आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71
श्लोक 72 से 81 समवसरण का दर्शन
भरत ने जिनेन्द्र के समवसरण को देखा, जहाँ सुर और असुर बैठते थे। धूलिसाल, मानस्तंभ, और स्वच्छ परिखा को पार कर वे लतावनों और गोपुरों तक पहुँचे। रत्नों से सुशोभित कोट और मंगलद्रव्यों ने उनकी इंद्रियों को संतुष्ट किया। नाट्यशालाएँ और धूपघटों ने समवसरण की शोभा बढ़ाई।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 33 – Shlok 72 to 81
श्लोक ( Shlok ) 72
ततोऽधिरुह्य तं शैलमपश्यत् सोऽस्य मूर्धनि । प्रागुक्तवर्णनोपेतं जैनमास्थानमण्डलम् ।।७२।।
तदनन्तर उस पर्वतपर चढ़कर भरतने उसके मस्तक पर पहले कही हुई रचनासे सहित जिनेन्द्रदेव का समवसरण मण्डल देखा ॥७२।।
Thereafter, Bharata, having climbed that very mountain, stood upon its lofty summit and beheld the Jina’s Samavasaraṇa-maṇḍala—resplendent with the very structure he had earlier conceived.72
श्लोक ( Shlok ) 73
समेत्या वसरावेक्षास्तिष्ठन्त्य स्मिन् सुरासुराः । इति तज्ज्ञैर्निरुक्तं तत्सरणं समवादिकम् ॥७३॥
इसमें समस्त सुर और असुर आकर दिव्य ध्वनिके अवसरकी प्रतीक्षा करते हुए बैठते हैं इसलिये जानकार गणधरादि देवोंने इसका समवसरण ऐसा सार्थक नाम कहा है ॥७३।।
Here, all the celestial and demoniac beings gather and seat themselves, awaiting the divine sound of the Jina’s discourse; therefore, the enlightened Gaṇadharas and other divine sages have aptly given it the meaningful name Samavasaraṇa—the sacred assembly of all beings.73
श्लोक ( Shlok ) 74
आखण्डलधनुर्लेखामखण्डपरिमण्डलाम् । जनयन्तं निजोद्योतैर्धूलीसालमथासदत् ॥७४॥
अथानन्तर-महाराज भरत, जो अपने प्रकाशसे अखण्ड मण्डलवाले इन्द्रधनुषकी रेखा को प्रकट कर रहा है ऐसे धूलिसाल के समीप जा पहुँचे ॥७४ll
Thereafter, the great King Bharata drew near the Dhūliśāla—whose radiant splendor seemed to manifest the unbroken arc of a celestial rainbow with its own effulgence.74
श्लोक ( Shlok ) 75
हेमस्तम्भाग्रविन्यस्तरत्नतोरणभासुरम् । धुलोसालमतीत्यासौ मानस्तम्भमपूजयत् ॥७५॥
सुवर्णके खंभोंके अग्रभागपर लगे हुए रत्नोंके तोरणोंसे जो अत्यन्त देदीप्यमान हो रहा है ऐसे धूलिसालको उल्लंघन कर उन्होंने मानस्तम्भकी पूजा की ॥७५॥
Crossing the resplendent Dhūliśāla—its golden pillars adorned with arching jeweled canopies that shimmered with dazzling brilliance—he then performed reverent worship of the Mānastambha, the Pillar of Honour.75
श्लोक ( Shlok ) 76
मानस्तम्भस्य पर्यन्ते सरसीः ससरोरुहाः । जैनीरिव श्रुतीः स्वच्छशीतलापो ददर्श सः ॥७६॥
जिनमें स्वच्छ और शीतल जल भरा हुआ है और कमल फूल रहे हैं ऐसी जिनेन्द्र भगवान्की वाणीके समान मानस्तम्भके चारों ओर की बावड़ियाँ भी महाराज भरत ने देखीं ॥७६॥
King Bharata beheld as well the stepwells surrounding the Mānastambha—filled with pure, cool waters and blooming lotuses, akin to the serene and sublime speech of the Jina.76
श्लोक ( Shlok ) 77
धूलीसालपरिक्षेपस्यान्तर्भागे समन्ततः । वीथ्यन्तरेषु सोऽपश्यद् देवावासोचिता भुवः ॥७७॥
धूलिसालकी परिधिके भीतर चारों ओरसे गलियोंके बीच बीचमें उन्होंने देवोंके निवास करने योग्य पृथिवी भी देखी ॥७७॥
Within the precincts of the Dhūliśāla’s grand enclosure, amidst the intersecting pathways on all sides, he beheld sacred grounds—fit for the dwelling of the celestial beings.77
श्लोक ( Shlok ) 78
अतीत्य परतः किञ्चिद् ददर्श जलखातिकाम् । सुप्रसन्नामगाधां च मनोवृत्ति सतामिव ॥७८॥
कुछ और आगे चलकर उन्होंने जलसे भरी हुई परिखा देखी। वह परिखा सज्जन पुरुषोंके चित्तकी वृत्तिके समान स्वच्छ और गम्भीर थी ।। ७८ ।।
Proceeding a little farther, he beheld a moat filled with water—clear and profound, like the disposition of noble souls: pure in clarity, yet deep in thought.78
श्लोक ( Shlok ) 79
वल्लीवनं ततोऽद्राक्षीन्नानापुष्पलताततम् । पुष्पासवरसामत्तभ्रमद् भ्रमरसङ्कुलम् ॥७९॥
तदनन्तर जो अनेक प्रकारके फूलोंकी लताओंसे व्याप्त हो रहा है और जो फूलोंके आसवरूपी रससे मत्त होकर फिरते हुए भ्रमरोंसे व्याप्त है ऐसा लता-वन देखा ॥७९॥
Thereafter, he beheld a grove of flowering vines—lush with countless blossoms, where bees, intoxicated by the nectarous essence of the blooms, wandered and hummed in blissful revelry.79
श्लोक ( Shlok ) 80
ततः किञ्चित्पुरो गच्छन् सालमाद्यं व्यलोकयत् । निषधाद्रितटस्पर्धिवपुषं रत्नभाजुषम् ॥८०॥
वहाँसे कुछ आगे जाकर उन्होंने पहला कोट देखा जो कि निषध पर्वतके किनारेके साथ स्पर्धा कर रहा था और रत्नोंकी दीप्तिसे सुशोभित था ।॥८०॥
Advancing a little farther, he came upon the first encircling wall—radiant with the brilliance of precious gems and vying in majesty with the very edge of Mount Niṣadha itself.80
श्लोक ( Shlok ) 81
सुरदौवारिकारक्ष्यतत्प्रतोलीतलाश्रितान् । सोऽपश्यन्मङगलद्रव्यभेदांस्तत्राष्टधा स्थितान् ॥८१॥
देवरूप द्वारपाल जिसकी रक्षा कर रहे हैं ऐसे गोपुरद्वारके समीप रखे हुए आठ मङ्गलद्रव्य भी उन्होंने देखे ॥८१॥
He beheld as well the eight auspicious emblems placed near the grand Gopura gateway—guarded by divine gatekeepers in celestial form.81
श्लोक 82 से 91
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 159
आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 154 | श्लोक 155 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71
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