आलोचना पाठ – छंद 22 व 23 : अर्थ एवं व्याख्या
बीध्यो अन राति पिसायो, ईंधन बिन सोधि जलायो
झाड़ू ले जागाँ बुहारी, चींटी आदिक जीव बिदारी ॥22॥
शब्दार्थ
- बीध्यो अन राति पिसायो — घुना हुआ अनाज पिसायो, रात्रि में अनाज पिसवाया
- ईंधन — जलाने की लकड़ी आदि।
- बिन सोधि — बिना जाँच या शोध किए।
- जागाँ — स्थान।
- बुहारी — झाड़ू लगाई।
- चींटी आदिक — चींटी आदि छोटे जीव।
- बिदारी — नष्ट/घायल किए।
मैंने घुना हुआ अनाज पिसायो, मैंने पीसा। यानी कि जब पीसते हैं हम आटा घर में या बाहर पिसाते हैं, तो मैंने बिना देखे, बिना छाने-शोधे मैंने उसको पीस दिया। दिन के स्थान पर रात्रि में अनाज पिसवाया या बाजार के पिसे हुए आटे का प्रयोग किया, जिसमें दिन-रात के शोधन का ध्यान नहीं रखा जाता। साथ ही, बिना देखे-शोधे ईंधन (लकड़ी, ईंधन साधन) जलाया, जिससे उसमें आश्रित जीवों का घात हुआ। जैसे कि गोबर है, कई जने जो हैं कंडे जलाते हैं, तो कंडे क्या हैं? उसके अंदर असंख्यात जीव बिलबिलाते रहते हैं। तो हम उसका ध्यान नहीं करते, हम बिना देखे कोयले आदि से यदि हम सुलगा रहे हैं, उसको हम जला रहे हैं, तो हमने उसको बिना शोधे, हमने ध्यान नहीं लगाया, हमने विवेक नहीं लगाया कि कहीं उसमें जीव तो नहीं है। मैंने ईंधन को बिना जाँच-पड़ताल किए अग्नि में जला दिया। इसी प्रकार स्थान को झाड़ू से साफ करते समय घर या स्थान की झाड़ू-बुहारी करते समय यत्नाचार नहीं रखा, जिससे चींटी आदि अनेक सूक्ष्म जीवों का घात हो गया।
हम स्वीकार करते हैं कि हमने झाड़ू लगाते समय ऐसे जीवों को भी बिदार दिया, अर्थात् घायल या नष्ट कर दिया। यह पद हमें सफाई और अहिंसा के बीच संतुलन सिखाता है। स्वच्छता आवश्यक है, लेकिन यदि वह असावधानी और क्रूरता से की जाए तो अनजाने में जीव-हिंसा हो सकती है।
इसलिए जैन आचार में ईर्या-समिति और अन्य सावधानियों का उद्देश्य ही यह है कि दैनिक कार्य करते हुए अनावश्यक जीव-हिंसा कम से कम हो।
छंद 23
जल छानि जिवानी कीनी, सो हू पुनि डारि जु दीनी
नहिं जल थानक पहुँचाई, किरिया बिन पाप उपाई ॥23॥
शब्दार्थ
- जल छानि — पानी को छानकर।
- जिवानी कीनी — जीवों को अलग किया/जीवों की रक्षा की।
- सो हू पुनि डारि दीनी — निकाले हुए जीवों/अवशेष को फिर फेंक दिया।
- जल थानक — उचित स्थान।
- पहुँचाई — सुरक्षित स्थान तक पहुँचाया।
- किरिया बिन — उचित क्रिया/विधि के बिना।
- पाप उपाई — पाप उत्पन्न किया।
मैंने और क्या पाप किए हैं? मैंने जल छाना, जल छान के मुझे जीवानी को यथास्थान पहुँचाना था, मैंने जल को छानकर उसमें से जीवों को अलग तो किया, लेकिन बाद में उन जीवों को उचित सुरक्षित स्थान तक पहुँचाने के बजाय फिर से फेंक दिया। इस प्रकार उचित विधि और सावधानी के बिना कार्य करके मैंने पाप का कारण बनाया। यह जिनेंद्र भगवान ने कहा है। लेकिन मैंने क्या करा? ‘नहीं जल थानक पहुँचाई’, मैंने उन जीवों को पुनः उनके स्रोत, मूल स्रोत पर नहीं पहुँचाया। ‘क्रिया बिन पाप उपाई’, और इस तरह से मैंने बहुत पाप को कमाया। यह पद बहुत सूक्ष्म आचरणगत सावधानी की ओर संकेत करता है।
केवल पानी छान लेना ही पर्याप्त नहीं है। यदि छानने के बाद निकले जीवों को असावधानी से फेंक दिया जाए और उनकी सुरक्षा का ध्यान न रखा जाए, तो पहले की गई सावधानी का उद्देश्य ही नष्ट हो सकता है।
इसलिए अपने व्यवहार में हुई इस कमी को स्वीकार करते हैं। यहाँ “नहिं जल थानक पहुँचाई” का भाव है कि अलग किए गए जीवों को उनके अनुकूल उचित स्थान तक सुरक्षित रूप से पहुँचाने की जिम्मेदारी भी समझनी चाहिए।
यहाँ एक महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने आता है अहिंसा केवल सही कार्य शुरू करने का नाम नहीं; उसे सही ढंग से पूरा करना भी आवश्यक है। यदि किसी कार्य में आधी सावधानी रखी और अंत में लापरवाही कर दी, तो हिंसा की संभावना फिर भी बनी रहती है।
छंद 24 व 25 – अर्थ
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