राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका
वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 312 to 321
श्लोक ( Shlok ) 312
अबोधतमसाक्रान्तमनाद्यन्तं जगत्त्रयम् । सुप्तं त्वमेव जागसिं शश्वद्विश्वं च पश्यसि ॥ ३१२ ॥
हे देव ! आदि और अन्तसे रहित यह तीनों लोक अज्ञान रूपी अन्धकारसे व्याप्त होकर सो रह।है उसमें केवल आप ही जग रहे हैं और समस्त संसारको देख रहे हैं ।॥ ३१२ ।।
“O Lord! This entire threefold universe, which is without beginning and without end, lies asleep, enveloped in the dense darkness of ignorance. In the midst of it, You alone remain awake, beholding the entire cosmos.” [312]
श्लोक ( Shlok ) 313
वस्तुबोधे विनेयस्य जिनेन्द्र भवदागमः । निर्मलः शर्मदो हेतुरालोको’ वा सचक्षुषः ॥ ३१३ ॥
हे जिनेन्द्र ! जिस प्रकार चक्षुसहित मनुष्यको पदार्थका ज्ञान होनेमें प्रकाश कारण है उसी प्रकार शिष्यजनोंको वस्तु-तत्त्वका ज्ञान हानेमें आपका निर्मल तथा सुखदायी आगम ही कारण है ॥ ३१३ ॥
“O Jinendra! Just as light is the cause for a person with sight to perceive objects, in the very same manner, Your pure and blissful scripture (Agama) alone is the cause for Your disciples to attain the true knowledge of reality.” [313]
श्लोक ( Shlok ) 314
इत्थं स्वकृतसंस्तोत्रः शुद्धश्रद्धावबोधनः । सम्यक्संसारसद्भावं भावयन्कर्मनिर्मितम् ॥ ३१४ ॥
इस प्रकार शुद्ध ज्ञानको धारण करनेवाले प्रीतिङ्कर कुमारने अपने द्वारा बनाया हुआ स्तोत्र पढ़ा तथा कर्मके द्वारा निर्मित संसारकी दशाका अच्छी तरह विचार किया ॥ ३१४ ॥
“In this manner, Prince Pritinkar, who possessed pure wisdom, recited the hymn composed by himself, and deeply contemplated the nature of the mundane existence (samsara) created by karma.” [314]
श्लोक ( Shlok ) 315
अभिषेचनश लायां सुप्तवान्किञ्चिदाकुलः । तदा नन्दमहानन्दावागतौ गुह्यकामरौ ॥ ३१५ ॥
तदनन्तर कुछ व्याकुल होता हुआ वह अभिषेकशाला (स्नानगृह) में सो गया। उसी समय नन्द और महानन्द नामके दो यक्ष देव, जिन-मन्दिरकी वन्दना करनेके लिए आये ।। ३१५ ।।
Thereafter, feeling somewhat distressed, he fell asleep inside the consecration hall (abhisheka-shala). At that very moment, two Yaksha deities named Nanda and Mahananda arrived to offer their adoration at the Jain temple. [315]
श्लोक ( Shlok ) 316 – 318
वन्दितुं मन्दिरं जैनं वीक्ष्य तं कर्णपत्रकम् । तौ तदीयं समादाय सधर्मा अवां कुमारकः ॥३१६ ॥ इति प्रापयतं देवौ द्रव्येण महता सह । सुप्रतिष्ठं पुरं प्रीतिक्करमेनं प्रमोदिनम् ॥ ३१७॥ प्रेषणं युवयोरेतदस्माकमिति तद्गतम् । गुरोः सन्देशमालोक्य ४स्मृत्वा प्राग्भववृत्तकम् ॥ ३१८ ॥
उन्होंने जिन मन्दिर के दर्शनकर प्रीतिङ्करके कानमें बँधा हुआ पत्र देखा और देखते ही उसे ले लिया। पत्रमें लिखा था कि ‘यह प्रीतिङ्करकुमार तुम्हारा सधर्मा भाई है, इसलिए सदा प्रसन्न रहनेवाले इस कुमारको तुम बहुत भारी द्रव्यके साथ सुप्रतिष्ठ नगर में पहुँचा दो। तुम दोनोंके लिए मेरा यही कार्य है’ इस प्रकार उन दोनों देवोंने उस पत्रसे अपने गुरुका संदेश तथा अपने पूर्वभवका सब समाचार जान लिया ॥ ३१६-३१८ ।।
Having paid their respects at the Jain temple, they noticed the letter tied to Pritinkar’s ear and took it the moment they saw it. In that letter, it was written: ‘This Prince Pritinkar is your brother in the true faith (sadharma). Therefore, transport this ever-cheerful prince to the city of Supratistha along with an immense amount of wealth. This is the task I assign to both of you.’ In this manner, upon reading that letter, both the deities learned the message of their Guru as well as the entire account of their past life. [316-318]
श्लोक ( Shlok ) 319
वाराणस्यां पुरे पूर्व धनदेववणिक्पतेः । भूत्वावां जिनदत्तायां शान्तवो रमणः सुतौ ॥ ३१९ ॥
पहले बनारस नगर में धनदेव नामका एक वैश्य रहता था। हम दोनों उसकी जिनदत्ता नामकी स्त्री से शान्तव और रमण नामके दो पुत्र हुए थे ॥ ३१९ ॥
“Formerly, in the city of Banaras, there lived a merchant named Dhandeva. From his wife named Jindatta, we two were born as his sons, Shantava and Ramana.” [319]
श्लोक ( Shlok ) 320
शास्त्राणि सर्वाणि विदित्वा ग्रन्थतोऽर्थतः । चोरशास्त्रबलात्पापौ परार्थहरणे रतौ ॥३२० ॥
वहाँ हमने ग्रन्थ और अर्थसे सब शास्त्रोंका ज्ञान प्राप्त किया परन्तु चोर शास्त्रका अधिक अभ्यास होनेसे हम दोनों दूसरेका धन-हरण करनेमें तत्पर हो गये ।। ३२० ।।
“There, we acquired a comprehensive knowledge of all the scriptures, mastering both their text and meaning. However, due to our extensive study of the art of thievery (chora-shastra), we both became intent on plundering the wealth of others.” [320]
श्लोक ( Shlok ) 321
अभूवास्मद्गुरुस्तस्मान्निवारयितुमक्षमः । सर्वसङ्गपरित्यागमकरोदतिदुस्तरम् ॥ ३२१ ॥
हमारे पिता भी हम लोगोंको इस चोरीके कार्यसे रोकनेमें समर्थ नहीं हो सके इसलिए उन्होंने अत्यन्त कठिन समस्त परिग्रहका त्याग कर दिया अर्थात् मुनिदीक्षा धारण कर ली ।। ३२१ ।।
“Even our father was unable to restrain us from this practice of thievery; consequently, he renounced all worldly possessions, which are exceedingly difficult to give up, and initiated himself into the order of ascetics (muni-diksha).” [321]
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राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका
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