राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 453 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 484 | श्लोक 485 से 493 | श्लोक 494 से 501 | श्लोक 502 से 515 | श्लोक 516 से 531
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 532 to 542
श्लोक ( Shlok ) 532 – 533
युद्धायास्फाल्यतां भेरी शत्रुपक्षक्षयावहा । इत्यादिष्टस्तदैवासौ तथा कृत्वाखिलं बलम् ॥ ५३२ ॥कालान्ते कालदूतो वा सहसैकीचकार तत् । अथ निर्गत्य लङ्काया विभक्तनिजसाधनः ॥ ५३३ ॥
कि युद्धके लिए शत्रुपक्षका क्षय करनेवाली भेरी बजा दो। उसने उसी प्रकार रणभेरी बजा दी और कल्पकालके अन्तमें यमराजके दूतके समान अपनी समस्त सेना इकट्ठी की। तदनन्तर सेनाका अलग-अलग विभाग कर रावण लङ्कासे बाहर निकला ।। ५३२-५३३ ॥
“Order the sounding of the war-drum that destroys the enemy hosts.” Having been commanded thus, he sounded the battle-drum in that very manner, and gathered his entire army, which resembled the messengers of Yama (the God of Death) at the end of a cosmic age (Kalpa). Thereafter, dividing the army into different regiments, Ravana marched out of Lanka. ॥ 532-533 ॥
श्लोक ( Shlok ) 534 – 539
सुकुम्भेन निकुम्भेन कुम्भकर्णेन चापरैः । सहजैरिन्द्रजिन्मुख्येनेन्द्राख्येनेन्द्रकीर्तिना ॥ ५३४ ॥ इन्द्रवर्माभिधानेन तनुजैरपरैरपि । महामुखातिकायाख्य दुर्मुखाख्यैर्महाबलैः ॥ ५३५ ॥खरदूषणधूमाख्यप्रमुखैश्च खगेश्वरैः । “इव क्रूरग्रहैर्भास्वानेदाधः परिवारितः ॥ ५३६ ॥त्रिजगद्द्मस नालोलकाललीलां विडम्बयन् । न तौ मम पुरः स्थातुं समर्थों रामलक्ष्मणौ ॥ ५३७ ॥तिष्ठतः शशगोमायू किं पुनः संहतौ हरेः । अरावणं भवेदद्य जगदेतत्सतोस्तयोः ॥ ५३८ ॥ सहावश्यमहं ताभ्यां पालयामि महीं नहि । इत्याद्यतर्कितायातनिजामङ्गलमालपन् ॥ ५३९ ॥
उस समय वह सुकुम्भ, निकुम्भ, कुम्भकर्ण तथा अन्य भाइयोंमें सबसे मुख्य इन्द्रजित्, इन्द्रकीर्ति, इन्द्रवर्मा तथा अन्य राजपुत्रोंसे एवं महाबलवान् महामुख, अतिकाय, दुर्मुख, खरदूषण और धूम आदि प्रमुख विद्याधरोंसे घिरा हुआ था अतः दुष्ट ग्रहोंसे घिरे हुए ग्रीष्म ऋतुके सूर्यके समान जान पड़ता था और तीनों जगत्को ग्नसने के लिए सतृष्ण यमराजकी लीलाको विडम्बित कर रहा था। वह कह रहा था कि राम और लक्ष्मण मेरे सामने खड़ा होनेके लिए समर्थ नहीं हैं। अरे, बहुतसे खरगोश और शृगाल इकट्ठे हो जायें तो क्या वे सिंहके सामने खड़े रहे सकते हैं ? आज उनके जीते जी यह संसार रावणसे रहित भले ही हो जाय परन्तु मैं उनके साथ इस पृथिवीका पालन कदापि नहीं करूँगा। इस प्रकार अतर्कित रूपसे उपस्थित अपने अमङ्गलको वह रावण स्वयं कह रहा था ॥ ५३४-५३९ ॥
At that time, he was surrounded by Sukumbha, Nikumbha, Kumbhakarna, and Indrajit—the foremost among his brothers—as well as Indrakirti, Indravarma, and other princes. He was also accompanied by the immensely powerful Vidyadharas, chief among whom were Mahamukha, Atikaya, Durmukha, Kharadushana, and Dhuma.
Thus, he appeared like the summer sun surrounded by malignant planets, and he mocked the very sport of a ravenous Yama (the God of Death) intent on devouring the three worlds. He was exclaiming, “Rama and Lakshmana are not capable of standing before me! Tell me, even if many rabbits and jackals gather together, can they ever stand against a lion? Today, while they are still alive, this world may well become devoid of Ravana, but I shall never rule this earth alongside them!”
In this manner, Ravana was himself speaking of his own impending ruin, which had arrived unforeseen. ॥ 534-539 ॥
श्लोक ( Shlok ) 540 – 542
कालमेघमहागन्धगजस्कन्धमधिष्ठितः । प्रतिवातहतप्रोद्यद्राक्षसध्वजराजितः ॥ ५४० ॥अग्रेसरस्फुरचक्रश्छत्रस्थगितभास्करः । नानानूनानकध्वानभिन्नाशानेकपश्रुतिः ॥ ५४१ ॥खेचराधीश्वरो योद्धं सन्नद्धोऽस्थान्मदोद्धतः । इतो रामस्तदायानकथाकर्णनघूर्णितः ॥ ५४२ ॥
उस समय वह कालमेघ नामक मदा मदोन्मत्त हाथीके ऊपर सवार था, प्रतिकूल (सामनेकी ओरसे आनेवाली) वायुसे ताड़ित होकर फहराती हुई राक्षस-ध्वजाओंसे सुशोभित था, उसके आगे-आगे चक्ररत्न देदीप्यमान हो रहा था, उसके छत्रसे सूर्य आच्छादित हो गया था – सूर्यका आताप रुक गया था और उसने अपने अनेक प्रकार के बड़े-बड़े नगाड़ोंके शब्दसे दिग्गजोंके कान बहिरे कर दिये थे। इस प्रकार उस ओर मदसे उद्धत हुआ रावण युद्धके लिए तैयार होकर खड़ा हो गया और इस ओर रामचन्द्र उसके आनेकी बात सुनकर क्रोधसे झूमने लगे ।। ५४०-५४२ ।।
At that time, he was mounted upon a fiercely intoxicated elephant named Kalamegha. He looked magnificent with the demon flags fluttering as they were struck by the opposing headwind. Before him, the brilliant Chakra-ratna (divine discus-jewel) blazed radiantly; his royal umbrella completely shielded the sun, blocking out its scorching heat. With the thunderous roar of his various massive war-drums, he deafened the ears of the Diggajas (the celestial elephants guarding the directions).
In this manner, on that side, Ravana—arrogant and intoxicated with pride—stood fully prepared for battle. Meanwhile, on this side, Ramachandra, upon hearing of his arrival, began to sway with righteous fury. ॥ 540-542 ॥
श्लोक 543 से 551
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राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 123 | श्लोक 124 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 174 | श्लोक 175 से 184 | श्लोक 185 से 193 | श्लोक 194 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 235 | श्लोक 236 से 252 | श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 276 | श्लोक 277 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 317 | श्लोक 318 से 332 | श्लोक 333 से 353 | श्लोक 354 से 364 | श्लोक 365 से 382 | श्लोक 383 से 401 | श्लोक 402 से 412 | श्लोक 413 से 422 | श्लोक 423 से 435 | श्लोक 436 से 452 | श्लोक 453 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 484 | श्लोक 485 से 493 | श्लोक 494 से 501 | श्लोक 502 से 515 | श्लोक 516 से 531
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