मेरी भावना – छंद 4: व्याख्या और अर्थ
अहंकार का भाव न रखूं, नहीं किसी पर क्रोध करूं, देख दूसरों की बढ़ती को कभी न ईर्ष्या-भाव धरूं ।
रहे भावना ऐसी मेरी, सरल-सत्य-व्यवहार करूं, बने जहां तक इस जीवन में औरों का उपकार करूं ॥4॥
यह छंद हमारे जीवन को चार महान दोषों से बचाने की प्रेरणा देता है—मान (अहंकार), क्रोध, माया (कपट) और लोभ। कविवर प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि हमारी आत्मा इन कषायों से सुरक्षित रहे और जीवन सद्गुणों से परिपूर्ण बने।
“अहंकार का भाव न रखूं, नहीं किसी पर क्रोध करूं”
‘मेरी भावना’ का यह चरण आत्मा को दो सबसे बड़े शत्रुओं—अहंकार (मान) और क्रोध—से बचाने की प्रार्थना है। ये आत्मा की शुद्धता को नष्ट कर देते हैं और उसे संसार में भटकाते रहते हैं।
अहंकार क्या है?
अहंकार का अर्थ है—Ego घमंड, मद या गर्व ।
जब मनुष्य अपने ज्ञान, धन, रूप, सौंदर्य, शक्ति, कुल, जाति, पद या प्रतिष्ठा के कारण स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है, तब अहंकार जन्म लेता है। शास्त्रों में ऐसे अनेक प्रकार के मद का वर्णन मिलता है, पर उनका परिणाम एक ही होता है—अशांति। अहंकारी व्यक्ति हमेशा तुलना करता रहता है। उसे लगता है—
- मैं सबसे बड़ा हूँ।
- मैं सबसे श्रेष्ठ हूँ।
- बाकी सभी मुझसे छोटे हैं।
लेकिन जैसे ही उसे कोई अपने से अधिक योग्य, अधिक सफल या अधिक सम्मानित व्यक्ति दिखाई देता है, उसका मन विचलित हो जाता है। वह तनाव, ईर्ष्या और दुःख में डूब जाता है। इसलिए अहंकार वास्तव में सुख नहीं देता, बल्कि निरंतर मानसिक पीड़ा का कारण बनता है।
अहंकार का सबसे बड़ा भ्रम
हम जिस वस्तु पर गर्व करते हैं, क्या वह सदैव हमारे पास रहने वाली है? धन आज है, कल नहीं भी हो सकता है। शरीर आज बलवान है, कल वृद्ध होकर सहारे का मोहताज बन सकता है। रूप और सौंदर्य समय के साथ बदल जाते हैं। ज्ञान भी तब तक उपयोगी है जब तक स्मरण शक्ति साथ देती है। इस संसार की प्रत्येक वस्तु परिवर्तनशील है। जो आज हमारे पास है, वह किसी भी क्षण समाप्त हो सकती है। जब सब कुछ क्षणभंगुर है, तब अहंकार किस बात का?
अतीत और भविष्य को याद रखिए
जब भी अभिमान आए, अपने जीवन के तीन चित्र मन में देखिए—
- बचपन,
- युवावस्था,
- वृद्धावस्था।
जो शरीर आज सुंदर है, वही समय के साथ बदल जाएगा। जो बल आज है, वह एक दिन क्षीण हो जाएगा। इसी प्रकार यदि ज्ञान का अभिमान हो, तो याद रखिए कि संसार में पूर्ण ज्ञान केवल सर्वज्ञ भगवान का है। हम सब सीमित ज्ञान वाले जीव हैं। हमारी उपलब्धियाँ हमारी पात्रता तक ही सीमित हैं। इसलिए ज्ञान विनम्र बनाए, अहंकारी नहीं। जब भी अहंकार उत्पन्न हो, उसी क्षण प्रभु से प्रार्थना करें—
“हे प्रभु! मुझे विनम्रता प्रदान करें। मैं अहंकार को पहचान रहा हूँ, कृपया मेरी आत्मा की रक्षा करें।”
संसार में सब कुछ बदलता रहता है
इतिहास इस सत्य का साक्षी है कि समय कभी एक जैसा नहीं रहता। जो कभी अत्यंत धनवान थे, वे निर्धन भी हुए हैं। जो कभी राजा थे, वे भी पतन को प्राप्त हुए। और जो कभी साधारण स्थिति में थे, वे भी समय के साथ समृद्ध बने। यह सब पुण्य और पाप के उदय का परिणाम है। आज जिन महलों को लोग अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए बनाते हैं, कई बार समय ऐसा आता है कि उनमें रहने वाला भी कोई नहीं बचता। इसलिए परिवर्तनशील संसार में स्थायी अहंकार का कोई स्थान नहीं है।
नहीं किसी पर क्रोध करूं
क्रोध का अर्थ है—गुस्सा, रोष और मानसिक अशांति।
कविवर केवल इतना नहीं कहते कि किसी को मत मारो या अपशब्द मत कहो। वे उससे भी आगे बढ़कर कहते हैं—
“किसी पर क्रोध ही मत करो।”
क्योंकि क्रोध का सबसे पहला शिकार सामने वाला नहीं, बल्कि स्वयं क्रोध करने वाला व्यक्ति होता है।
क्रोध जलते हुए अंगारे के समान है
एक सुंदर उदाहरण समझिए।
यदि कोई व्यक्ति क्रोध में जलता हुआ अंगारा उठाकर किसी दूसरे पर फेंकना चाहता है, तो यह निश्चित नहीं कि सामने वाला जलेगा या नहीं। लेकिन यह निश्चित है कि अंगारा उठाते ही उसका अपना हाथ अवश्य जल जाएगा। क्रोध भी ऐसा ही है। हम सोचते हैं कि हम सामने वाले को दंड दे रहे हैं, जबकि सबसे अधिक नुकसान हमारा अपना हो रहा होता है।
- रक्तचाप बढ़ता है।
- मानसिक तनाव बढ़ता है।
- कटु वचन निकलते हैं।
- नए कर्मों का बंध होता है।
- मन की शांति नष्ट हो जाती है।
सामने वाले पर कितना प्रभाव पड़ेगा, यह निश्चित नहीं है। हो सकता है उसने हमारी बात को गंभीरता से लिया ही न हो। लेकिन हमारा मन तो अशांत हो ही जाता है।
छोटी-छोटी बातों पर क्रोध क्यों?
अक्सर हमारा अधिकांश क्रोध बहुत छोटी-छोटी बातों पर होता है—
- किसी ने हमारी बात नहीं मानी।
- किसी कर्मचारी से गलती हो गई।
- परिवार के किसी सदस्य ने अपेक्षा के अनुसार कार्य नहीं किया।
- किसी ने हमारी प्रशंसा नहीं की।
हम घंटों क्रोधित रहते हैं, जबकि सामने वाला सामान्य रूप से अपना कार्य करता रहता है। जिसे हम दंड देना चाहते थे, वह तो शांत रहता है; लेकिन हमारा रक्तचाप बढ़ जाता है, हमारी नींद खराब हो जाती है और हमारी मानसिक शांति समाप्त हो जाती है। इसलिए क्रोध वास्तव में दूसरे को नहीं, पहले स्वयं को जलाता है।
क्रोध आए तो क्या करें?
जब भी क्रोध आने लगे, स्वयं को बार-बार स्मरण कराएँ—
“मैं शांत हूँ। मेरा स्वभाव शांति है।”
कुछ क्षण मौन रहें। गहरी श्वास लें। प्रतिक्रिया देने से पहले स्वयं को संभालें। यदि परिस्थितिवश कठोर शब्द बोलने भी पड़ें, तो भीतर का भाव शांत रहना चाहिए। बाहरी व्यवहार परिस्थिति के अनुसार हो सकता है, लेकिन अंतःकरण में द्वेष और अशांति नहीं आनी चाहिए।
“देख दूसरों की वृद्धि को, कभी न ईर्ष्या भाव धरूं”
‘मेरी भावना’ का यह चरण साधना का अत्यंत गहरा सूत्र सिखाता है। देखने में यह पंक्ति सरल लगती है, पर वास्तव में यह आत्मनिरीक्षण का सबसे कठिन अभ्यास है। अहंकार और क्रोध को पहचानना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन ईर्ष्या jealousy इतनी सूक्ष्म होती है कि अधिकांश लोग इसे अपने भीतर स्वीकार ही नहीं करते।
अक्सर हम कहते हैं—“मुझे किसी से ईर्ष्या नहीं होती।” लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है?
ईर्ष्या jealousy को पहचानना सीखिए
ईर्ष्या का अर्थ केवल किसी से जलना नहीं है। ईर्ष्या वह मानसिक अवस्था है जिसमें किसी दूसरे की उन्नति देखकर हमारा मन संकुचित होने लगता है। इसे पहचानने का सबसे सरल उपाय है—अपने मन की पहली प्रतिक्रिया को देखना।
कल्पना कीजिए—
- आपके पड़ोसी को समाज में सम्मानित किया जा रहा है।
- किसी परिचित के बच्चे को एक लाख रुपये का पुरस्कार मिला।
- किसी रिश्तेदार ने आपसे बड़ा घर बना लिया।
- किसी मित्र ने आपसे महंगी गाड़ी खरीद ली।
उस समय आपके मन में सबसे पहला भाव क्या उठता है? यदि मन पूरी सहजता से प्रसन्न हो जाए, तो समझिए कि ईर्ष्या कम है। लेकिन यदि भीतर हल्की-सी बेचैनी, तुलना, हीनता या असहजता उत्पन्न हो जाए, तो वही ईर्ष्या का प्रारम्भ है। ईर्ष्या बाहर से दिखाई नहीं देती, लेकिन भीतर आत्मा को निरंतर कष्ट देती रहती है।
ईर्ष्या हमें आगे नहीं बढ़ने देती
ईर्ष्या का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि यह हमें स्वयं आगे बढ़ने से रोक देती है। दूसरे की सफलता देखकर प्रेरित होने के स्थान पर हमारा मन उसके दोष खोजने लगता है। कोई बड़ा दान दे दे तो मन कहता है— “पता नहीं पैसा कहाँ से आया होगा!” कोई बच्चा परीक्षा में प्रथम आ जाए तो विचार आता है— “ज़रूर किसी तरह नंबर ले आया होगा।”
कोई व्यक्ति प्रतिष्ठा प्राप्त कर ले तो मन तुरंत उसके पीछे छिपी कमियाँ खोजने लगता है। वास्तव में हम सामने वाले का नहीं, अपने मन का परिचय दे रहे होते हैं। ईर्ष्या का पहला कार्य है—दूसरे की सफलता का सम्मान करने से रोक देना।
अपने परिणामों को पकड़िए
साधना का अर्थ दूसरों को बदलना नहीं, बल्कि अपने परिणामों को देखना है। जैसे ही किसी की उन्नति दिखाई दे, उसी क्षण अपने मन को पकड़िए। अपने आप से पूछिए—
“अभी मेरे भीतर कौन-सा भाव उत्पन्न हुआ?”
यदि तुलना आई है, तो उसे पहचानिए। यदि जलन आई है, तो उसे स्वीकार कीजिए। यदि हीनता आई है, तो उसे देखिए। यही आत्मनिरीक्षण साधना की शुरुआत है।
अपने परिणामों को तुरंत बदलना सीखिए
सिर्फ ईर्ष्या पहचान लेना पर्याप्त नहीं है। उसे सकारात्मक भावना में बदलना भी आवश्यक है। मान लीजिए कोई व्यक्ति उदारतापूर्वक दान दे रहा है। मन यदि कहे—“दिखावा कर रहा है।”
तो उसी क्षण अपने विचार को बदल दीजिए—
“यह व्यक्ति आज लोभ का त्याग करके दान दे रहा है। मैं इसके शुभ परिणामों की अनुमोदना करता हूँ।”
प्रत्येक उपलब्धि अपने पुण्य का परिणाम है
जैन दर्शन हमें सिखाता है कि संसार में बिना अपने पुण्य और क्षयोपशम के किसी को कुछ भी प्राप्त नहीं होता।
- किसी को धन मिला।
- किसी को यश मिला।
- किसी को सौंदर्य मिला।
- किसी को ज्ञान मिला।
यह सब उसके कर्मों के उदय का परिणाम है। यदि हमें भी श्रेष्ठ फल चाहिए, तो दूसरों से ईर्ष्या करने के स्थान पर अपने पुरुषार्थ को बढ़ाना चाहिए। दूसरों की सफलता देखकर अपने परिणाम बिगाड़ना, अपने ही भविष्य को बिगाड़ना है।
ईर्ष्या का आध्यात्मिक दुष्परिणाम
जब मन में ईर्ष्या आती है, तब केवल मानसिक अशांति ही उत्पन्न नहीं होती, बल्कि हमारे कर्मों का भी अशुभ बंध होता है। ईर्ष्या धीरे-धीरे—
- मन को नकारात्मक बनाती है,
- दूसरों के गुण देखने की क्षमता समाप्त करती है,
- हीनता और असंतोष को बढ़ाती है,
- तथा आत्मा को पतन की ओर ले जाती है।
इसलिए साधक का पुरुषार्थ केवल बाहर के व्यवहार को सुधारना नहीं, बल्कि भीतर उठने वाले प्रत्येक परिणाम को शुद्ध करना है।
ईर्ष्या का उपाय — गुणीषु प्रमोद
ईर्ष्या का वास्तविक उपचार जैन दर्शन ने एक सुंदर भावना के रूप में बताया है—गुणीषु प्रमोद। अर्थात् जो हमसे अधिक गुणवान हैं, अधिक ज्ञानी हैं, अधिक समृद्ध हैं, अधिक सफल हैं—उन्हें देखकर मन में प्रसन्नता उत्पन्न होना। ऐसे व्यक्ति को देखकर—
- चेहरे पर मुस्कान आए,
- हृदय में प्रसन्नता हो,
- हाथ सम्मान से जुड़ जाएँ,
- और मन से निकले—
“धन्य हैं। इनके गुणों की मैं अनुमोदना करता हूँ।” यही प्रमोद भावना है। जीवन का एक सरल नियम है—
जैसा भाव हम संसार को देते हैं, वैसा ही भाव धीरे-धीरे हमारे जीवन में लौटकर आता है।
यदि हम दूसरों के प्रति सम्मान, प्रसन्नता और अनुमोदना रखते हैं, तो समाज भी हमें सम्मान देता है। यदि हम केवल जलन और नकारात्मकता फैलाते हैं, तो वही मानसिक विष सबसे पहले हमारे भीतर फैलता है। ईर्ष्या सामने वाले को जलाए या न जलाए, लेकिन ईर्ष्यालु व्यक्ति को भीतर से अवश्य जलाती है।
स्वयं को प्रतिदिन समझाइए
जब भी किसी की उन्नति दिखाई दे, अपने मन से कहिए— “उसे जो मिला है, वह उसके पुण्य का फल है। यदि मुझे भी ऐसा जीवन चाहिए, तो मुझे भी शुभ कर्म और श्रेष्ठ पुरुषार्थ करना होगा।”
यही आत्मसंवाद धीरे-धीरे ईर्ष्या को समाप्त कर देता है।
“रहे भावना ऐसी मेरी, सरल सत्य व्यवहार करूं”
‘मेरी भावना’ की यह पंक्ति केवल अच्छे व्यवहार की शिक्षा नहीं देती, बल्कि आत्मशुद्धि का मार्ग दिखाती है। कविवर प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि हमारा व्यवहार केवल बाहरी दिखावा न हो, बल्कि हमारे मन की सरलता और सत्यता का वास्तविक प्रतिबिंब बने। सरलता और सत्यता किसी भी साधक के सबसे बड़े आभूषण हैं। यदि जीवन में इन्हें धारण कर लिया जाए, तो अनेक समस्याएँ अपने आप समाप्त होने लगती हैं।
जैसा व्यवहार करेंगे, वैसा ही लौटकर मिलेगा
जीवन का एक अटल नियम है—
जैसा व्यवहार हम दूसरों के साथ करते हैं, वैसा ही व्यवहार किसी न किसी रूप में हमारे पास लौटकर आता है।
इसलिए केवल वाणी में नहीं, बल्कि अपने मन के परिणामों में भी सरलता लाना आवश्यक है। कभी ऐसा मत सोचिए—
- “यह तो हमारा नौकर है।”
- “यह गरीब है।”
- “यह हमारे अधीन काम करता है।”
ऐसी सोच अहंकार को जन्म देती है। संसार में किसी के भी दिन बदलने में देर नहीं लगती। हम सबने कोरोना महामारी के दौरान देखा कि एक ही दिन में परिस्थितियाँ कैसे बदल गईं। जो लोग बड़े उद्योगों के मालिक थे, उनका व्यवसाय ठप हो गया। जिनके पास अपार धन था, वे भी असहाय दिखाई दिए। जो विदेशों में करोड़ों कमाने जा रहे थे, एक क्षण में सब कुछ बदल गया।
संसार की यही सच्चाई है—एक मिनट और एक क्षण में परिस्थितियाँ बदल सकती हैं।
इसलिए किसी भी व्यक्ति के साथ उसके वर्तमान के आधार पर व्यवहार मत कीजिए। उसके भीतर भी वही आत्मा है जो आपके भीतर है।
हमें दूसरों को नहीं, स्वयं को बदलना है
अक्सर लोग कहते हैं—
- “यदि मैं बहुत सरल बन गया, तो लोग मेरा फायदा उठाएँगे।”
- “यदि मैं सीधा रहूँगा, तो परिवार वाले मुझे दबाएँगे।”
यह सोच स्वाभाविक हो सकती है, लेकिन साधना का मार्ग कुछ और सिखाता है। हमें अपना ध्यान इस बात पर नहीं देना कि सामने वाला कैसा है। हमारा पुरुषार्थ इस बात पर होना चाहिए कि हम कैसे हैं। दुनिया में एक ही स्थान ऐसा है जिसे हम पूरी तरह बदल सकते हैं—
वह है हमारा अपना मन।
हम दूसरों के स्वभाव की गारंटी नहीं ले सकते, लेकिन अपने परिणामों की जिम्मेदारी अवश्य ले सकते हैं। इसलिए अपना समय दूसरों को बदलने में नहीं, स्वयं को निर्मल बनाने में लगाइए।
सरलता कमजोरी नहीं, आत्मबल है
सरल व्यक्ति मूर्ख नहीं होता। सरल व्यक्ति वह है जिसके मन, वचन और कर्म में एकरूपता होती है। वह जैसा सोचता है, वैसा ही बोलता है और वैसा ही आचरण करता है। उसे किसी प्रकार का दिखावा नहीं करना पड़ता। उसे अलग-अलग लोगों के सामने अलग-अलग चेहरे पहनने की आवश्यकता नहीं होती। यही वास्तविक सरलता है।
मायाचार से बचिए
सरलता का सबसे बड़ा शत्रु है—मायाचार।
मायाचार अर्थात् छल, कपट और बनावटीपन। जब मन में कुछ और हो, वाणी में कुछ और हो और व्यवहार में कुछ और दिखाई दे, तब व्यक्ति भीतर से विभाजित हो जाता है। ऐसी स्थिति में न तो संबंध टिकते हैं और न ही संवाद प्रभावी बनता है। सामने वाला शायद कुछ समय तक भ्रमित हो जाए, लेकिन हृदय तक पहुँचने वाला व्यवहार केवल वही होता है जिसमें सत्य और निष्कपटता हो। इसलिए अपने जीवन से धीरे-धीरे छल, कपट और दिखावे को कम करते जाइए।
मन, वचन और कर्म की एकता
जब हमारा मन, वचन और कर्म तीनों एक दिशा में चलने लगते हैं, तब व्यक्तित्व में अद्भुत शक्ति आ जाती है। ऐसे व्यक्ति की बातों पर लोग सहज ही विश्वास करते हैं। उसके संबंध मधुर होते हैं। उसका मन हल्का रहता है। और सबसे बड़ी बात—उसे किसी प्रकार का मानसिक तनाव नहीं रहता, क्योंकि उसे किसी झूठ या दिखावे को संभालने की आवश्यकता नहीं होती।
स्वयं को प्रतिदिन यह स्मरण कराइए
साधना केवल प्रवचन सुनने से नहीं होती, बल्कि प्रतिदिन स्वयं को सही दिशा में प्रेरित करने से होती है। अपने आप से बार-बार कहिए—
“मैं सहज हूँ।”
सहजता ही सरलता की पहचान है। एक छोटा बच्चा किसी से भेदभाव नहीं करता। उसे यह नहीं दिखाई देता कि कौन अमीर है, कौन गरीब है, कौन अपना है, कौन पराया है। वह सभी के साथ समान भाव से खेलता है। लेकिन जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, हमारे भीतर अनेक प्रकार के भेदभाव, स्वार्थ और बनावटी व्यवहार प्रवेश करने लगते हैं। साधना का उद्देश्य इन्हीं कृत्रिम परतों को हटाकर फिर से उस सहजता को प्राप्त करना है।
सरलता का अभ्यास कैसे करें?
प्रतिदिन स्वयं से कुछ प्रश्न पूछिए—
- क्या आज मेरे मन में किसी के प्रति छल का भाव आया?
- क्या मैंने किसी से बनावटी व्यवहार किया?
- क्या मेरे मन और वाणी में अंतर था?
- क्या मैं सभी के साथ समान सम्मान से मिला?
यदि उत्तर ‘हाँ’ हो, तो स्वयं को दोष देने की आवश्यकता नहीं। केवल अगले दिन थोड़ा और बेहतर बनने का संकल्प लें। धीरे-धीरे यही अभ्यास सरलता को हमारा स्वभाव बना देगा।
“बने जहाँ तक इस जीवन में, औरों का उपकार करूं”
‘मेरी भावना’ का अंतिम संदेश हमें केवल अपने लिए जीना नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन में भी प्रकाश बनने की प्रेरणा देता है।
उपकार का अर्थ केवल धन देना नहीं है। उपकार का अर्थ है—अपने पास जो भी अतिरिक्त है, उसे किसी योग्य व्यक्ति के जीवन को बेहतर बनाने में लगाना। हमारे पास धन हो, समय हो, ज्ञान हो, अनुभव हो, संसाधन हों या प्रेरणा देने की क्षमता—यदि उनका उपयोग केवल अपने लिए होगा, तो वे सीमित रह जाएँगे। लेकिन वही साधन जब किसी और के जीवन में आशा का दीपक बनते हैं, तब उनका वास्तविक मूल्य प्रकट होता है।
जो अतिरिक्त है, वह किसी का अधिकार बन सकता है
हर व्यक्ति के जीवन में कुछ न कुछ ऐसा होता है जो उसकी आवश्यकता से अधिक होता है।
- किसी के पास धन अधिक है।
- किसी के पास समय अधिक है।
- किसी के पास ज्ञान अधिक है।
- किसी के पास अनुभव अधिक है।
यदि हम अपने इस “अतिरिक्त” को किसी ज़रूरतमंद के जीवन से जोड़ दें, तो वही उपकार बन जाता है।
उपकार का एक सरल अभ्यास
यदि हम वास्तव में इस भावना को जीवन में उतारना चाहते हैं, तो शुरुआत अपने आसपास से ही कर सकते हैं। अपने घर या कार्यस्थल पर काम करने वाले किसी कर्मचारी, ड्राइवर, घरेलू सहायक या श्रमिक से एक दिन प्रेमपूर्वक पूछिए—
“आपके बच्चे कहाँ पढ़ते हैं? उनकी पढ़ाई के लिए किसी सहायता की आवश्यकता है?”
यदि किसी एक बच्चे की शिक्षा का उत्तरदायित्व भी हम अपने सामर्थ्य के अनुसार उठा लें, तो वह केवल आर्थिक सहायता नहीं होगी, बल्कि एक पूरे परिवार के भविष्य को दिशा देने का कार्य होगा। कई बार जिस सम्मान और आत्मीयता की अनुभूति हमें अपने धन से नहीं मिलती, वह किसी एक व्यक्ति के जीवन में परिवर्तन लाने से मिल जाती है। यही वास्तविक उपकार है।
लोभ कम होगा, प्रेम बढ़ेगा
जब हम दूसरों के लिए देना प्रारम्भ करते हैं, तब सबसे पहले हमारा लोभ कम होता है। और जैसे-जैसे लोभ घटता है, वैसे-वैसे हमारे प्रति लोगों के मन में सम्मान और विश्वास बढ़ता है। संसार में धन कमाने से अधिक कठिन कार्य है—लोगों के हृदय में स्थान बनाना। यह स्थान अधिकार से नहीं, उपकार से मिलता है।
इसीलिए कहा गया है—
“यदि किसी को बल से जीतोगे, तो वह एक दिन छूट जाएगा; लेकिन यदि किसी का हृदय उपकार से जीत लोगे, तो वह जीवन भर आपका सम्मान करेगा।”
उपकार का उद्देश्य किसी पर एहसान जताना नहीं, बल्कि अपने भीतर करुणा और उदारता का विकास करना है।
लोभ से पवित्रता की ओर
इस छंद का अंतिम संदेश हमें लोभ छोड़कर पवित्रता की ओर ले जाता है।
- लोभ केवल धन का नहीं होता।
- लोभ वस्तुओं का भी होता है।
- प्रशंसा का भी होता है।
- पद का भी होता है।
दूसरों की वस्तुओं को पाने की इच्छा भी लोभ ही है। जैसे-जैसे यह चाह कम होती जाती है, वैसे-वैसे आत्मा अधिक निर्मल होती जाती है।
चार कषायों से मुक्ति के चार Affirmation
इस पूरे छंद में कविवर ने चारों कषायों—क्रोध, मान, माया और लोभ—से बचने का मार्ग बताया है। इनका अभ्यास केवल पढ़ने से नहीं, बल्कि प्रतिदिन आत्म-संकल्प (Affirmation) करने से जीवन का हिस्सा बनता है। कुछ क्षण शांत होकर बैठिए। आँखें बंद कीजिए। अपने भीतर स्थित आत्मा का अनुभव करने का प्रयास कीजिए। फिर पूरे विश्वास के साथ स्वयं से कहिए—
मैं शांत हूँ।
मैं क्रोध से रहित, शांत स्वभाव वाली आत्मा हूँ।
मैं विनम्र हूँ।
मैं अहंकार और मान से दूर, विनम्र आत्मा हूँ।
मैं सहज हूँ।
मैं छल, कपट, प्रपंच और मायाचार से रहित सहज आत्मा हूँ।
मैं पवित्र हूँ।
मेरा मन, मेरा वचन, मेरा शरीर और मेरा सम्पूर्ण जीवन पवित्र है। मैं लोभ से मुक्त होने का सतत प्रयास कर रहा हूँ। इन आत्म-संकल्पों को प्रतिदिन दोहराने से धीरे-धीरे हमारे विचार बदलते हैं, विचारों से व्यवहार बदलता है और व्यवहार से पूरा व्यक्तित्व।
जब ये चारों गुण हमारे जीवन का हिस्सा बन जाते हैं, तब दूसरों का उपकार करना कोई प्रयास नहीं रह जाता, बल्कि हमारा स्वभाव बन जाता है।
छंद 5
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