आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 63
श्लोक 64 से 71 : विन्ध्याचल की समानता और सौन्दर्य
भरत ने विन्ध्याचल को अपने समान देखा, दोनों भूभृत्, उत्तुंग, पृथुवंश धारक और अलंघ्य थे। विन्ध्य के झरने पताकाओं जैसे शोभित थे। पर्वत समुद्र में प्रवेश करता प्रतीत हुआ, मानो दावानल से भयभीत होकर मित्रता चाहता हो। झरने वृक्षों का पोषण करते थे, और शब्दकारी नदियाँ हँसी करती प्रतीत हुईं। दावानल से जलते शिखर सुवर्ण जैसे लगे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 30 – Shlok 64 to 71
श्लोक ( Shlok ) 64
प्रसारितरिज्जिह्मो योऽब्धिं पातुमिवोद्यतः । सह्याचलं तमुल्लङ्घय विन्ध्याद्रि प्राप तद्बलम् ॥ ६४।।
जो अपनी नदियाँरूपी जीभोंको फेलाकर मानो समुद्रको पीने के लिये ही उद्यत हुआ है ऐसे उस सहय पर्वतको उल्लंघन कर भरतकी सेना विन्ध्याचल पर पहुँची ।। ६४ ।।
Spreading forth its river-like tongues as though in eager thirst to drink the very ocean, the mighty Sahya mountain was crossed; and thus did Bharata’s army at last arrive upon the heights of the Vindhya range.
श्लोक ( Shlok ) 65
भूभृतां पतिभुत्तुङ्गं पृथुवंशं धृतायतिम् । परैरलङ्गवचमद्राक्षीद् विन्ध्याद्रि स्वमिव प्रभुः ॥६५।।
चक्रवर्ती भरतने उस विन्ध्याचलको अपने समान ही देखा था क्योंकि जिस प्रकार आप भूभृत् अर्थात् राजाओंके पति थे उसी प्रकार विन्ध्याचल भी भूभृत् अर्थात् पर्वतोंका पति था, जिस प्रकार आप उत्तुंग अर्थात् अत्यन्त उदार हृदय थे उसी प्रकार वह विन्ध्याचल भी उत्तुंग अर्थात् अत्यन्त ऊँचाथा, जिस प्रकार आप पृथुवंश अर्थात् विस्तृत उत्कृष्ट वंश (कुल) को धारण करनेवाले थे उसीं प्रकार वह विन्ध्याचल भी पृथुवंश अर्थात् बड़े बड़े बाँसके वृक्षोंको धारण करनेवाला था, जिस प्रकार आप धृतायति अर्थात् उत्कृष्ट भविष्यको धारण करनेवाले थे उसी प्रकार वह विन्ध्याचल भी धृतायति अर्थात् लम्बाईको धारण करनेवाला था, और जिस प्रकार आप दूसरोंके द्वारा अलंघ्य अर्थात् अजेय थे उसी प्रकार वह विन्ध्याचल भी दूसरोंके द्वारा अलंघ्य अर्थात् उल्लंघन न करने योग्य था ।॥६५॥
The emperor Bharata beheld the Vindhya mountain as his very equal. For just as he was bhūbhṛt—the bearer and lord of kings—so too was Vindhya bhūbhṛt, the sovereign of mountains. As Bharata was uttuṅga—lofty in spirit and magnanimity—so was the Vindhya, towering in height and grandeur. As the emperor upheld a pṛthu-vaṁśa—a vast and noble lineage—so did the Vindhya sustain pṛthu-vaṁśa—great groves of mighty bamboo. As Bharata bore the weight of a glorious future (dhṛtāyati), so too did the Vindhya stretch long and steadfast (dhṛtāyati) across the land. And just as Bharata was unconquerable, inviolable by any foe, so too was the Vindhya—unassailable, impassable by any other.65
श्लोक ( Shlok ) 66
भाति यः शिखरैस्तुङ्गेर्दूरव्यायतनिर्झरैः । सपताकैविमानौघैर्विश्रमायेव संश्रितः ॥६६॥
जिनसे बहुत दूरतक फैलनेवाले झरने झर रहे हैं ऐसे ऊंचे ऊंचे शिखरों से वह पर्वत ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो पताकाओंसहित अनेक विमानोंके समह ही विश्राम करनेके लिये उसपर ठहरे हों ।। ६६।।
Adorned with lofty peaks from which cascaded far-reaching waterfalls, that mountain shone with such splendor as though countless celestial chariots, adorned with fluttering banners, had alighted upon it to rest.66
श्लोक ( Shlok ) 67
यः पूर्वापरकोटिभ्यां विगाह्याम्बुनिधि स्थितः । नूनं दावत्रयात् सख्यममुना प्रचिकीर्षति ॥६७ll
वह पर्वत अपने पूर्व और पश्चिम दिशाके दोनों कोणोंसे समुद्रमें प्रवेश कर खड़ा हुआ था और उससे ऐसा जान पड़ता था मानो दावानलके डरसे समुद्रके साथ मित्रता ही करना चाहता हो ।॥६७॥
That mountain, extending from its eastern to its western extremities, stood with its flanks immersed in the sea—appearing as though, in fear of a raging forest fire, it sought to forge a bond of friendship with the ocean itself.67
श्लोक ( Shlok ) 68
नयन्ति निर्झरा यस्य शश्वत्पुष्टिं तटद्रुमान् । स्वपादाश्रयिणः पोप्याः प्रभुणेतीव शंसितुम् ॥६८॥
उस विन्ध्याचल के झरने ‘स्वामी को अपने चरणों का आश्रय लेने वाले पुरुषोंका अवश्य ही पालन करना चाहिये’ मानो यह सूचित करनेके लिये ही अपने किनारेके वृक्षों का सदा पालन-पोषण करते रहते थे ॥६८॥
The waterfalls of that Vindhya mountain seemed to proclaim, “A master must indeed cherish those who seek refuge at his feet,” as they ceaselessly nourished the trees along their banks with tender care.68
श्लोक ( Shlok ) 69
तटस्थपुट पाषाणस्खलितोच्चलिताम्भसः । नदीवधूः कृतध्वानं निर्झरैर्हसतीव यः ॥६९॥
वह पर्वत शब्द करते हुए निर्भरनोंसे ऐसा जान पड़ता था मानो अपने किनारेके ऊँचे नीचे पत्थरों से स्खलित होकर जिनका पानी ऊपरकी ओर उछल रहा है ऐसी नदी रूपी स्त्रियोंकी हँसी ही कर रहा हो ॥६९॥
That mountain, resounding with the murmurs of countless springs, seemed as though it were laughing in delight—its rocky slopes giving rise to rivers that, stumbling over uneven stones, flung their waters upward like the joyous laughter of women.69
श्लोक ( Shlok ) 70
वनाभोगमपर्यन्तं यस्य दग्धुमिवाक्षमः । भृगुपाताय दावाग्निः शिखराण्यधिरोहति ॥७०॥
उस पर्वतकी शिखरोंपर लगा हुआ दावानल ऐसा जान पड़ता था मानो उसके सीमारहित बहुत बड़े वनप्रदेशको जलानेके लिये असमर्थ हो ऊपरसे गिरकर आत्म-घात करनेके लिये ही उसके शिखरोंपर चढ़ रहा हो ।॥७०॥
The fire that blazed atop that mountain seemed as though it were striving in vain to consume its vast, boundless forested expanse, only to falter and, in its frustration, climb higher upon the peaks, as if intent on self-destruction.
श्लोक ( Shlok ) 71
ज्वलद्दावपरीतानि यत्कूटानि वनेचरैः । चामीकरमयानीव लक्ष्यन्ते शुचि सन्निधौ ॥७१॥
आषाढ़ महीनेके समीप जलती हुई दावानलसे घिरे हुए उस पर्वतके शिखर वहांके भीलोंको सुवर्णसे बने हुएके समान दिखाई देते थे ।।७१।।
As the blazing forest fire of the month of Āṣāḍha enveloped the mountain, its peaks shimmered like gold, appearing to the Bhīlas as though they were crafted from the precious metal itself.71
श्लोक 72 से 81
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 169
आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 63