आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 45- Shlok 92 to 103
श्लोक ( Shlok ) 92
सम्प्राप्तभावपर्यन्तौ विदतुर्न’ स्वयं च तौ । मुक्त्वैकं शं” सहैवोद्यत्स्वक्रियोद्रेक सम्भवम् ॥९२॥
जिनके भावोंका अन्त आ चुका है ऐसे वे दोनों ही एक साथ उत्पन्न हुई अपनी क्रियाओंके उद्रेकसे उत्पन्न होनेवाले एक सुखको छोड़कर और कुछ नहीं जानते थे ॥९२॥
Those two, whose emotions had reached their ultimate limit, knew nothing beyond the single bliss arising from the surge of their simultaneous actions—bliss born of their shared, fervent union.92
श्लोक ( Shlok ) 93
रतावसाने निःशक्त्योर्गाढौत्सुक्यात् प्रपश्यतोः । तयोरन्योन्यमाभातां नेत्रयोरिव पुत्रिके ॥९३॥
संभोग क्रीड़ाके अन्तमें अशक्त हुए तथा गाढ़ उत्कंठाके कारण परस्पर एक दूसरेको देखते हुए उनके नेत्रोंकी पुतलियां एक दूसरेके नेत्रोंकी पुतलियोंके समान ही सुशोभित हो रही थीं। (यहां अनन्वयालंकार होनेसे उपमेय ही उपमान हो गया है) ॥९३॥
At the culmination of their amorous play, weakened by exhaustion and gazing at each other with fervent longing, the pupils of their eyes mirrored one another so perfectly that each seemed the very image of the other’s—so complete was their unity, that the object of comparison itself became the standard of likeness.
(Note: Here, owing to the literary device of ananyayālaṅkāra, the subject and object of comparison have become indistinguishable.)93
श्लोक ( Shlok ) 94
अवापि या तया प्रीतिस्तस्मात्तेन च या ततः । “तयोरन्योन्यमेवासीदुपमानोपमेयता ॥९४॥
सुलोचनाने जयकुमारसे जो सुख प्राप्त किया था और जय-कुमारने सुलोचनासे जो सुख पाया था उन दोनोंका उपमानोपमेय भाव परस्पर-उन्हीं दोनोंमें था ।।९४।।
The bliss Sulochana received from Jayakumara, and the joy he found in her—each served as both the standard and the example for the other, for their delight was so perfect that only their own rapture could mirror itself.94
श्लोक ( Shlok ) 95
भुक्तमात्मम्भरित्वेन यत्सुखं परमात्मना । ततोऽप्यधिकमासीद्वा संविभागेऽपि तत्तयोः ॥९५॥
परमात्माने सबके स्वामी होकर जिस सुखका अनुभव किया था उन दोनोंका वह सुख परस्परमें विभक्त होनेपर भी उससे कहीं अधिक था । भावार्थ-यद्यपि उन दोनोंका सुख एक दूसरेके संयोगसे उत्पन्न होनेके कारण परस्परमें विभक्त था, तथापि परिमाणकी अपेक्षा परमात्माके पूर्ण सुखसे भी कहीं अधिक था। (यहां ऐसा अतिशयोक्ति अलंकारसे कहा गया है वास्तवमें तो वह परमात्माके सुखका अनन्तवां भाग भी नहीं था) ॥९५॥
Though the supreme bliss of the Almighty, Lord of all, is complete in itself, the joy shared by these two—though divided between them by their mutual union—surpassed even that divine delight in its measure.
(Meaning: Through the literary device of hyperbole (atiśayokti alaṅkāra), it is suggested that although their pleasure was but a finite, divided experience, it appeared greater even than the infinite bliss of the Supreme Being—though in truth, it could not compare to even the smallest fraction of that divine ecstasy.)95
श्लोक ( Shlok ) 96
इत्यन्योन्य समुद्भूतप्रीतिस्फीतामृताम्भसि । कामाम्भोधौ निमग्नौ तौ स्वैरं चिक्रीडतुश्चिरम् ॥९६॥
इस प्रकार परस्परमें उत्पन्न होनेवाले प्रेमामृतरूपी जलसे भरे हुए कामरूप समुद्रमें डूबकर वे दोनों चिरकालतक इच्छानुसार क्रीड़ा करते रहे ॥ ९६।।
Thus, immersed in the ocean of desire, brimming with the nectar-like waters of mutual love, the two reveled in playful delight for a long time, indulging their every wish.96
श्लोक ( Shlok ) 97 – 98
तदा स्वमन्त्रिप्र “हित गूढपत्रार्थचोदितः । जयो जिगमिषुस्तूर्ण स्वस्थानीयं धियो वशः ॥९७॥भवद्भिर्भावितैश्वर्य मां मदीया’ दिदृक्षवः । इति मामं समभ्येत्य’ ‘प्रस्थानार्थमबूबुधत् ॥९८॥
उसी समय एक दिन जो अपने मंत्रीके द्वाराभेजे हुए पत्रके गूढ़ अर्थसे प्रेरित हो रहा है, बुद्धिमान् है, और शीघ्रसे शीघ्र अपने स्थानपर पहुं-चनेकी इच्छा कर रहा है ऐसे जयकुमारने मामा (श्वसुर) के पास जाकर अपने जानेकी सूचना दी कि हे माम, आपने जिसका ऐश्वर्य बढ़ाया है ऐसे मुझे मेरी प्रजा देखना चाहती है । ।।९७-९८।।
At that very time, Jayakumara—prompted by the subtle meaning of a letter sent by his minister, wise and eager to return swiftly to his own domain—approached his uncle (father-in-law) and informed him of his departure, saying:
“O revered uncle, the people whose prosperity you have so greatly enhanced now long to behold me once more.” 97 – 98
श्लोक ( Shlok ) 99
तद्बुध्वा नाथवंशेशः किञ्चिदासीत् ससंभ्रमः । जये जिगमिषौ स्वस्मान्न स्यात् कस्याकुलं मनः ।।
यह जानकर नाथवंशका स्वामी अकंपन कुछ घबड़ाया सो ठीक ही है क्योंकि अपनेसे जय (जयकुमार अथवा विजय) के जानेकी इच्छा करनेपर किसका मन व्याकुल नहीं होता है ? ॥९९॥
Learning this, Akampana, the lord of the Nath lineage, grew somewhat distressed—and rightly so, for whose heart would not be troubled upon hearing that Jay (whether Jayakumara or victory itself) wished to depart from them?99
श्लोक ( Shlok ) 100
विचार्य कार्यपर्यायं तथास्त्वित्याह तं नृपः । स्नेहानुवर्तनीं नैति दीपिकां वा धियं सुधीः ॥१००॥
तदनन्तर कार्योंका पूर्वापर विचारकर राजा अकंपनने जयकुमारसे ‘तथास्तु’ कहा सो ठीक ही है क्योंकि बुद्धिमान् मनुष्य दीपिकाके समान स्नेह (तेल अथवा प्रेम) का अनुवर्तन करनेवाली बुद्धिको नहीं प्राप्त होते हैं। भावार्थ-बुद्धिमान् मनुष्य स्नेहके पीछे बुद्धिको नहीं छोड़ते हैं ।॥१००॥
Thereafter, weighing the order and consequence of affairs, King Akampana assented to Jayakumara’s request, saying, “So be it.” And rightly so—for wise men do not let their judgment, like the flame of a lamp, blindly follow the course of affection; rather, they guide their love with reason, never allowing wisdom to be swayed by mere attachment. 100
श्लोक ( Shlok ) 101 -103
प्रादात् प्रागेव सर्वस्वं तस्मै दत्तसुलोचनः । तथापि लौकिकाचारं परिपालयितुं प्रभुः ॥१०१॥ दत्वा कोशादि सर्वस्वं स्वीकृत्य प्रीतिमात्मनः । अनुगम्य स्वयं दूरं शुभेऽहनि वधूवरम् ॥१०२॥कथं कथमपि त्यक्त्वा स “सजानिर्जनाग्रणीः । “व्यावर्तत ततः शोकी “तुग्वियोगो हि दुःसहः ॥१०३॥
यद्यपि महाराज अकंपन, सुलोचनाको देकर पहले ही जयकुमार-को सब कुछ दे चुके थे तथापि लौकिक व्यवहार पालन करनेके लिये अपने प्रेमके अनुसार खजाना आदि सब कुछ देकर उन्होंने किसी शुभ दिनमें वधू-वरको बिदा किया । सब मनुष्योंमें श्रेष्ठ महाराज अकंपन अपनी पत्नी सहित कुछ दूरतक तो स्वयं उन दोनोंके साथ साथ गये फिर जिस किसी तरह छोड़कर शोक करते हुए वहांसे वापिस लौट आये सो ठीक ही है क्योंकि संतान-का वियोग बड़े दुःखसे सहा जाता है ।।१०१-१०३॥
Although the illustrious King Akampana, by giving Sulochana in marriage, had already bestowed all he possessed upon Jayakumara, he nonetheless, in observance of worldly custom, gifted him treasures and riches in keeping with his boundless affection, and on an auspicious day, bid farewell to the bride and groom.
The noble king, foremost among men, then accompanied the newlyweds for some distance, walking alongside them with his queen. At last, though pained at heart, he took leave of them and returned home in sorrow. And rightly so, for the parting from one’s own child is a grief that few can bear without great anguish. 101 -103
श्लोक 104 से 113
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 103 | श्लोक 104 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 203 | श्लोक 204 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 352 | श्लोक 353 से 361 | श्लोक 362 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91