आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 154 | श्लोक 155 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 199
संक्षिप्त सारांश: आदिपुराण पर्व 33 (श्लोक 1 से 202)
चक्रवर्ती भरत, जिन्होंने समस्त राजाओं, विद्याधरों, और देवों को वश में किया, नौ निधियों और चौदह रत्नों के साथ अयोध्या की ओर लौटे। उनकी सेना, गंगा के समान विजयार्थ पर्वत से निकली, जिसमें हाथी, घोड़े, और सैनिकों के कोलाहल से दिशाएँ गूँज उठीं। गंगा किनारे देशों और पर्वतों को पार करते हुए वे कैलास पर्वत पहुँचे, जहाँ सेना ठहराकर वे जिनेन्द्र भगवान वृषभदेव की पूजा के लिए गए। कैलास की शोभा झरनों, मणियों, और वनों से सुशोभित थी, जो भगवान की सेवा का प्रतीक थी। मणिमयी सीढ़ियों से चढ़कर भरत ने वनदेवियों, हरिणों, और सिंहों को देखा। पुरोहित ने पर्वत की तुलना भरत से की, जो शांत और भयंकर दोनों था। समवसरण में प्रवेश कर भरत ने धूलिसाल, मानस्तंभ, और रत्नमयी कोट देखे। उन्होंने चैत्यवृक्षों, ध्वजाओं, और नाट्यशालाओं की पूजा की। गंधकुटी में भगवान वृषभदेव को सिंहासन पर देखा, जिनकी प्रभा, छत्रत्रय, और दिव्य ध्वनि सभा को संतुष्ट करती थी। भरत ने जल, चंदन, और फूलों से पूजा की और सप्तभंगी वाणी की प्रशंसा की, जो उनकी सर्वज्ञता दर्शाती थी। उन्होंने भगवान को अरिहंत, वीतराग, और लोकगुरु कहकर जय-स्तुति की। उनकी भक्ति से मन, वचन, और शरीर पवित्र हुए, और दर्शन से पाप नष्ट हुए। साठ हजार वर्षों के दिग्विजय के बाद, भगवान से धर्म स्वरूप सुनकर और समवसरण की विभूति से आनंदित होकर भरत अयोध्या लौटे। यह पर्व उनकी भक्ति, पुण्य, और जिनमत के महत्व को दर्शाता है।
श्लोक 1 से 11 अयोध्या की ओर प्रस्थान
चक्रवर्ती भरत, जिन्होंने समस्त राजाओं, विद्याधरों, और देवों को वश में किया, नौ निधियों और चौदह रत्नों के साथ अयोध्या की ओर लौटे। उनकी सेना, गंगा के समान विजयार्थ पर्वत से निकली, जिसमें हाथी, घोड़े, और पैदल सैनिक लहरों और बुलबुलों से प्रतीत होते थे। रथों, घोड़ों, और हाथियों के शब्दों से कोलाहल हुआ। भरत ने विजय पर्वत नामक हाथी पर सवार होकर गंगा किनारे देशों और पर्वतों को पार करते हुए कैलास पर्वत के समीप पहुँचे।
श्लोक 12 से 27 कैलास पर्वत का दर्शन
भरत ने कैलास पर्वत पर सेना ठहराकर जिनेन्द्र भगवान की पूजा के लिए प्रस्थान किया। राजाओं के साथ वे इंद्र की तरह शोभित थे। कैलास की शोभा, झरनों, फूलों, और वनों से सुसज्जित थी, जो भगवान वृषभदेव की सेवा का प्रतीक थी। स्फटिक मणियों, नीले और हरे मणियों, और रत्नों से पर्वत इंद्रधनुष सा प्रतीत होता था। किनारों पर सिंह, किन्नर, और विद्याधर क्रीड़ा करते थे, जिससे भरत को आनंद हुआ।
श्लोक 28 से 41 पर्वत पर चढ़ाई और शोभा
भरत पैदल कैलास पर चढ़े, बिना खेद के, क्योंकि धर्म कार्यों में कष्ट नहीं होता। मणिमयी सीढ़ियों से वे शिखर पर पहुँचे, जहाँ वन की शीतल वायु ने उनका स्वागत किया। उन्होंने मंदार वनों में देवियों, हरिणियों, अजगरों, और सिंहों को देखा। पुरोहित ने पर्वत की शोभा की प्रशंसा की, जिसमें नदियाँ, वन, और मुनियों जैसे प्रदेश थे, जो द्वंद्व सहते और कल्याण करते थे।
श्लोक 42 से 51 पर्वत की महिमा
पर्वत के झरने सिंहों को तर्जना करते प्रतीत होते थे। पुरोहित ने भरत की तुलना पर्वत से की, जो सेवकों और भद्र हाथियों को धारण करता था। वन में सिहों, हरिणों, और मुनियों की उपस्थिति थी, जो शांति और भय का मिश्रण दर्शाती थी। सिंह और हरिण शांतिपूर्वक विचरण करते थे, जो जिनेन्द्र की उपस्थिति से संभव था।
श्लोक 52 से 61 पर्वत की शांति और रत्न
पर्वत जिनेन्द्र की उपस्थिति से शांत था। सिंह और हरिण सहवास में थे, और मुनियों के पीछे पशु निर्भय विचरते थे। पर्वत अष्टापद नाम से जाना गया। रात्रि में औषधियाँ और मणियाँ प्रकाशमान थीं, पर किन्नर अंधेरे से डरते थे। हरिण मणियों को घास समझकर लज्जित होते थे। सूर्यकांत और चंद्रकांत मणियाँ सूर्य और चंद्र की किरणों से जल और शोभा उत्पन्न करती थीं।
श्लोक 62 से 71 जिनेन्द्र के समान पर्वत
पर्वत जिनेन्द्र के समान था, क्योंकि दोनों देवों से सेवित, स्थिर, और महान थे। पुरोहित ने इसकी शोभा की प्रशंसा की, जिससे भरत आनंदित हुए। समवसरण के दर्शन के लिए आगे बढ़ते हुए, उन्होंने पुष्पवृष्टि, दुंदुभि शब्द, और मंदार वनों की सुगंधित वायु का अनुभव किया। फूलों से भरे मार्ग से वे बिना परिश्रम शिखर पर चढ़े।
श्लोक 72 से 81 समवसरण का दर्शन
भरत ने जिनेन्द्र के समवसरण को देखा, जहाँ सुर और असुर बैठते थे। धूलिसाल, मानस्तंभ, और स्वच्छ परिखा को पार कर वे लतावनों और गोपुरों तक पहुँचे। रत्नों से सुशोभित कोट और मंगलद्रव्यों ने उनकी इंद्रियों को संतुष्ट किया। नाट्यशालाएँ और धूपघटों ने समवसरण की शोभा बढ़ाई।
श्लोक 82 से 91 समवसरण की शोभा
भरत ने अशोक, चंपक, और सप्तपर्ण वनों में चैत्यवृक्षों की पूजा की। किन्नर देवियाँ जिनेन्द्र का उत्सव गा रही थीं। वनों की सुगंध और कोयलों के शब्दों ने आनंद बढ़ाया। ध्वजाभूमि यज्ञभूमि सी शोभित थी, जिसमें चक्र और हाथी के चिह्न थे। भरत ने इनका पूजन किया और आगे बढ़े।
श्लोक 92 से 101 समवसरण की संरचना
ध्वजाभूमि में दस प्रकार की ध्वजाएँ थीं। भरत ने चांदी के कोट, नाट्यशालाएँ, और कल्पवृक्षों के वन देखे। सिद्धार्थ वृक्षों की पूजा की और रत्नमयी स्तूपों का दर्शन किया। ये सब तीनों लोकों की शोभा का प्रतीक थे।
श्लोक 102 से 111 समवसरण की संरचना और पूजा
चक्रवर्ती भरत ने रत्नमयी स्तूपों का दर्शन किया, जो जिनेन्द्र प्रतिमाओं और तोरणों से सुशोभित थे। आश्चर्यचकित होकर उन्होंने इनकी पूजा की और कक्ष को पार किया। आकाशस्फटिक से निर्मित तीसरा कोट देखा, जो जिनेन्द्र की समीपता से शुद्ध प्रतीत होता था। कल्पवासी देवों से आज्ञा लेकर वे सभा में प्रवेशे। वहाँ एक योजन विस्तृत श्रीमण्डप में बारह संघों—मुनि, देवियाँ, राजा, और पशु—का दर्शन किया। उन्होंने तीन कटनीदार पीठ की प्रदक्षिणा की, धर्मचक्रों और चक्र, हाथी आदि चिह्नों वाली आठ महाध्वजाओं की पूजा की।
श्लोक 112 से 123 जिनेन्द्र का दर्शन
भरत ने गंधकुटी में भगवान वृषभदेव को मेरु शिखर जैसे सिंहासन पर देखा। वे छायारहित, तीन छत्रों से सुशोभित, और प्रभामण्डल से युक्त थे। अशोक वृक्ष चिह्न उनके शोक-निवारक स्वरूप को दर्शाता था। चामर, आकाशदुंदुभियाँ, और फूलों की वर्षा उनकी शोभा बढ़ाते थे। उनकी दिव्य ध्वनि अनेक भाषाओं में हृदय का अंधकार दूर करती थी। अनन्त वीर्य, सुगंध, और शुभ लक्षणों से युक्त भगवान को देखकर भरत आनंदित हुए और घुटनों पर नमस्कार किया।
श्लोक 124 से 131 पूजा और स्तुति का प्रारंभ
भरत ने भक्तिपूर्वक नमस्कार किया, उनका मुकुट और कुण्डल चञ्चल हो उठे। मोक्ष की इच्छा से उन्होंने जल, चंदन, पुष्पमाला, और अन्य सामग्री से भगवान की पूजा की। पूजा के बाद प्रणाम कर स्तोत्रों से स्तुति शुरू की। उन्होंने भगवान को अपार गुणों वाला, अविनश्वर, और परमात्मा कहा। स्वीकार किया कि उनकी शक्ति सीमित है, पर भक्ति से प्रेरित होकर स्तुति कर रहे हैं। उनकी भक्ति का फल महान है, जैसे स्वामी की सम्पत्ति सेवकों को समृद्ध करती है।
श्लोक 132 से 141 सर्वज्ञता और सप्तभंगी
भरत ने कहा कि घातिया कर्मों के नष्ट होने से भगवान के दर्शन, ज्ञान, और सुख प्रकट हुए। उनके केवलज्ञान ने लोक-अलोक को जाना। उनकी सप्तभंगी वाणी, जो पदार्थों के अस्तित्व, नास्तित्व, और अवक्तव्य स्वरूप को दर्शाती है, उनकी सर्वज्ञता को प्रमाणित करती है। यह वाणी विरोधरहित और सभी पदार्थों को समेटने वाली है, जो उनकी आप्तता को स्थापित करती है। अन्य देवों के वचनों में विरोध होता है, पर भगवान के उपदेश निर्भ्रान्त हैं।
श्लोक 142 से 151 भगवान की महिमा
भरत ने भगवान के सिंहासन को मेरु शिखर सा और छत्रत्रय को तीनों लोकों की प्रभुता का प्रतीक बताया। चामर, फूलों की वर्षा, और दुंदुभि शब्द उनकी महिमा दर्शाते थे। अशोक वृक्ष और उनकी प्रभा सभा को शोभित करते थे। उनकी दिव्य ध्वनि पशुओं तक के अंधकार को दूर करती थी। गंधकुटी मेरु की चूलिका सी थी, जो मुनियों की स्तुति से भक्तिमय प्रतीत होती थी।
श्लोक 152 से 164 समवसरण की विभूति
स्वर्ग के देव गंधकुटी में भगवान की सेवा करते थे। उनके मुकुटों पर भगवान के नखों की किरणें प्रसन्नता का प्रतीक थीं। देवांगनाओं के मुख नखों में कमल से प्रतीत होते थे। तीन कटनीदार पीठ धर्मचक्रों और ध्वजाओं से सुशोभित थी। समवसरण की संरचना—धूलिसाल, मानस्तंभ, परिखा, और वन—तीनों लोकों की शोभा का समावेश थी। यह विभूति भगवान की आंतरिक लक्ष्मी को दर्शाती थी।
श्लोक 165 से 181 जय-स्तुति
भरत ने भगवान की जय-स्तुति की, उन्हें कर्म-विजेता, सर्वज्ञ, और मोक्षदाता कहा। उनकी बाह्य विभूति वैराग्य को प्रभावित नहीं करती। उन्होंने भगवान को तीनों लोकों का स्वामी, अनन्त गुणों से युक्त, और अरिहंत कहा। गर्भ, दीक्षा, और मोक्ष कल्याणकों की प्रशंसा की। भगवान को वीतराग, स्वयंभू, और संसार-पारक कहकर नमस्कार किया। उनकी स्तुति से सभा पवित्र हुई।
श्लोक 182 से 191 स्तुति का फल
भरत ने केवलज्ञान और मोक्ष कल्याणकों की पूजा करने वाले देवों का स्मरण किया। भगवान की स्तुति से उनके वचन, मन, और शरीर पवित्र हुए। उनके दर्शन से वे धन्य हुए, जन्म सार्थक हुआ, और नेत्र संतुष्ट हुए। भगवान के तीर्थ में स्नान कर वे सुखी हुए। उनके नखों की किरणों से अभिषेक सा अनुभव हुआ, और दिग्विजय के पाप नष्ट हुए।
श्लोक 192 से 202 अयोध्या की वापसी
भरत ने चक्रवर्ती विभूति और भगवान की सेवा दोनों प्राप्त की। उनकी स्तुति से अर्जित पुण्य से वे चरणों में भक्ति की कामना करते हैं। आनंद के आँसुओं के साथ उन्होंने भगवान को नमस्कार किया। वृषभदेव से धर्म स्वरूप सुनकर वे प्रसन्न हुए। मुनियों को नमस्कार कर, समवसरण की विभूति से नेत्रों को तृप्त कर, वे अयोध्या लौटे। साठ हजार वर्षों के दिग्विजय और पुण्य से प्रेरित होकर उन्होंने जिनेन्द्र की भक्ति में आनंद प्राप्त किया।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 33 – Shlok 1 to 11
श्लोक ( Shlok ) 1
श्रीमानानमिताशेषनृपविद्याधरामरः । सिद्धदिग्विजयश्चक्री न्यवृत्तत्स्वां पुरीं प्रति ॥१॥
Thereafter, the illustrious Emperor Bharata—he who had humbled all kings, Vidyādharas, and celestial beings, and had triumphed gloriously in his conquest of the quarters—turned back toward his own Ayodhyā, resplendent in the glory of universal sovereignty.Verse 1
श्लोक ( Shlok ) 2
नवास्य निधयः सिद्धा रत्नान्यपि चतुर्दश: सिद्ध’ विद्याधरैः सार्द्ध षट्षण्डधरणीभुजः ॥२॥
इन महाराज भरतको नौ निधियां और चौदह रत्न सिद्ध हुए थे तथा विद्याधरोंके साथ साथ छह खण्डोंके समस्त राजा भी इनके वश हुए थे ।।२।।
To this sovereign Emperor Bharata were revealed the nine treasures and the fourteen celestial jewels; and not only the Vidyādharas, but all the monarchs of the six continents bowed to his dominion.Verse 2
श्लोक ( Shlok ) 3
जित्वा महीमिमां कृत्स्नां लवणाम्भोधिमेखलाम् । प्रयाणमकरोच्चक्री साकेतनगरं प्रति ॥३॥
लवण समुद्र ही जिसकी मेखला है ऐसी इस समस्त पृथिवीको जीतकर चक्रवर्ती ने अपने अयोध्या नगरकी ओर प्रस्थान किया ।।३।।
Having conquered the entire earth, girdled by the salt ocean as by a gleaming girdle, the universal monarch set forth on his return to the noble city of Ayodhyā.Verse 3
श्लोक ( Shlok ) 4
प्रकीर्णकचलद्वीचिरुल्लसच्छत्रबुद्धुदा । निर्ययौ विजयार्डाद्रितटाद् गङगेव सा चमूः ॥४॥
ढलते हुए चमर ही जिसकी लहरें हैं और ऊपर चमकते हुए छत्र ही जिसके बबूले हैं ऐसी वह सेना गंगाके समान विजयार्ध पर्वत के तटसे निकली ॥४॥
With waving yak-tail fans for its rippling waves and gleaming parasols for its glistening foam, that mighty army—like a river of victory—flowed forth from the slopes of Mount Vijayārddha, resembling the sacred Gaṅgā in its majestic sweep.Verse 4
श्लोक ( Shlok ) 5
करिणीनौभिरश्वीयकल्लोलैर्जनतोर्मिभिः । दिशो रुन्धन्बलाम्भोधिः प्रससर्प स्फुरद्ध्वनिः ॥५॥
हथिनीरूपी नावोंसे, घोड़ोंके समूहरूपी लहरोंसे और मनुष्योंके समूहरूपी छोटी छोटी तरङ्गोंसे दिशाओंको रोकता हुआ तथा खूब शब्द करता हुआ वह सेनारूपी समुद्र चारों ओर फैल गया ।।५।।
With elephants like stately ships, with waves formed of galloping steeds, and with countless foot soldiers rising like smaller ripples, that oceanic army surged forth, resounding mightily and spreading in all directions, as though to arrest the very march of the winds.Verse 5
श्लोक ( Shlok ) 6
चलतां रथचक्राणां चीत्कारैर्हय हेषितैः । बृंहितैश्च गजेन्द्राणां शब्दाद्वैतं तदाभवत् ॥६॥
उस समय चलते हुए रथोंके पहियोंके चीत्कार शब्दसे, घोड़ोंकी हिनहिनाहटसे और हाथियोंकी गर्जनासे शब्दाद्वैत हो रहा था अर्थात् सभी ओर एक शब्द ही शब्द नजर आ रहा था ।।६।।
At that time, the clamorous screech of chariot wheels, the neighing of steeds, and the thunderous trumpeting of elephants merged into a singular symphony of sound—so resounding and all-pervasive that the very air seemed filled with nothing but its echoing roar.Verse 6
श्लोक ( Shlok ) 7
भेर्यः प्रस्थानशंसिन्यो नेदुरामन्द्रनिःस्वनाः । अकालस्तनिताशङ्कामा तन्वानाः शिखण्डिनाम् ॥७॥
जिनका शब्द अतिशय गम्भीर है ऐसी प्रस्थान-कालको सूचित करनेवाली भेरियाँ मयूरोंको असमयमें ही बादलोंके गरजनेकी शंका बढ़ाती हुई शब्द कर रही थीं ।।७।।
The kettledrums, whose sound was deep and solemn, heralding the hour of departure, resounded so mightily that even the peacocks, deceived by their thunderous roar, mistook them for unseasonal clouds rumbling in the sky.Verse 7
श्लोक ( Shlok ) 8
तटाऽभूद्रुद्धमश्वीयं हास्तिकेन प्रसर्पता । न्यरोधि पत्तिवृन्दं च प्रयान्त्या रथकल्पया ।।८।।
उस समय दौड़ते हुए हाथियों के समूहसे घोड़ोंका समूह रुक गया था और चलते हुए रथोंके समूहसे पैदल चलनेवाले सिपाहियों का समूह रुक गया था ॥८॥
At that time, the charging herds of elephants brought the cavalries to a halt, while the advancing ranks of chariots compelled the marching foot soldiers to pause in their stride.Verse 8
श्लोक ( Shlok ) 9
पादातकृतसंबाधात् पथः पर्यन्तपातिनः। हया गजा वरूथाश्च भेजुस्तिर्यक्प्रचोदिताः ॥ ९ ॥
पैदल सेनाके द्वारा जिन्हें कुछ बाधा की गई है ऐसे हाथी घोड़े और रथ-थोड़ी दूरतक कुछ तिरछे चलकर ठीक रास्तेपर आ रहे थे। भावार्थ-सामने पैदल मनुष्योंकी भीड़ देखकर हाथी घोड़े और रथ बगलसे बरक कर आगे निकल रहे थे ।।९।।
The elephants, steeds, and chariots—whose progress had been momentarily impeded by the dense throng of foot soldiers—were now veering slightly off course, only to regain their proper path after a brief detour. The implication is clear: seeing the mass of foot soldiers ahead, the elephants, horses, and chariots swerved to the side, advancing swiftly past them.Verse 9
श्लोक ( Shlok ) 10
पर्वतोदग्रमारूढो गजं विजयपर्वतम् । प्रतस्थे विचलन्मौलिः चक्री शक्रसमद्युतिः ॥१०॥
जिनका मुकुट कुछ कुछ हिल रहा है और जिनकी कान्ति इन्द्रके समान है ऐसे चक्रवर्तीने पर्वत के समान ऊंचे विजय पर्वत नामके हाथीपर सवार होकर प्रस्थान किया ।।१०।।
The universal monarch, whose crown swayed gently and whose radiance rivaled that of Indra himself, set forth upon the majestic elephant named Vijayaparvata—its towering form resembling a mountain—embarking on his journey with regal grace.Verse 10
श्लोक ( Shlok ) 11
अनुगङ्गातटं देशान् विलाङ्घय ससरिद् गिरीन् । कैलासशैलसान्निध्यं प्रापतच्चक्रिणो बलम् ॥११॥
चक्रवर्ती की वह सेना गङ्गा नदीके किनारे किनारे अनेक देश, नदी और पर्वतोंको उल्लंघन करती हुईक्रमसे कैलास पर्वतके समीप जा पहुंची ।।११।।
The army of the universal monarch, crossing numerous lands, rivers, and mountains in succession, traversed along the banks of the sacred Gaṅgā, until it reached the vicinity of Mount Kailāsa, its journey unhindered by any obstacle.Verse 11
श्लोक 12 से 27
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 159
आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 154 | श्लोक 155 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 199
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