifested for me’ not yet reached his ears? It is well known to everyone, from children to the elderly, that my pair of feet adorns the crowns of earth-dwelling and Vidyadhara kings like land-lotuses or roses. Leaving aside the matter of Sita being mine, which is a far greater truth, even the entire Vijayardha mountain belongs to me. Sita cannot belong to anyone else but me. Your king, who wishes to claim her, is neither powerful nor a true warrior. If he possesses the strength to claim this Sita or any other woman, let him come here, defeat me in battle, and take Sita away quickly. Who is stopping him?]”
Hearing these words, which were driven by fate and foretold Ravana’s destruction, Anuman (Hanuman) thought to himself: ‘At this moment, auspicious and favorable signs manifesting Ramachandra’s rise are occurring. This is exactly what I desire as well—I wish for Ramachandra to come here, defeat Ravana in battle, and advance his glory.’ [417-418]
श्लोक ( Shlok ) 419 – 420
व्याजहार दुरात्मानं दुश्चरित्रं दशाननम् । अन्यायस्य निषेद्धा त्वं निषेध्यश्चेन्निषेद्धरि ॥ ४१९ ॥ वाडवाग्निरिवाम्भोधौ केन वा स निषिध्यते । अभेद्येयमहं ख्यातो राघवः सिंहविक्रमः ॥ ४२० ॥
तदनन्तर वह अणुमान् रामचन्द्रकी ओरसे दुष्ट और दुराचारी रावणसे फिर कहने लगा कि ‘आप अन्यायको रोकनेवाले हैं, यदि रोकनेवालेको ही रोकना पड़े तो समुद्र में बड़वानलके समान उसे कौन रोक सकता है ? यह सीता अभेद्य है-इसे कोई विचलित नहीं कर सकता और मैं सिंहके समान पराक्रमी प्रसिद्ध रामचन्द्र हूँ ।। ४१९-४२० ।।
“Thereafter, on behalf of Ramachandra, Anuman (Hanuman) spoke again to the wicked and evil-minded Ravana, saying, ‘You are supposed to be the one who stops injustice. But if the protector himself has to be stopped, who can restrain him—just like who can restrain the submarine fire (Badavanala) within the ocean? This Sita is unyielding and inviolable—no one can shake her virtue—and I am Ramachandra, renowned for possessing the prowess of a lion.'” [419-420]
श्लोक ( Shlok ) 421 – 422
अकीर्तिनिष्फलाऽऽचन्द्रमिति स्मर्तुं तवोचितम् । मया बन्धुत्वसम्बन्धात्तव पथ्यमुदाहृतम् ॥४२१॥ प्रभो गृहाण चेत्तुभ्यं रोचते चेन्न मा गृहींः । इति दूतवचः श्रुत्वा पौलस्त्यः पुनरब्रवीत् ॥ ४२२ ॥
इस अकार्यके करनेसे जब तक चन्द्रमा रहेगा तबतक आपकी निष्प्रयोजन अकीर्ति बनी रहेगी इस बातका भी आपको विचार करना उचित है। मैंने भाईपनेके सम्बन्धसे आपके लिए हितकारी वच्चन कहे हैं। हे स्वामिन् ! यदि आपको रुचिकर हों तो ग्रहण कीजिए अन्यथा मत कीजिये।’ इस प्रकार दूत-अणुमान्के। वचन सुनकर रावण फिर कहने लगा ।। ४२१-४२२ ।।
“By committing this improper deed, your baseless infamy will endure for as long as the moon exists; it is highly fitting for you to consider this point as well. Out of a sense of brotherly relation, I have spoken these beneficial words to you. O Lord! If they are pleasing to you, then accept them; otherwise, do not.’ Hearing these words from the messenger Anuman (Hanuman), Ravana began to speak again.” [421-422]
श्लोक 423 से 435
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राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 123 | श्लोक 124 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 174 | श्लोक 175 से 184 | श्लोक 185 से 193 | श्लोक 194 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 235 | श्लोक 236 से 252 | श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 276 | श्लोक 277 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 317 | श्लोक 318 से 332 | श्लोक 333 से 353 | श्लोक 354 से 364 | श्लोक 365 से 382 | श्लोक 383 से 401 | श्लोक 402 से 412
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