नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 11
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 69- shlok 12 to 21
श्लोक ( Shlok ) 12 – 13
काले गच्छति तस्यैवं कदाचित्स्वगुरोर्मुनेः । श्रुत्वा शरीरसंन्यासं विच्छिन्नविषयस्पृहः ॥ १२ ॥सथो मनोहरोद्याने बुद्धतत्त्वार्थविस्तृतिः ।महाबलाभिधाख्यातास्केवलावगमेक्षणात् ॥ १३ ॥
इस प्रकार समय व्यतीत हो रहा था कि एक दिन उसने अपने पिता पार्थिव मुनिराजका समाधिमरण सुना । समाधिमरणका समाचार सुनते ही उसकी विषय-सम्बन्धी इच्छा दूर हो गई। उसने शीघ्र ही मनोहर नामके उद्यानमें जाकर महाबल नामक केवली भगवान्से तत्त्वार्थका विस्तारके साथ स्वरूप समझा ॥ १२-१३ ॥
In this manner, time was passing when, one day, he heard about the Samadhimaran (peaceful ritual death/holy demise) of his father, Parthiv Muniraj. Upon hearing the news of the Samadhimaran, his worldly desires vanished. He immediately went to the garden named Manohar and, from the Kevali Bhagavan (omniscient lord) named Mahabal, understood the true nature of Tattvartha (the fundamental principles/realities) in great detail. ॥ 12-13 ॥
श्लोक ( Shlok ) 14
राज्यभारं समारोप्य श्रीदत्ते स्वसुते सति । लब्धक्षायिकसम्यक्त्वः शमी संयममाददे ॥ १४ ॥
तदनन्तर श्रीदत्त नामक पुत्रके लिए राज्य देकर उसने क्षायिक सम्यग्दर्शन प्राप्त कर लिया और शान्त होकर संयम धारण कर लिया ॥ १४ ॥
Thereafter, having handed over the kingdom to his son named Shridatta, he attained Kshayika Samyagdarshana (permanent/destructive right faith) and, becoming tranquil, embraced Sanyam (self-restraint/asceticism). ॥ 14 ॥
श्लोक ( Shlok ) 15
स धृत्वैकादशाङ्गानि बद्ध्वा षोडशकारणैः । अन्त्यनामादिकर्माणि पुण्यानि पुरुषोत्तमः ॥ १५ ॥
उस पुरुषोत्तमने ग्यारह अङ्ग धारण कर सोलह कारण भावनाओंके द्वारा तीर्थकर नामक पुण्य कर्मका बन्ध किया ॥ १५ ॥
That best among men (Purushottama) mastered the eleven Angas (sacred scriptures) and, through the sixteen Karana Bhavanas (auspicious reflections), bound the meritorious karma known as Tirthankara-nam-karma. ॥ 15 ॥
श्लोक ( Shlok ) 16
स्वायुरन्ते समाराध्य विमाने ‘लवससमः । देवोऽपराजिते पुण्यादुत्तरेऽनुत्तरेऽभवत् ॥ १६ ॥
और आयुके अन्तमें समाधिमरण कर अपराजित नामके श्रेष्ठ अनुत्तर विमानमें अतिशय शोभायमान देव हुआ ॥ १६ ॥
And at the end of his life span, having attained Samadhimaran (peaceful holy demise), he was reborn as an exceptionally radiant celestial being (Deva) in the magnificent, supreme Anuttara vimana (heavenly vehicle/realm) named Aparajita. ॥ 16 ॥
श्लोक ( Shlok ) 17
त्रयविशत्पयोब्ध्यायुरेकारत्निसमुच्छितिः । निश्वासाहारलेश्यादिभावैस्तत्रोदितैर्युतः ॥ १७ ॥
वहाँ उसकी तैंतीस सागरकी आयु थी, एक हाथ ऊँचा शरीर था, तथा श्वासोच्छ्वास, आहार, लेश्या आदि भाव उस विमान-सम्बन्धी देवोंके जितने बतलाये गये हैं वह उन सबसे सहित था ॥ १७ ॥
There, his life span was thirty-three Sagaras (an immense cosmic unit of time), his body was one cubit (haath) tall, and he possessed the breath, food intake, Leshya (aura/thought-coloration), and other such attributes exactly as they are described for the celestial beings of that particular Vimana (heavenly realm). ॥ 17 ॥
श्लोक ( Shlok ) 18 – 19
जीवितान्तेऽहमिन्द्रेऽस्मिन् षण्मासैरागमिष्यति । जम्बूपलक्षिते द्वीपे विषये बङ्गनामनि ॥ १८ ॥मिथिलायां महीपालः श्रीमान् गोत्रेण काश्यपः । विजयादिमहाराजो विख्यातो वृषभान्वये ॥ १९ ॥
जब इस अहमिन्द्रका जीवनका अन्त आया और वह छह माह बाद यह वहाँ से चलनेके लिए तत्पर हुआ तब जम्बूवृक्षसे सुशोभित इसी जम्बूद्वीपके वङ्ग नामक देशमें एक मिथिला नामकी नगरी थी। वहाँ भगवान् वृषभदेवका वंशज, काश्यपगोत्री विजयमहाराज नामसे प्रसिद्ध सम्पत्तिशाली राजा राज्य करता था ।॥ १८-१९ ॥
“When the life of this Ahamindra (a higher celestial being) came to an end and he prepared to depart from there after six months, there was a city named Mithila in the country called Vanga, located right within this Jambudvipa, which is adorned by the Jambu tree. Ruling there was a wealthy and famous king named Maharaja Vijaya, a descendant of Lord Vrishabhadeva and belonging to the Kashyap gotra (lineage).” [18-19]
श्लोक ( Shlok ) 20
अनुरक्त व्यधात् कृत्नमुद्यश्चिव रविर्जगत् । स्वविरागाद्विरक्त तत् सोऽतपत्तस्य तादृशम् ॥ २० ॥
जिस प्रकार उदित होता हुआ सूर्य संसारको अनुरक्त-लालवर्णका कर लेता है उसी प्रकार उसने राज्यगद्दी पर आरूढ़ होते ही समस्त संसारको अनुरक्त-प्रसन्न कर लिया था और ज्यों-ज्यों सूर्य स्वयं राग- लालिमासे रहित होता जाता है त्यों-त्यों वह संसारको विरक्त लालिमासे रहित करता जाता है इसी प्रकार वह राजा भी ज्यों-ज्यों विराग-प्रसन्नतासे रहित होता जाता था त्यों-त्यों संसारको विरक्त-प्रसन्नतासे रहित करता जाता था । सारांश यह है कि संसारकी प्रसन्नता और अप्रसन्नता उसीपर निर्भर थी सो ठीक ही है क्योंकि उसने वैसा ही तप किया था और वैसा ही उसका प्रभाव था ।। २० ।।
“Just as the rising sun fills the world with a deep red glow (or affection), he, upon ascending the royal throne, instantly filled the entire world with affection and joy. Furthermore, just as the sun gradually sheds its own crimson tint and consequently deprives the world of that red glow, this king, as he gradually became detached from worldly pleasures, caused the world to lose its attachment as well.
In essence, the joy and sorrow of the entire world depended solely on him. And this was only fitting, for such was the nature of his rigorous penance and such was the magnitude of his divine influence.” [20]
श्लोक ( Shlok ) 21
अवृणीत गुणालिस्तं लक्ष्मीश्च सुकृतोदयात् । पुष्कलाविष्क्रियं तस्मिन् पुरुषार्थत्रयं ततः ॥ २१ ॥
चूंकि पुण्य कर्मके उदय से अनेक गुणोंके समूह तथा लक्ष्मीने उस राजाका वरण किया था इसलिए उसमें धर्म, अर्थ, कामरूप तीनों पुरुषार्थ अच्छी तरह प्रकट हुए थे ॥ २१ ॥
“Since Fortune (Lakshmi) and a multitude of noble virtues had chosen that king due to the rise of his meritorious deeds (punya karma), all three pursuits of human life—Dharma (righteousness), Artha (wealth), and Kama (pleasure)—were beautifully and perfectly manifested in him.” [21]
श्लोक 22 से 31
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