पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 24 | श्लोक 25 से 32 | श्लोक 33 से 43 | श्लोक 44 से 53 | श्लोक 54 से 66 | श्लोक 67 से 79 | श्लोक 80 से 92
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 73- shlok 93 to 105
श्लोक ( Shlok ) 93 – 105
नेम्यन्तरे खपञ्चस्वराग्न्यष्टमितवत्सरे । प्रान्ते हन्ता कृतान्तस्य तदभ्यन्तरजीवितः ॥ ९३ ॥पार्श्वनाथः समुत्पन्नः शतसंवत्सरायुषा । बालशालितनुच्छायः सर्वलक्षणलक्षितः ॥ ९४ ॥नवारत्नितनूत्सेधो लक्ष्मीवानुग्रवंशजः । षोडशाब्दावसानेऽयं कदाचिन्नवयौवनः ॥ ९५ ॥क्रीडार्थ स्वबलेनामा निर्यायायाद्वहिः पुरम् । आश्रमादिवने मातुर्महीपालपुराधिपम् ॥ ९६ ॥पितरं तं महीपालनामानममरार्चिताः । महादेवीवियोगेन दुःखात्तापसदीक्षितम् ॥ ९७ ॥तपः कुर्वन्तमालोक्य पञ्चपावकमध्यगम् । तत्समीपे कुमारोऽस्थादनत्वैनमनादरः ॥ ९८ ॥अविचार्य तदाविष्टः कोपेन कुमुनिर्गुरुः । कुलीनोऽहं तपोवृद्धः पिता मातुर्नमस्क्रियाम् ॥ ९९ ॥अकृत्वा मे कुमारोऽज्ञः स्थितवान्मदविह्वलः । इति प्रक्षोभमागत्य प्रशान्ते पावके पुनः ॥ १०० ॥निक्षेप्तुं स्वयमेवोच्चैरुत्क्षिप्य परशुं घनम् । भिन्दन्निन्धनमज्ञोऽसौ मा भैत्सीरत्र विद्यते ॥ १०१ ॥प्राणीति वार्यमाणोऽपि कुमारेणावधित्विषा । अन्वतिष्ठदयं कर्म तस्याभ्यन्तरवर्तिनौ ॥ १०२ ॥नागी नागश्च तच्छेदाद् द्विधा खण्डमुपागतौ । तन्निरीक्ष्य सुभौमाख्यकुमारः समभाषत ॥ १०३ ॥अहं गुरुस्तपस्वीति गर्व दुर्वहमुद्वहन् । पापास्त्रवो भवत्यस्मान्न वेत्येतष्व वेत्सि न ॥ १०४ ॥अज्ञानतपसानेन दुःखं तेऽत्र परत्र च । इति तद्वचनात्कोपी मुनिरित्थं तमब्रवीत् ॥ १०५ ॥
श्री नेमिनाथ भगवान्के बाद तिरासी हजार सात सौ पचास वर्ष बीत जानेपर मृत्युको जीतनेवाले भगवान् पार्श्वनाथ उत्पन्न हुए थे, उनकी आयु सौ वर्षकी थी जो कि उसी पूर्वोक्त अन्तरालमें शामिल थी। उनके शरीरकी कान्ति धानके छोटे पौधेके समान हरे रङ्गकी थी, वे समस्त लक्षणोंसे सुशोभित थे, नौ हाथ ऊँचा उनका शरीर था, वे लक्ष्मीवान् थे और उग्र वंशमें उत्पन्न हुए थे, सोलह वर्ष बाद जब भगवान् नव यौवनसे युक्त हुए तब वे किसी समय क्रीड़ा करनेके लिए अपनी सेनाके साथ नगरसे बाहर गये । वहाँ आश्रमके वनमें इनकी माता का पिता, महीपाल नगरका राजा महीपाल अपनी रानीके वियोगसे तपस्वी होकर तप कर रहा था, वह पञ्चाग्नियोंके बीचमें बैठा हुआ तपञ्चरण कर रहा था। देवोंके द्वारा पूजित भगवान् पार्श्वनाथ उसके समीप जाकर उसे नमस्कार किये बिना ही अनादरके साथ खड़े हो गये। यह देख, वह खोटा साधु, बिना कुछ विचार किये ही क्रोधसे युक्त हो गया। वह मनमें सोचने लगा कि ‘मैं कुलीन हूँ- उच्च कुल में उत्पन्न हुआ हूँ, तपोवृद्ध हूं- तपके द्वारा बड़ा हूँ, और इसकी माताका पिता हूं फिर भी यह अज्ञानी कुमार अहंकारसे विह्वल हुआ मुझे नमस्कार किये बिना ही खड़ा है’ ऐसा विचार कर वह अज्ञानी बहुत ही क्षोभको प्राप्त हुआ और बुझती हुई अग्निमें डालनेके लिए वहाँ पर पड़ी हुई लकड़ीको काटनेकी इच्छासे उसने लकड़ी काटनेके लिए अपना मजबूत फरसा ऊपर उठाया ही था कि अवधिज्ञानी भगवान् पार्श्वनाथने ‘इसे मत काटो, इसमें जीव है’ यह कहते हुए मना किया परन्तु उनके मना करनेपर भी उसने लकड़ी काट ही डाली। इस कर्मसे उस लकड़ीके भीतर रहनेवाले सर्प और सर्पिणीके दो दो टुकड़े हो गये। यह देखकर सुभौम कुमारकहने लगा कि तू ‘मैं गुरु हूं, तपस्वी हूँ’ यह समझकर यद्यपि भारी अहंकार कर रहा है परन्तु यह नहीं जानता कि इस कुतपसे पापास्त्रव होता है या नहीं। इस अज्ञान तपसे तुझे इस लोकमें दुःख हो रहा है और परलोकमें भी दुःख प्राप्त होगा।’ सुभौमकुमारके यह वचन सुनकर वह तपस्वी और भी कुपित हुआ तथा इस प्रकार उत्तर देने लगा ॥ ९३-१०५ ॥
“Eighty-three thousand seven hundred and fifty years after the time of Lord Neminatha, Lord Parshvanatha—the conqueror of death—was born. His total lifespan was one hundred years, which was included within the aforementioned intervening period (antaraal).
The radiance of His body was green, resembling a fresh, tender stalk of paddy. He was adorned with all auspicious bodily marks, stood nine hands tall, possessed supreme divine splendor, and was born into the illustrious Ugra dynasty.
After sixteen years, when the Lord attained the bloom of youth, He once went outside the city with His army for recreation. There, in the forest of the hermitage, His maternal grandfather—Mahipala, the king of Mahipala city, who had become an ascetic out of grief over separation from his queen—was practicing austerities. He was performing penance seated in the midst of five fires (Panchagni).
Lord Parshvanatha, who was worshipped by the gods themselves, approached him but stood there indifferently without bowing down. Seeing this, that misguided ascetic grew furious without a second thought. He began to think, ‘I am well-born, advanced in penance, and his mother’s father; yet this ignorant prince, blinded by arrogance, stands here without bowing to me.’ Filled with immense agitation, the ignorant ascetic raised his heavy axe to split a log of wood that lay nearby, intending to throw it into the dying fire.
At that moment, Lord Parshvanatha, using His clairvoyant knowledge (Avadhijnana), warned him, saying, ‘Do not split it, there are living beings inside!’ Yet, despite the prohibition, the ascetic split the wood anyway. Due to this act, a serpent and a she-serpent living inside the log were cut into two pieces.
Seeing this, Prince Shubhauma (Parshvanatha) said, ‘Though you harbor immense pride thinking “I am a Guru, I am an ascetic,” you do not even realize whether this false penance (Kutapa) causes the influx of sinful karma (Papasrava) or not. This ignorant penance brings you misery in this world, and it will bring you misery in the next world as well.’
Hearing these words from the Prince, the ascetic became even more enraged and replied in this manner…” (93-105)
श्लोक 106 से 114
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पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 24 | श्लोक 25 से 32 | श्लोक 33 से 43 | श्लोक 44 से 53 | श्लोक 54 से 66 | श्लोक 67 से 79 | श्लोक 80 से 92
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