राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 561 से 575 | श्लोक 576 से 585 | श्लोक 586 से 594 | श्लोक 595 से 604 | श्लोक 605 से 622 | श्लोक 623 से 631 | श्लोक 632 से 641
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 642 to 651
श्लोक ( Shlok ) 642
कृतदोषो हतः सीता निर्दोषेति निरूप्य ताम् । स्व्यकरोद्राघवः सन्तो विचारानुचराः सदा ॥ ६४२ ॥
‘जिसने दोष किया था ऐसा रावण मारा गया, रही सीता, सो यह निर्दोष है’ ऐसा विचार कर रामचन्द्रजीने उसे स्वीकृत कर लिया। सो ठीक ही है क्योंकि सज्जन हमेशा विचारके अनुसार ही काम करते हैं ॥ ६४२ ॥
“‘The one who committed the transgression was Ravana, and he has been slain; as for Sita, she is entirely faultless’—reflecting deeply upon this truth, Ramachandra accepted her back. And this was truly fitting, for the virtuous always act in accordance with righteous discernment and reason.” || 642 ||
श्लोक ( Shlok ) 643 – 645
ततोऽरिखेपुरोऽगच्छत्स्फुरत्पीठगिरौ स्थितः । अत्रैवाभिषवं प्राप्य सर्वतीर्थाम्बुसम्भृतैः ॥ ६४३॥ अष्टोत्तरसहस्त्रोरुसुवर्णकलशैर्मुदा । देवविद्याधराधीशैः स्वहस्तेन समुद्धतैः ॥ ६४४ ॥ कोटिकाख्यशिलां तस्मिनुज्जहे राघवानुजः । तन्माहात्म्यप्रतुष्टः सन् सिंहनादं व्यधाद्धलः ॥ ६४५ ॥
तदनन्तर-दोनों भाई लंकापुरीसे निकलकर अतिशय-सुन्दरपीठ नामके पर्वत पर ठहरे वहाँ पर देव और विद्याधरोंके राजाओंने अपने हाथसे उठाते हुए सुवर्णके एक हजार आठ बड़े-बड़े कलशोंके द्वारा दोनोंका बड़े हर्षसे अभिषेक किया। वहीं पर लक्ष्मणने कोटि-शिला उठाई और उसके माहात्म्यसे सन्तुष्ट हुए रामचन्द्रजीने सिंहनाद किया ।। ६४३-६४५ ।।
“Thereupon, the two brothers departed from the city of Lanka and halted upon the exceptionally beautiful mountain named Atishaya-Sundarpitha. There, the lords of both the celestial beings (Devas) and the mystical rulers (Vidyadharas), joyfully lifting them with their own hands, performed a grand royal anointment (Abhisheka) over the brothers using one thousand and eight massive, golden urns (Kalashas). It was on that very mountain that Lakshmana lifted the monumental Koti-Shila, and Ramachandra, deeply gratified by the sheer majesty of that feat, let out a thunderous, lion-like roar (Simhanada).” || 643-645 ||
श्लोक ( Shlok ) 646
तन्निवासी सुनन्दाख्यो यक्षः सम्पूज्य तौ मुदा । असि सौनन्दकं नान्ना समानं चक्रिणोऽदित ॥६४६॥
वहाँ के रहनेवाले सुनन्द नामके यक्षने उन दोनोंकी बड़े हर्षसे पूजा की और लक्ष्मण के लिए बड़े सन्मानसे सौनन्दक नामकी तलवार दी ।। ६४६ ॥
“A Yaksha (celestial guardian) named Sunanda, who resided upon that mountain, joyfully worshipped both the brothers and, with immense reverence, presented a legendary sword named Saunandaka to Lakshmana.” || 646 ||
श्लोक ( Shlok ) 647 – 648
अनुगङ्गं ततो गत्वा गङ्गाद्वारसमीपगे । वने निवेश्य शिविरं रथमारुह्य चक्रभृत् ॥ ६४७ ॥गोपुरेण प्रविश्याब्धि निजनामाङ्कितं शरम् । मागधावासमुद्दिश्य व्यमुञ्चत् कुञ्चितक्रमः ॥ ६४८ ॥
तदनन्तर दोनों भाइयोंने गङ्गा नदीके किनारे-किनारे जाकर गङ्गाद्वारके समीप ही वनमें सेना ठहरा दी। लक्ष्मणने रथपर सवार हो गोपुर द्वारसे समुद्रमें प्रवेश किया और पैरको कुछ टेढ़ाकर मागध देवके निवास स्थानकी ओर अपने नामसे चिह्नित वाण छोड़ा ॥ ६४७-६४८ ॥
“Subsequently, both brothers marched along the banks of the river Ganges and stationed their army in the forest near Gangadvara (the gateway of the Ganges). Mounting his chariot, Lakshmana entered the ocean through the Gopura gateway; then, slightly bending his foot, he loosed an arrow marked with his own name toward the abode of the deity Magadha-Deva.” || 647-648 ||
श्लोक ( Shlok ) 649 – 650
मागधोऽपि शरं वीक्ष्य मत्वा स्वं स्वल्पपुण्यकम् । अभिष्टुवन् महापुण्यश्चक्रवर्तीति लक्ष्मणम् ॥ ६४९ ॥रत्नहारं तिरीटं च कुण्डलं शरमप्यमुम् । तीर्थाम्बुपूर्ण कुम्भान्तर्गतमस्मै ददौ सुरः ॥ ६५० ॥
मागध देवने भी बाण देखकर अपने आपकोअल्प पुण्यवान् माना और यह महापुण्यशाली चक्रवर्ती है ऐसा समझकर लक्ष्मणकी स्तुति की । यही नहीं, उसने रत्नोंका हार, मुकुट, कुण्डल और उस वाणको तीर्थ-जलसे भरे हुए कलशके भीतर रखकर लक्ष्मणके लिए भेंट किया ॥ ६४९-६५० ।।
“Upon seeing the arrow, Magadha-Deva considered himself to be of meager merit (Alpa-Punyavan) in comparison. Realizing that Lakshmana was a supreme, highly meritorious Chakravarti (universal sovereign), the deity sang praises in his honor. Not only this, he placed a magnificent necklace of gems, a crown, earrings, and that very arrow inside an urn filled with sacred tirtha water, and offered them as a tribute to Lakshmana.” || 649-650 ||
श्लोक ( Shlok ) 651
ततोऽनुजलधिं गत्वा वैजयन्ताख्यगोपुरे । वशीकृत्य यथा प्राच्यं तथा वरतनुं च तम् ॥ ६५१ ॥
तदनन्तर समुद्र के किनारे-किनारे चलकर वैजयन्त नामक गोपुर पर पहुँचे और वहाँ पूर्वकी भाँति वरतनु देवको वश किया ।। ६५१ ॥
“Thereafter, marching along the shores of the ocean, they arrived at the gateway named Vaijayanta, where, just as before, they brought the deity Varatanu-Deva under their subjection.” || 651 ||
श्लोक 652 से 661
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राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 123 | श्लोक 124 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 174 | श्लोक 175 से 184 | श्लोक 185 से 193 | श्लोक 194 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 235 | श्लोक 236 से 252 | श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 276 | श्लोक 277 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 317 | श्लोक 318 से 332 | श्लोक 333 से 353 | श्लोक 354 से 364 | श्लोक 365 से 382 | श्लोक 383 से 401 | श्लोक 402 से 412 | श्लोक 413 से 422 | श्लोक 423 से 435 | श्लोक 436 से 452 | श्लोक 453 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 484 | श्लोक 485 से 493 | श्लोक 494 से 501 | श्लोक 502 से 515 | श्लोक 516 से 531 | श्लोक 532 से 542 | श्लोक 543 से 551 | श्लोक 552 से 560 | श्लोक 561 से 575 | श्लोक 576 से 585 | श्लोक 586 से 594 | श्लोक 595 से 604 | श्लोक 605 से 622 | श्लोक 623 से 631 | श्लोक 632 से 641
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