आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 203 | श्लोक 204 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271
श्लोक 272 से 281 चन्द्रमा का उदय और युद्ध का विराम
चन्द्रमा का उदय हुआ, जो अंधकार को दूर करने के लिए अमृत से भरे चांदी के कलश की तरह प्रतीत हुआ। उसकी किरणें अंधकार को पी रही थीं, मानो क्षय रोग का नाश करने के लिए धूम्रपान कर रही हों। हालांकि, चन्द्रमा पूर्ण रूप से अंधकार नष्ट करने में असमर्थ था, क्योंकि उसका मंडल अशुद्ध और प्रतापहीन था। युद्धक्षेत्र में रात्रि के आगमन के साथ युद्ध थम गया।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 44- Shlok 272 to 281
श्लोक ( Shlok ) 272
तदा बलद्वयामात्याः श्रित्वा बद्धरुषौ नृपौ । इत्यधर्म्य निशायुद्धमनुवद्य” न्यषेधयन् ॥२७२॥
उस समय दोनों सेनाओं के मंत्रियोंने क्रोधित हुए उन दोनों राजाओंके पास जाकर रात्रिमें युद्ध करना अधर्म है ऐसा नियम कर उन्हें युद्ध करनेसे रोका ॥ २७२।।
At that moment, the ministers of both armies approached the two enraged kings and, invoking the sacred ordinance that waging war at night is unrighteous, restrained them from continuing the battle.272
श्लोक ( Shlok ) 273
ताभ्यां तत्रैव सा रात्रिर्नेत्तु मिष्टा रणाङ्गणे । भटतीव्रव्रणासह्यवेदनारावभीषणे ॥२७३॥
उन दोनोंने योद्धाओंके तीव्र घावोंकी असहय वेदनाजनित चिल्लाहटसे भयंकर उसी रणके मैदानमें रात्रि व्यतीत करना अच्छा समझा ॥२७३।।
Troubled by the agonized cries of the warriors, wounded by fierce blows and writhing in unbearable pain, both kings deemed it best to spend the night upon that very battlefield, now made dreadful by the echoes of suffering. 273
श्लोक ( Shlok ) 274
प्रतीची येन’ जायेऽहमगिलत्तम हस्करम् । इति सन्ध्याच्छलेना “हस्तत्र’ कोपमिवागतम् ॥ २७४।।
संध्याके बहानेसे दिन लाल लाल हो गया, मानो जिससे में पैदा हुआ हूँ उस सूर्यको यह पश्चिम दिशा निगल रही है यही समझकर मानो उसे क्रोध आ गया हो ॥ २७४।।
Under the pretext of twilight, the day turned crimson, as if enraged at the sight of the western sky devouring the very sun from whom it was born—burning red with fury at the downfall of its own progenitor. 274
श्लोक ( Shlok ) 275
लज्जे सम्पर्कमर्केण कर्तुं लोचनगोचरे । इयं वेलेति वा सन्ध्याऽप्यन्वगादात्तविग्रहा ॥२७५।।
मैं सबके देखते हुए सूर्यके साथ सम्बन्ध करनेके लिये लज्जित होती हूँ यही समझकर मानो संध्या-की बेला भी शरीर धारणकर सूर्यके पीछे पीछे चल्ली गई ।। २७५॥
Ashamed to be seen uniting with the sun before all eyes, twilight itself seemed to have taken form and followed him closely—retreating with modesty in his wake, as if to veil her union in secrecy.275
श्लोक ( Shlok ) 276
‘अगादहः पुरस्कृत्य मामर्को रात्रिगामिना । तेन पश्चात्कृतेऽतीव शोकात् सन्ध्या व्यलीयत ॥२७६॥
सूर्य जब दिनके पास गया था तब मुझे आगे कर गया था परन्तु अब रात्रिके पास जाते समय उसने मुझे पीछे छोड़ दिया है इस शोकसे ही मानो संध्या वहीं विलीन हो गई थी ॥ २७६॥
“When the sun approached the day, he placed me at the forefront; but now, as he moves toward the night, he has abandoned me behind”—grieved by this neglect, it seemed as though twilight dissolved into sorrow and faded away.276
श्लोक ( Shlok ) 277
तमः सर्वं तदा व्यापत् क्वचिल्लीनं गुहादिषु । शत्रुशेषं न कुर्वन्ति तत एव विचक्षणाः ॥२७७।।
दिनके समय जो अंधकार किन्हीं गुफा आदि स्थानोंमें छिप गया था उस समय वह सबका सब आकर फैल गया था सो ठीक ही है क्योंकि चतुर लोग इसलिये ही शत्रुको बाकी नहीं छोड़ते हैं-उसे समूल नष्ट कर देते हैं ।॥ २७७।।
The darkness that had hidden itself in caves and secret hollows during the day now returned and spread forth completely. And rightly so—for the wise leave no remnant of their enemy, but uproot him entirely.277
श्लोक ( Shlok ) 278
अवकाशं प्रकाशस्य यथात्मानमधात् पुरा । तथैव तमसः पश्चाद् धिङ्महत्त्वं विहायसः ॥२७८॥
आकाशने जिस प्रकार पहले प्रकाशके लिये अपनेमें स्थान दिया था उसी प्रकार पीछेसे अन्धकार के लिये भी स्थान दे दिया इसलिये आचार्य कहते हैं कि आकाशके इस बड़प्पनको धिक्कार हो । भावार्थ-बड़ा होनेपर भी यदि योग्य-अयोग्यका ज्ञान न हुआ तो उसका बड़प्पन किस कामका है ? ॥ २७८।।
Just as the sky once made room for light, so now it offers space to darkness as well. For this, the wise declare: shame upon such grandeur of the heavens!
Interpretive Meaning:
What worth is greatness, if it cannot discern between the worthy and the unworthy? If the vast sky embraces both alike—light and darkness—then its greatness is but hollow.278
श्लोक ( Shlok ) 279
“तमोबलान् प्रदीपादिप्रकाशाः प्रदिदीपिरे । जिनेनेव विनेनेन” कलौ कष्टं कुलिङ्गिनः ॥२७९॥
जिस प्रकार कलिकालमें जिनेन्द्रदेवके न होने से अज्ञानके कारण अनेक कुलिङ्गियोंका प्रभाव फैलने लगता है उसी प्रकार उस समय सूर्यके न होनेसे अन्धकारके कारण अनेक दीपक आदिका प्रकाश फैलने लगा था ॥ २७९।।
Just as in the age of Kali, when the divine presence of Lord Jina fades, ignorance prevails and the influence of many heretical paths begins to spread—
even so, in the absence of the sun, darkness gave way to the rise of myriad lights, as lamps and other sources of radiance began to assert their glow.279
श्लोक ( Shlok ) 280
तमोविमोहितं विश्वं” प्रबोधयितुमुद्धृतः । विधिनेव सुधाकुम्भो दौर्वर्णो विधुरुद्ययौ ॥२८०॥
इतने में चन्द्रमाका उदय हुआ जो ऐसा जान पड़ता था मानो अन्धकारसे मोहित हुए समस्त संसारको जगाने के लिये विधाताने अमृतसे भरा हुआ चांदीका कलश ही उठाया हो ॥२८०।।
Just then, the moon arose—appearing as though the Creator Himself had lifted a silver urn brimming with nectar, to awaken the entire world that had fallen under the spell of darkness.280
श्लोक ( Shlok ) 281
चन्द्रमाः करनालीभिर पिबद् बहलं तमः । वृद्धकासं क्षयं हातुं धूमपानमिवाचरन् ॥२८१॥
उस समय चन्द्रमा अपनी किरणरूपी नालियोंके द्वारा गाढ अन्धकारको पी रहा था और उससे ऐसा जान पड़ता था मानो जिसमें खाँसी बढ़ी हुई है ऐसे क्षय रोगका नाश करनेके लिये धूम्रपान ही कर रहा हो ।॥ २८१॥
At that time, the moon appeared to be drinking in the dense darkness through the straw-like channels of its rays—much like one performing smoke-inhalation therapy to cure a deep, phlegm-laden cough, striving to dispel the disease of nightfall.281
श्लोक 282 से 291
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208
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