आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103
श्लोक 104 से 111 अकम्पन और जयकुमार की सेनाएँ
महाराज अकम्पन ने सुलोचना को नित्यमनोहर चैत्यालय में भेजकर स्वयं सेना के साथ युद्ध के लिए निकले। सुकेतु, सूर्यमित्र, श्रीधर, जयवर्मा, और देवकीर्ति जैसे राजा अपनी सेनाओं के साथ जयकुमार से मिले। मेत्रप्रभ नामक विद्याधर भी अपनी तलवार और विद्याधरों के साथ युद्ध में शामिल हुआ। जयकुमार ने मकरव्यूह रचना बनाकर सेना को सुसज्जित किया, जबकि अर्ककीर्ति चक्रव्यूह के साथ सूर्य की तरह चमक रहा था।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 44- Shlok 104 to 111
श्लोक ( Shlok ) 104 – 105
कुर्वन्ती शान्तिपूजां त्वं तिष्ठ मात्रेति सादरम् । प्रवेश्य चैत्यधामाग्रयं सुतां नित्यमनोहरम् ॥१०४॥समग्रबलसम्पत्त्या चचाल चलयन्निलाम् । अकम्पः कम्पितारातिः साकम्पनिरकम्पनः ॥१०५।।
इधर शत्रुओंको कम्पित करनेवाले और स्वयं अकंप (निश्चल) रहनेवाले महाराज अकम्पनने भी ‘तू अपनी माताके साथ आदरपूर्वक शान्ति-पूजा करती हुई बैठ’ इस प्रकार कहकर पुत्री सुलोचनाको नित्यमनोहर नामके उत्तम चैत्यालय में पहुंचाया और स्वयं अपने पुत्रोंको साथ लेकर समस्त सेनारूपी सम्पत्तिके द्वारा पृथिवीको कंपाते हुए निकले ॥१०४-१०५॥
Meanwhile, the great King Akampana—he who causes his enemies to tremble while remaining unshaken himself—spoke thus to his daughter: “Remain seated with your mother, performing the rites of peace with due reverence.”
So saying, he escorted Sulocanā to the splendid and ever-beautiful Caityālaya named Nityamanohara. Then, taking his sons with him and accompanied by the vast wealth of his army, he set forth—shaking the very earth with his martial might.104 – 105
श्लोक ( Shlok ) 106
सुकेतुः सूर्यमित्राख्यः श्रीधरो जयवर्मणा । देवकीर्तिर्जयं जग्मुरिति भूपाः ससाधनाः ॥१०६॥
सुकेतु, सूर्यमित्र, श्रीधर, जयवर्मा और देवकीर्ति ये सब राजा अपनी अपनी सेनाओंके साथ जयकुमारसे जा मिले ॥ १०६ ॥
Suketū, Sūryamitra, Śrīdhara, Jayavarma, and Devakīrti—these noble kings, each accompanied by his own army, came forth and joined forces with Jayakumara.106
श्लोक ( Shlok ) 107
इमे मुकुटबद्धेषु पञ्च विख्यातकीर्तयः । परे च शूरा नाथेन्दुवंशगृहह्याः समाययुः ॥१०७॥
मुकुटबद्ध राजाओंमें जिनकी कीति अत्यन्त प्रसिद्ध है ऐसे ऊपर कहे हुए सुकेतु आदि पांच राजा तथा नाथवंश और सोमवंशके आश्रित रहनेवाले अन्य शूरवीर लोग, सभी जयकुमारसे आ मिले ॥ १०७॥
Those five aforenamed kings—Suketū and the rest—renowned among crowned monarchs for their illustrious glory, along with other valiant heroes who were scions or loyal allies of the noble lineages of the Nāthas and the Somas, all came and united themselves with Jayakumara.107
श्लोक ( Shlok ) 108
मेघप्रभश्च चण्डासिप्रभाव्याप्तवियत्तलः । विद्याबलोद्धतः सार्द्धमद्धं विद्याधरैरगात् ॥१०८॥
जिसने . अपनी तीक्ष्ण तलवारकी प्रभासे आकाशतलको व्याप्त कर लिया है और जो विद्याके बलसे उद्धत हो रहा है ऐसा मेत्रप्रभ नामका विद्याधर भी अपने आधे विद्याधरोंके साथ निकला ॥१०८॥
Maitraprabha, the Vidyādhara—whose radiant, keen-edged sword had illumined the very vault of heaven, and who now surged forth in pride born of his mystic power—also advanced, accompanied by half the host of his celestial kin.108
श्लोक ( Shlok ) 109 – 110
बलं विभज्य भूभागे विशाले सकलं समे । प्रकृत्य मकरव्यूहं विरोधिबलघस्मरः ॥१०९।। उच्चैरुर्जिततूयांवनिर्यन्निर्घोषभीषणः । जितमेघस्वरो गर्जन् रेजे मेघस्वरस्तदा ॥११०॥
जो शत्रुओंकी सेनाको नष्ट करनेवाला है, बड़े बड़े बाजोंके समूहसे निकलती हुई आवाजके समान भयंकर है और जिसने अपनी आवाजसे मेघोंकी गर्जनाको भी जीत लिया है ऐसा जयकुमार उस समय विशाल और सम (ऊंची नीची रहित) पृथ्वीपर अपनी समस्त सेनाका विभागकर तथा मकरव्यूहकी रचनाकर गर्जता हुआ बहुत ही अधिक सुशोभित हो रहा था ।।१०९-११०॥
Jayakumara—he who is the destroyer of enemy armies, dreadful as the thunderous roar of resounding war-drums, and whose own voice had surpassed even the rumbling of storm-clouds—at that moment shone with unmatched splendour. Upon the vast and level plain, he arrayed his entire host in ordered divisions and formed the Makara-vyūha (the crocodile-shaped battle formation). Roaring like a lion, he stood resplendent, a vision of sovereign might and martial glory.109 – 110
श्लोक ( Shlok ) 111
चक्रव्यूह विभक्तात्मभूरिसाधनमध्यगः । अर्ककीर्तिश्च भाति स्म परिवेषाहि तार्कवत् ॥१११॥
उधर चक्रव्यूहकी रचनाकर अपनी बहुत भारी सेनाके बीच खड़ा हुआ अर्ककीति भी परिवेषसे युक्त सूर्यके समान सुशोभित हो रहा था ।।१११॥
Meanwhile, Arkakīrti, having arrayed his vast army in the form of the Chakravyūha (the wheel-shaped formation), stood at its center, radiant like the sun encircled by its halo—resplendent in the midst of his formidable host.111
श्लोक 112 से 121
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 264 | श्लोक 265 से 275 | श्लोक 276 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103