आदिपुराण 30 पर्व सारांश
Summary of Ādi purāṇa Parv 30 by Acharya Jinasena
संक्षिप्त सारांश: आदिपुराण पर्व 30 (श्लोक 1 से 129)
चक्रवर्ती भरत ने अपनी अजेय सेना के साथ नैर्ऋत्य, दक्षिण और पश्चिम दिशाओं पर विजय अभियान शुरू किया। उनकी सेना, जिसमें घोड़े, रथ, हाथी और प्यादे शामिल थे, देवों और विद्याधरों के साथ विस्तारित हुई, जिससे समुद्र लहराने लगा और शत्रु राजा परास्त हुए। भरत की सिद्धियाँ उनके उद्योगों से फलित हुईं, और उनकी शक्ति ने शत्रुओं को सहायता-रहित किया। समुद्र तट पर सैनिकों ने नारियल, कटहल और मिरच का आनंद लिया, जबकि सुपारी और पान की लताओं से सुशोभित वृक्षों ने भरत को प्रसन्न किया। सिंहल, मलय और सह्य पर्वतों की स्त्रियाँ उनके यश का गान करती थीं। भरत ने चोल, केरल, पाण्ड्य और पश्चिमी राजाओं को जीता, सह्य और विन्ध्याचल पर्वतों को पार किया, और नर्मदा सहित अनेक नदियाँ उल्लंघन कीं। विन्ध्याचल के वनों में औषधियाँ, मोती और भील देखे गए। सेना ने लाट, सोरठ, पंजाब के राजाओं को वश में किया, गिरनार की प्रदक्षिणा की, और रत्न, घोड़े, वस्त्र प्राप्त किए। सिन्धु नदी पर पड़ाव डालकर समुद्र में प्रवेश किया, प्रभासदेव को जीता और रत्नाकर से धन प्राप्त किया। पूर्व, दक्षिण, पश्चिम दिशाओं को शत्रुरहित कर, भरत ने पुण्य की महत्ता दर्शाई, जो चक्रवर्ती, इंद्र, तीर्थंकर और मोक्ष की लक्ष्मी प्रदान करता है।
श्लोक 1 से 11 : चक्रवर्ती भरत की सेना का नैर्ऋत्य दिशा पर अभियान
चक्रवर्ती भरत अपनी विशाल सेना के साथ नैर्ऋत्य दिशा (दक्षिण-पश्चिम) को जीतने के लिए निकले। उनकी सेना में घोड़े आगे, रथ पीछे, हाथी बीच में और प्यादे सर्वत्र थे। देवों और विद्याधरों की सेना के साथ यह चार अंगों वाली सेना छह अंगों से विस्तारित थी। सेना के आंदोलन से समुद्र लहराने लगा, मानो वह महापुरुषों के अनुकरण का संदेश दे रहा हो। विरोधी राजा परास्त हो गए, नदियाँ कीचड़मय और पहाड़ समतल हो गए। भरत की सिद्धियाँ उनके उद्योगों से फलित हुईं। उनकी अजेय शक्ति और सेना ने शत्रुओं पर प्रभाव डाला। योद्धा और बाण समान गुणों वाले थे, दोनों विजय के अंग बने। शत्रुओं के छत्र-चमर छीन लिए गए, जिससे वे सहायता-रहित हो गए। श्लेष अलंकार से युक्त एक श्लोक में विरोधी राजाओं के कुपतित्व (दरिद्रता) का वर्णन है, जो उनकी पराजय के बाद जंगलों में फल खाकर जीवनयापन करते थे। भरत को सन्धि-विग्रह की चिन्ता केवल व्याकरण तक सीमित थी, क्योंकि उन्होंने सभी शत्रुओं को नष्ट कर दिया था।
श्लोक 12 से 21 : समुद्र तट पर सेना का अभियान
भरत की सेना ने सुपारी और नारियल के वनों से घिरे समुद्र तट पर आक्रमण किया। सैनिकों ने सरोवरों की छाया में विश्राम किया और नारियल का रस पिया। ताड़ के वनों में सूखे पत्तों की मर्मर ध्वनि सुनी। भरत ने सुपारी के वृक्षों को पान की लताओं से लिपटे देखकर प्रसन्नता अनुभव की, जो स्त्री-पुरुष के समान प्रतीत होते थे। सूर्यास्त के समय पक्षियों के शब्द मुनियों के स्वाध्याय जैसे लगे। सैनिकों ने कटहल के फल खाए और नारियल का रस, मिरच आदि से भोजन व्यवस्था सुखद रही। मिरच खाकर आंसू बहाते पक्षी और वानरों का दृश्य भी भरत ने देखा।
श्लोक 22 से 34 : वनों और पर्वतों का सौन्दर्य
वनों में फलों से लदे वृक्ष कल्पवृक्ष जैसे लगे। लताओं से लिपटे फलदार वृक्ष सैनिकों को संतुष्ट करते थे। सिंहल द्वीप की स्त्रियाँ नारियल की मदिरा पीकर भरत का यश गाती थीं। त्रिकूट, मलय और पाण्डयकबाटक पर्वतों पर किन्नर देवियाँ और मलय-सह्य के वनों में भील स्त्रियाँ भरत का यश गा रही थीं। मलय गिरि के लतागृहों में चन्दन को हिलाता वायु अतिथि सत्कार करता प्रतीत हुआ। केरल की युवतियाँ सुगन्धित निःश्वास, चन्दन-लेपित शरीर, नृत्य और गीतों से भरत का मन मोह रही थीं।
श्लोक 35 से 50 : दक्षिण और पश्चिम की विजय
भरत ने चोल, केरल और पाण्ड्य राजाओं को परास्त कर उनसे प्रणाम करवाया। कलिंग के विशाल हाथियों ने मलय के छोटे पर्वतों को व्याप्त किया। भरत के हाथियों ने दिग्गजों को अधीन कर लिया। पश्चिम समुद्र तट के राजाओं को जीतकर उनकी सेना समुद्र के दोनों किनारों तक फैली। समुद्र की लहरें सेना के भय से आकुल प्रतीत हुईं। सह्य पर्वत की गोद में लहराता समुद्र दुखी और पराजित जान पड़ा। सेना के आघात से सह्य पर्वत के वृक्ष टूटे, शिखर क्षतिग्रस्त हुए और वह नाममात्र का अचल रहा। भरत के हाथी सह्य से तुंगवरक तक घूमे, पर्वतों को पार किया।
श्लोक 51 से 63 : पश्चिम के हाथी और नदियाँ
भरत ने पश्चिम दिशा के उत्कृष्ट गुणों वाले हाथियों को प्राप्त किया, जो शूरवीर, सुगंधित मद वाले और मजबूत थे। सह्य पर्वत की नदियाँ, जैसे भीमरथी, दारुवेणा, नीरा, मूला, बाणा, गोदावरी आदि, सेना ने पार कीं। इन नदियों में मगरमच्छ, पक्षी और वृक्षों की छाया थी। सेनापति ने जंगली हाथियों को भी पकड़ा।
श्लोक 64 से 71 : विन्ध्याचल की समानता और सौन्दर्य
भरत ने विन्ध्याचल को अपने समान देखा, दोनों भूभृत्, उत्तुंग, पृथुवंश धारक और अलंघ्य थे। विन्ध्य के झरने पताकाओं जैसे शोभित थे। पर्वत समुद्र में प्रवेश करता प्रतीत हुआ, मानो दावानल से भयभीत होकर मित्रता चाहता हो। झरने वृक्षों का पोषण करते थे, और शब्दकारी नदियाँ हँसी करती प्रतीत हुईं। दावानल से जलते शिखर सुवर्ण जैसे लगे।
श्लोक 72 से 81 : विन्ध्याचल का सौन्दर्य और विविधता
विन्ध्याचल का वन हाथियों, सर्पों, काँटों और उपद्रवी लोगों से युक्त था, जो इसे दुखदायी बनाता था। वन में विरोधाभास था—मदोन्मत्त हाथियों से युक्त होने पर भी यह समुद्री नमक और शोभंजन लताओं से समृद्ध था। फटे बाँसों से मोतियाँ बिखरती थीं, मानो वनलक्ष्मी हँस रही हो। गुफाओं से झरनों की गंभीर ध्वनि पर्वत की महिमा को कुलाचलों से स्पर्धा करती प्रतीत हुई। पर्वत का विविध रंग, धातुएँ और हरिणों के वर्ण विचित्र आकार बनाते थे। रात में औषधियाँ दीपकों की तरह चमकती थीं। सिंहों द्वारा मारे गए हाथियों के मोतियों से प्रदेश फ बिखरे फूलों जैसा लगता था। चक्रवर्ती भरत ने विन्ध्याचल पर भील और हाथियों को देखा, जो मेघ जैसे काले थे। नदियों को उन्होंने स्त्रियों के समान उत्कंठा से देखा।
श्लोक 82 से 91 : नर्मदा नदी और विन्ध्याचल की विजय
भरत ने विन्ध्याचल के मध्य में समुद्र तक फैली नर्मदा नदी देखी, जो पृथ्वी की चोटी या विन्ध्य की विजय-पताका सी लगती थी। सेना के क्षोभ से पक्षियों की पंक्तियाँ उड़ती थीं, मानो तोरण बाँधे गए हों। नर्मदा ने रानियों को क्रीड़ा प्रदान की। सेना ने नर्मदा पार कर विन्ध्याचल के उत्तर में आक्रमण किया। पर्वत दोनों दिशाओं में फैला, मानो स्वयं को अर्पित कर रहा हो। सेना का पड़ाव नर्मदा के किनारों पर विन्ध्याचल सा शोभित था। सेना और पर्वत में समानता थी—हाथियों और गंडोपलों, घोड़ों और किन्नरों के कारण। सेना ने विन्ध्याचल के फल-पत्तों का उपभोग कर इसे वन्ध्याचल बना दिया। सैनिकों ने मोतियों और वाँसी चावलों से जिनेन्द्र की पूजा की।
श्लोक 92 से 101 : विन्ध्याचल से पश्चिम की ओर प्रस्थान
विन्ध्याचल के वनराजाओं ने औषधियाँ और भील राजाओं ने हाथियों के दाँत व मोती भेंट किए। सेना ने नर्मदा पार कर पश्चिम दिशा की ओर प्रस्थान किया। भरत का प्रताप आगे बढ़ा, धूल ने सूर्य का तेज रोक दिया। लाट देश के राजा उनकी आज्ञा में आए। सोरठ और पंजाब के राजाओं ने हाथी भेंट किए। चक्ररत्न से भयभीत राजा ग्रहों की तरह वश में आए। भरत ने दिग्गज जैसे अभिमानी राजाओं को जीता। सोरठ के राजाओं ने ऊँट और घोड़ियाँ भेंट कीं, और भरत गिरनार पर्वत पर पहुँचे।
श्लोक 102 से 111 : गिरनार और पश्चिम के राजाओं की भेंट
भरत ने नेमिनाथ का स्मरण कर गिरनार की प्रदक्षिणा की। राजाओं ने रेशमी वस्त्र और सिल्क भेंट किए। भरत ने कुछ को सन्मान, कुछ को स्नेह और कुछ को प्रसन्न दृष्टि से अनुरक्त किया। राजाओं ने हाथी, घोड़े और रत्नों से उनकी पूजा की। तुरुष्क आदि देशों के वेगवान घोड़े और काम्बोज, सैन्धव जैसे कुलीन घोड़े भेंट किए गए। भरत को रत्नों के साथ यश की प्राप्ति हुई। सेनापति ने जल-स्थल मार्ग रोककर पहाड़ी राजाओं को जीता और देश, जंगल, नदियाँ, पर्वत पार कर भरत की आज्ञा स्थापित की।
श्लोक 112 से 121 : पश्चिम समुद्र की ओर विजय
भरत पश्चिम समुद्र की ओर बढ़े, राजाओं का अभिमान और धन हरते हुए। समुद्र नदियों रूपी हाथों से रत्नों का अर्घ देता प्रतीत हुआ। समुद्र को रत्नाकर माना गया, न कि केवल लवण समुद्र। सूर्य का तेज मंद पड़ता था, पर भरत का तेज देदीप्यमान था। चक्ररत्न धारी भरत सूर्य समान चमके। उन्होंने सिन्धु नदी के द्वार पर पड़ाव डाला। सैनिकों ने सिन्धु के वन में निवास किया। पुरोहित ने चक्ररत्न और जिनेन्द्र की पूजा की, और गंधोदक व आशीर्वादों से भरत को आनंदित किया।
श्लोक 122 से 129 : समुद्र में प्रवेश और अंतिम विजय
भरत ने रथ पर चढ़कर लवण समुद्र में प्रवेश किया। उन्होंने प्रभासदेव को जीता और उससे मोतियों, कल्पवृक्ष के फूलों और सुवर्ण का जाल प्राप्त किया। पुण्यकर्म से देवों को जीतकर उन्होंने सिन्धुद्वार पर सारभूत धन प्राप्त किया। लक्ष्मी से अलंकृत भरत समुद्र से निकले, नवीन वर सा शोभित। पूर्व, दक्षिण और पश्चिम दिशाओं को जीतकर, दिक्प slide जैन धर्म के सिद्धांतों के आधार पर, चक्रवर्ती भरत ने समस्त दिशाओं को शत्रुरहित किया। पुण्य से चक्रवर्ती, इंद्र, तीर्थंकर और मोक्ष की लक्ष्मी प्राप्त होती है। अतः जिनेन्द्र के आगम अनुसार पुण्य उपार्जन की सलाह दी गई।
पर्व 31 सारांश
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द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण भाग – 2
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आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena
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