आदिपुराण 28 पर्व सारांश
Summary of Ādi purāṇa Parv 28 by Acharya Jinasena
संक्षिप्त सारांश: आदिपुराण पर्व 28 (श्लोक 1 से 221)
चक्रवर्ती भरत ने प्रातःकालीन क्रियाएँ पूर्ण कर चक्ररत्न और दण्डरत्न के साथ समुद्र की ओर प्रस्थान किया। विजयपर्वत हाथी पर सवार, उनकी शोभा इन्द्र-सी थी। सेना गंगा के किनारे चलती हुई गंगा-सी प्रतीत होती थी, जो ध्वजाओं और घोड़ों से सुशोभित थी। मार्ग में बिना युद्ध के शत्रु समर्पण करते थे, और भरत ने प्रभुता से पूर्व दिशा जीत ली। गोकुलों में ग्वालाएँ और वनों में भील कन्याएँ देखीं। सेना गंगाद्वार और समुद्र तक पहुँची, जहाँ उप-समुद्र का जल गहरा था। भरत ने अरहन्त देव की आराधना कर अजितंजय रथ पर समुद्र विजय हेतु प्रस्थान किया। रथ जल में स्थल-सा चला, और क्रुद्ध भरत ने अमोघ बाण छोड़ा, जो मागधदेव के निवास में पहुँचा। मागधदेव ने क्रोधित होकर युद्ध की बात कही, पर देवों ने उन्हें समझाया कि बाण चक्रवर्ती का है। प्रबुद्ध मागधदेव ने भरत को रत्न, हार, और कुण्डल भेंट कर समर्पण किया। समुद्र की शोभा का वर्णन हुआ, जो रत्नों, सर्पों, और लहरों से युक्त था। भरत ने समुद्र को तुच्छ समझकर पार किया और छावनी में लौटे, जहाँ जयघोष और आशीर्वाद प्राप्त हुए। पुण्य के प्रभाव से भरत ने समुद्र और मागधदेव को जीता। पुण्य की महिमा बताते हुए जिनपूजा, दान, व्रत, और उपवास की सलाह दी गई। अंत में, भरत सभाभवन में सिंहासन पर विराजे और गंगा तट पर सेना के साथ सुखपूर्वक रहे।
श्लोक 1 से 11
चक्रवर्ती भरत का प्रस्थान और सेना की शोभा
चक्रवर्ती भरत ने प्रातःकाल की क्रियाएँ पूर्ण कर चक्ररत्न के पीछे प्रस्थान किया। चक्ररत्न और दण्डरत्न, दोनों देवों द्वारा रक्षित, सेना के अग्रभाग में थे और विजय के प्रमुख कारण थे। भरत विजयपर्वत नामक विशाल हाथी पर सवार हुए, जो विजयार्ध पर्वत से स्पर्धा करता था। उनकी शोभा इन्द्र के समान थी, सफेद छत्र यश का प्रतीक था, और चमरों की पंक्ति लक्ष्मी के हास्य-सी शोभित थी। सेनापति सैनिकों को समुद्र तक शीघ्र प्रस्थान के लिए प्रेरित कर रहे थे।
श्लोक 12 से 21
सेना का समुद्र की ओर प्रयाण और गंगा के साथ समानता
सेनापतियों के आह्वान पर सैनिकों ने समुद्र की ओर प्रस्थान किया, जहाँ मागधदेव को वश करना था। नगाड़ों के शब्द से आकाश गूंज उठा। सेना गंगा के किनारे चलती हुई गंगा नदी की तरह प्रतीत होती थी, जिसमें चमर, ध्वजाएँ, और घोड़े गंगा के हंस, बगुले, और तरंगों जैसे थे। सेना की गति अविचल थी और वह गंगा को भी परास्त करती प्रतीत होती थी, क्योंकि यह चक्रवर्ती की आज्ञा का पालन करती थी। ध्वजाएँ आकाश को स्वच्छ करती सी प्रतीत होती थीं।
श्लोक 22 से 31
मार्ग में देशों और शत्रुओं पर विजय
भरत ने मार्ग में अनेक देश, नदियाँ, पर्वत, और किले पार किए। शत्रु बिना युद्ध के समर्पण कर रहे थे, और मण्डलेश्वर राजा उन्हें प्रणाम करते थे। भरत ने अपनी प्रभुता से शत्रुओं की भूमि छीन ली और उनकी धूल में मिला दिया। सन्धि आदि गुणों में वे अद्वितीय थे, जिससे शत्रुओं को परास्त करना उनके लिए सहज था। बिना तलवार या धनुष का उपयोग किए उन्होंने पूर्व दिशा जीत ली।
श्लोक 32 से 41
ग्वालाओं और भीलों का दर्शन
भरत ने मार्ग में गोकुलों में दही मथती ग्वालाओं को देखा, जो श्रम और शोभा से युक्त थीं। उनकी गतिविधियाँ और सौन्दर्य मनमोहक थे। वनों में भील लोग जंगली हाथियों के दाँत और मोती भेंट करते दिखे। भील कन्याएँ सौन्दर्य और सादगी से युक्त थीं, जो सेना को देखकर विस्मित थीं।
श्लोक 42 से 51
समुद्र के समीप शिविर और उप-समुद्र का दर्शन
म्लेच्छ राजाओं ने भेंट देकर भरत की आज्ञा स्वीकारी। सेनापति ने अन्तपालों के किलों को वश में किया। सेना गंगाद्वार और समुद्र तक पहुँची, जहाँ उप-समुद्र का जल गहरा और स्थायी था। भरत ने गंगा के उपवन में सेना को ठहराया, जहाँ शिविर की रचना नन्दन वन-सी थी। सेना गंगा की शीतल वायु में सुखपूर्वक रही।
श्लोक 52 से 61
लवण समुद्र विजय की तैयारी
भरत ने मागधदेव को वश करने के लिए अरहन्त देव की आराधना का विचार किया। उन्होंने पंच परमेष्ठी की पूजा की, सेना की रक्षा हेतु सेनापति नियुक्त किया, और अजितंजय रथ पर सवार होकर समुद्र विजय के लिए प्रस्थान किया। पुरोहित ने मंगल आशीर्वाद और ऋचा पढ़कर उनकी विजय की कामना की।
श्लोक 62 से 102
समुद्र का वर्णन और भरत की वेदी पर आरूढ़ता
भरत गंगाद्वार की वेदी पर चढ़े, जिसे वे समुद्र में प्रवेश और कार्य-सिद्धि का द्वार मानते थे। समुद्र का वर्णन अनेक रूपकों से किया गया: वह लहरों से उछलता, शंखों और रत्नों से युक्त, और चक्रवर्ती की सेना-सा अलंघनीय था। यह अपस्मार रोगी, सर्प, पेटू, राक्षस, बालक, और सिद्धालय-सा प्रतीत होता था। इसकी गहराई, चंचलता, और रत्नों की शोभा विस्मयकारी थी। भरत ने इसे अपूर्व महानिधि के रूप में देखा, जो उनकी विजय की वेदी पर उनकी शोभा को बढ़ा रहा था।
श्लोक 103 से 111
समुद्र में रथ का वेग और चक्रवर्ती का प्रभाव
चक्रवर्ती भरत ने गंभीर समुद्र को तुच्छ समझकर सिद्ध परमेष्ठी को नमस्कार किया और रथ को शीघ्र बढ़ाने की आज्ञा दी। उनका रथ मन-सा वेगवान घोड़ों द्वारा समुद्र में जहाज की भाँति तेजी से चला। जल में भी रथ और घोड़े स्थल की तरह दौड़ रहे थे, जो चक्रवर्ती के पुण्य का आश्चर्य था। लहरें घोड़ों का परिश्रम दूर करती थीं, और रथ के पहियों से उछलता जल ध्वजा को भारी करता था। घोड़ों का अंगराग केवल जल के छींटों से धुल गया।
श्लोक 112 से 121
रथ का समुद्र में रुकना और बाण प्रक्षेपण
रथ के पहियों से जल दो भागों में बँटकर मार्ग बनाता प्रतीत हुआ। रथ समुद्र में बारह योजन चलकर रुक गया, तब क्रुद्ध भरत ने धनुष उठाया। धनुष की प्रत्यंचा के शब्द से समुद्र और मछलियाँ क्षुब्ध हो उठीं। विद्याधरों को संसार के संहार की आशंका हुई। भरत ने अमोघ बाण पर अपनी पहचान अंकित कर मागधदेव को अधीन करने का संदेश देते हुए उसे पूर्व दिशा में छोड़ा।
श्लोक 122 से 131
मागधदेव का क्रोध और प्रतिक्रिया
बाण का भारी शब्द मागधदेव की सेना में क्षोभ उत्पन्न करता हुआ उनके निवास में जा गिरा। व्यन्तरदेवों ने इसे कल्पान्त या भूकंप समझकर मागधदेव को घेर लिया। मागधदेव ने क्रोधित होकर बाण को चूर करने और शत्रु को नष्ट करने की बात कही। उन्होंने कहा कि पराभव सहन करना पुरुष के लिए कलंक है और सच्चा पुरुष पराक्रम से कुल को पवित्र करता है।
श्लोक 132 से 141
मागधदेव का क्रोध और देवों की सलाह
मागधदेव ने शत्रु को युद्ध और मृत्यु देने की घोषणा की, पर समीपवर्ती देवों ने उनके क्रोध को शांत किया। उन्होंने कहा कि बलवानों से विरोध पराभव लाता है और यश की रक्षा समर्थ पुरुष के आश्रय से ही संभव है। बुद्धिमान को बिना विचार किए कार्य नहीं करना चाहिए। देवों ने सुझाव दिया कि बाण की उत्पत्ति की जाँच हो, क्योंकि यह चक्रवर्ती का ही हो सकता है।
श्लोक 142 से 151
मागधदेव का प्रबोधन और चक्रवर्ती की पहचान
देवों ने कहा कि चक्रवर्ती के बाण पर अंकित नाम उनकी पहचान प्रकट करता है। उन्होंने मागधदेव को क्रोध त्यागकर चक्रवर्ती की आज्ञा मानने और बाण की पूजा कर उन्हें अर्पित करने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि चक्रवर्ती के साथ वैर से शांति नहीं मिलेगी और पूज्य पुरुषों की पूजा से दोनों लोकों में उन्नति होती है।
श्लोक 152 से 161
मागधदेव का समर्पण और भरत के प्रति नम्रता
मागधदेव ने देवों के वचनों से प्रबोध प्राप्त कर चक्रवर्ती भरत की महिमा स्वीकारी। उनके मन में भय, आशंका, और प्रबोध उत्पन्न हुआ। क्रोध शांत होने पर उन्होंने भरत को प्रथम चक्रवर्ती, वृषभदेव के पुत्र, और पूज्य माना। वे आकाश-मार्ग से भरत के पास पहुँचे, बाण अर्पित कर नमस्कार किया, और स्वयं को उनका सेवक स्वीकार करने की प्रार्थना की। उन्होंने अपने अपराध की क्षमा माँगी और भरत के चरणों की सेवा से पवित्र होने की बात कही।
श्लोक 162 से 171
मागधदेव की भेंट और समुद्र का वर्णन
मागधदेव ने भरत को अमूल्य रत्न, दिव्य मोतियों का हार, और कुण्डल भेंट किए, जो उनके वक्ष और कानों को शोभित करने योग्य थे। प्रसन्न मागधदेव ने रत्नों से भरत की पूजा की और उनकी अनुमति से अपने स्थान को लौट गए। भरत ने समुद्र और उसके अन्तर्वीपों को देखकर आश्चर्य अनुभव किया। सारथि ने समुद्र की शोभा का वर्णन किया, जिसमें लहरें मणियों से पूजा करती प्रतीत होती थीं, शंखों का शब्द गूंजता था, और जल दिशाओं में यश बांटता प्रतीत होता था। समुद्र का जल आकाश और राजकुलों से तुलनीय था।
श्लोक 172 से 181
समुद्र की तुलना और आश्चर्य
सारथि ने कहा कि गंगा और सिन्धु का जल समुद्र में मिलता है, पर यह तृप्त नहीं होता, जैसे मूर्ख मूर्खों के संग्रह से संतुष्ट नहीं होता। समुद्र के जलचर जीव इसके पुत्र, नदियाँ स्त्रियाँ, और बालू रत्न हैं, फिर भी यह महोदधि कहलाता है, जो आश्चर्यजनक है। सर्प अलातचक्र-से शोभित हैं, और समुद्र चन्द्र-स्पर्श से क्रोधित-सा उछलता है। इसके भीतर देवों के क्रीड़ास्थल और द्वीप किलों-से हैं। समुद्र किनारे के वनों को ताड़न करता प्रतीत होता है और कुलपर्वतों को चुनौती देता है। सर्प और मछलियाँ इसमें भोजन के लिए संघर्ष करती हैं।
श्लोक 182 से 191
समुद्र के जीव और किनारे की शोभा
सारथि ने समुद्र के जीवों का वर्णन किया: एक मछली रथ को मूर्खतावश बड़ा मच्छ समझती है, सर्प तरंगों-से दीपक प्रज्वलित करते प्रतीत होते हैं। समुद्र का जल रत्नों से दीप्तिमान और दीपकों-युक्त घर-सा है। ज्वार-भाटे और मयूरों के नृत्य से यह जीवंत है। किनारे के वन सूर्य के ताप से मुक्त, फूलों और लहरों से शोभित हैं। हरिण तालाबों के पास विचरण करते हैं और दावानल की शंका से लौटते हैं। समुद्र नदियों को आलिंगन करता है, पर तृप्त नहीं होता।
श्लोक 192 से 201
समुद्र की गतिविधियाँ और रत्नों की महिमा
समुद्र के किनारे मन्दार वृक्षों में विद्याधरियाँ टहलती हैं। मछलियाँ और अजगर परस्पर युद्धरत हैं, पर समान बल के कारण विजय नहीं होती। जंगली हाथी समुद्र को ताड़न करते हैं, जो मृदंग-सा बजता है। जल मछलियों, सीपों, और सर्पों की कांचलियों से भयानक है। वायु किनारे की सुगंध और लहरों को हिलाता है। समुद्र की भूमियाँ मोतियों और देवों की सेवा से शोभित हैं। जलचर जीव समुद्र को पिता मानकर इसके धन के लिए लड़ते हैं। समुद्र के रत्न और जल बड़वानल के बावजूद अक्षय हैं।
श्लोक 202 से 211
समुद्र और भरत की समानता, छावनी में वापसी
सारथि ने समुद्र और भरत की समानता बताई: दोनों आश्चर्यों, रत्नों, गंभीरता, और शक्ति से युक्त हैं, पर भरत मूर्खों से मुक्त हैं। भरत आनंदित होकर छावनी की ओर प्रस्थान करते हैं। सारथि ने कठिनाई से रथ लौटाया, और समुद्र की लहरें रथ का पीछा करती प्रतीत हुईं। रथ किनारे पहुँचा, और लोग भरत के पुण्य और सकुशल वापसी की प्रशंसा करते हैं। राजा और सैनिक जयघोष के साथ उनका स्वागत करते हैं। भरत छावनी में प्रवेश कर राजभवन पहुँचते हैं, जहाँ मंगलाक्षत और आशीर्वाद प्राप्त होते हैं।
श्लोक 212 से 221
भरत की विजय और पुण्य की महिमा
लोगों ने भरत को शत्रु-विजय और चिरायु होने के आशीर्वाद दिए, जो पुनरुक्त थे, क्योंकि वे पहले ही ये प्राप्त कर चुके थे। पुण्य के प्रभाव से भरत ने अगाध समुद्र को पार कर मागधदेव को वश किया। पुण्य ही जल-स्थल में शरण और सुख देता है। जिनेन्द्र द्वारा बताए गए पुण्यकर्मों—जिनपूजा, दान, व्रत, उपवास—का संचय करने की सलाह दी गई। भरत सभाभवन में सिंहासन पर विराजते हैं और गंगा के किनारे सेना के साथ सुखपूर्वक निवास करते हैं, जिनेन्द्र का स्मरण करते हुए।
हिन्दी-भाषानुवाद पर्व 28
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण
द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25
Download PDF
आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena