राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 360 | श्लोक 361 से 371 | श्लोक 372 से 381 | श्लोक 382 से 391| श्लोक 392 से 401
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 402 to 412
श्लोक ( Shlok ) 402 – 403
भभात्येषः स्वमिथ्यात्वपाकाविष्कृतचेतसा । पाषण्डिषु किमस्माकं सन्त्यत्राज्ञापराङ्मुखाः ॥४०२॥ कथ्यतामिति पापेन प्रष्ठव्यास्तेन मन्त्रिणः । निर्ग्रन्थाः सन्ति देवेति ते वदिष्यन्ति सोऽपि तान् ॥४०३॥
तदनन्तर मिथ्यात्वके उदय से जिसका चित्त भर रहा है ऐसा पापी कल्कि अपने मन्त्रियोंसे पूछेगा कि कहो इन पाषण्डी साधुओंमें अब भी क्या कोई ऐसे हैं जो हमारीआज्ञासे पराङ्मुख रहते हों ? इसके उत्तर में मन्त्री कहेंगे कि हे देव ! निर्गन्थ साधु अब भी आपकी आज्ञासे बहिर्भूत हैं. ॥ ४०२-४०३ ॥
“Thereafter, that sinful Kalki, whose consciousness is entirely clouded by the rise of deluding wrong belief (Mithyatva), will ask his ministers: ‘Tell me, among these heretical ascetics, are there still any who remain averse to our command?’ In response, the ministers will reply: ‘O Lord! The possessionless and unattached Jain monks (Nirgrantha Sadhus) still remain outside the purview of your command.’ ॥ 402-403 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 404– 409
आचारः कीदृशस्तेषामिति प्रक्ष्यति भूपतिः । निजपाणिपुटामश्रा धनहीना गतस्पृहाः ॥ ४०४ ॥ अहिंसाव्रतरक्षार्थ व्यक्तचेलादिसंवराः । साधनं तपसो मत्वा देहस्थित्यर्थमाहृतिम् ॥ ४०५ ॥ *एकद्वयुपोषितप्रान्ते भिक्षाकालेऽङ्गदर्शनात् । निर्याचनात्स्वशास्त्रोक्तां ग्रहीतुमभिलाषिणः ॥ ४०६ ॥ आत्मनो घातके त्रायके च ते समदर्शिनः । श्रुत्पिपासादिवाधायाः सहाः सत्यपि कारणे ।। ४०७ ।। परपाषण्डिवश्नान्यैरदत्तमभिलाषुकाः । २ सर्पा वा विहितावासा ज्ञानध्यानपरायणाः ॥ ४०८ ॥ अनुसञ्चारदेशेषु संवसन्ति मृगैः समम् । इति वक्ष्यन्ति दृष्टं स्वैविशिष्टास्तेऽस्य मन्त्रिणः ॥ ४०९ ॥
यह सुनकर राजा फिर पूछेगा कि उनका आचार कैसा है ? इसके उत्तरमें मन्त्री लोग कहेंगे कि अपना हस्तपुट ही उनका बर्तन है अर्थात् वे हाथमें ही भोजन करते हैं, धनरहित होते हैं, इच्छारहित होते हैं, अहिंसा व्रतकी रक्षाके लिए वस्त्रादिका आवरण छोड़कर दिगम्बर रहते हैं, तपका साधन मानकर शरीरकी स्थितिके लिए एक दो उपवासके बाद भिक्षाके समय केवल शरीर दिखला कर याचनाके बिना ही अपने शास्त्रोंमें कही हुई विधिके अनुसार आहार ग्रहण करनेकी इच्छा करते हैं, वे लोग अपना घात करनेवाले अथवा रक्षा करनेवाले पर समान दृष्टि रखते हैं, क्षुधा तृषा आदिकी वाधाको सहन करते हैं, कारण रहते हुए भी वे अन्य साधुओंके समान दूसरेके द्वारा नहीं दी हुई वस्तुकी कभी अभिलाषा नहीं रखते हैं, वे सर्पके समान कभी अपने रहनेका स्थान बनाकर नहीं रखते हैं, ज्ञान-ध्यानमें तत्पर रहते हैं और जहाँ मनुष्योंका संचार नहीं ऐसे स्थानोंमें हरिणोंके साथ रहते हैं। इस प्रकार उस राजाके विशिष्ट मन्त्री अपने द्वारा देखा हुआ हाल करेंगे ॥ ४०४-४०९ ॥
“Hearing this, the king will ask again, ‘What is their conduct like?’ In response, the ministers will describe the account they have personally witnessed, saying: ‘Their own cupped palms serve as their vessel—meaning they take their food only in their hands. They are devoid of wealth and free from all worldly desires. To safeguard the vow of non-violence (Ahimsa), they discard all clothing and coverings to remain sky-clad (Digambara). Regarding it as an instrument of penance, they only seek to accept food after one or two days of fasting solely to sustain the body, presenting themselves at the time of alms-seeking, without making any verbal request, and strictly according to the procedures prescribed in their scriptures. They maintain an equal vision toward both their attacker and their protector. They endure the afflictions of hunger, thirst, and other physical hardships. Even in times of extreme necessity, unlike other ascetics, they never harbor a desire for anything not explicitly given by another. Like a serpent, they never build or keep a permanent dwelling for themselves; they remain deeply engrossed in spiritual knowledge and meditation, and reside alongside deer in places completely uninhabited by humans.’ In this manner, the prominent ministers of that king will narrate the reality they have observed. ॥ 404-409 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 410
श्रुत्वा तत्सहितुं नाहं शक्नोग्यक्रमवर्तनम् । तेषां पाणिपुटे प्राच्यः पिण्डः शुल्को विधीयताम् ॥ ४१० ॥
यह सुनकर राजा कहेगा कि मैं इनकी अक्रम प्रवृत्तिको सहन करनेके लिए समर्थ नहीं हूं, इसलिए इनके हाथमें जो पहला भोजनका ग्रास दिया जाय वही कर रूपमें इनसे वसूल किया जावे ॥ ४१० ।।
“Hearing this, the king will say, ‘I am not capable of tolerating their non-conformist practices; therefore, the very first morsel of food offered into their hands must be collected from them as a tax.’ ॥ 410 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 411 – 412
इति राजोपदेशेन याचिष्यन्ते नियोगिनः । अग्रपिण्डमभुञ्जनाः स्थास्यन्ति मुनयोऽपि ते ॥ ४११ ॥ तद्दृष्ट्वा दर्पिणो नग्ना नाज्ञां राज्ञः प्रतीप्सवः । किं जातमिति ते गत्वा ज्ञापयिष्यन्ति तं नृपम्॥ ४१२ ॥
इस तरह राजाके कहनेसे अधिकारी लोग मुनियोंसे प्रथम ग्रास माँगेंगे और मुनि भोजन किये बिना ही चुप चाप खड़े रहेंगे। यह देख अहंकारसे भरे हुए कर्मचारी राजासे जाकर कहेंगे कि मालूम नहीं क्या हो गया है ? दिगम्बर साधु राजाकी आज्ञा माननेको तैयार नहीं हैं ।॥ ४११-४१२ ॥
“In this manner, upon the king’s command, the officials will demand the first morsel from the monks, but the monks will stand there silently without consuming the food. Seeing this, the employees, filled with arrogance, will go back to the king and report, ‘We do not know what has happened, but the sky-clad ascetics are not ready to obey the king’s command!’ ॥ 411-412 ॥”
श्लोक 413 से 421
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549 | चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 691
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका
वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 360 | श्लोक 361 से 371 | श्लोक 372 से 381 | श्लोक 382 से 391| श्लोक 392 से 401
Download PDF
महापुराण हिन्दी-भाषानुवाद
आदिपुराण पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 | पर्व 66 | पर्व 67 | पर्व 68 | पर्व 69 | पर्व 70 | पर्व 71 | पर्व 72 | पर्व 73 | पर्व 74
महापुराण सारांश
आदिपुराण पर्व 1पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 | पर्व 66 | पर्व 67 | पर्व 68 | पर्व 69 | पर्व 70 | पर्व 71 | पर्व 72 | पर्व 73 | पर्व 74