आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171
श्लोक 172 से 182 रथों का युद्ध और जयकुमार की विजय
योद्धा कपिशीर्षक धनुष और तलवारों से युद्ध करते रहे, कुछ अंधे होकर भी लड़ते रहे। जयकुमार ने क्रोधित होकर सिंह की तरह युद्ध किया, और शत्रु की सेना समुद्र की लहरों की तरह पीछे हट गई। रथों के पहियों से खून और मांस की कीचड़ बन गई। जयकुमार ने शस्त्रों से युक्त रथ पर सवार होकर, सूर्य की तरह शत्रुओं के अंधकार को भेदा और युद्ध में विजय प्राप्त की।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 44- Shlok 172 to 182
श्लोक ( Shlok ) 172
वंशमात्रावशिष्टाङ्गै र्मण्डलाग्रेश्चिरं क्रुधा । लोहदण्डैरिवाखण्डैर्धीरा युयुधिरे धुरि ॥१७२॥
उस युद्धमें कितने ही योद्धा क्रोधित होकर अखण्ड लोहे के डंडेके समान जिनमें बांसमात्र ही शेष रह गया है ऐसी तलवारोंसे चिरकाल तक युद्ध करते रहे थे ॥१७२॥
In that fierce battle, many warriors, aflame with wrath, fought on for long hours wielding swords worn down to mere bamboo hilts — their blades reduced to unbroken shafts of iron alone.172
श्लोक ( Shlok ) 173
शिरः “प्रहरणे नान्यो ऽपश्यस्त्रान्ध्यं प्रकुर्वता । सर्वरोगसिराविद्धो” दृष्ट्वा पश्चादयुद्ध सः ॥१७३॥
अन्य कोई योद्धा, अन्धा करनेवाली शिरकी चोटसे यद्यपि कुछ देख नहीं सक रहा था तथापि गलेकी पीछेको नसोंसे शिरको जुड़ा हुआ देखकर वह फिर भी युद्ध कर रहा था ।।१७३।।
Another warrior, though rendered nearly blind by a crushing blow to the head, continued to fight on — for seeing his severed head still faintly tethered by the sinews at the nape, he refused to yield the battle.173
श्लोक ( Shlok ) 174
हयान् प्रतिष्कशोकृत्य धनुस्तत्कपिशीर्षकम् । अयुध्यत पुनः सुष्ठु तदा द्विगुणयद्रणम् ॥१७४।॥
उस समय कितने ही योद्धा अपने कपिशीर्षक नामक धनुषसे घोड़ोंको ताड़ित कर युद्धको द्विगुणित करते हुए अच्छी तरह लड़ रहे थे ॥१७४।॥
At that time, many valiant warriors fought with fierce resolve, striking down steeds with their mighty bows named Kapiśīrṣaka, thus intensifying the fury of battle and doubling its ferocity.174
श्लोक ( Shlok ) 175
जयोऽयात् सानुजस्तावदाविष्कृत्य यमाकृतिः । कण्ठीरवमिवारुह्य हयमस्युद्यतः क्रुधा ।।१७५।।
इतने में ही तलवार हाथमें लिये हुए जयकुमार अपने छोटे भाइयोंके साथ साथ यमराज सरीखा आकार प्रकट कर और सिंहके समान घोड़ेपर सवार होकर क्रोधसे आगे बढ़ा ॥ १७५॥
Just then, Jayakumar appeared, sword in hand, flanked by his younger brothers. With a form resembling Yama himself and mounted upon a lion-like steed, he advanced in wrath, fierce and unstoppable.175
श्लोक ( Shlok ) 176
वाहयन्तं तमालोक्य कल्पान्तज्वालिभीषणम्। विवेश विद्विडश्वाली वेलेव स्वबलाम्बुधिम् ॥१७६॥
कल्पान्त कालकी अग्निके समान भयंकर जयकुमारको घोड़ेपर सवार हुआ देखकर शत्रुके घोड़ोंकी पंक्ति लहर के समान अपने सेनारूपी समुद्रमें जा घुसी ॥ १७६॥
Beholding the fearsome Jayakumar mounted upon his steed—terrible as the fire of doomsday—the ranks of enemy horses recoiled in dread, surging back like waves into the depths of their ocean-like army.176
श्लोक ( Shlok ) 177
चिरात् पर्याय मासाद्य प्रनृत्यत्केतवो रथाः । जविभिर्व्याजिभिर्व्यढा प्राधावन् विद्विषः प्रति ॥१७७।।
जिनपर पताकाएं नृत्य कर रही हैं और वेगशाली घोड़े जिनम जुते हुए हैं ऐसे रथ चिरकालम अपना नम्बर (बारी) पाकर शत्रुओक प्रति दौड़ने लगे ।।१७७॥
Chariots, adorned with fluttering banners and drawn by swift and powerful steeds, began to surge forth one after another — each advancing toward the enemy as its turn in the great battle came.177
श्लोक ( Shlok ) 178
निश्शेष हे तिपूर्णेषु रथेषु रथनायकाः । तुलां’ ‘जगर्जुरारुह्य पिञ्जरैः कुञ्जरारिभिः ॥१७८॥
रथोंके स्वामी, सम्पूर्ण शस्त्रोंसे भरे हुए रथोंपर सवार हो पिंजरों में बन्द हुए सिहोंकी तुलना धारण करते हुए गरज रहे थे ॥१७८॥
The lords of the chariots, mounted upon their weapon-laden cars, roared aloud like lions caged within iron enclosures — fierce, restrained, yet brimming with the thunder of impending fury.178
श्लोक ( Shlok ) 179
चक्रसंघट्टसम्पिष्टशवासृग्मांसकर्दमे । रथकट्याश्चरन्ति स्म ‘तत्राब्धौ मन्दपोतवत् ॥१७९॥
उस युद्धमें पहियोंके संघट्टन से पिसे हुए मुरदोंके खून और मांसकी कीचड़में रथों के समूह ऐसे चल रहे थे मानो किसी समुद्र में छोटी छोटी नावें ही चल रही हों ।॥ १७९॥
In that dreadful battle, the chariot wheels crushed the slain beneath them, stirring a mire of blood and flesh—through which the chariots moved as if they were small boats sailing upon a crimson, storm-tossed sea. 179
श्लोक ( Shlok ) 180
कुन्तासिप्रासचक्रादिसङ्कीर्णे व्रणितक्रमाः । अक्रामन् कृच्छ्रकृच्छ्रेण रणे रथतुरङ्गमाः ॥१८०॥
बरछा, तलवार, भाले और चक्र आदिसे भरे हुए युद्धक्षेत्र में घायल पैरोंवाले रथके घोड़े बड़े कष्टसे चल रहे थे ।। १८०।।
Amidst a battlefield strewn with spears, swords, lances, and whirling discs, the chariot-horses, their limbs wounded and bleeding, moved with great anguish, struggling with each step through the perilous terrain.180
श्लोक ( Shlok ) 181 – 182
तदा सन्नद्धसंयुक्तसर्वायुधभृतं” रथम् । सङ्क्रम्य वृषभं वाऽर्कः समारूढपराक्रमः ॥१८१॥पुरोज्वलत्समुत्सर्पच्छरतीक्ष्णांशु सन्ततिः । शत्रुसन्तमसं भिन्दन् बालार्कभजयज्जयः ॥१८२॥
उसी समय तैयार हुए तथा जुड़े हुए सब प्रकारके शस्त्रोंसे व्याप्त रथपर आरूढ़ होनेसे जिसका पराक्रम वृषभराशिपर आरूढ़ हुए सूर्यके समान बढ़ रहा है, जिसके आगे चलते हुए बाणरूपी तीक्ष्ण किरणों का समूह प्रकाशमान हो रहा है और जो शत्रुरूपी अन्धकारको भेदन कर रहा है ऐसे उस जय-कुमारने उदय होता हुआ बाल-सूर्य भी जीत लिया था ॥१८१-१८२॥
At that moment, Jayakumar mounted a chariot fully equipped and adorned with every manner of weapon. His valor blazed forth like the rising sun upon the chariot of the zodiac’s bull, his path illuminated by a host of arrow-like, razor-sharp rays.Piercing the darkness of his enemies like the dawn dispels night, he outshone even the newborn sun ascending the eastern sky. 181 – 182
श्लोक 183 से 191
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