दर्शन स्तुति – छंद 3 से 5 – अर्थ एवं व्याख्या
भव विकट वन में करम बैरी, ज्ञान धन मेरो हरयो |
तब इष्ट भूल्यो भ्रष्ट होए, अनिष्ट गति धरतो फिरयो ||(3)
कठिन शब्दों के अर्थ
भव का अर्थ है—संसार।
विकट का अर्थ है—भयंकर या कठिन।
ज्ञान-धन का अर्थ है—ज्ञान रूपी धन।
हरयो का अर्थ है—हर लिया या छीन लिया।
इष्ट का अर्थ है—सुखदायक या हितकारी।
भूलियो का अर्थ है—भूल गया।
अनिष्ट का अर्थ है—दुःखदायक।
गति का अर्थ है—जीव की अवस्था या जन्म की गति।
भ्रमण का अर्थ है—भटकते हुए घूमना।
इस पंक्ति में “ज्ञान धन मेरो हरयो” पढ़ना चाहिए, न कि “ज्ञान धन मेरो भयो”।
भव विकट वन में: भव अर्थात् संसार। संसार रूपी विकट—अर्थात् अत्यंत घने, घनघोर अंधकार से युक्त वन (जंगल) में। यह संसार एक भयंकर वन के समान है, जिसमें जीव भटक रहा है। कर्म बैरी ज्ञान धन मेरो हरयो: कर्म रूपी बैरियों (शत्रुओं) ने मेरे ज्ञान रूपी धन को हर लिया, छीन लिया। इस संसार रूपी वन में कर्म हमारे शत्रु के समान हैं। इन कर्मों ने हमारे ज्ञान रूपी धन को हर लिया है।
जिस प्रकार कोई राहगीर भयंकर जंगल में फँस जाए और उसे कोई मार्ग दिखाई न दे तथा वहाँ लुटेरे उसका धन छीन लें, उसी प्रकार हम संसार रूपी जंगल में भटक रहे हैं और हमारे कर्मों ने हमारे ज्ञान रूपी धन को लूट लिया है।
अरे! जब मैं अनंत शक्तिमान आत्मा हूँ, तो मुझे आज तक यह सद्बुद्धि क्यों नहीं जागी? हे भगवन! मैंने आज तक आपको नहीं पहचाना, इसलिए मैं यहाँ भ्रम में घूमता रहा। घूमते-घूमते कहाँ पहुँच गया? संसार रूपी जंगल में। और जंगल में क्या हुआ? कर्म रूपी चोरों ने मुझे लूट लिया और मेरे ज्ञान रूपी धन पर आवरण डाल दिया—ज्ञानावरणीय कर्म ने ज्ञान को प्रकट नहीं होने दिया। विशेष रूप से मोहनीय कर्म की मिथ्यात्व प्रकृति ने हमारे सम्यक् दर्शन और सम्यक् ज्ञान को प्राप्त नहीं होने दिया। इसके कारण हम अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को नहीं पहचान सके।
तो उससे क्या हुआ? “तब इष्ट भूल्यो भ्रष्ट होए, अनिष्ट गति धरतो फिरयो—उसके कारण मैं इष्ट को भूल गया। ‘तब’ मतलब आप; आपके स्वरूपी जो इष्ट हैं (इष्ट मतलब कल्याण करने वाले, प्रिय), उनको मैं भूलकर भ्रष्ट हो गया और अनिष्ट गतियों में (अर्थात् नरक, तिर्यंच, निगोद आदि में) भटकता फिरता रहा।जब सम्यक् दर्शन और सम्यक् ज्ञान प्राप्त नहीं होते, तब हम अपने वास्तविक इष्ट—अर्थात् आत्मस्वरूप, वीतराग जिनेंद्र भगवान के दर्शन तथा मोक्षमार्ग—को भूल जाते हैं। इस प्रकार हम अनिष्ट गतियों में भटकते हुए संसार में परिभ्रमण करते रहते हैं।
इसलिए कर्मों ने हमारे ज्ञान रूपी धन को हर लिया, जिसके कारण हम अपने वास्तविक हित और मोक्षमार्ग को भूल गए तथा संसार में भटकते रहे।
यही चक्कर क्यों काटता रहा? क्योंकि मेरा ज्ञान रूपी धन तो कर्म रूपी बैरियों ने छीन लिया था। जब कर्म रूपी बैरियों के शिकंजे में पड़ गया, तो वह ज्ञान रूपी धन छिन गया। अब मेरे पास कोई शक्ति नहीं रही! जिसे अपने धन की कीमत नहीं पता, वह क्या करता है? दर-दर की ठोकरें खाता फिरता है। और जिस दिन बोध हुआ कि ‘अरे! यह खजाना तो तेरे पास ही है’, तो अब जागृति आ गई!
धन घड़ी यो धन दिवस यो ही, धन जनम मेरो भयो |
अब भाग्य मेरो उदय आयो, दरश प्रभु जी को लख लयो ||(4)
कठिन शब्दों के अर्थ
धन का अर्थ है—धन्य या सार्थक।
घड़ी का अर्थ है—समय।
दिवस का अर्थ है—दिन।
जनम का अर्थ है—जन्म।
भाग का अर्थ है—भाग्य।
उदय का अर्थ है—प्रकट होना या भाग्य का जागना।
दरश का अर्थ है—दर्शन।
लख लयो का अर्थ है—देख लिया या दर्शन प्राप्त कर लिए।
धन घड़ी यो, धन दिवस यो ही: हे भगवान! आज क्या हो गया? अरे आज तो कुछ विशेष हो गया! ‘धन घड़ी’ अर्थात् आज का यह समय धन्य-धन्य हो गया, और उसी तरह आज का यह दिन भी धन्य-धन्य हो गया। हे भगवान! जिस घड़ी मुझे आपके दर्शन प्राप्त हुए, वह घड़ी धन्य हो गई और मेरा समय सार्थक हो गया। जिस दिन मैंने वीतराग जिनेंद्र भगवान के दर्शन किए, वह दिन भी धन्य हो गया। धन जनम मेरो भयो: मेरी यह पर्याय, मेरा यह जन्म, मेरा यह जीवन आज धन्य-धन्य हो गया।
मेरा मनुष्य जन्म भी सफल हो गया, क्योंकि मनुष्य पर्याय प्राप्त करके मुझे वीतराग जिनेंद्र भगवान के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वास्तव में यह मेरा अहोभाग्य है कि मुझे आपके दर्शन प्राप्त हुए।
जिनेंद्र भगवान के दर्शन प्राप्त होना सौभाग्य की बात है। इसलिए प्रतिदिन जिनेंद्र भगवान के दर्शन करने का अवसर मिले तो उसे अपना अहोभाग्य और सौभाग्य समझना चाहिए।
शास्त्रों में बताया गया है कि जीव जब जिनेंद्र भगवान के दर्शन करता है, तब उसके असंख्यात गुणी कर्मों की निर्जरा होती है और अनंत गुना पुण्य का बंध होता है। यह अवसर भी तभी प्राप्त होता है जब जीव का पुण्य और भाग्य उदय में आता है।
इसी भाव से कहते हैं कि हे भगवान! जब मुझे आपके दर्शन प्राप्त हुए, तब वह घड़ी, वह दिन और मेरा जीवन—सब धन्य हो गए। आपके दर्शन से मेरे मनुष्य जन्म की सार्थकता सिद्ध हुई।
आप कहो—”मुझे जिनवाणी सुनने मिली, सो यह समय मेरा धन्य-धन्य हो गया, आज का यह दिन धन्य-धन्य हो गया और मेरा यह जीवन भी धन्य-धन्य हो गया।” जब गुरु महाराज दिखें, तब कहो उनके सामने—“धन घड़ी यो धन दिवस यो ही, धन जनम मेरो भयो।” “आज मैं धन्य-धन्य हो गया! “अब भाग मेरो उदय आयो, दरश प्रभु जी को लखल्यो”—हे भगवन! आज तक न जाने कहाँ-कहाँ घूमकर आया, लेकिन आज मेरे भाग्य का उदय आया है, सो मुझे आपका दर्शन प्राप्त हुआ।”
कैसा है आपका दर्शन? एक-एक अंग उनका निहारता है और आनंद से भरता है। प्रभु की वीतराग मुद्रा को देखकर अनंताअनंत भवों के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं:
“प्रशांत रूपाय दिगंबराय, देवाधिदेवाय नमो जिनाय।”
“हे भगवन! आपको देख रहा हूँ और महान आनंद से भरता चला जा रहा हूँ।”
क्या है आपकी यह छवि? उसको हम आगे देखेंगे। अभी हम क्या करें? मात्र आँखें बंद करके—जो भी प्रभु की प्रतिमा हमको बहुत प्यारी लगती है, उस प्रतिमा को निहारें। चाहे वह कुंडलपुर के बड़े बाबा की प्रतिमा हो, चाहे सांगानेर (संघी जी) के बड़े बाबा की प्रतिमा हो, चाहे गोलाकोट के आदिनाथ भगवान हों, चाहे पदमपुरा के पद्मप्रभु भगवान हों, चाहे हनुमान ताल/शासन उदय के आदिनाथ भगवान हों—क्या करो? उन वीतराग मुद्राओं को निहारो।
आँखें बंद करके उनको देखो, बस देखते रहो! इसी का नाम दर्शन है। आँखें खोलकर उन्हें निहारते रहो, इसी का नाम दर्शन है—और कुछ नहीं करना। मंदिर में जाकर आँखें बंद करके हाथ जोड़कर खड़े हो गए, ऐसे धर्मात्मा नहीं बनो। आँखें खोलकर उन्हें देखते रहो, देखते रहो!
छवि वीतरागी नगन मुद्रा, दृष्टि नासा पै धरैं |
वसु प्रातिहार्य अनंत गुण जुत, कोटि रवि छवि को हरैं ||(5)
कठिन शब्दों के अर्थ
वीतरागी का अर्थ है—राग और द्वेष से रहित।
नग्न मुद्रा का अर्थ है—दिगंबर अवस्था, जिसमें किसी प्रकार का परिग्रह या वस्त्र नहीं होता।
नासा का अर्थ है—नासिका।
दृष्टि नासा पर धरे का अर्थ है—दृष्टि को नासिका के अग्रभाग पर स्थिर रखना।
अष्ट प्रातिहार्य का अर्थ है—तीर्थंकर भगवान के साथ प्रकट होने वाली आठ विशेष शोभाएँ।
अनंत गुण युत का अर्थ है—अनंत गुणों से युक्त।
कोटि रवि का अर्थ है—करोड़ों सूर्य।
छवि का अर्थ है—कांति या शोभा।
जिनेंद्र भगवान का स्वरूप
छवि वीतरागी: अर्थात् आपकी छवि वीतरागी है—राग और द्वेष से रहित है। राग क्या? जो अच्छा लगने वाला है, वह राग है; जो बुरा लगने वाला है, वह द्वेष है। ‘अच्छा, ये हमारे भक्त हैं’—ऐसा देखते ही मुख प्रसन्न हो जाए; ‘अरे, यह भक्त नहीं है, अभक्त है, पापी है’—उन्हें देखकर चेहरे पर शिकन आ जाए… नहीं, ऐसा नहीं है! क्या कह रहे हैं कि छवि वीतरागी है—ना उनमें राग है, ना उनमें द्वेष है। भक्तों को देखकर वे प्रसन्न नहीं होते और अभक्तों को देखकर वे रुष्ट नहीं होते। ऐसे हैं हमारे प्रभु! मंदिर कोई जाए तो उससे उन्हें कोई मतलब नहीं, कोई नहीं जाता तो उससे भी उन्हें कोई प्रयोजन नहीं। आप गए, बड़े-बड़े सोने-चांदी की थाली भर-भरकर लेकर गए और द्रव्य चढ़ा रहे हैं—तो भी उन्हें कोई प्रयोजन नहीं; और आपने एक चावल का दाना भी नहीं चढ़ाया—तो भी उन्हें कोई प्रयोजन नहीं। यह है वीतरागता! ना नाराज़ होते हैं, ना प्रसन्न होते हैं; ना आपको आशीर्वाद की मुद्रा में आशीष देते हैं, ना ही किसी से रुष्ट होते हैं। हे भगवान! आपका स्वरूप पूर्ण वीतराग है। आप राग और द्वेष से रहित हैं तथा अठारह दोषों से मुक्त हैं। आपके मन में किसी भी प्राणी के प्रति राग या द्वेष नहीं है। आपकी दृष्टि समभाव वाली है।
नगन मुद्रा: उनकी मुद्रा नग्न (परम दिगंबर) है। उनके शरीर पर एक भी आडंबर नहीं है। उनकी वीतरागता और दिगंबर अवस्था देखकर ही दिशाओं को उन्होंने अपना अंबर (वस्त्र) मान लिया है। एक तिल-तुष मात्र धागा भी उनके शरीर पर नहीं है। सो मुद्रा कैसी है? नग्न है, जो बतला रही है कि अंतरंग में कोई विकार नहीं है, और बाहर की नग्न मुद्रा बतला रही है कि बाहर में भी कोई विकार नहीं है—ना कोई त्रिशूल है, ना कोई धनुष है, ना कोई बाण है; किसी पर गुस्सा दिखलाने का कोई चिह्न उनके पास नहीं है। कैसा स्वरूप है उनका? वीतराग, परम दिगंबर! प्रशांत रूपाय दिगंबराय, देवाधिदेवाय नमो जिनाय! आप दिगंबर मुद्रा में विराजमान हैं। दिगंबर का अर्थ है—दिशाएँ ही जिनका अंबर अर्थात् वस्त्र हैं। आपके शरीर पर किसी प्रकार का परिग्रह या वस्त्र नहीं है। यह पूर्ण अपरिग्रह और वीतरागता का प्रतीक है।
दृष्टि नासा पे धरै: और उनकी दृष्टि हमेशा नासा (नाक) के अग्रभाग पर स्थित है। वे यह नहीं देखते—”अच्छा-अच्छा, आप आ गए? हाँ-हाँ, नैनपुर वाले हो?”—ऐसा नहीं देखते वे! “अरे, वह क्यों नहीं आया इतने दिनों से?”—ऐसा भी वे नहीं देखते, और हम गए कि नहीं गए—यह भी वे नहीं देखते। आपकी दृष्टि नासिका के अग्रभाग पर स्थिर रहती है। यहाँ “नासा” का अर्थ नासिका है। इसलिए जहाँ “नाशा” लिखा हो, वहाँ उसे “नासा” पढ़ना चाहिए।
अष्ट प्रातिहार्य
वसु प्रातिहार्य…: ‘वसु’ अर्थात् आठ, प्रातिहार्य। वे आठ प्रातिहार्यों से युक्त हैं। जब तीर्थंकर भगवान केवलज्ञान को प्राप्त करते हैं और समवसरण में विराजमान होते हैं, तब देवताओं द्वारा अष्ट प्रातिहार्यों की रचना की जाती है।
पूजन में भी इनके नामों का उल्लेख किया जाता है—
दिव्य विटप, पुष्पवृष्टि, दुंदुभि, आसन, वाणी, छत्र, चमर और भामंडल।
दिव्य विटप से आशय अशोक वृक्ष से है। पुष्पवृष्टि देवताओं द्वारा की जाने वाली पुष्पों की वर्षा है। दुंदुभि दिव्य ध्वनि का प्रतीक है और आसन से सिंहासन का अभिप्राय है। इसी प्रकार छत्र, चमर और भामंडल भगवान की विशेष शोभा को प्रकट करते हैं।
अनंत गुण युत…: (युत या जुत, दोनों बोल सकते हैं) और वे अनंत गुणों से युक्त हैं। जिनेंद्र भगवान अनंत गुणों के भंडार हैं। कोटि रवि छवि को हरै: ‘कोटि’ अर्थात् करोड़ों-कर करोड़ों, ‘रवि’ अर्थात् सूर्य, ‘छवि’ अर्थात् प्रकाश। करोड़ों-करोड़ों सूर्यों का जो प्रकाश है, उसको भी हरने वाले (लज्जित कर देने वाले/नष्ट कर देने वाले) हैं! उससे भी अधिक वे प्रकाशित हैं। उनके शरीर से ऐसी दिव्य कांति और आभा प्रकट होती है कि करोड़ों सूर्य की शोभा भी उनके सामने फीकी पड़ जाती है। समवसरण में ऐसी दिव्य प्रकाशमय स्थिति होती है कि वहाँ दिन और रात का भेद भी अनुभव नहीं होता।
अतः इस छंद में जिनेंद्र भगवान के वीतराग स्वरूप, दिगंबर मुद्रा, नासिका पर स्थिर दृष्टि, अष्ट प्रातिहार्यों और अनंत गुणों की महिमा का वर्णन किया गया है।
छंद 6 से 8
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