नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 72 – श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 191
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 72- shlok 192 to 201
श्लोक ( Shlok ) 192 – 196
पुण्यघोषणकृद्यक्ष धृतचक्रपुरस्सरः । पादन्यासे पुरः पश्चात्सरोजैः सप्तभिः पृथक् ॥ १९२ ॥कृतशोभो जगन्नाथश्छत्रादिप्रातिहार्यकः । मरुन्मार्गगताशेषसुरखेचरसेवितः ॥ १९३ ॥पृथ्वीपथप्रवृत्तान्यविनेयजनतानुगः । पवनामरनिर्भूतधूलीकण्टकभूतलः ॥ १९४ ॥मेघामरकुमारोप सिक्तगन्धाम्बुसत्क्षितिः । इत्याद्याश्चर्यसम्पन्नः सर्वप्राणिमनोहरः ॥ १९५ ॥धर्मामृतमयीं वृष्टिमभिषिञ्चन् जिनेश्वरः । विश्वान्देशान्विहृत्यायात्स देशं पल्लवाह्वयम् ॥ १९६ ॥
अथानन्तर-किसी दूसरे दिन भगवान् नेमिनाथने वहाँ से विहार किया। उस समय पुण्यकी घोषणा करनेवाले यक्षके द्वारा धारण किया हुआ धर्मचक्र उनके आगे चल रहा था, पैर रखनेकी जगह तथा आगे और पीछे अलग-अलग सात सात कमलोंके द्वारा उनकी शोभा बढ़ रही थी, छत्र आदि आठ प्रातिहार्य अलग सुशोभित हो रहे ये, आकाशमार्गमें चलनेवाले समस्त देव तथा विद्याधर उनकी सेवा कर रहे थे, देव और विद्याधरोंके सिवाय अन्य शिष्य जन पृथिवीपर ही उनके पीछे-पीछे जा रहे थे, पवन-कुमार देवोंने पृथिवीकी सब धूली तथा कण्टक दूर कर दिये थे और मेघकुमार देवोंने सुगन्धित जल बरसाकर भूमिको उत्तम बना दिया था, इत्यादि अनेक आश्चर्योंसे सम्पन्न एवं समस्त प्राणियोंका मन हरण करनेवाले भगवान् नेमिनाथ धर्मामृतकी वर्षा करते हुए समस्त देशोंमें विहार करनेके बाद पल्लव देशमें पहुँचे ।। १९२-१९६ ।।
“Thereafter, on another day, Lord Neminatha departed (Vihara) from that place. At that time, the Wheel of Dharma (Dharmachakra)—proclaiming the glory of meritorious deeds (Punya) and borne by a Yaksha—moved ahead of Him. His divine splendor was enhanced by seven lotuses blooming under each footstep, as well as seven lotuses appearing separately ahead and behind Him.
The eight divine manifestations, including the triple umbrella (Chhatra-Trayi), shone beautifully. All the celestial beings (Devas) and sky-faring spirits (Vidyadharas) served Him as they traveled through the sky, while His other disciples followed Him on foot upon the earth. The Pavana-kumara deities had cleared all dust and thorns from the earth, and the Megha-kumara deities had rendered the ground pristine by showering fragrant water.
Enriched by these and many other such miracles, Lord Neminatha—who captivated the hearts of all living beings—showered the nectar of Dharma as He journeyed through various lands, ultimately arriving in the Pallava country.”— 192–196
श्लोक ( Shlok ) 197
अन्न पाण्डुतनूजानां प्रपञ्चोऽल्पः प्रभाष्यते । ग्रन्थविस्तरभीरूणामायुर्मेधानुरोधतः ॥ १९७ ॥
आचार्य गुणभद्र कहते हैं कि यहाँ पर ग्रन्थके विस्तारसे डरनेवाले शिष्योंकी आयु और बुद्धिके अनुरोधसे पाण्डवोंका भी कुछ वर्णन किया जाता है ।॥ १९७ ॥
“Acharya Gunabhadra says: Keeping in view the limited lifespan and intellect of the disciples, who might otherwise fear an overly lengthy text, a brief description of the Pandavas is also being presented here.”— 197
श्लोक ( Shlok ) 198 – 200
काम्पिल्यायां धराधीशो नगरे द्रुपदाह्वयः । देवी दृढरथा तस्य द्रौपदी तनया तयोः ॥ १९८ ॥स्त्रीगुणैः सकलैः शस्या बभूव भुवनप्रिया । तां पूर्णयौवनां वीक्ष्य पित्रा कस्मै समर्थताम् ॥ १९९ ॥इयं कन्येति सम्पृष्टा मन्त्रिणो मन्त्रचर्चया । प्राभाषन्त प्रचण्डेभ्यः पाण्डवेभ्यः प्रदीयताम् ॥ २०० ॥
कम्पिला नामकी नगरीमें राजा द्रुपद राज्य करता था उसकी देवीका नाम दृढरथा था और उन दोनोंके द्रौपदी नामकी पुत्री थी। वह द्रौपदी स्त्रियोंमें होनेवाले समस्त गुणोंसे प्रशंसनीय थी तथा सबको प्यारी थी। उसे पूर्ण यौवनवती देखकर पिताने मन्त्रचर्चाके द्वारा मन्त्रियोंसे पूछा कि यह कन्या किसे देनी चाहिये । मन्त्रियोंने कहा कि यह कन्या अतिशय बलवान् पाण्डवोंके लिए देनी चाहिये ।। १९८-२०० ॥
“In the city named Kampila, King Drupada used to rule. His queen’s name was Dridharatha, and the two had a daughter named Draupadi. That Draupadi was highly praiseworthy for possessing all the virtues found in women and was beloved by all. Seeing her come of full age and youth, her father held a council with his ministers and asked, ‘To whom should this maiden be given in marriage?’ The ministers replied, ‘This maiden should be given to the exceptionally powerful Pandavas.'”— 198–200
श्लोक ( Shlok ) 201
एतान् सहजशत्रुत्वाद् दुर्योधनमहीपतिः । पाण्डुपुत्रानुपायेन लाक्षालयमवीविशत् ॥ २०१ ॥
पाण्डवोंकी प्रशंसा करते हुए मन्त्रियोंने कहा कि राजा दुर्योधन इनका जन्मजात शत्रु है उसने इन लोगोंको मारनेके लिए किसी उपायसे लाक्षाभवन (लाखके बने घर) में प्रविष्ट कराया था ।।२०१।।
“Praising the Pandavas, the ministers said: ‘King Duryodhana is their born enemy. In an attempt to kill them, he resorted to a deceptive scheme and caused them to enter the Lakshabhavana (the house made of lac).'”— 201
श्लोक 202 से 211
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462
नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 46 | श्लोक 47 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 191
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 |
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 |