आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 160 | श्लोक 161 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 45- Shlok 202 to 211
श्लोक ( Shlok ) 202
भुज्यते यः स भोगः स्याद् भुक्तिर्वा भोग” इष्यते । तद् द्वयं नरकेऽप्यस्ति तस्माद् भोगेषु का रतिः ॥२०२।।
जिसका भोग किया जाता है उसे भोग कहते हैं अथवा उपभोग किया जाना भोग कहलाता है वे दोनों प्रकारके भोग नरक में भी हैं इसलिये उन भोगोंमें क्या प्रेम करना है ? ॥२०२॥
That which is enjoyed is called a pleasure, or indeed the very act of enjoyment is termed pleasure; yet both these forms of indulgence are found even in the realms of hell. Therefore, what reason is there to harbor any attachment to such pleasures?”202
श्लोक ( Shlok ) 203
भोगास्तृष्णाग्निसंवृद्ध्ये “दीपनीयौषधोपमाः। “एभिः प्रवृद्धतृष्णाग्नेः “शान्त्यै चिन्त्यमिहापरम् ॥२०३॥
जिस प्रकार औषध से पेटकी अग्नि प्रदीप्त हो जाती है उसी प्रकार इन भोगोंसे भी तृष्णारूपी अग्नि प्रदीप्त हो उठती है अतः इन भोगोंसे बढ़ी हुई तृष्णारूपी अग्निकी शान्तिके लिये कोई दूसरा ही उपाय सोचना चाहिये ॥ २०३॥
“Just as certain medicines enkindle the fire of the stomach, so too do these pleasures inflame the fire of craving. Therefore, to quell the ever-growing blaze of thirst kindled by indulgence, one must surely seek an entirely different remedy.” 203
श्लोक ( Shlok ) 204 – 206
इत्यतो न सुधीः सद्यो वान्ततृष्णाविषो भृशम् । हेमांगदं समाहूय “पूज्यपूजापुरस्सरम् ॥२०४॥ अभिषिच्य चलां मत्वा बध्वा पट्टेन वाऽचलम् । लक्ष्मीं समय गत्वोच्चै रभ्यासं वृषभेशितुः ॥२०५॥ प्रव्रज्य बहुभिः सार्द्ध मूर्धन्यैः स ससुप्रभः । क्रमाच्छ्रे णीं समारुह्य कैवल्यमुदपादयत् ॥ २०६॥
इस प्रकार तृष्णारूपी विषको उगल देनेवाले बुद्धि-मान् राजा अकम्पनने बहुत शीघ्र हेमाङ्गदको बुलाकर पूज्य-परमेष्ठियोंकी पूजापूर्वक उसका राज्याभिषेक किया, लक्ष्मी को चंचल समझ पट्टबन्धसे बांधकर उसे अचल बनाया और हेमांगद-को सौंपकर श्रीभगवान् वृषभदेवके समीप जाकर अनेक राजाओं और रानी सुप्रभाके साथ दीक्षा धारण की तथा अनुक्रमसे श्रेणियां चढ़कर केवलज्ञान उत्पन्न किया ॥२०४-२०६।।
“Thus did the wise King Akampana, having expelled the poison of craving from his heart, swiftly summon Hemangada and, with reverent worship of the venerable Paramesthis, perform his coronation. Binding the fickle goddess of fortune with the diadem of sovereignty, he rendered her steadfast and entrusted her to Hemangada.
Then, accompanied by many kings and Queen Suprabha, he approached the divine Lord Rishabha and undertook initiation into the ascetic life. Ascending the stages of spiritual progress in due order, he ultimately attained the supreme knowledge of Kevala Jnana.”204 – 206
श्लोक ( Shlok ) 207 – 211
अथ जन्मान्तरापातमहास्नेहातिनिर्भरः । सुलोचनाननानन्दनेन्दुबिम्बात् श्रुतां सुधाम् ॥२०७॥ उन्मीलन्नीलनी रेजराजिभिर्लोकनैः पिबन् । पूरयन् श्रोत्रपात्राभ्यां तद्गीर्गीतरसायनम् ॥२०८॥’हरन् करिकराकारकरालिङ्गन सङ्गतः । तद्गात्रकूपिकान्तःस्थ रसं ‘स्पर्शमवेदिनम् ॥२०९॥तद् बिम्बाधरसम्भावितामृतास्वादनोत्सुकः । तद्वक्त्रावारिजामोदान्मोदमानोऽनिशं भृशम् ॥२१०॥”अत्रैव न पुनर्वेति’ मम वामासमागमः । ‘स सुलोचनया स्वानि चक्षुरादीन्यतर्पयत् ॥२११॥
अथानन्तर अन्य जन्मसे आये हुए बहुत भारी स्नेहसे भरा हुआ जयकुमार खुले हुए नीलकमलों के समान सुशोभित होनेवाले अपने नेत्रोंसे सुलोचनाके मुखरूपी आनन्ददायी चन्द्रमासे झरते हुए अमृतको पीता था, सुलोचनाके वचन और गीतरूपी रसायनको अपने कानरूपी पात्रोंसे भरता था, हाथीकी सूँड़के समान आकारवाले हाथोंके आलिंगनसे युक्त हो स्पर्शन इन्द्रियसे जानने योग्य उसके शरीररूपी कुइँयाके भीतर रहनेवाले रसको ग्रहण करता था, बिम्बी फलके समान सुशोभित उसके ओठोंमें रहनेवाले अमृतका आस्वाद लेनेमें सदा उत्सुक रहता था, उसके मुखरूपी कमलकी सुगन्धिसे रातदिन अत्यन्त हर्षित होता रहता था और ‘स्त्री समागम मुझे इसी भवमें है अन्यभवमें नहीं है, ऐसा मानकर ही मानो सुलोचना के द्वारा अपनी चक्षु आदि इन्द्रियोंको संतुष्ट करता रहता था ।।२०७-२११।।
Thereafter, Jayakumara, bound by a profound affection carried over from past lives, drank deeply of the nectar flowing from Sulochana’s bliss-giving, moon-like face with eyes as radiant as blooming blue lotuses. He filled the vessels of his ears with the elixir of her words and songs. Embracing her with arms shaped like an elephant’s trunk, he delighted in savoring the essence dwelling within the wellspring of her bodily beauty through the sense of touch.
Ever eager to taste the ambrosia resting upon her lips, red and lustrous like the ripe bimba fruit, he rejoiced day and night in the fragrance emanating from her lotus-like face. Convinced that the union with his beloved was possible only in this very life, and in no other, he seemed to satisfy his senses—sight and beyond—unceasingly through the charms of Sulochana.207 – 211
श्लोक 212 से 219
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 203 | श्लोक 204 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 352 | श्लोक 353 से 361 | श्लोक 362 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 160 | श्लोक 161 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201